छोटे बच्चों ने रामदास को झक झोरते हुए कहा_बाबा आप इतने परेशान क्यों हैं? बयोवृदध रामदास ने अपने 8 वर्षीय पोते के कोमल हाथों को पकड़ कर चूम लिया और उसे आलिंगन में लेकर बोले’अरे बाबू हम कहां परेशान हैं,, तुम्हारे रहते हमें क्या दुख? उस बालक को क्या बताते कि उसके पिता की शादी में जितना पैसा महाजन से लिया
उसे पूरा न उतर सके और आज उनके लाखों की जमीन के कागजात वह महाजन ले गया और साथ में धमकी भी दे गया कि आज जमीन के कागज ले जा रहे हैं एक माह में पूरा भुगतान न हो पाया तो तुम्हारा इतना बड़ा मकान और ट्यूबवेल सब ले जाएंगे धक्के मार कर तुम सबको घर से बाहर निकाल देंगे,,,,
रामदास अपना दुख किसी से कहना नहीं चाहते थे,, एक बेटा उसकी पढ़ाई बैंगलोर में रहकर वह इंजीनियर बना बुद्धिमान और ज्ञानी था। अपनी योग्यता से उसने छात्रवृत्ति पाई और लंदन गया पिता के लिए गर्व और गौरव की बात थी वहां पर उसे नौकरी भी मिल गई,, इस बीच गांव के लोगों ने
कहा -अपने बेटा की शादी कर दोभैया, नहीं तो किसी दिन एक गोरी को पकड़ कर घर ले आएगा, अपने अकेले बेटे से हाथ धो बैठोगे। रामदास की पत्नी की बहुत बीमार चल रही थी उसको त्रिवेदी हो गया था। उसके स्वास्थ्य के लिए तथा बेटे की बंगाल में रखकर पढ़ाई के लिए सर पर उधार का बोझा था। एक बार बेटा कुछ दिनों के लिए घर आया तो रामदास ने उसे हिम्मत करके कुछ लड़कियों के चित्र दिखाएं कि वह अपने जीवन साथी
के रूप में किसी को पसंद करने और साथ ही बताया कि एक लड़की बहुत अच्छी है जो उसके योग्य है। बेटे ने कहा पिताजी आप जो कहेंगे मैं वही करूंगा लेकिन अभी तो मेरी नौकरी का ट्रेनिंग का समय पूरा नहीं हुआ आप कुछ दिन और रुक जाइए,, फिर मां रोने लगी,, बोली मेरी आंख बंद होने से पहले बहू का मुंह दिखा दे बाबू,,, बेचारा बेटा चुप रहा,बोला-अभी तो
मैंने कुछ पैसे जमा नहीं किया बात को बीच में काटते हुए रामदास ने कहा बेटा महेश इसकी चिंता तुम मत करो मैं इंतजाम कर लूंगा। 4 महीने बाद महेश लंबी छुट्टियां लेकर आया और उसका विवाह हो गया। बहू बहुत सुशील, पढ़ी-लिखी और सुंदर थी माता-पिता को धरती पर स्वर्ग मिल गया। महेश ने जाने से कुछ दिन पूर्व रात्रि में पत्नी से कहा,, पिताजी का रहे थे
की मैं तुम्हें अपने साथ ले जाऊं, तुम अभी से इतनी जिम्मेदारियां क्यों उठाओगी,, तुम्हारी क्या राय है, पत्नी महेश के गले लग गई उसने कहा मैं भी एक बड़े परिवार की लड़की हूं दादा-दादी,मां पिताजी,भाई बहनों को देखती चली आ रही हूं, मैंने वहां पर भी सब संभाला है और जब यहां मां इतनी बीमार है, पिताजी सब खेती मकान अकेले देख रहे हैं तो ऐसे में उनको अकेले
नहीं छोड़ सकती आपके साथ तीन-चार माह का समय मेरे लिए बहुमूल्य है, आप अपना काम देखिए बाद में पिताजी का सहारा बन जाइए। महेश को जैसे कितनी बड़ी संपत्ति मिल गई उसे पत्नी के रूप में स्त्री के संपूर्ण स्वरूप का दर्शन हो गया। महेश चला गया। बहू पूरी स्वतंत्रता के साथ अपना ससुराल और कभी-कभी मायका भी संभाल लेती थी। महेश के जाने के
एक माह के अंदर ही उसे खुशखबरी मिली कि बह पिता बनने वाला है,, महेश इतनी जल्दी आ नहीं सकता था वह फोन से बातचीत करता रहता था। अपने विवाह की वर्षगांठ पर भी नहीं आ सका। बहू की सेवा से मां कुछ तो ठीक हो गई पर पूरी तरह से नहीं। वर्षगांठ पर पूरे गांव को रामदास ने दावत दी सभी गांव के लोग कह रहे थे की भाई कुछ समय बाद फिर
दावत मिल जाएगी इस घर में नया मेहमान आ जाएगा और यही हुआ पोते का आगमन हुआ। उसकी खबर पाकर महेश बहुत खुश हुआ महेश को भी अब अच्छा वेतन मिलने लगा, वह पिता के पास कुछ पैसा भेजने लगा। बच्चों के पहले जन्मदिन पर घर भी आया परिवार के साथ अच्छा समय बीता। इस बार रामदास ने कहा”बेटा अब बहू और अपने बेटे के साथ जाना तुम अकेले मत रहो, महेश ने पूरी व्यवस्था की, कागज तैयार कराया, छोटे बच्चों का बिछड़ना दादी बाबा को दुख दे रहा था।
बहू ने भी रोते हुए कहा मां का ध्यान रखिएगा और अपना भी। घर सूना हो गया और मां की बीमारी गंभीर हो गई। बेटे ने बाहर से पैसा भेजते हुए कहा मां को शहर में एडमिट कर दो मैं पैसा भेज रहा हूं,, पैसा पानी की तरह बहा दिया गया पर मां को नहीं बचाया जा सका। उन्होंने 5 वर्ष का जीवन असाध्याय होकर जिया था,, रामदास दूर बैठे बेटे को कष्ट न पहुंचे इसलिए हर बात नहीं बताते थे। कुछ दिनों के लिए महेश ने चाहा पिता उसके साथ चले पर वह नहीं माने तो बहू ने जिद पकड़ ली
क्यों यही रहेगी और महेश से कहा आप अकेले जाइए इस समय घर में मेरा होना जरूरी है,, महेश ने कहा मैं यहीं कहीं पास के शहर में नौकरी देख लूंगा आप लोग चिंता ना करें हमारा गांव हरियाणा में है काम तो मिल जाएगा,, महेश चला गया। अब रामदास लाखों के उधर को निपटने की चिंता में लग गए छोटे बच्चे ने बाबा के गले में बाहें डालकर कहा,, आप क्या सोचते
रहते हो,, वह उसे बच्चों को उठाकर उसे पुचकारते हुए खेतों की ओर चल पड़े अचानक सामने से आता महाजन मिल गया, रामदास से सोच कि वे आंखें चुरा कर उससे किनारा कर लें, लेकिन यह तो आश्चर्य था कि महाजन उनके सामने आ गया और मुस्कुराते हुए बोला,, कहां नजरे बचा कर जा रहे हो तुम्हारे बेटे ने मुझे खत तथा पैसे भेजे हैं,, यह खत देखो,, इसके साथ
ही वह पत्र पढ़ कर सुनाने लगा, मैं अपने पिता के खेत व जमीन छुड़ा रहा हूं, कुछ पैसा रह जाएगा उसे धीरे-धीरे चुका दूंगा। मैं दो माह बाद वही रहूंगा, मुझे काम भी मिल गया है, मेरे पिता तथा परिवार को परेशान ना करें, तुम जमीन व जायदाद सब ले भी लोगे तो भी क्या मेरे पिता की सबसे बड़ी ताकत और खुशियां
और सबसे बड़ा धन उनका परिवार उनसे छिन सकोगे भाई परिवार का धन सबसे ज्यादा संतोष देता है, मेरे पिता इस धन से परिपूर्ण है। यह सुनाते -सुनाते महाजन रोने लगा। रामदास ने उसे चुप कराया और ईश्वर का धन्यवाद दिया उनकी आंखों में खुशी के आंसू थे आज उनकी झोली दुनिया के सबसे बड़े धन से भरी हुई थी।
लेखिका : सुमन
#सबसे बड़ा धन परिवार