आज मास्टर जी विद्यालय से वापस आकर ,अपने घर के बरामदे में चाय का कप लेकर बैठे थे ।चाय को खत्म करके, एकाएक घर की तरफ कुर्सी को घूमाकर सारे घर को ध्यानपूर्वक निहारने लगे और एक-एक करके अपने अतीत को याद करने लगे ।पहला चेहरा माता-पिता का उनकी आंखों के सामने आया।
माता-पिता का लाड- प्यार, उनके द्वारा की गई बेटे के लिए मेहनत, एक-एक पहलू किसी फिल्म की तरह उनकी आंखों के सामने जीवंत होने लगा। मास्टर जी को लगा जैसे वह अपनी आंखों के सामने फिर से उन्हीं खुशनुमा पलों को जी रहे हैं। कुछ पल हृदय में आनंद आया
और पल भर में वह आनंद समाप्त हो गया। जब उन्हें याद आया कि अब उनके माता-पिता इस दुनिया में नहीं है। उनका दिल भर आया। आंखों से अश्रु की धारा को समेटते हुए, वह थोड़े अपने आप को संभालने लगे। उसके बाद उनकी पत्नी का चेहरा उनके सामने आने लगा।
वह अपनी पत्नी के साथ बिताए गए, उन सुनहरी लम्हों उन खट्टी मीठी यादों को याद करने लगे। साथ में दो प्यारे बच्चे बबलू और रजनी उनकी आंखों के सामने जैसे जीवंत रूप में प्रकट हो गए। मास्टर जी के चेहरे पर खुशी का पल दो पल का झोंका आया और मास्टर जी अपनी पत्नी और अपने बच्चों रजनी और बबलू की सुनहरी यादों में खो गए ।
उन्हें याद आया कि किस प्रकार पहली बार रजनी और बबलू ने उन्हें पापा कहकर पुकारा था? और वह उसे शब्द को सुनने के लिए बार-बार उनके करीब जाते थे। बस इतना ही जीवंत एहसास हुआ और मास्टर जी एकदम से रो पड़े। मास्टर जी को याद आया कि किस प्रकार से वह उनके बच्चों के साथ और उनकी पत्नी के साथ उनका अंतिम सफर था। जिस समय वह गाड़ी लेकर घूमने गए थे।
इस यात्रा में सब कुछ ठीक-ठाक से हो रहा था ।जब वह घर पर पहुंचने ही वाले थे। उसी समय एक अनियंत्रित ट्रक उनकी गाड़ी से टकरा गया था और इस हादसे में उन्होंने अपने बीवी और बच्चों को खो दिया था। माता-पिता के जाने के बाद एकमात्र सहारा उनकी पत्नी और उनके बच्चे थे। परंतु एक दुर्घटना ने उनका सारा संसार समाप्त कर दिया ।मास्टर जी की आंखों से टपटप अश्रु की धारा बहने लगे।
गहरी सांस लेकर मास्टर जी ने अपने आप को संभाल, उठने की कोशिश करने लगे ।परंतु जैसे परिवार के बिछड़ने के दर्द ने उनको कमजोर बना दिया था। वह उठते -उठते फिर से बैठ गए और आसमान की तरफ देखकर सिर्फ एक ही प्रश्न करते। आखिर मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ? मैंने ऐसा कौन सा गुनाह किया था? जो मुझे इस प्रकार का जीवन जीना पड़ रहा है। बस यही सोच ही रहे थे और ईश्वर से शिकायत कर ही रहे थे।
अचानक उनके सामने एक मैना छत पर बैठ गई और मस्ती से उछल कूद करने लगी ।उन्होंने ध्यान से देखा तो मैना के एक पांव का एक पंजा नहीं था। मैना फिर भी एक पंजे के सहारे लगातार उछलती कूदती दाने चुगने की कोशिश कर रही थी। उस टूटे हुए पंजे का दुख न मनाकर लगातार खुशी से चहक रही थी ।
दाने चुग रही थी। मास्टर जी को समझ आ गया कि एक छोटी सी मैना दुखों से ना घबराकर जीवन को कितनी आसानी से जी रही है। हम इंसान होकर जीवन से हार मान रहे हैं । ईश्वर इंसान को जिस स्थिति में रखता है। हमें उस स्थिति में अपने आप को ढालना चाहिए और प्रसन्न रहना चाहिए।
ईश्वर का धन्यवाद करना चाहिए कि वह हमें इस संसार में लाया है तो वही हमारे दुखों का निवारण करेगा। हमें वह शक्ति भी नवाजेगा। जिससे हम उन दुखों को झेल सकें। मास्टर जी ने अपनी आंखें पौछी
और ईश्वर का धन्यवाद किया। सारे अतीत के गमों को पीछे छोड़कर कुर्सी से उठे और दैनिक भ्रमण के लिए निकल गए। जाते-जाते सिर्फ यही कहते कि जो विधि का विधान है उसे कोई नहीं टाल सकता।
(लेखक : संजय सिंह)