हां हो गई हूं मैं स्वार्थी – मंजू ओमर 

तुम इतनी स्वार्थी कैसे हो गई  निशा।इस उम में जबकि मालती जी की ये हालत है , तुम उनको अकेला छोड़कर चली आई । तुम्हारा मन नहीं कांपा ये सोचकर कि उन पर क्या बीतेगी। निशा की बूढ़ी मौसी ने निशा से कहा। हां मौसी मैं हो गई हूं स्वार्थी,अब मेरा वहां क्या रह गया है जिसके सहारे मैं जिंदगी जीऊं।

सास की क्या उनकी तों उम हो गई है अब बस थोड़ी ही बची है , लेकिन फिर उसके बाद , उसके बाद मैं क्या करूंगी। किसके सहारे जीऊंगी, कैसे जीवनयापन करूंगी। अभी हाल की बात है तुरंत ये फैसला ले लिया तो ठीक है वरना बाद में तो कुछ फैसला लेना मेरे लिए मुश्किल हो जाता।

जब एक बार मांजी की जिम्मेदारी अपने सिर ले लेती तो फिर तो हमेशा के लिए ही हो जाता। अभी तो उनकी बेटियां हैं वो करेगी देखभाल। यहां कोई व्यवस्था करें या अपने घर ले जाए । उनके चक्कर में मैं अपनी जिंदगी क्यों बर्बाद करूं। अभी मेरी उम्र ही क्या है

              आईए जानते हैं निशा के इस फैसले का क्या  कारण था।मालती जी के दो बेटे और दो बेटियां थी जिसमें सबसे बड़ी बेटी  थी फिर दो बेटे अनीता सबसे छोटी  थी। 

संयुक्त परिवार था मालती जीका ।पति किशोरी लाल के  चार भाई थे जिसमें दो बड़े और दो छोटे  थे ।सभी को  पिता रामदयाल जी ने काम धंधा  करवा दिया था।सभी अपनी मेहनत से अपने कामको संभाल रहे थे ।सभी भाइयों  शादी ब्याह हो चूके थे ।रामदयाल जी भी 80 को  पार हो चुके थे सभी बेटों का हिस्सा बांट कर दिया था।

                किशोरी लाल जी को कपड़े की दुकान खुलवाई थी  रामदयाल जी ने ,लेकिन किशोरी लाल जी का  काम-धंधे में मन ना लगता और इधर-उधर घूमते रहते दोस्तों के साथ ।

और ऐसे ही उनकी जुआ खेलने की आदत भी लग गई थी। जिससेक काम धंधा ठप्प पड़ गया था घर में  चार-चार बच्चे हो गए थे, घर चलाने को पूरे नहीं हो पाते थे  पैसे तो पिता रामदयाल से घर- चलाने को पैसे मांगते थे। पैसे न देने पर पिता से गाली गलौज करते थे।

उनके इस व्यवहार का असर उनके बच्चों पर भी पड़ने लगा था। बच्चे भी पढ़ाई लिखाई से जी चुराने लगे थे। इसी बीच किशोरी लाल जी का बड़ा बेटा स्कूल में किसी बच्चे की किताब चोरी कर ले आया ।घर में जब मां मालती जी ने डांटा तो वो घर से भाग गया। पता नहीं कहां गया।आज 25 साल हो गए घर वापस नहीं आया पता नहीं कहां गया।

       इस बीच बड़ी बेटी सुनीता की शादी हो गई और छोटा बेटा अरुण भी पढ़ाई-लिखाई छोड़कर घर बैठ गया। और किशोरी लाल जी की एक एक्सीडेंट में मृत्यु  हो गई। अब

 घर में भरण पोषण की दिक्कत आ गई छोटी  बेटी अनीता उसके चार मामा थे उन लोगों ने न मिलकर छोटी  बेटी की शादी वहीं गांव में ही करवा दी  थी।अब घर में सिर्फ छोटा बेटा अरुण और मालती जी  रह गई । मकान में घर में ऊपर वाला मंजिल का हिस्सा इनको रहने को मिला था।

बेटा 20 साल का हो रहा था उसने अपने पिता किशोरी लाल की दुकान को संभाल लिया और मन लगाकर काम करने लगा।  तीन-चार साल काम ठीक चला तो वही दो-तीन गांव छोड़कर एक गांव में  एक मास्टर जी थे  उनकी  बेटी से अरूण की  शादी हो गई।

अब अरुण  की पत्नी निशा भी दुकान और घर संभालने लगी। और उसी दुकान में एक छोटा  सा जनरल स्टोर खोलकर लेडिस सामान रखने लगी उसका भी काम चलने लगा। निशा इंटर तक पढ़ी थी और बहुत चालाक और तेज तर्रार लड़की थी ।एजेंट से सामान  मंगवा लेती थी। और घर का काम करने के बाद दुकान भी संभालती थी।

           इधर मालती जी का शरीर पहले से ही भारी था कुछ शारीरिक कार्य नहीं करने की वजह से शरीर और भारी होता गया । बस वह बैठकर ही रह गई, कहीं आना जाना नहीं होता था ।  पुराने जमाने की घर की  ऊंची ऊंची सिढियों से उतरना चढ़ना मुश्किल हो गया ।अब वह बीमार रहने लगी  थी , सीढ़ी उतर नहीं सकती थी तो  किसी डॉक्टर के पास  जा नहीं सकती बस डॉक्टर से पूछ कर ही दवा आ जाती थी।

               निशा की  शादी को 10 साल बीत गए लेकिन उसके कोई बाल बच्चे नहीं हुए । कुछ इलाज भी नहीं करवाया गांव में  रहकर  सोच भी वैसी ही  बन गई थी ।

फिर पैसा भी नहीं था बस सारी ज़रूरतें पूरी हो जाती थी बस। और इलाज के लिए शहर जाना पड़ता और दुकान को बंद करना पड़ता। इसी में रह गए। इसी तरह से 20 साल बीत गए इस बीच अरुण को भी कुछ बीमारियों ने घेर  लिया लीवर की प्रॉब्लम हो गई उसको पेट में अक्सर पानी भर जाता था

सांस लेने में तकलीफ होने लगी थी। थोड़ा बहुत इलाज करवाया लेकिन उससे कुछ ज्यादा फायदा नहीं हुआ। फिर एक रात वह सोया तो सोया ही रह गया उठा ही नहीं 45 साल की उम्र में ही उसकी मृत्यु हो गई। मां मालती देवी बिल्कुल भी अपना काम नहीं कर पाती थी वह पूरी तरीके से बेटे पर ही आश्रित थी ।बेटा ही उनका उनका सब बाथरूम नहलाना  धुलाना सब ध्यान रखता था।और बहू खाने- पीने का ध्यान रख लेती थी ऐसे ही जिंदगी बीत रही थी।

            अब अचानक बेटे की मौत से मालती जी की दुनिया ही उजड़ गई ।सोच  रही थी 80 की हो गई हूं जाने की  तो मेरी उमर थी और बेटा चला गया ।अब बहू को  सब समझा रहे थे देखो  अब तुम्हारा ही उनको सहारा है और तुम्ही  को सब ध्यान रखना है।

              अरुण  की मृत्यु के बाद निशा के पिताजी और बहन  आए थे। मालती जी की हालत देख सोचने  लगे मेरी बेटी का क्या  होगा ,नौकरानी बनकर ही रह जाएगी। और आमदनी का भी कोई जरिय नहीं है । निशा को सास का भी ख्याल रखना पड़ेगा और  दुकान का भी ध्यान  रखना पड़ेगा।और आमदनी का भी कोई जरिया नहीं है निशा को ही कमाना पड़ेगा  फिर मेरी बेटी का क्या होगा। कुछ सोच विचार  करने के बाद तेरहवीं  में जब  निशा के पिताजी आए तो बेटी निशा को अपने साथ ले गए। उन्होंने यह भी नहीं सोचा कि मालती जी अकेले कैसे गुजर रहे 

बसर करेंगी ।

          अब सब  निशा को भला बुरा   कह रहे थे। इस बुढ़ापे में सास को अकेला छोड़ आई । आज मायके पहुंच कर निशा की मौसी निशा से कह रही  इस उम्र में जब सास को तुम्हारी सबसे ज्यादा  जरूरत थी तो तुम उन्हें छोड़कर यहां आ गई ।निशाने कहा मौसी  उनका तो बुढ़ापा है वह कितने दिन की है और फिर दो दो  बेटियां है  वो रखेगी उनका ख्याल ,मेरी तो अभी उम्र पड़ी है मैं अपनी भविष्य के लिए भी तो सोचूंगी कुछ ।अब आप मुझे स्वार्थी कहे या जो भी कुछ कहें लेकिन मैं अब अपने लिए सोचना है ।

           अब मालती जी  जिन्होंने सारी उम्र बेटियों के घर का रुख नहीं किया। कभी  उनके घर का खाया पिया नहीं अब उनको मजबूरी में बेटियों के घर में रहना पड़ रहा है ।और वह छोटी बेटी उनको अपने साथ में ले ले गई।

       दोस्तों आप लोग बताएं , क्या निशा ने अपने लिए सोचकर कुछ ग़लत किया या सही। कभी कभी इंसान को स्वार्थी बनना पड़ता है । कुछ परिस्थितियों की वजह से। मेरे ख्याल से शायद निशा ने सही किया।कहीं और शादी करके या न भी करें शादी तो भी कुछ काम करके अपना जीवन यापन कर सकती है।और अपना जीवन खुशी-खुशी बिता सकती है ।एक खुशी का हकदार तो हर इंसान होता है ।

मंजू ओमर 

झांसी उत्तर प्रदेश 

20 जनवरी

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