भाई जैसा मित्र नहीं भाई जैसा दुश्मन नहीं – बबीता झा

रात 8:00 बज रहे थे। विनोद बरामदे पर टहल रहा था और बार-बार घड़ी की ओर देख रहा था। घड़ी में 8:00 बज गए। संजू अभी तक घर नहीं आया है। उसको तो 5:00 बजे तक घर आ जाना चाहिए था ना।

मां, उसका फोन भी स्विच ऑफ आ रहा है। सब दोस्तों से भी पूछ लिया, किसी को नहीं पता। एक दोस्त और भी है जिसके साथ संजू गया है, लेकिन उसका फोन भी नहीं लग रहा।  

विनोद परेशान होकर मां को सब बता रहा था। मां बोली, “इतना परेशान मत हो, कहीं घूमने चला गया होगा। चिंता तो मुझे भी हो रही है।” तभी विनोद के फोन की घंटी बजी। विनोद ने हर बार आकर फोन उठाया। “कौन?” उधर से संजू की आवाज थी, “भैया, मैं हूं।”  

विनोद बोला, “संजू, कहां हो तुम? सब ठीक है ना? तुम्हारा फोन क्या हुआ? तुम्हारे दोस्त का भी फोन नहीं लग रहा है।” विनोद सवाल पर सवाल कर जा रहा था। तभी मां बोली, “उसको बताने तो दो कि क्या हुआ।”  

विनोद पसीना पोंछते हुए बोला, “बताओ संजू, क्या हुआ?”  

संजू बोला, “इतना परेशान होने वाली बात नहीं है भैया। मेरा फोन बंद हो गया था। मेरे दोस्त के फोन से नहीं लग रहा था। हम लोग कॉलेज से निकल ही रहे थे कि मेरे दोस्त के घर से फोन आया कि उसकी मां की तबीयत खराब हो गई है। सुनकर मैं भी उसके साथ हॉस्पिटल चला गया। अब सब ठीक है। मैं घर आ रहा हूं। आप लोग परेशान मत होइए।”  

सुनकर सबके जान में जान आई और 9:32 पर संजू घर आ गया। घर आने पर संजू बोला, “भैया, मैं तो आपको सब बात ही देता हूं तभी कहीं जाता हूं। आज फोन नहीं लग रहा था और वह दोस्त कोई लड़का नहीं, लड़की है। ऐसी हालत में मैं उसको अकेला नहीं छोड़ सकता था, इसलिए उसके साथ चला गया।”  

विनोद बोला, “ठीक है, चिंता हो गई थी। तू मुझे बिना बताए कभी कहीं नहीं जाता है ना।”  

मां बोली, “चलो सब ठीक है। सब खाना खाने चलो।” और सब खाना खाने चले गए।  

रात में संजू खाना खाकर वॉक कर रहा था। तभी पीछे से संजू के कंधे पर हाथ रखते हुए विनोद ने पूछा, “किस सोच में हो? इस लड़की की चिंता हो रही है क्या? वह लड़की दोस्ती है या उससे कुछ आगे भी?”  

संजू बोला, “आप तो सब समझ गए। मैं आपको बताने की सोच ही रहा था कि मैं कनक को पसंद करता हूं। उसका नाम कनक है। मेरे साथ इंजीनियरिंग कर रही है।”  

विनोद ने कहा, “तब शादी कब करोगे?”  

संजू ने कहा, “एग्जाम समाप्त होने के बाद मैं आपसे बात करनी ही वाला था। आपके हां के बिना बात तो आगे बढ़ ही नहीं सकती थी।”  

विनोद ने कहा, “ठीक है, मैं मां से बात करूंगा। तुम्हारा प्लेसमेंट भी हो ही गया है। नौकरी की भी चिंता नहीं है। जल्दी से तुम दोनों की शादी करवा देंगे।”  

संजू सुनकर विनोद के गले लग गया और कहा, “थैंक यू भैया।” और दोनों सोने के लिए चले गए।  

कुछ दिनों में विनोद ने संजू और कनक की शादी करवा दी। शादी भी खूब धूमधाम से हुई। विनोद को तो लग रहा था सब घर लुटा दे, लेकिन मां ही रोक-टोक कर रही थी। फिर भी बहुत अच्छे से शादी संपन्न हुई और कनक नई बहू घर आ गई।  

नई बहू के आने से घर में रौनक आ गई। विनोद और उसकी पत्नी सीमा रोज कुछ ना कुछ बाहर से कनक के लिए ले आते थे। कनक बहुत खुश थी, उसे सबका प्यार जो मिल रहा था। कुछ दिनों में कनक और संजू भी जॉब पर जाने लगे। बड़ी बहू सीमा तीनों के लिए बड़े ही प्यार से लंच तैयार करके सबको ऑफिस भेजती थी।  

उनके पड़ोस में ही सुधीर रहता था। विनोद को आते-जाते उससे बात हो जाती थी। सुधीर को उनके घर की खुशी जैसे बर्दाश्त नहीं हो रही थी। एक दिन विनोद ने अपनी गाड़ी से सब्जी का थैला निकाला तो सुधीर बोला, “क्या विनोद बाबू, आजकल आपका थैला कुछ बड़ा हो गया है। एक के आने से ही दो गुना थैला।”  

विनोद थोड़ा गुस्से में बोला, “दो गुना थैला क्या होता है? मैं तो हमेशा से ऐसी ही लाता हूं। तुम ऐसी बात फिर मत करना। मुझे ऐसी बात बिल्कुल पसंद नहीं है।”  

सुधीर बोला, “ऐसी कोई बात नहीं है। मुझे लगा, इसीलिए बोल दिया।”  

विनोद सुधीर की बातों को अनसुना करके अंदर चला गया। सीमा थैली में से सब्जी निकाल रही थी तो बोली, “कटहल नहीं लाए?”  

विनोद थोड़ा तमक कर बोला, “इतनी सब्जी कम है क्या?”  

सीमा ने कहा, “नहीं-नहीं, कनक को कटहल बहुत अच्छा लगता है, इसलिए बोली। कोई बात नहीं, दूसरे दिन ले आइएगा।”  

विनोद चुपचाप मां के पास आकर बैठ गया। मां विनोद के हाव-भाव को देख रही थी। प्यार से हाथ सहलाती हुई बोली, “विनोद, आज कुछ परेशान लग रहे हो।”  

विनोद को एहसास हो गया था कि उसने कुछ ज्यादा ही जोर से बोल दिया। सब सुधीर की वजह से हुआ। इतना तो मैं हमेशा से करता हूं। विनोद ने मन ही मन सोचा।  

तभी मां की बातों को सुनकर बोला, “नहीं मां, कोई बात नहीं। सब ठीक है। और बताओ, संजू और कनक घर आए कि नहीं? आज मुझे ज्यादा भूख लग रही है।” कहते हुए विनोद टीवी खोलकर बैठ गया।  

तभी बिट्टू खुशी से उछलता हुआ आया और बोला, “पापा, पापा देखिए चाचू मेरे लिए क्या लाए हैं। बाइक है।”  

संजू ने अंदर आते हुए कहा, “तुम्हें मेरा वाला बाइक चलाने का बहुत मन था ना, इसीलिए लाया हूं। अब मेरी बाइक मत मांगना।” कहकर हंसने लगा।  

तभी कनक ने कुछ दवाई विनोद की तरफ बढ़ाते हुए कहा, “भैया, यह दवाई आपकी है। भाभी सुबह में मुझे बता रही थी कि भैया की बीपी की दवाई खत्म हो गई। तो आते समय मुझे याद आया, तो मैं ले आई। आप सबकी चिंता करते हो और अपना ध्यान नहीं रखते।”  

यह सब सुनकर मां विनोद की तरफ देख कर मुस्कुरा रही थी। विनोद समझ गया था।  

अगले दिन जब सुबह-सुबह विनोद दूध लेने दुकान गया तो बोला, “जल्दी से देना भाई, ऑफिस को लेट हो रही है।”  

तभी वहां सुधीर आया और बोला, “अरे संजू को बोल देते। अभी-अभी तो संजू अपने काम से दुकान पर आया था। वही ले जाता।”  

विनोद ने उसकी बातों का जवाब नहीं दिया और वहां से दूध लेकर चला गया।  

घर आता ही सीमा बोली, “जल्दी ऑफिस के लिए निकलीए। बिट्टू को भी लेट हो रहा है।”  

विनोद झुंझला कर बोला, “संजू के साथ भेज देती।”  

सीमा बोली, “लेकिन आज संजू और कनक सवेरे निकल गए थे।”  

विनोद बिना कुछ जवाब दिए निकल रहा था कि पीछे से मां ने कहा, “बेटा, आते समय बिजली का बिल भी जमा कर देना।”  

विनोद मां पर गुस्से से बोला, “संजू को फोन करके कह दो, जरा आते समय उधर से ही बिजली बिल जमा करने चला जाएगा।”  

मां ने कहा, “लेकिन उसको तो उल्टा पड़ जाएगा। तुम्हारे तो रास्ते में पड़ता है। तुम ही तो हमेशा से करते आए हो।”  

विनोद फिर चिल्ला के बोला, “हां-हां, सब मैं ही करता हूं और संजू हमेशा बच्चा बना रहेगा क्या?” कहकर विनोद चला गया।  

मां समझ नहीं पा रही थी कि विनोद को अचानक क्या हो गया है। आज मां की तबीयत ठीक नहीं लग रही थी। शाम होते-होते मां की तबीयत ज्यादा बिगड़ गई और शाम को मां को डॉक्टर के पास ले जाना पड़ा। रात भर हॉस्पिटल में ही सबको रहना पड़ा। सुबह में मां को घर लेकर आए।  

दो दिन तक तो सब नॉर्मल रहा। फिर एक दिन शाम को विनोद पार्क में बैठा परेशान सा था। तभी वहां पर सुधीर आया और बोला, “क्या बात है विनोद, बहुत परेशान लग रहे हो। घर में सब ठीक है ना? वैसे बुरा मत मानना, विनोद, तुम्हारे घर में संजू और कनक भी कमाते हैं लेकिन सब भार तुम ही पर क्यों है? सुना है घर का लोन भी तुम ही भरते हो।”  

विनोद बोला, “नहीं, वह मां के पेंशन से जाता है।”  

सुधीर बोला, “लेकिन फिर भी अपने घर का सारा भार तुमने अपने ऊपर ले रखा है। कुछ संजू को क्यों नहीं देते हो?”  

कहीं ना कहीं विनोद को सुधीर की बातें सही लग रही थीं। सुधीर बार-बार विनोद को भड़काने वाली बातें बोल रहा था और विनोद चुपचाप सुन रहा था। विनोद के मन में सुधीर की बातें घर कर गई थीं। घर में छोटी-छोटी नोकझोंक शुरू हो गई थी।  

इसी बीच कनक भी गर्भवती हो गई। कनक घर के माहौल से परेशान हो रही थी। एक दिन रात में खाने की टेबल पर खाना खाते समय संजू बोला, “भाभी, अब तुम्हारे खाने में स्वाद कम हो गया है। मन नहीं लगता क्या?” कहकर हंस दिया।  

आज सीमा को यह बात अच्छी नहीं लगी। बोली, “नहीं स्वाद है, तो अब कनक को बोलो बना देगी। सही में मुझे अब काम करने में मन नहीं लगता और ना ही खाना बनाने में।”  

संजू बोला, “मैं तो मजाक से बोल रहा था। आपको इतना बुरा क्यों लग गया?”  

सुनकर विनोद गुस्से से बोला, “हां, तुम्हारी बात का तो बुरा लग ही नहीं सकता क्योंकि तुम तो दूध पीते बच्चे हो ना।”  

संजू बोला, “इसमें इतना बोलने की क्या जरूरत है?”  

विनोद बोला, “मैं बहुत दिनों से देख रहा हूं तुम दोनों के नखरे। अब मेरे से बर्दाश्त नहीं होता और ना ही मैं कोई खर्चा उठा सकता हूं। घर में पैसे भी देता हूं और नौकर की तरह हम दोनों तुम लोगों का नखरा भी उठाते हैं। कल सुबह  सारा सामान समेट कर घर अलग करो।”  

सुनकर संजू भी जोर से बोला, “लेकिन घर क्यों? घर तो सबका है ना। क्योंकि लोन का पैसा तो…”  

इतना ही बोलना था कि बीच में ही विनोद बोला, “हां, मां देती है। यही बोलना था ना तुम्हारा? लेकिन पूरे घर का खर्चा तो मैं ही उठाता हूं और घर में सीमा नौकरानी की तरह काम करती है। तुम लोग सारा पैसा बैंक में जमा करते हो।”  

संजू बोला, “लेकिन अभी कनक की हालत ठीक नहीं है। मैं उसको लेकर कहां जाऊं?”  

विनोद बोला, “तो उसका खर्चा भी मैं ही उठाउ क्या।”  

सुनकर संजू आश्चर्य से बोला, “भैया, आप इतने कब से बदल गए? आपने मुझे जितना प्यार दिया, आज उतनी ही दुश्मनी निकाल रहे हो।”  

विनोद बोला, “इस प्यार का तुम लोग मेरा नाजायज फायदा उठा रहे हो। मैं अब बर्दाश्त नहीं कर सकता। कल ही घर खाली कर दो।”  

तभी मां जोर से बोली, “बस, बस करो विनोद। संजू जताता नहीं, इसका मतलब यह नहीं कि वह घर के लिए कुछ नहीं करता। कभी सीमा ने तुम्हें बताया नहीं कि तुम्हारी बेटी की फीस के पैसे कौन देता है? घर के लोन के पैसे कौन देता है? घर के राशन के पैसे कौन भरता है? मेरी दवाई के पैसे कौन देता है? तुम्हारा बेटा जो इतने महंगे-महंगे कपड़े पहनता है, वह कौन देता है? अपनी भाभी की हर फरमाइश को पूरा कौन करता है?”  

यह सब सुनकर विनोद चिल्लाता हुआ बोला, “अगर सब वही करता है तो मेरे पैसे और तुम्हारी पेंशन के पैसे कहां जाते हैं?”  

मां ने कहा, “वही तो, वही तो मैंने कहा। कभी सीमा ने तुम्हें बताया नहीं कि संजू ने तुम्हारे पैसे और मेरे पैसे कभी खर्च नहीं होने दिए। कहा, भाभी, इसे आप संभाल के रखना। कभी जरूरत के समय काम आएगा तो भैया को देना। मैं तो घर चला ही लेता हूं। रहा घर के कामों को, तो वह तुम पर छोड़ देता है। कहता है, भैया को सब समझ है। मुझे घर चलाने नहीं आता है। वही घर संभालेंगे। और तुम हो कि एक दुष्ट भाई की तरह ऐसी हालत में इस घर से निकलने को बोल रहे हो।”  

मां बोली, “मुझे सब मालूम है कि तुम इतने कैसे बदल गए। मैं कुछ दिनों से तुम्हें सुधीर के साथ बात करते देख रही थी। जो सुधीर कभी अपना घर नहीं संभाल सका, अपने मां-बाप को भी उसने घर से निकाल दिया। वह क्या भाई-भाई का प्यार समझेगा?”  

बोलते-बोलते मां रोने लगी। विनोद और सीमा दौड़कर मां के पैरों पर गिर पड़े। विनोद रो-रो कर बोल रहा था, “हां मां, मैं सुधीर की बातों में आ गया था। सीमा ने भी मुझे कभी बताया नहीं। मैं समझ रहा था इतना भार मुझ पर है और संजू बच्चा बन बैठा है।”  

सीमा भी माफी मांगने लगी। विनोद ने संजू को गले लगाया और कहा, “मैं कब अपने भाई का दोस्त से दुश्मन हो गया, पता नहीं चला। संजू, मुझे माफ कर देना।”  

सीमा ने भी कनक को गले लगाया और कहा, “यह घर हम दोनों का है।”  

यह सब देखकर मां की आंखों से खुशी के आंसू बहने लगे।

उस दिन विनोद ने समझ लिया कि सबसे बड़ा नुकसान पैसा नहीं, रिश्तों में आई दरार होती है।

और संजू ने जान लिया कि कभी-कभी चुप रहना भी बहुत बड़ा त्याग होता है।

घर फिर से घर बन गया था।

बबीता झा

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