अहंकार – रश्मि प्रकाश 

“यह क्या कर दिया तुमने बिमला? तुम्हें अकल नहीं है? यह मेरी ‘इंपोर्टेड’ क्रॉकरी थी। जानती हो इसकी कीमत क्या है? तुम्हारी साल भर की तनख्वाह भी कम पड़ जाएगी इसे खरीदने में!”

काव्या की चीख से पूरा घर गूँज उठा। हॉल में सन्नाटा पसर गया। कांच के बारीक टुकड़े फर्श पर बिखरे हुए थे और उनके बीच सिर झुकाए खड़ी थी बिमला, जो इस घर में पिछले पंद्रह सालों से काम कर रही थी। उसकी आँखों में डर था, लेकिन उसने कोई सफाई नहीं दी। वह बस चुपचाप झाड़ू उठाने के लिए मुड़ी।

सोफे पर बैठीं सावित्री देवी के हाथ से अखबार छूट गया। उन्होंने चश्मा उतारकर मेज़ पर रखा और अपनी बहू काव्या की ओर देखा। काव्या का चेहरा गुस्से से लाल था। वह एक मल्टीनेशनल कंपनी में एचआर हेड थी। ऑफिस का तनाव और घर की जिम्मेदारियों के बीच उसका स्वभाव पिछले कुछ महीनों में बहुत चिड़चिड़ा हो गया था।

“काव्या, शांत हो जाओ बहू। गलती से टूट गया होगा। कांच का क्या है, आता-जाता रहता है,” सावित्री देवी ने मामले को संभालने की कोशिश की।

“मम्मी जी, प्लीज!” काव्या ने हाथ उठाकर उन्हें रोका। “आप इसे सिर पर चढ़ाकर रखती हैं। गलती से नहीं, इसकी लापरवाही से टूटा है। और आज शाम को मिस्टर मल्होत्रा डिनर पर आ रहे हैं। यह डिनर मेरी प्रमोशन के लिए कितना ज़रूरी है, आप जानती हैं। अगर एक भी चीज़ गलत हुई, तो मेरी सारी मेहनत पानी में मिल जाएगी। और यह औरत… इसे तो बस काम बिगाड़ना आता है।”

बिमला ने कांपते हाथों से कांच के टुकड़े समेटे। उसकी उंगली में एक कांच चुभ गया, खून की एक नन्ही बूंद फर्श पर गिर गई, जिसे उसने तुरंत अपने पल्लू से पोंछ लिया ताकि मेमसाब को एक और मुद्दा न मिल जाए। वह बिना कुछ बोले रसोई में चली गई।

सावित्री देवी का दिल भर आया। बिमला सिर्फ एक नौकरानी नहीं थी। जब सावित्री जी के पति को लकवा मारा था, तब इसी बिमला ने उनकी सेवा की थी। जब बेटा राहुल विदेश पढ़ने गया था और घर में वीरानी थी, तब बिमला ही सावित्री जी का सहारा बनी थी। वह अनपढ़ थी, गँवार थी, लेकिन वफादारी और ममता में उसका कोई सानी नहीं था। लेकिन काव्या के लिए वह सिर्फ एक ‘पेड सर्विस’ थी, जिसे हर वक्त परफेक्शन देना चाहिए था।

शाम गहराने लगी थी। घर में तनाव साफ महसूस किया जा सकता था। काव्या ने शहर के सबसे महंगे कैटरर ‘ला-जीज’ को डिनर का ऑर्डर दिया था। कॉन्टिनेंटल खाना, इटालियन स्टार्टर्स और फ्रेंच डेज़र्ट। सब कुछ परफेक्ट होना था। मिस्टर मल्होत्रा खाने के बहुत शौकीन थे और काव्या कोई रिस्क नहीं लेना चाहती थी।

घड़ी में सात बज गए। मेहमानों के आने का वक्त आठ बजे का था। अचानक काव्या का फोन बजा। उसने फोन उठाया और कुछ ही पलों में उसके चेहरे का रंग उड़ गया।

“क्या? आप ऐसा कैसे कर सकते हैं? एक घंटे पहले? यह अनप्रोफेशनल है! हेलो? हेलो?”

काव्या ने फोन सोफे पर पटक दिया और हताशा में अपना सिर पकड़कर बैठ गई।

“क्या हुआ बेटा?” सावित्री जी ने घबराकर पूछा।

“सब खत्म मम्मी जी! कैटरर की वैन का एक्सीडेंट हो गया है। सारा खाना खराब हो गया। अब वे कह रहे हैं कि वे नया खाना नहीं भेज सकते। आठ बजने वाले हैं। मैं अब क्या करूँ? मिस्टर मल्होत्रा रास्ते में होंगे। अगर उन्हें घर का सादा खाना खिलाया तो मेरी क्या इमेज रह जाएगी? मेरी प्रमोशन तो गई।”

काव्या की आँखों से आँसू बहने लगे। राहुल अभी ऑफिस से नहीं लौटा था। घर में अफरातफरी का माहौल था।

तभी रसोई के दरवाजे पर बिमला आकर खड़ी हो गई। उसने संकोच से कहा, “बहू जी… अगर आप कहें तो मैं कुछ बना दूँ? फ्रिज में पनीर, चिकन और ताज़ी सब्जियाँ रखी हैं।”

काव्या ने गुस्से और हिकारत से उसकी ओर देखा। “तुम? तुम बनाओगी? क्या बनाओगी? वही तेल-मसाले वाला देसी खाना? मिस्टर मल्होत्रा ‘गॉरमे फूड’ (Gourmet Food) खाते हैं। उन्हें तुम्हारी बनाई हुई मसालेदार करी खिलाकर मुझे अपनी बेइज्जती नहीं करवानी।”

“लेकिन काव्या,” सावित्री जी ने दृढ़ता से कहा, “अब और कोई रास्ता नहीं है। बाहर से ऑर्डर करने में एक घंटा लगेगा और खाना ठंडा हो जाएगा। बिमला के हाथ में जादू है। तुम्हें याद नहीं, पिछली बार राहुल ने इसके हाथ का बना ‘दम पुख्त’ कितना चाव से खाया था?”

“मम्मी जी, राहुल घर का सदस्य है और मिस्टर मल्होत्रा मेरे बॉस हैं। दोनों में फर्क है,” काव्या चिल्लाई।

लेकिन समय रेत की तरह फिसल रहा था। घंटी बजी। मिस्टर मल्होत्रा समय से पहले आ गए थे। काव्या के पसीने छूट गए।

सावित्री जी ने तुरंत कमान संभाली। उन्होंने काव्या को इशारे से बाहर भेजा और बिमला का हाथ पकड़कर रसोई में ले गईं।

“बिमला, आज इस घर की इज़्ज़त तेरे हाथ में है। जो तुझे सबसे अच्छा बनाना आता है, वही बना। और सुन, घबराना मत।”

बिमला ने एक पल के लिए अपनी मालकिन की आँखों में देखा। उन आँखों में भरोसा था। उसने अपनी साड़ी का पल्लू कमर में खोसा और काम पर लग गई। उसने काव्या की ‘रेसिपी बुक’ नहीं खोली। उसने अपनी दादी-नानी के नुस्खे याद किए।

अगले पैंतालीस मिनट तक रसोई से खट-पट की नहीं, बल्कि एक लयबद्ध संगीत की आवाज़ आती रही। मसालों की महक ने धीरे-धीरे एयर फ्रेशनर की कृत्रिम खुशबू को दबा दिया। काव्या बाहर मेहमानों को जूस सर्व करते हुए बार-बार रसोई की तरफ देख रही थी, उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। उसे लग रहा था कि आज उसकी करियर की सबसे बड़ी त्रासदी होने वाली है।

डाइनिंग टेबल सज गया। बिमला ने खाना परोसा। कोई इटालियन पास्ता नहीं था, कोई बेक्ड डिश नहीं थी।

मेज़ पर था—मिट्टी की हांडी में पकाया हुआ ‘चंपारण मटन’, धीमी आंच पर घुटी हुई ‘दाल बुखारा’, केसरिया पुलाव और ताजे आटे की फूली हुई रोटियाँ। साथ में सिलबट्टे पर पिसी हुई धनिए-पुदीने की चटनी।

मिस्टर मल्होत्रा ने डिशेस को देखा। काव्या ने डरते हुए कहा, “सर, एक्चुअली कैटरर के साथ कुछ इश्यू हो गया था, तो…” वह माफ़ी मांगने ही वाली थी।

मिस्टर मल्होत्रा ने हाथ के इशारे से उसे चुप कराया। उन्होंने गहरी साँस ली, जैसे खाने की खुशबू को अपने अंदर उतार रहे हों।

“काव्या, यह खुशबू… यह मुझे मेरे बचपन की याद दिला रही है। यह मसाले… यह बाज़ार के नहीं लगते।”

उन्होंने पहला निवाला मुँह में डाला। कमरे में सन्नाटा छा गया। काव्या ने अपनी सास की तरफ देखा, सावित्री जी शांत बैठी थीं। राहुल भी अपनी सांस रोके हुए था।

मिस्टर मल्होत्रा ने आँखें बंद कर लीं। जब उन्होंने आँखें खोलीं, तो उनमें एक अजीब सी नमी थी।

“अद्भुत! बेमिसाल! मैंने दुनिया भर के फाइव स्टार होटलों में खाना खाया है काव्या, लेकिन यह स्वाद… यह स्वाद रूह को छूने वाला है। इसमें जो ‘अपनापन’ है, वह किसी इटालियन शेफ के पास नहीं हो सकता। यह किसने बनाया है? तुमने?”

काव्या सकपका गई। एक पल के लिए उसके मन में आया कि वह झूठ बोल दे, कह दे कि उसने बनाया है। यह उसकी प्रमोशन पक्की कर देगा। लेकिन फिर उसकी नज़र रसोई के दरवाजे की ओट में खड़ी बिमला पर पड़ी, जो पसीने से लथपथ थी, लेकिन उसके चेहरे पर एक संतोष था—वही संतोष जो किसी कलाकार को अपनी कलाकृति पूरी करने पर होता है।

“नहीं सर,” काव्या की आवाज़ कांपी, लेकिन उसमें सच्चाई थी। “यह मैंने नहीं, हमारी… हमारे परिवार की एक बहुत खास सदस्य, बिमला दीदी ने बनाया है।”

“बिमला दीदी?” मिस्टर मल्होत्रा ने उत्सुकता से पूछा। “उन्हें बुलाइए। मैं उनके हाथ चूमना चाहता हूँ।”

काव्या उठी और रसोई में गई। बिमला डर गई। “क्या हुआ बहू जी? कुछ गलती हो गई क्या? नमक तेज़ हो गया?”

काव्या ने कुछ नहीं कहा। उसने बिमला का हाथ पकड़ा—वही खुरदुरा हाथ जिससे आज सुबह कांच के टुकड़े चुभे थे—और उसे खींचकर डाइनिंग रूम में ले आई।

मिस्टर मल्होत्रा खड़े हो गए। एक बड़ी कंपनी का सीईओ एक साधारण सी सूती साड़ी पहनी महिला के सामने सम्मान में खड़ा था।

“बिमला जी,” उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, “आज आपने मुझे मेरी माँ की याद दिला दी। पैंतीस साल पहले जब मैं गाँव से शहर आया था, तो माँ ने आखिरी बार ऐसा ही मटन खिलाया था। मैं बरसों से इस स्वाद को ढूँढ रहा था। आपका बहुत-बहुत शुक्रिया।”

बिमला की आँखों से झर-झर आँसू बहने लगे। उसने कांपते हुए हाथ जोड़े। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या कहे। उसे आज तक सिर्फ डांट मिली थी या आदेश। इतना सम्मान? और वह भी इतने बड़े साहब से?

डिनर खत्म होने के बाद, मिस्टर मल्होत्रा ने जाते-जाते काव्या से कहा, “काव्या, जो इंसान अपने घर के स्टाफ के हुनर की इतनी कद्र करता है, वह निश्चित रूप से मेरी कंपनी के लोगों को भी बहुत अच्छे से मैनेज करेगा। तुम्हारी प्रमोशन पक्की है। लेकिन एक शर्त पर—अगली बार जब मैं आऊँ, तो खाना बिमला जी ही बनाएंगी।”

मिस्टर मल्होत्रा चले गए। राहुल भी उन्हें छोड़ने बाहर तक गया।

हॉल में अब सिर्फ तीन औरतें थीं। सावित्री, काव्या और बिमला।

माहौल भारी था। काव्या अपनी जगह जड़वत खड़ी थी। उसकी सारी डिग्रियां, उसका कॉरपोरेट अनुभव, उसका ‘क्लास’ का अहंकार—सब आज बिमला की उस एक हांडी के सामने बौना साबित हो गया था। उसे एहसास हुआ कि जिसे वह ‘गँवार’ समझती थी, वह असल में अन्नपूर्णा थी। उसने यह भी महसूस किया कि आज सुबह उसने बिमला के साथ कितना बुरा बर्ताव किया था। उस कांच के गिलास की कीमत बिमला के हुनर और वफादारी के सामने धूल के बराबर भी नहीं थी।

बिमला बर्तन समेटने के लिए आगे बढ़ी।

“रहने दो बिमला,” काव्या की आवाज़ आई। बहुत धीमी, बहुत विनम्र।

बिमला रुक गई। “क्या हुआ बहू जी? मैं बस टेबल साफ कर देती हूँ।”

“नहीं,” काव्या आगे बढ़ी। उसने बिमला के हाथ से जूठी प्लेट ले ली और मेज़ पर रख दी। फिर उसने बिमला के उस हाथ को अपने हाथों में लिया जिस पर बैंडेज लगा हुआ था।

“यह चोट… सुबह लगी थी न?” काव्या ने पूछा, उसकी नज़रें झुकी हुई थीं।

“जी… वो तो छोटी सी खरोंच है,” बिमला ने हाथ छुड़ाने की कोशिश की।

काव्या ने हाथ नहीं छोड़ा। उसकी आँखों से एक आँसू टपका और बिमला की हथेली पर गिर गया।

“मुझे माफ़ कर दो दीदी। मैंने तुम्हें कभी इंसान नहीं समझा। मैं अपनी नौकरी और स्टेटस के नशे में इतनी अंधी हो गई थी कि मुझे तुम्हारे हुनर और तुम्हारे त्याग की कद्र ही नहीं रही। आज तुमने न सिर्फ मेरी नौकरी बचाई, बल्कि मेरी इज़्ज़त भी बचा ली। और बदले में मैंने तुम्हें क्या दिया? अपमान? डांट?”

बिमला घबरा गई। “अरे नहीं-नहीं बहू जी, आप तो मालकिन हैं। आप माफ़ी क्यों मांग रही हैं? यह तो मेरा फर्ज था।”

सावित्री देवी सोफे से उठीं और दोनों के पास आईं। उन्होंने काव्या के कंधे पर हाथ रखा।

“काव्या, हुनर का कोई धर्म या जात नहीं होती, और न ही कोई क्लास होती है। बिमला ने आज साबित कर दिया कि बड़ा वो नहीं जो हुक्म चलाए, बड़ा वो है जो मुसीबत में साथ निभाए।”

काव्या ने सिर हिलाया। वह अंदर गई और अपनी अलमारी से एक नया शॉल और एक लिफाफा लेकर आई।

“यह पैसे नहीं हैं दीदी,” काव्या ने लिफाफा बिमला के हाथ में रखते हुए कहा, “यह शगुन है। और कल से… कल से तुम रसोई में ज़मीन पर बैठकर खाना नहीं खाओगी। हम सब साथ में डाइनिंग टेबल पर बैठकर खाएंगे। क्योंकि अन्नपूर्णा को ज़मीन पर बिठाकर हम अन्न का अपमान नहीं कर सकते।”

बिमला अवाक रह गई। वह सावित्री देवी की ओर देखने लगी। सावित्री जी मुस्कुरा दीं।

रात बहुत हो चुकी थी। काव्या ने खुद अपने हाथों से तीन कप चाय बनाई। एक अपने लिए, एक सास के लिए और एक बिमला के लिए।

तीनों किचन के स्लैब के पास खड़ी होकर चाय पी रही थीं। कोई बात नहीं हो रही थी। शब्दों की अब ज़रूरत नहीं थी। बस चाय की चुस्कियों की आवाज़ थी और एक सुकून भरी खामोशी। उस खामोशी में सदियों पुरानी दीवारें ढह रही थीं—मालकिन और नौकरानी की दीवार, सास और बहू के बीच की दीवार, अहंकार और विनम्रता के बीच की दीवार।

बिमला ने चाय का घूँट भरा और खिड़की से बाहर देखा। चाँद बहुत चमक रहा था। उसे लगा, शायद आज शहर की रोशनी में थोड़ी कम चकाचौंध और थोड़ी ज़्यादा गर्माहट थी। यह गर्माहट सम्मान की थी, जो उसे पंद्रह साल बाद, सही मायनों में आज मिली थी।

काव्या ने बिमला की ओर देखा और पहली बार उसे एक ‘वर्कर्स’ के रूप में नहीं, बल्कि एक ‘महिला’ के रूप में, एक ‘सहयोगी’ के रूप में देखा। उसे समझ आ गया था कि असली ‘मैनेजमेंट’ लोगों पर शासन करना नहीं, बल्कि उनके भीतर के सर्वश्रेष्ठ को पहचानना और उसे सम्मान देना है।

उस रात घर के सारे कांच सलामत थे, लेकिन काव्या का अहंकार चकनाचूर हो चुका था। और उस बिखरे हुए अहंकार के मलबे पर एक नए, खूबसूरत रिश्ते की नींव पड़ चुकी थी।

मूल लेखिका : रश्मि प्रकाश 

#सबसे बड़ा धन : परिवार

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