अनाधिकार निर्णय – शुभ्रा बैनर्जी

“संजना ओ संजना,आज इतनी देर तक सोई हो,तबीयत खराब है क्या?बच्चों को स्कूल नहीं भेजना क्या?” 

सोम की आवाज सुनकर ,संजना हड़बड़ाकर उठी।जैसे ही घड़ी की तरफ देखा, दंग रह गई।आज इतनी देर कैसे सोई ?तभी भोर का सपना आंखों के आगे नाच गया।छोटी बुआ किसी  तकलीफ में है क्या? कब से सोच रही हूं, जाकर देख आऊंगी, पर निकल ही नहीं पा रही घर से। एक घंटे से भी कम समय लगता है पहुंचने में,

पर जाना ही नहीं हो पा रहा।छोटी बुआ रेलवे में पी डब्ल्यू डी में नौकरी करती थीं।जन्म से ही एक पैर छोटा था,सो झुक कर चलतीं थीं।विकलांग कोटे से रेलवे में नौकरी मिली थी उन्हें ।बड़ी बुआ के शहर में ही रेलवे के क्वार्टर में रहती थीं।बड़ी बुआ और उनका परिवार देखभाल करते थे उनकी,पर छोटी बुआ का अपने मायके के प्रति मोह ज्यादा था।संजना को भी शादी करने के लिए यह कहकर मनाया था

“तू चिंता मत कर।जब तक मैं नौकरी करूंगी,अपनी विधवा भाभी और भतीजे -भतीजियों को पैसे भेजूंगी।बस तेरा घर बसता देख लूं।मेरे अंतिम समय मैं मां-बाबा(संजना के दादा -दादी)के घर में ही रहूंगी।तू शादी के लिए मना मत कर बेटा।पास रहेगी,

तो हमारे पास आ पाएगी,कभी भी।हम भी तुझे देखने आएंगे।” अपने मृत भाई के बच्चों के प्रति उनका मोह जगजाहिर था।पहले भी जब वो आतीं,एक सहायिका के साथ,सबके लिए कुछ ना कुछ लेकर आतीं।हम सब बिना पिता के बच्चे उनके बैग टटोलने लगते।

हां इस प्रेम में बड़ा हिस्सा होता था मेरा और मुझ से चार साल छोटे भाई (राजा) का।एक पैर से चलने में लाचार थीं,पर दौड़कर हम सभी की पसंद का खाना बनाती थीं बड़ी शौक से।संजना की शादी में अपने फंड से पैसे निकाले थे उन्होंने।संजना को बहुत बुरा लगा था ,तब उन्होंने कहा” तू क्या मेरी बेटी नहीं।

मेरे इकलौते भाई की निशानी हो तुम सब।तू शादी कर ले तो,मैं गंगा नहा लूं।देखना एक कार खरीदूंगी ,उसमें बैठकर जाया करूंगी, कैमोर(मायका)खूब घूमूंगी अपनी पुरानी पहचान के लोगों से मिलूंगी।ऐसे ना जाने कितने सपने आंखों में लिए,होटल से सारे लजीज व्यंजन मंगवाती थी हम सब के लिए।मरते दम तक उन्होंने अपना वादा निभाया।

अब पिछले कुछ महीनों से बड़ी बुआ से बातचीत हो गई थी सोम की।तो जाना बंद कर दिए।मुझे बोल दिया गया था कि मैं अकेली जाकर मिल आऊं,पर मैं भी जिद में थी।अकेली क्यों जाऊं?जब सोम जा सकते हैं।वो‌ तो बस छोटी सी किसी बात की गांठ बांधे बैठे हैं।पिछले कुछ महीनों से नहीं जा रहे।नहीं तो सोम ख़ुद ही हर हफ्ते ले जाते थे।

संजना स्कूल तो पहुंची,पर काम में मन नहीं लग रहा था। बार-बार ऐसा लगता,जैसे कोई उसको पुकार रहा है।कोई तो उसे आखिरी बार देखना चाहता है।स्कूल में फाइलिंग की जिम्मेदारी थी उस पर।दोपहर होने को आई।घर‌पर पहुंच कर बच्चे खाना भी खा लेंगे।

रिंकी(काम वाली बाई )तो ससुर जी को खिला ही देती थी।अभी स्कूल की छुट्टी होने में समय था। बच्चे बस से जा चुके थे।संजना को अभी एक घंटा और रुकना पड़ेगा।तभी चपरासी ने आकर बताया प्रिंसिपल सिस्टर ने बुलवाया है।हालत खराब हो गई,जरूर कुछ गंभीर गलती हुईं है हैं,उससे‌अब क्या करे?

प्रिंसिपल के ऑफिस में सोम को बैठे देखकर माथा ठनका,संजना का।क्या कुछ  हो गया है घर पर।पापा तो ठीक होंगे ना।हे भगवान मां भी नहीं है इस समय। प्रिंसिपल सिस्टर ने बस इतना ही कहा “संजना यहां का काम छोड़ो।सोम के साथ बुआ के घर जाना पड़ेगा तुरंत।चलो अभी निकल जाओ।” 

उस समय बुआ के  घर पर फोन नहीं था। मोबाईल का भी चलन था नहीं।घर पर यहां लैंडलाइन था।बड़ी बुआ के घर के लैंड लाइन से बात होती थी।स्कूल में सोम का चेहरा बहुत उदास दिख रहा था।

जरूर कोई गंभीर बात है।बता क्यों नहीं रहे मुझसे। बाइक में बिठाकर सोम ने जब बुआ के नगर गाड़ी मोड़ी तो संजना ने पूछा”हम क्या हुआ के घर जा रहें हैं।तुमने तो कसम खाई थी यहां ना आने की।फिर आज क्यों ?” संजना की सोच को विराम दिया ,सोम ने यह कहकर”,ज्यादा समय नहीं है।जल्दी से पहुंचे तो देखा पाएंगे,अन्यथा वह भी नहीं हो पाएगा।” 

संजना समीकरण समीकरण हल ही नहीं कर पा रही थी।कौन‌इतना बीमार है यहां,और वहां‌ मुझे पता ही नहीं।किसी ने मुझे खबर करने की भी जरूरत नहीं समझी। कहते -कहते छोटी बुआ के क्वार्टर का दरवाजा खोलते ही चिल्लाने लगी संजना”बुआ ,ओ बुआ।कैसी हो तुम।शुगर ठीक हो जाता है बुआ।तुम डर के मारे बेहोश भी हो गई।

मुझे एकबार खबर भी नहीं की,क्यों?क्या यही है तुम्हारा प्यार हमारे लिए।संजना -संजना करते पूरा घर सर पर उठा लेती थी,अब जब इतनी बीमार हो,बताया भी नहीं।कहां हो तुम,लड़ाई करनी है तुमसे।ओ छोटी बुआ निकलो ना बाहर।

” आंगन धोती हुई बऊ ने आकर गले से लगा लिया,और लगी दहाड़े मार-मार रोने।बोलीं” संजू ,अभी आधा घंटा पहले श्मशान ले गए हैं छोटी बुआ को।दिन‌ डूबने से पहले क्रियाक्रम करना पड़ता है ना।और तू क्यों नहीं आई रे।मरते -मरते तक तेरा और राजा का नाम लेते गई है।आंखें पूरी बंद‌ होने से पहले भी टटोल‌ रहीं थीं तुझे,कि तू आ गई होगी।”

संजना लड़खड़ाते हुए किसी तरह अंदर जैसे ही पहुंची,सामने मां खड़ी थीं मुंह घुमाएं।देखा तक नहीं पलटकर उन्होंने,बस रोए जा रही थीं।संजना मां के पास जाकर बोली”तुम कब पहुंची मां,इतनी जल्दी तो ट्रेन नहीं मिलती कटनी से।तुम्हें खबर मिल गई।सबको खबर कर दी बड़ी बुआ,

बस मुझे बताना जरूरी नहीं समझा।मैं थी ही कौन उनकी?भतीजी ना बस।” फिर बड़ी बुआ ने आकर संभाला और पीठ पर हांथ फेरते हुए कहा “नहीं थे,कल रात से बहुत ज्यादा सीरियस हो गई थी।किसी को पहचान नहीं पा रही थीं।बस तेरा और राजा का नाम लेते-लेते दुनिया छोड़ी वो,रात को तीन बजे।” 

” तीन बजे गईं वो,और तुम लोगों ने एक बार भी मुझे फोन नहीं किया।माना मेरे घर का फोन खराब है,पर सामने दुलारे अंकल के फोन से तो बात हो जाती थी हमारी।

ऐसा क्यों किया मेरे साथ बुआ।वो‌ रात को खुद ही मुझसे मिलने आई थी।कराह रही थी बुरी तरह।मैं मिल भी ना पाई और आप लोगों ने उनकी अंतिम विदाई भी कर दी।क्यों?मैंने ऐसा क्या पाप किया था।उतनी दूर से मां पहुंच गई।राजा(छोटा भाई) नागपूर से पहुंच गया,और आधे घंटे की दूरी से क्या मैं ना पहुंच पाती?”

तब बुआ की बेटी ने कहा”बाबा(फूफा)ने रात तीन बजे दुलारे अंकल‌को फोन कर दिया था।बता भी दिया था कि वो अब जिंदा नहीं।जल्दी से संजू और बच्चों को लेकर आ जाओ। जीजाजी तो गुस्साए थे पिछले कई महीनों से।तो तुम्हें नहीं‌ बताया होगा।तुमने बहुत ग़लत किया दीदी।मौसी तुमसे मिलने को,देखने को तड़पती रही,और तुम नहीं आई। तुम्हें क्या पाप नहीं लगेगा?” 

अब संजना में और कुछ सुनने की ताकत नहीं बची थी।सोम घर के बाहर ही लज्जित हो खड़े थे। बड़ी बुआ ने सोम से पिछली बातें भुलाकर यात्रा में जल्दी जाकर शामिल होने के लिए कहा,साथ में संजना को भी रमा(छोटी बुआ)के अंतिम दर्शन करवाने की सलाह दी।

संजना बिना किसी से कुछ बोले सोम का हांथ पकड़कर पूछा” यहां से फोन आया था तीन बजे?दुलारे अंकल‌ने बुआ के नाम रहने की बात भी बताई थी क्या?”

सोम नजर नीची किए हुए ही बोले” हां,दुलारे अंकल‌ ने बताया था,तुम तब सो रही‌ थी।उपास था‌ तुम्हारा निर्जला।मैं अगर बता देता तो,तुम रोने लगती जोर-जोर से।कौन संभालता फिर।घर में‌ बाबा भी बिस्तर पर हैं।मैं‌ साहस ही नहीं‌ जुटा पाया।मैं जानता हूं ,तुम छोटी बुआ‌की‌लाड़ली हो।कैसे सह पाओगी ये दुख।पर मुझे यह अंदाजा बिल्कुल नहीं था कि इतनी जल्दी सब कार्यक्रम हो जाएंगे।”

संजना ने जीवन में पहली बार इतनी ऊंची आवाज में बात की”मेरे इतने बड़े हितुआ बनने की कोशिश में,तुमने मुझसे उन्हें अंतिम बार देखने का सुख छीन लिया।मरते दम तक मैं तुम्हें माफ़ नहीं करूंगी।तुम तो हमेशा फोन आने पर बताते हो मुझे,ये कौन सा नया बैर पाल‌ रहे हो,

कि रिश्तों में तनाव आता जा रहा है।जब तुम्हारी मर्जी हो,तुम हफ्ते में एक बार जरूर आते थे,कभी मुझे लेकर,कभी अकेले।अब यह कैसी दुश्मनी पाल ली तुमने?

मेरी बुआ की मृत्यु की खबर तुम्हारे लिए कोई मायने ही नहीं रखती।सारे दूर-दूर के लोग समय पर पहुंच गए,बस मैं ही पास रहकर पहुंच नहीं पाई।”संजना धार -धार रोए जा रही थी।सोमेश ने तब बड़ी बुआ को सफाई दी” कल निर्जला उपवास था ना बुआ।

आज कुछ खिलाकर फिर बताता,ऐसा मैंने सोचा था।आ तो जल्दी जाते,पर इनके स्कूल में नाटक शुरू हो गया।ये फाइल ,वो फाइल।मैंने जानबूझ कर कुछ नहीं किया।” बड़ी बुआ तब सोम को धीरज बंधाते बोलीं “जो हुआ ,सो हुआ।अब निकलो‌ जल्दी,रास्ते में ही‌होंगे।संजू को दर्शन करवा दो सोम।रमा की आत्मा संतोष पाएगी।” 

सोम ने तुरंत अपनी बाइक निकाली,तो संजना जोर से गरजी” कोई नहीं जाएगा बुआ के दर्शन को।अच्छा किया उन्होंने,जिनके आने की उम्मीद में तड़पती रही,वे‌ पहुंच ही नहीं‌ पाए आखिरी समय में।जब आखिरी समय में उनको शांति नहीं दे पाए,तो अब किस अधिकार से उन्हें देखने जाएंगे।

हमारे मुंह पर तमाचा मार गई छोटी बुआ।तुम इतने जिम्मेदार बन बैठे कि मुझे क्या करना है,वह भी तुमने ही निर्णय लिया।मैंने तुम्हारे घर की हर विपत्ति पर तुमसे पहले पहुंच कर उनका समाधान किया है।जब जिसको कहीं जाना जरूरी है,तो तुम्हारे मना करने के बाद भी मैं भेजती।

रिश्तों‌ को निभाना सीखा है मैंने।तुमने क्या किया?सही किया क्या?अपनी अंतरात्मा से पूछकर देखो।किस मुंह से जाओगे,उनके सामने।धिक्कारेगी नहीं‌ तुम्हारी आत्मा तुम्हें।इस बार तुमने पति के दायरे से निकलकर अनाधिकृत अधिकार जमाया है मुझ पर।सोम,यह गलती नहीं गुनाह है।इस गुनाह की कोई माफी नहीं।आज से मेरे विषय में प्लीज़ कोई निर्णय मत लेना।

शाम हो रही है,तुम घर जाओ।बच्चों‌ और पापा को देखना।मैं‌ तेरह दिनों तक यही रहूंगीं।उनके नाम होने वाली पूजा खत्म करके ही मैं आऊंगी।

मैं नहीं चाहती कि तुम तब उपस्थित रहो,और वे तुम्हें माफ़ कर दें।उनकी तड़प,बेबसी,लाचारी और मोह रोई होगी मेरे लिए।मेरे लिए भी यही सजा है कि मैं उन्हें अंतिम बार भी ना देखूं।देखने से जो पाप किया है मैंने ना मिलने आकर,वह धुलेगा नहीं।”अनजाने में हो गई घटना,गलती कहलाती है,पर जानबूझकर की गई ग़लती ” गुनाह”बन जाती है,जिसकी कोई माफी नहीं।

शुभ्रा बैनर्जी 

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