सबसे बड़ा धन परिवार – बबीता झा

शंकर के घर में आज बहुत ही खुशी का माहौल था। आज उसकी छोटी बहन करुणा की शादी है। पूरा घर रिश्तेदारों से भरा हुआ है। सब यही बोल रहे थे कि शंकर ने करुणा के लिए बहुत ही अमीर घर का लड़का ढूंढा है।

शंकर मन ही मन बहुत खुश हो रहा था। शंकर घर की गरीबी से परेशान था। वह अपनी बहन की शादी बड़े से बड़े घर में करना चाहता था और उसका यह सपना पूरा हुआ। करुणा की शादी शहर के सबसे रईस घर में हो गई। करुणा अपने ससुराल चली गई।

शंकर दिन-रात अमीर होने के सपने देखता रहता था, लेकिन मां और पत्नी शारदा समझते थे कि हम लोग खुश हैं क्योंकि तुम हमारे पास हो। कुछ देर हम लोग बैठकर हंस-बोल लेते हैं। आज मां करुणा के जाने से थोड़ी परेशान लग रही थी। पता नहीं करुणा वहां खुश रह पाएगी कि नहीं, लेकिन शंकर बहुत खुश था।

अगले दिन शंकर ऑफिस के लिए निकला। उसके साथ उसका दोस्त रामशंकर भी जाता था। दोनों साथ में ही काम करते थे। दोनों में अच्छी दोस्ती थी। दोनों परिवारों में भी बहुत बनती थी। शंकर हमेशा रामशंकर को बोलता, “इससे भी कोई अच्छी नौकरी मिल जाती तो कर लेता। इतने कम पैसों में गुजारा नहीं होता है।”

रामशंकर बोला, “ठीक है, लेकिन यह भी तो सोचो कि हम लोग इतने ही पैसों में खुश हैं। हम दोनों का परिवार कितना हंसी-खुशी से रहता है। फिर भी अगर तुम्हें ज्यादा पैसा कमाने की इच्छा है, तो मुझे अगर कुछ पता चला तो मैं तुम्हें जरूर बताऊंगा।”

और एक दिन रामशंकर ने शंकर को फोन किया। “शंकर, एक जॉब का ऑफर है, लेकिन उसके लिए तुम्हें विदेश जाना पड़ेगा। सोच के बताना।”

शंकर ने बिना सोचे-समझे कहा, “हां-हां, इसमें सोचने की क्या बात है। खाली पैसा अच्छा मिलना चाहिए।”

रामशंकर ने कहा, “वह तो मिलेगा ही, इसलिए तुम्हें बताया है।”

शंकर ने कहा, “ठीक है, मुझे फिर बात करवा देना कि कब और कैसे जाना है।”

शंकर की फोन पर यह बातें सब सुनकर शारदा और मां को अच्छा नहीं लग रहा था। वह लोग कहीं भी नहीं चाहते थे कि शंकर पैसे कमाने के लिए विदेश जाए। दोनों ने शंकर को बहुत अच्छे से समझाया कि हम लोगों को सब कुछ है, इससे ज्यादा की जरूरत नहीं है। हम लोग इसी में खुश हैं, लेकिन शंकर कुछ समझने को तैयार नहीं था।

बहन करुणा ने सुना कि भैया विदेश जा रहे हैं, तो उसके पैरों तले से जमीन खिसक गई। करुणा का पति विनय बोला, “इसमें खुशी की बात है। तुम इतनी परेशान क्यों हो रही हो? आदमी को अच्छी जिंदगी जीने के लिए पैसा तो चाहिए ना। तुम खुद को ही देख लो, कितनी ऐशो-आराम की जिंदगी जी रही हो।”

कहते हुए विनय बोला, “ठीक है, रात में तुम खाना खाकर सो जाना। मैं सुबह तक घर आऊंगा,” कहकर विनय चला गया।

यही तकलीफ तो थी करुणा को। पैसा तो मिला, लेकिन कभी परिवार नहीं मिला। विनय और उसके परिवार कभी साथ में नहीं बैठते थे। इससे करुणा को भी उन लोगों के साथ बैठने का मौका नहीं मिला। सब दिन-रात काम में लगे रहते थे। करुणा को ऐसे लग रहा था कि मायके के साथ-साथ उसकी हंसी भी कहीं छूट गई है। यही सब सोच-सोचकर करुणा परेशान रहती थी।

इधर शंकर मां, बीबी, 5 साल के बेटे और भाई जैसे दोस्त रामशंकर को छोड़कर विदेश चला गया। शारदा सोच रही थी कि कभी हम लोगों ने शंकर से ऐसा कुछ नहीं मांगा जो वह हमें नहीं दे सकता था। फिर क्यों, फिर क्यों उसे विदेश जाने की जरूरत पड़ गई। सोचकर शारदा बहुत रोने लगी। मां ने शारदा को संभाला और कहा, “देखना, बहुत जल्दी ही घर वापस आएगा। उसको हम लोगों की याद आएगी।”

लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। शंकर ऐसा पैसा कमाने के चक्कर में पड़ गया कि उसे धीरे-धीरे घर की याद भी कम आने लगी और वह घर पर फोन भी बहुत कम करने लगा। शंकर का बेटा रोज सोते समय मां को परेशान करता था कि, “मां, पापा कब आएंगे? मुझे उनकी कहानी सुने बिना नींद नहीं आती है।”

शारदा उसे “आज-कल” कहकर सुला देती थी और मां चुपचाप सब देखती रहती थी। वह भी तो बेटे का इंतजार कर रही थी।

वैसे तो रामशंकर रोज सब का हाल-चाल पूछ लेता था और बोलता था, “मां, कभी कोई जरूरत हो तो बेझिझक बोलिएगा। मैं भी तो आपके बेटे के समान हूं।”

बेटे के इंतजार में मां बीमार रहने लगी। शंकर का बेटा भी धीरे-धीरे मंद-सा हो गया था, क्योंकि उसे अपने पापा के साथ खेलने की आदत थी। और शारदा… शारदा तो दोनों को संभालने में लगी रहती थी। उसका दुख कौन समझता?

एक दिन शारदा ने परेशान होकर शंकर को फोन किया और कहा, “शंकर, तुम घर आ जाओ। हमें पैसा नहीं चाहिए, हमें आप चाहिए। यहां आपके बिना बहुत अकेला-सा लगता है। क्या आपको हम लोगों की याद नहीं आती?”

शंकर झुंझला कर बोला, “याद आएगी तो तुम लोग इतनी ऐशो-आराम की जिंदगी कैसे जियोगी?”

शारदा बोली, “इतना हम लोगों को नहीं चाहिए। आप इतना मेहनत करते हैं, कोई आपको देखने वाला भी नहीं है वहां। घर आते होगे तो कोई रोटी पूछने वाला नहीं है। आपकी परेशानी और थकान दूर करने के लिए आपके पास आपका बेटा भी खेलने के लिए नहीं है, जिसके साथ अपनी परेशानी और थकान आप दूर करते थे। एक साल से ऊपर हो गया है। मां भी बीमार रहने लगी है। अब तो करुणा भी बहुत कम आने लगी है।”

करुणा का नाम सुनकर शंकर परेशान हो गया और बोला, “क्या हुआ करुणा को? करुणा क्यों नहीं आती है?”

शारदा बोली, “क्या होगा? नई शादी हुई है, लेकिन कभी उसको टाइम नहीं देता है। पता है, रात-रात को लेट से आता है और कभी-कभी तो काम की वजह से उसे सुबह हो जाती है। कल ही करुणा का फोन आया था और मुझे बताते-बताते रोने लगी थी।”

सुनकर शंकर बोला, “ठीक है, कुछ दिनों के लिए करुणा को अपने पास मंगा लो। कुछ दिन तुम लोगों के साथ रहेगी तो ठीक हो जाएगी।”

शारदा बोली, “लेकिन यहां भी तो उसको आपके बिना अच्छा नहीं लगेगा और विनय से दूर रहना भी नहीं चाहती है।”

इतना सब सुनकर शंकर ने फोन रख दिया।

शाम को शंकर घर आया तो अपने दोस्त रामशंकर को फोन किया। रामशंकर ने थोड़ी देर से फोन उठाया और बोला, “क्या बात है, शंकर? आज बहुत दिनों के बाद याद किया हमको। सब ठीक है ना?”

“हां, ठीक है। और तुम लोग कैसे हो?” शंकर ने पूछा।

रामशंकर बोला, “सब एकदम मस्ती में है।”

रामशंकर बहुत खुश हो रहा था। उसकी खुशी उसके बोलने में झलक रही थी। वह बोला, “आज दीदी भी आई है। सबके साथ बैठकर थोड़ा हंसना-बोलना हो रहा था। और हां, देखो, बात करते-करते बताना ही भूल गया कि तुम्हारी मां की तबीयत कुछ ज्यादा ही खराब हो रही है। हो सके तो एक बार जल्दी घर आ जाना। अच्छा, तो मैं फोन रखता हूं, जीजा आवाज दे रहे हैं।”

कहकर रामशंकर ने फोन रख दिया।

शंकर के कानों में उनके घर के ठहाकों की आवाज गूंज रही थी। वह सोच रहा था कि कुछ दिनों में और पैसा कमा कर मैं भी घर जाऊंगा।

सोते हुए वह सोने की कोशिश करने लगा, लेकिन उसे नींद नहीं आ रही थी। इस वजह से अगले दिन शंकर को थकान महसूस हो रही थी और वह जल्दी ही घर आ गया और चुपचाप बिस्तर पर लेट गया।

उसके कानों में बार-बार रामशंकर के घर के ठहाकों की आवाज गूंज रही थी। शंकर सोच रहा था, वह भी घर पर होता तो उसके घर में भी करुणा और शारदा की हंसी-ठहाकों की आवाज गूंजती रहती। और बेटा तो दादी को कहानी सुनाने के लिए परेशान करता रहता था।

मां बोलती, “जा, अपने पापा से कहानी सुन ले।”

और फिर बेटा बार-बार कहता, “पापा, कहानी सुनाओ। तभी मुझे नींद आएगी।”

शंकर के दिमाग में यही सब घूम रहा था और उसे नींद नहीं आ रही थी कि तभी फोन की घंटी बजी। इतनी रात को किसका फोन होगा? यहां मुझे इतनी रात को कौन फोन कर सकता है?

उठाया तो शारदा थी। वह बहुत रो रही थी। रोते-रोते बोली, “शंकर, जल्दी घर आ जाओ। मां को अटैक हुआ है।”

तभी शारदा के हाथों से रामशंकर ने फोन ले लिया और कहा, “जल्दी से अभी की फ्लाइट ले लो। चाची बच नहीं पाएंगी। उनकी हालत ठीक नहीं है।”

कहकर रामशंकर ने फोन रख दिया।

इतना सब सुनकर शंकर का दिमाग काम नहीं कर रहा था और उसके हाथों से फोन गिर गया। लेकिन किसी तरह से अपने आप को संभालकर उसने अपना सामान पैक किया और निकल गया।

और सीधे अस्पताल पहुंच गया। दौड़कर शंकर मां के पास गया और मां का हाथ अपने हाथों में लेकर बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोने लगा। मां कुछ कह पाती, लेकिन कह नहीं पाई और सबको छोड़कर चली गई।

शंकर बच्चों की तरह फूट-फूट कर रो रहा था। रामशंकर ने उसे संभाला। शंकर के दिमाग में बार-बार उसका पैसे के पीछे भागना याद आ रहा था, जिस वजह से आज उसने अपनी मां को भी खो दिया।

और कहीं-न-कहीं करुणा की हंसी छीन जाने का जिम्मेदार भी वही था। उसने करुणा की खुशी देखे बिना एक पैसे वाले घर में उसकी शादी कर दी थी। वहां पैसा तो था, लेकिन परिवार साथ में नहीं था।

लेकिन अब तो बहुत देर हो चुकी थी।

शंकर ने बहुत अच्छे से मां का काम समाप्त किया। और अगले दिन बैग लेकर निकल ही रहा था कि पीछे से बेटे ने पकड़ लिया और पूछा, “पापा, आप कहां जा रहे हो? मत जाओ।”

करुणा भी आंखों में आंसू भरकर भैया के सामने खड़ी हो गई और बड़ी ही आशाओं से देखने लगी। करुणा को लग रहा था कि भैया के रहने से सब ठीक हो जाएगा।

शंकर ने सब की तरफ अपनी नजर घुमा कर देखा और बोला, “मैं जा नहीं रहा हूं। जाकर आ रहा हूं, हमेशा के लिए।”

तभी रामशंकर आया और बोला, “हां दोस्त, पैसा ही सब कुछ नहीं है। परिवार से बढ़कर तो कुछ भी नहीं।”

शंकर की आंखों में आंसू भर गए। वह बोला, “मैं अब सब समझ गया हूं कि सबसे बड़ा धन परिवार होता है। लेकिन देर हो गई। मां के जाने के बाद समझ में आया।”

और वह फिर से रोने लगा।

शारदा ने शंकर की आंखों से आंसू पोंछे और बोली, “अब जल्दी घर आ जाना। हम लोग आपका इंतजार कर रहे हैं।”

इस बार शंकर के जाते समय शंकर की आंखों में उसके परिवार का प्यार झलक रहा था। और शंकर जल्दी ही घर वापस आ गया और उसने यहीं पर अपना बिजनेस शुरू कर लिया।

करुणा के पति को भी समझाया कि परिवार ही सबसे बड़ी संपत्ति होती है।

लेखिका बबीता झा

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