*भाई जैसा मित्र नहीं ना भाई जैसा शत्रु…* – तोषिका

हेलो! प्रणाम मां दिया को लड़का हुआ है। मीरा को भी यह खुशी सुना देना वो भी इंतजार कर रही होगी।तभी मीरा पूछती है फोन पे कौन है दादी? दादी बोली, मीरा बेटा बधाई हो तुम अब एक बड़ी बहन बन गई हू। अब तुम्हारा एक छोटा भाई है जिसके साथ तुम खूब खेल सकती हो और साथ में ध्यान भी रखना उसका आखिर अब तुम अब उसकी बड़ी बहन जो हो।

उधर 9 वर्ष की मीरा फूले नहीं समा रही थी कि अब उससे भी एक छोटा सदस्य होगा घर में। उत्सुकता में उसने पूछा “दादी मेरा भाई कब तक आयेगा घर पर?”

दादी मीरा की आंखों में वो खुशी की चमक देख पा रही थी और मुस्कुरा कर कहती है तेरा भाई शाम तक आ जाएगा। तब तक उसको किस नाम से बुलाएगी वो तो सोच ले।

उधर शाम होने को चली थी और घर पे नन्हे मेहमान के स्वागत की सारी तैयारी हो गई थी और सबसे ज्यादा मेहनत मीरा ने की थी और आखिर करे भी क्यों न, उसकी इच्छा जो पूरी हो गई थी एक मित्र की जो भगवान ने उसको उसके भाई के रूप में दिया था।

सूरज बस ढाला ही था कि गाड़ी के हॉर्न की आवाज़ आई और दादी और मीरा पूजा की थाली लेके गेट पर आ गए और उस नन्हे मेहमान का स्वागत किया।

*15 वर्ष बाद*

मीरा अब 24 साल की हो गई थी और उधर रजत(उसका भाई) आज 15 वर्ष का हो गया था और सब उसी के जन्मदिन की पार्टी की तैयारी कर ही रहे थे।

रजत अपनी बहन मीरा से बिल्कुल अलग था। यही एक कारण था दोनों को जब भी मौका मिलता तो शत्रु की तरह लड़ना शुरू कर देते या फिर आपस में मस्ती करते रहते और जब भी ऐसा होता तो बीच में दिया उनकी मां फसती थी इसीलिए अब उन्होंने भी इन दोनों की लड़ाई में फसना छोड़ दिया था। इसका मतलब यह नहीं था कि वो एक दूसरे के मित्र नहीं थे। इस दुनिया में अगर रजत किसी में भरोसा करता था तो वो मीरा ही थी।

मीरा उधर पार्टी की तैयारी कर रही थी और अपने भाई को लेटा देख एक दम से परेशान होके और हल्का सा रजत को छेड़ते हुए बोली “एक वो दिन था जब यह इतना शांत सा घर पर आया था मैं कितनी खुश थी और आज देखती हू तो लगता है कि यह मेरा भाई नहीं हो सकता, पक्का हस्पताल में अदला बदली करी होगी।

ये सुनते ही रजत बोला “दीदी मेरी तो बस अदला बदली ही हुई थी तुम्हें तो कूड़े के ढेर से लाए थे।”

इनका ऐसा हसी मजाक चल ही रहा था कि अचानक से उनके घर में शॉर्ट सर्किट हुआ और धीरे धीरे आग पूरे घर में फैल रही थी।

जब रजत की नजर पड़ी तो उसने तुरंत ही दिया को अपने पापा को दादी को और अपनी बहन को बाहर जाने को कहा साथ में वो भी जा ही रहा था उसको अचानक से रसोई के सिलेंडर का ध्यान आया कि अगर उसको नहीं निकला तो बहुत बड़ा धमाका हो सकता है और इससे बाकी घरों में भी आग फैल सकती है। मीरा अपने भाई का चेहरा देख के सब समझ गई और दोनों ने बड़ी सूझबूझ से और हिम्मत दिखाते हुए उस सिलेंडर को बाहर निकाला पर इसी बीच घर से निकलते ही रजत बेहोश हो गया।

जब वह हॉस्पिटल आए और डॉक्टर ने रजत को एडमिट किया तो मीरा का रो रो कर बुरा हाल हो रहा था। वो अपने आप को कोस रही थी और कह रही थी “यह सब मेरी वजह से हुआ है, मुझे उसको बाहर भेज देना चाहिए था। मैं बड़ी हू वो मेरी बात जरूर सुनता।” एक वो ही तो था मेरा मित्र, मेरा शत्रु मेरा अपना भाई। सही कहते है लोग *”भाई जैसा मित्र नहीं न भाई जैसा शत्रु”*… 

अगर उसको कुछ हुआ तो मैं खुद को माफ नहीं कर पाऊंगी, यह बोलते ही वो स्ट्रेस के चलते बेहोश हो गई।

मीरा को 5 घंटे बाद होश आया और उसने देखा उसका भाई सही सलामत उसके साथ बैठा हुआ है और घर के सभी सदस्य भी वहा है।

तभी मीरा, रजत को जैसे ही देखा उसको अपने सीने से लगाकर रोते रोते बोली “मेरा भाई ठीक हो गया है, सच में रजत इस दुनिया में मेरे *”भाई जैसा मित्र नहीं ना भाई जैसा शत्रु है”*।

ये सुन कर सब की आँखें नम हो गई और रजत फिर से अपनी बहन मीरा के साथ खुशी खुशी मजाक कर रहा था।

लेखिका

तोषिका

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