जब जेठानी ने देवरानी की गैर मौजूदगी में.. उसके कमरे पर कब्जा कर लिया |
ऑटो रिक्शा की आवाज़ के साथ ही सुमेधा ने चैन की साँस ली। पिछले एक महीने से वह अपने मायके में थी, जहाँ उसकी माँ की बाईपास सर्जरी हुई थी। अस्पताल के चक्कर, रातों का जगना और घर की ज़िम्मेदारी—इन सबने उसे शारीरिक और मानसिक रूप से निचोड़ दिया था। अब वह वापस अपने ससुराल, अपने घर लौट रही थी। उसे बस अपने कमरे की, अपने उस बिस्तर की याद आ रही थी जहाँ वह सुकून से पैर फैलाकर सो सके।
सुमेधा ने गेट खोला। घर में सन्नाटा था। दोपहर के दो बज रहे थे। सासू माँ शायद अपने कमरे में आराम कर रही होंगी और जेठानी, वंदना भाभी, शायद ऊपर अपने कमरे में होंगी। सुमेधा ने धीरे से अपना सूटकेस अंदर किया और सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर अपनी मंजिल की ओर बढ़ी।
यह दो मंजिला मकान सुमेधा के ससुर जी ने बनवाया था। नीचे सासू माँ और ससुर जी रहते थे। ऊपर की मंजिल पर दो हिस्से थे—दाहिनी तरफ वंदना भाभी और उनके पति (सुमेधा के जेठ) का तीन कमरों का सेट था, और बाईं तरफ सुमेधा और उसके पति, अनिरुद्ध का दो कमरों का छोटा सा हिस्सा था। सुमेधा को अपने हिस्से से बहुत प्यार था, ख़ासकर उसके उस छोटे से ‘स्टडी रूम’ से, जिसे उसने अपनी किताबों और पेटिंग्स से सजाया था। वह एक फ्रीलांस ग्राफिक डिज़ाइनर थी और वही उसका वर्कस्टेशन था।
सुमेधा ने अपने पर्स से चाबी निकाली और अपने मुख्य दरवाज़े के ताले में डाली। लेकिन चाबी घूमी नहीं। उसने दोबारा कोशिश की। ताला नहीं खुला। उसने गौर से देखा—ताला बदला हुआ था।
उसके माथे पर शिकन आ गई। “अनिरुद्ध तो टूर पर हैं, फिर ताला किसने बदला?” उसने सोचा।
उसने वंदना भाभी के हिस्से की घंटी बजाई। कुछ देर बाद वंदना भाभी बाहर निकलीं। उन्होंने एक नाईटी पहन रखी थी और बाल बिखरे हुए थे, जैसे अभी सोकर उठी हों।
“अरे सुमेधा? तुम आ गईं? अनिरुद्ध ने तो कहा था तुम परसों आओगी,” वंदना के चेहरे पर सुमेधा को देखकर ख़ुशी से ज़्यादा हड़बड़ाहट दिखाई दी।
“हाँ भाभी, माँ की तबियत अब ठीक है, तो मैंने सोचा जल्दी आ जाऊँ। वैसे भी अनिरुद्ध कल रात तक लौट रहे हैं। भाभी, मेरे दरवाज़े की चाबी? ताला बदला हुआ है,” सुमेधा ने पूछा।
वंदना थोड़ी असहज हो गई। उसने अपनी नज़रें चुराते हुए कहा, “हूँ… वो दरअसल… तुम अंदर आओ, मैं चाबी देती हूँ।”
सुमेधा को कुछ अजीब लगा। वंदना भाभी अंदर गईं और चाबियों का गुच्छा लेकर आईं। सुमेधा ने चाबी ली और अपना दरवाज़ा खोला।
दरवाज़ा खोलते ही सुमेधा के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
सामने का हॉल, जो हमेशा साफ़-सुथरा और ‘मिनिमलिस्ट’ रहता था, अब सामान से अटा पड़ा था। वंदना भाभी के पुराने सोफे, जो उन्होंने दिवाली पर बदलने के लिए निकाले थे, यहाँ रखे थे। डाइनिंग टेबल पर पुराने अखबारों के ढेर लगे थे।
सुमेधा का दिल ज़ोर से धड़का। वह भागकर अपने बेडरूम की तरफ गई। बेडरूम का नज़ारा और भी भयावह था। उसके बिस्तर पर वंदना भाभी के बच्चों—चिंटू और पिंकी—के खिलौने और स्कूल बैग्स बिखरे पड़े थे। अलमारी का दरवाज़ा खुला था और सुमेधा के कपड़े एक कोने में कुर्सी पर ढेर लगाकर पटके गए थे, जबकि अलमारी में वंदना भाभी की साड़ियाँ और जेठ जी के कोट टंगे थे।
“यह सब क्या है भाभी?” सुमेधा की आवाज़ में कंपन था।
वंदना भाभी पीछे-पीछे आ गई थीं। वे बड़ी बेपरवाही से बोलीं, “अरे सुमेधा, तुम तो जानती ही हो, नीचे वाले कमरे में पेंटिंग का काम शुरू होने वाला था। और हमारे हिस्से में चिंटू के दोस्तों का ग्रुप प्रोजेक्ट चल रहा था। तुम थी नहीं, अनिरुद्ध भी टूर पर था… तो हमने सोचा कि यह जगह खाली ही तो पड़ी है। थोड़ी ‘एडजस्टमेंट’ कर ली।”
“एडजस्टमेंट?” सुमेधा ने हैरानी से पूछा। “भाभी, यह एडजस्टमेंट नहीं, कब्ज़ा है। आपने मेरे पर्सनल सामान को हाथ कैसे लगाया? मेरे कपड़े… मेरी चीज़ें…”
सुमेधा को अचानक अपने स्टडी रूम का ख्याल आया। वह दौड़कर उस छोटे कमरे की तरफ गई जो उसकी आत्मा था।
जैसे ही उसने दरवाज़ा खोला, उसकी आँखों से आँसू छलक पड़े।
उसका वर्कस्टेशन गायब था। उसकी महंगी एर्गोनोमिक कुर्सी की जगह एक पुरानी सिलाई मशीन रखी थी। उसकी किताबों की अलमारी, जिसमें उसने दुर्लभ किताबें सहेज कर रखी थीं, उसे हटाकर वहाँ वंदना भाभी ने अपने अचार के मर्तबान और सर्दियों के रज़ाइयां रखने का स्टोर रूम बना दिया था। उसका कंप्यूटर मॉनिटर एक कोने में ज़मीन पर पड़ा था, जिस पर धूल जमी थी।
“मेरा कंप्यूटर…” सुमेधा ने मॉनिटर को उठाया। “भाभी, यह मेरा ऑफिस है! आपने इसे स्टोर रूम बना दिया?”
वंदना भाभी ने अब रक्षात्मक रुख अपना लिया। “अरे, क्या ऑफिस-ऑफिस लगा रखा है। दिन भर कंप्यूटर पर टिक-टिक ही तो करती हो। कौन सा कोई बहुत बड़ी कंपनी चला रही हो। और देखो सुमेधा, बड़ी हूँ मैं तुमसे। घर परिवार में चीज़ें मिल-बाँट कर इस्तेमाल होती हैं। तुम्हारा कमरा एक महीने से बंद पड़ा था, धूल खा रहा था। मैंने साफ़ करवाकर इस्तेमाल कर लिया तो क्या पहाड़ टूट पड़ा?”
“इस्तेमाल करने और घर बदल देने में फ़र्क होता है भाभी,” सुमेधा ने सख़्त लहज़े में कहा। “आपने मुझसे एक बार पूछना भी ज़रूरी नहीं समझा? कम से कम फ़ोन तो कर लेतीं।”
“फ़ोन करती तो तुम माँ की बीमारी का रोना लेकर बैठ जातीं। मैंने सोचा तुम आओगी तो समझा दूँगी। अब आ गई हो न, तो धीरे-धीरे कर लेना अपना सामान सेट। कौन सा अभी आते ही तुम्हें काम पर बैठना है,” वंदना ने बात को रफा-दफा करना चाहा।
सुमेधा का सिर चकरा रहा था। थकान और अपमान का मिला-जुला असर था। वह सोफे पर (जो उसका नहीं था) बैठ गई।
शाम को सासू माँ ऊपर आईं। सुमेधा को लगा कि शायद माँ जी कुछ कहेंगी। लेकिन माँ जी ने आते ही कहा, “अरे सुमेधा, अच्छा हुआ तू आ गई। देख वंदना ने कितनी अकलमंदी का काम किया। तेरे खाली कमरों का कितना सही इस्तेमाल किया। चिंटू को पढ़ने में दिक्कत हो रही थी, अब यहाँ शांति से पढ़ लेता है। और हमारे सर्दियों के कपड़े भी यहाँ आ गए। अब तू आ गई है, तो मिलजुलकर रह लेना।”
सुमेधा समझ गई कि यह सिर्फ़ वंदना भाभी का किया-धरा नहीं है, इसमें पूरे घर की मौन सहमति है। उन्हें लगता था कि सुमेधा का ‘स्पेस’ और उसका ‘काम’ दोनों ही फ़ालतू हैं, जिनका इस्तेमाल वे अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं।
उस रात सुमेधा को नींद नहीं आई। वह उस बिस्तर पर लेटी थी जिसे वह अपना कहती थी, लेकिन चादरें वंदना भाभी की थीं। उसे घुटन महसूस हो रही थी। उसे लगा जैसे उसकी निजता (privacy) का चीरहरण हुआ हो।
अगली सुबह, सुमेधा उठी। उसने कोई चाय नहीं बनाई, न ही वह नीचे नाश्ते के लिए गई। उसने अपना लैपटॉप बैग उठाया और सीधे बाहर निकल गई।
दोपहर में जब वह लौटी, तो साथ में दो मज़दूर थे।
वंदना भाभी बालकनी में बैठी चाय पी रही थीं। मज़दूरों को देखकर चौंक गईं।
“ये कौन हैं सुमेधा? और ये डिब्बे क्यों ला रहे हैं?”
सुमेधा ने बिना रुके मज़दूरों को निर्देश दिया, “भैया, ये सारा सामान जो इस कमरे में नहीं होना चाहिए, इसे बाहर गैलरी में निकाल दो। और ये सोफे… इन्हें सीढ़ियों के पास रख दो।”
वंदना भाभी का कप हिल गया, चाय छलक गई। “सुमेधा! तुम्हारा दिमाग तो ख़राब नहीं हो गया? यह क्या तमाशा है? चिंटू के प्रोजेक्ट का सामान रखा है अंदर। आचार के मर्तबान टूट जाएंगे।”
सुमेधा मुड़ी और वंदना भाभी की आँखों में आँखें डालकर बोली, “भाभी, तमाशा मैंने नहीं, आपने शुरू किया था। मेरा घर कोई ‘धर्मशाला’ या ‘स्टोर रूम’ नहीं है जहाँ आप अपना फ़ालतू सामान डंप कर दें। यह मेरा घर है, और यहाँ चीज़ें मेरे हिसाब से रहेंगी।”
“माँ जी!” वंदना भाभी ज़ोर से चिल्लाईं। “देखिए आपकी छोटी बहू क्या कर रही है!”
सासू माँ दौड़ती हुई ऊपर आईं। सामान को बाहर निकलता देख वे भी भड़क गईं। “सुमेधा, शर्म नहीं आती? जेठानी का सामान ऐसे फिंकवा रही है? घर की इज़्ज़त का तमाशा बना दिया।”
सुमेधा ने एक गहरी साँस ली। वह अब रो नहीं रही थी।
“माँ जी,” सुमेधा ने बहुत शांत स्वर में कहा। “इज़्ज़त की बात आप मत कीजिये। जब मेरी ग़ैर-मौजूदगी में मेरे कमरे का ताला तोड़ा गया (या चाबी बनवाई गई), तब इज़्ज़त कहाँ थी? जब मेरे काम के कंप्यूटर को कचरे की तरह ज़मीन पर पटका गया, तब इज़्ज़त कहाँ थी? आपने मुझे बहू माना ही कब? आपने तो मेरे हिस्से को ‘खाली जगह’ मान लिया जिस पर जब चाहे कब्ज़ा कर लो।”
“अरे तो परिवार में…” माँ जी कुछ कहने जा रही थीं।
“परिवार में मर्यादा होती है माँ जी,” सुमेधा ने उनकी बात काटी। “अगर अनिरुद्ध भैया के ऑफिस के दस्तावेज़ों को हटाकर वहाँ अपनी साड़ियाँ रख देते, तो क्या आप चुप रहतीं? नहीं न? क्योंकि वो ‘आदमी’ का काम है, ‘ज़रूरी’ है। और मेरा काम? वो तो बस ‘टाइम पास’ है? मेरे स्पेस की कोई वैल्यू नहीं?”
वंदना भाभी का चेहरा लाल हो गया था। “बड़ी जुबान चलने लगी है तेरी। अनिरुद्ध को आने दे, बताती हूँ उसे।”
“बिल्कुल बताइएगा,” सुमेधा ने कहा। “लेकिन उससे पहले यह कमरा खाली होगा। मुझे अभी, इसी वक़्त मेरा वर्कस्टेशन वापस चाहिए। और हाँ भाभी, वो अलमारी में टंगे आपके कपड़े… उन्हें अभी हटा लीजिये, वरना मज़दूर उन्हें भी बाहर रख देंगे।”
वंदना भाभी ने देखा कि सुमेधा रुकने वाली नहीं है। उसकी आँखों में एक ऐसी दृढ़ता थी जो उन्होंने पहले कभी नहीं देखी थी। सुमेधा हमेशा चुप रहने वाली, ‘हाँ में हाँ’ मिलाने वाली बहू थी। लेकिन आज उसने अपनी लक्ष्मण रेखा खींच दी थी।
मजबूरन, वंदना भाभी को उठना पड़ा। बड़बड़ाते हुए, कोसते हुए, उन्होंने अपना सामान समेटना शुरू किया। आचार के मर्तबान वापस उनके हिस्से में गए। सोफे वापस उनकी लॉबी में ठूंस दिए गए।
शाम तक सुमेधा का घर वापस ‘घर’ जैसा दिखने लगा था। हालाँकि दीवारें गंदी थीं और फ़र्श पर खरोंचें थीं, लेकिन सुमेधा ने अपनी किताबों को झाड़-पोंछकर वापस सजाया। कंप्यूटर को कनेक्ट किया।
रात को अनिरुद्ध आया। उसे वंदना भाभी और माँ जी ने पहले ही फ़ोन पर ‘नमक-मिर्च’ लगाकर सारी बातें बता दी थीं कि कैसे सुमेधा ने घर सिर पर उठा लिया। अनिरुद्ध गुस्से में ऊपर आया।
“सुमेधा, यह क्या बचपना है? भाभी रो रही हैं। माँ नाराज़ हैं। तुम क्या चाहती हो घर का बंटवारा हो जाए? एक महीने बाद आई हो और आते ही क्लेश?” अनिरुद्ध ने बैग पटकते हुए कहा।
सुमेधा अपनी डेस्क पर बैठी काम कर रही थी। उसने पलकें झपकाईं और अनिरुद्ध की ओर देखा।
“अनिरुद्ध, मेरे साथ आओ,” उसने कहा।
वह उसे उस छोटे कमरे में ले गई। उसने ज़मीन पर पड़ी एक टूटी हुई हार्ड-डिस्क दिखाई।
“यह देख रहे हो अनिरुद्ध? इसमें मेरे पिछले तीन साल का काम था। मेरे क्लाइंट्स का डेटा था। भाभी ने जब यहाँ मर्तबान रखे, तो इसे नीचे गिरा दिया। यह अब चल नहीं रही। मेरा हज़ारों का नुकसान हुआ है, और मेरी साख जो ख़राब हुई वो अलग। क्या भाभी इसकी भरपाई करेंगी?”
अनिरुद्ध चुप हो गया।
सुमेधा ने आगे कहा, “और यह देखो,” उसने अलमारी खोली। “मेरे कुछ निजी दस्तावेज़, मेरी डायरी… सब खुले पड़े थे। मेरी प्राइवेसी का मज़ाक बना दिया गया। अनिरुद्ध, अगर मैं तुम्हारे भाई के कमरे में जाकर, उनके लैपटॉप को हटाकर वहाँ अपनी सिलाई मशीन रख दूँ, तो क्या तुम इसे ‘बचपना’ कहोगे? या उसे ‘अतिक्रमण’ कहोगे?”
अनिरुद्ध का गुस्सा पिघलने लगा था। उसने कमरे की हालत देखी। उसे अपनी गलती का एहसास हुआ कि उसने एकतरफा बात सुनी थी।
“मुझे नहीं पता था कि इतना कुछ हुआ है…” अनिरुद्ध ने धीमे स्वर में कहा।
“तुम्हें पता इसलिए नहीं था क्योंकि तुम्हें लगता है कि घर की औरतों के बीच ‘छोटी-मोटी’ बातें होती रहती हैं। लेकिन यह छोटी बात नहीं है अनिरुद्ध। यह ‘बाउंड्री’ की बात है। अगर आज मैं चुप रह जाती, तो कल यह घर मेरा रहता ही नहीं। मैं यहाँ सिर्फ़ एक मेहमान बनकर रह जाती।”
सुमेधा ने अनिरुद्ध का हाथ पकड़ा। “मुझे बंटवारा नहीं चाहिए। मुझे बस सम्मान चाहिए। मेरा कमरा, मेरा काम, और मेरी निजता—ये मेरे आत्मसम्मान का हिस्सा हैं। और इसके लिए मैं किसी से भी लड़ सकती हूँ, तुमसे भी।”
अनिरुद्ध ने सुमेधा को गले लगा लिया। “आई एम सॉरी, सुमेधा। मैं बात करूँगा भाभी से।”
“बात करने की ज़रूरत नहीं है,” सुमेधा ने मुस्कुराते हुए कहा। “मैंने बात अपने तरीके से कह दी है। और मुझे लगता है उन्हें समझ आ गया है।”
अगले दिन सुबह नाश्ते की मेज पर सन्नाटा था। वंदना भाभी का चेहरा सूजा हुआ था। माँ जी ने चुप्पी साधे रखी थी। लेकिन जब सुमेधा आई, तो किसी ने उसे टोकने की हिम्मत नहीं की।
सुमेधा ने अपनी चाय का कप उठाया। वह जानती थी कि रिश्ते थोड़े खट्टे हो गए हैं, और शायद कुछ दिन बातचीत बंद रहेगी। लेकिन उसने यह भी महसूस किया कि आज उसकी चाय का स्वाद ज़्यादा मीठा है। यह आज़ादी का स्वाद था। उसने सीख लिया था कि संयुक्त परिवार में प्यार ज़रूरी है, लेकिन अपनी जगह बनाए रखने के लिए कभी-कभी ‘बुरा’ बनना भी ज़रूरी होता है।
उसने वंदना भाभी की तरफ देखा और शिष्टाचार से पूछा, “भाभी, चाय लेंगे?”
वंदना भाभी ने एक पल सुमेधा को देखा, फिर झिझकते हुए अपना कप आगे बढ़ा दिया। उस मौन स्वीकृति में यह तय हो गया था कि अब इस घर में सीमा रेखाएं खींच दी गई हैं, जिन्हें लांघना अब आसान नहीं होगा।
सुमेधा ने चाय डाली और मन ही मन मुस्कुराई। उसका कमरा अब वापस उसका था, और सबसे बड़ी बात—उसका वजूद अब वापस उसका था।
“अगर यह कहानी आपको अपनी लगी,
तो इसे उस इंसान तक पहुँचाइए
जो आज भी चुप है।”
मूल लेखिका : डॉ पारुल अग्रवाल