खामोशी की गूंज – हेमलता गुप्ता

सुबह के 6:30 बज रहे थे। अलार्म की आवाज़ से नहीं, बल्कि रसोई में बर्तनों के पटकने की तेज़ आवाज़ से 65 वर्षीय सुमेधा देवी की आँख खुली। उनके सिर में हल्का भारीपन था। कल रात ब्लड प्रेशर थोड़ा बढ़ा हुआ था, इसलिए नींद देर से आई थी। अभी उन्होंने करवट बदली ही थी कि कमरे का दरवाज़ा ज़ोर से खुला।

सामने उनकी बहू तनीषा खड़ी थी। जिम के टाइट कपड़े पहने, हाथ में प्रोटीन शेक की बोतल और चेहरे पर तनाव की लकीरें।

“मम्मी जी! आप अभी तक बिस्तर में हैं? साढ़े छह बज गए हैं! आपको याद नहीं कि आज कबीर की स्कूल बस 7:15 पर आती है? मुझे 8 बजे क्लाइंट मीटिंग के लिए निकलना है, और रोहन (बेटा) को भी आज जल्दी जाना है। अगर आप ही इतनी देर तक सोती रहेंगी, तो घर का निज़ाम कैसे चलेगा?” तनीषा की आवाज़ में इज़्ज़त कम और हुक्म ज्यादा था।

सुमेधा जी हड़बड़ा कर उठ बैठीं। “बेटा, वो रात को थोड़ी तबियत…”

“अब बहाने मत बनाइए प्लीज़,” तनीषा ने उनकी बात काट दी। “आप जल्दी तैयार हो जाइए। कबीर को बस स्टॉप तक छोड़ना है। और हाँ, मेड नहीं आ रही आज, तो कृपया नाश्ते में पोहा बना दीजियेगा, रोहन को पसंद है। मैं जिम से होकर सीधे तैयार होने चली जाऊंगी। और हाँ, आज मंगलवार है, आपका व्रत होगा न? तो अपने लिए साबूदाना भिगो लीजियेगा, मेरे पास टाइम नहीं है अलग से फलाहार बनाने का।”

इतना कहकर तनीषा मुड़ी और अपने कमरे की ओर चली गई। सुमेधा जी ने एक गहरी सांस ली। उनकी प्यास से जीभ सूख रही थी। मन कर रहा था कि एक कप अदरक वाली चाय मिल जाए, तो शरीर में जान आए। लेकिन वे जानती थीं कि अगर अभी चाय बनाने बैठीं, तो कबीर लेट हो जाएगा और फिर घर में महाभारत शुरू हो जाएगी।

रोहन, उनका बेटा, अपनी पत्नी तनीषा की हर बात पर मौन स्वीकृति देता था। सुमेधा जी के पति के गुजरने के बाद, उन्होंने अपनी सारी जमापूंजी बेटे के नए फ्लैट में लगा दी थी। उन्हें लगा था कि बुढ़ापे में परिवार का साथ मिलेगा, लेकिन वे इस आलीशान फ्लैट के एक कोने वाले कमरे में सिर्फ़ एक ‘अनपेड नैनी’ (बिना वेतन की आया) बनकर रह गई थीं।

सुमेधा जी ने जल्दी से मुंह धोया। कबीर को तैयार किया। कबीर, उनका सात साल का पोता, ही इस घर में उनकी जीने की वजह था।

“दादी, आज आप मुझे कहानी सुनाओगी न बस स्टॉप तक?” कबीर ने मासूमियत से पूछा।

“हाँ मेरे लाल,” सुमेधा जी ने फीकी मुस्कान के साथ कहा।

कबीर को बस स्टॉप तक छोड़ने के बाद, सुमेधा जी की चाल धीमी हो गई। वापसी में सोसायटी के गेट के पास बनी एक बेंच पर वे हांफते हुए बैठ गईं। पेट में भूख की ऐंठन और सिर में दर्द। उन्हें याद आया कि फ्रिज में कल का दूध रखा है, घर जाकर चाय बनाएंगी और फिर पोहा बनाएंगी।

तभी उनकी नज़र सामने वाले पार्क में गई। वहाँ कुछ महिलाएं हारमोनियम और ढोलक के साथ बैठी थीं। वे शायद किसी भजन कीर्तन की तैयारी कर रही थीं। सुमेधा जी के पैर अनायास ही उस ओर खिंच गए।

एक ज़माना था जब सुमेधा जी अपने शहर की मानी-मानी शास्त्रीय गायिका थीं। उनकी आवाज़ में वो जादू था कि लोग मंत्रमुग्ध हो जाते थे। लेकिन शादी, फिर पति की बीमारी, और फिर बेटे के करियर के चक्कर में उनका रियाज़, उनका तानपूरा, सब कहीं पीछे छूट गया था। पिछले दस सालों से उन्होंने गुनगुनाया तक नहीं था।

पार्क में बैठी महिलाओं में से एक, जो ढोलक बजा रही थी, सुर से भटक रही थी। सुमेधा जी से रहा नहीं गया। वे पास जाकर खड़ी हो गईं।

“बेटी, ढोलक की थाप थोड़ी धीमी रखो, सुर बिखर रहे हैं,” सुमेधा जी ने अनजाने में ही टोक दिया।

वो महिला, जिसका नाम अनुराधा था, ने सिर उठाकर देखा। “माजी, आप गाती हैं क्या? हमसे तो यह ‘राग यमन’ संभल ही नहीं रहा।”

सुमेधा जी की आँखों में एक पुरानी चमक आ गई। “यमन… शाम का राग है, पर भक्ति में इसे सुबह भी गाया जा सकता है।” उन्होंने धीरे से आलाप लिया।

जैसे ही सुमेधा जी के गले से वो स्वर निकला, पार्क का शोर जैसे थम गया। उनकी आवाज़ में दर्द, अनुभव और साधना का ऐसा मिश्रण था कि वहां टहलने वाले लोग भी रुक गए। सुमेधा जी भूल गईं कि घर पर पोहा बनाना है, भूल गईं कि तनीषा का गुस्सा इंतज़ार कर रहा है। वे बस गाती रहीं। दस मिनट, बीस मिनट, आधा घंटा… समय का जैसे कोई अस्तित्व ही नहीं रहा।

जब उन्होंने आँखें खोलीं, तो देखा कि अनुराधा और बाकी महिलाएं हाथ जोड़े बैठी थीं। अनुराधा की आँखों में आंसू थे।

“माजी, आप साक्षात सरस्वती हैं! आप यहाँ इस सोसायटी में रहती हैं और हमें पता ही नहीं? हमारा एक छोटा सा संगीत विद्यालय है पास में, ‘स्वर-साधना’। हमारे गुरुजी पिछले महीने शहर छोड़ गए, तब से हम अनाथ हो गए हैं। क्या आप हमें सिखाएंगी?”

सुमेधा जी हड़बड़ा गईं। “नहीं-नहीं बेटा, मैं कहाँ… घर पर बहुत काम है। बहू इंतज़ार कर रही होगी।”

घड़ी देखी तो 8:15 बज चुके थे। सुमेधा जी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। तनीषा की मीटिंग! रोहन का ऑफिस!

वे पागलों की तरह घर की ओर दौड़ीं। लिफ्ट से ऊपर जाते वक़्त उनका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। जैसे ही उन्होंने फ्लैट का दरवाज़ा खोला, अंदर का नज़ारा किसी तूफ़ान से कम नहीं था।

रोहन टाई बांधते हुए चिल्ला रहा था, “माँ कहाँ हैं? मेरा नाश्ता नहीं बना और मुझे निकलना है!”

तनीषा फ़ोन पर किसी पर चिल्ला रही थी और साथ ही किचन में ब्रेड ढूंढ रही थी।

सुमेधा जी के अंदर घुसते ही तनीषा उन पर बरस पड़ी। “मम्मी जी! हद होती है लापरवाही की! आप कबीर को छोड़ने गई थीं या पिकनिक मनाने? पौने नौ बज रहे हैं! न नाश्ता बना है, न लंच पैक हुआ है। रोहन भूखे जा रहे हैं। आपको ज़रा भी ज़िम्मेदारी का अहसास है? हम दिन-रात खटते हैं और आपसे घर का एक काम नहीं होता?”

रोहन ने भी जाते-जाते कहा, “माँ, आपसे उम्मीद नहीं थी। कम से कम बता तो देतीं कि आपसे नहीं होगा, हम बाहर से मंगा लेते। अब मेरा दिन ख़राब कर दिया।”

सुमेधा जी दरवाज़े पर खड़ी रहीं। उनका शरीर कांप रहा था। भूख, प्यास, और अब यह अपमान। लेकिन आज कुछ अलग था। आज पार्क में मिले उस सम्मान की गूंज अभी भी उनके कानों में थी। अनुराधा का वो वाक्य—“आप साक्षात सरस्वती हैं”—तनीषा के वाक्यों से टकरा रहा था।

तनीषा ने अपना बैग उठाया और गुस्से में बोली, “अब खड़ी क्या हैं? जाइये, किचन में देखिये क्या हो सकता है। शाम को आकर बात करती हूँ आपसे।”

दोनों चले गए। घर में फिर वही सन्नाटा छा गया जो सुमेधा जी को खाने को दौड़ता था।

सुमेधा जी किचन में गईं। उन्होंने पोहा नहीं बनाया। उन्होंने अपने लिए चाय बनाई। साबूदाना नहीं भिगोया, बल्कि बिस्किट का पैकेट खोला। वे चाय का कप लेकर बालकनी में आ गईं।

उन्होंने अपनी पुरानी संदूक खोली, जो स्टोर रूम में सबसे ऊपर पड़ी थी। धूल झाड़ी। अंदर से एक पुरानी डायरी और कुछ सर्टिफिकेट्स निकले। और सबसे नीचे—उनका तानपूरा। तार टूट चुके थे, लेकिन लकड़ी अभी भी मज़बूत थी।

दोपहर में उनके फ़ोन की घंटी बजी। अनजान नंबर था।

“हेलो, सुमेधा माजी?”

“हाँ, कौन?”

“मैं अनुराधा। पार्क से। माजी, मैंने आपका नंबर गार्ड से लिया। माफ़ कीजियेगा दखल देने के लिए, लेकिन हमारे संगीत विद्यालय के ट्रस्टी आज शहर में हैं। मैंने उन्हें आपके गायन के बारे में बताया। वो आपसे मिलना चाहते हैं। हम आपको ससम्मान ‘वरिष्ठ शिक्षिका’ के पद पर रखना चाहते हैं। हफ्ते में सिर्फ़ तीन दिन, दो-दो घंटे। क्या आप आज शाम 5 बजे आ सकती हैं?”

सुमेधा जी की धड़कन तेज़ हो गई। एक तरफ घर की चारदीवारी और रोज़ का तिरस्कार, दूसरी तरफ संगीत की दुनिया और सम्मान।

शाम के 5 बजने वाले थे। तनीषा का फ़ोन आया।

“मम्मी जी, मैं लेट हो रही हूँ। आप कबीर को डे-केयर से ले आइएगा और रात के खाने में राजमा चावल बना दीजियेगा। और हाँ, रोहन के कपड़े भी प्रेस वाले से ले लीजियेगा।”

सुमेधा जी ने फ़ोन काटा नहीं, बस इतना कहा, “मैं घर पर नहीं हूँ, तनीषा।”

उधर से सन्नाटा छा गया। “क्या? कहाँ हैं आप? कबीर को कौन लाएगा?”

“तुम ले आओ। या रोहन को बोलो। मैं अभी व्यस्त हूँ।” सुमेधा जी ने फ़ोन काट दिया। यह उनके जीवन का पहला विद्रोह था।

सुमेधा जी ने अपनी सबसे अच्छी कांजीवरम साड़ी निकाली, जो सालों से नहीं पहनी थी। बाल सलीके से बनाए। माथे पर बड़ी बिंदी लगाई। और ऑटो लेकर ‘स्वर-साधना’ केंद्र पहुँच गईं।

वहां उनका स्वागत ऐसे हुआ जैसे कोई सेलिब्रिटी आई हो। ट्रस्टी ने उनका गायन सुना और मंत्रमुग्ध हो गए। उन्होंने सुमेधा जी को न केवल नौकरी दी, बल्कि अच्छी सैलरी भी ऑफर की।

जब सुमेधा जी रात के 8 बजे घर लौटीं, तो घर का माहौल बदला हुआ था। रोहन और तनीषा सोफे पर बैठे थे। कबीर टीवी देख रहा था। किचन में बाहर से मंगाये खाने के डिब्बे पड़े थे।

सुमेधा जी के चेहरे पर एक अलग ही तेज था। तनीषा उन्हें देखकर हक्का-बक्का रह गई। साड़ी में सजी-धजी सुमेधा जी वह ‘बेचारी सास’ नहीं लग रही थीं जो सुबह डांट खाकर सिर झुका लेती थीं।

“माँ, आप कहाँ थीं? फ़ोन भी नहीं उठाया बाद में? हम लोग कितने परेशान थे!” रोहन ने खीजते हुए कहा।

सुमेधा जी ने आराम से सोफे पर बैठकर पानी का गिलास उठाया और एक घूंट पिया।

“रोहन, तनीषा,” उनकी आवाज़ शांत लेकिन दृढ़ थी। “आज मुझे कुछ ज़रूरी बात करनी है।”

तनीषा ने ताना मारने के अंदाज़ में कहा, “हाँ-हाँ बोलिए। वैसे भी आज आपने घर का सारा शेड्यूल बिगाड़ दिया है।”

सुमेधा जी ने तनीषा की आँखों में सीधे देखा। “शेड्यूल तो अब बनेगा, तनीषा। पिछले पांच सालों से मैं इस घर में एक परछाई की तरह रह रही हूँ। मैं सुबह 6 बजे उठती हूँ और रात के 11 बजे तक खटती हूँ। बदले में मुझे क्या मिलता है? न सम्मान, न अपनापन, न दो मीठे बोल। आज मुझे अहसास हुआ कि मैं सिर्फ रोहन की माँ या तुम्हारी सास नहीं हूँ। मैं सुमेधा हूँ।”

उन्होंने अपने पर्स से नियुक्ति पत्र (Appointment Letter) निकाला और टेबल पर रख दिया।

“मैंने ‘स्वर-साधना’ संगीत विद्यालय में नौकरी जॉइन कर ली है। हफ्ते में तीन दिन मैं वहां जाउंगी। शाम 4 से 7 बजे तक। उस दौरान मैं कबीर को नहीं देख पाऊंगी और न ही रात का खाना बनाउंगी।”

रोहन और तनीषा के मुंह खुले के खुले रह गए।

“नौकरी? माँ, आपको क्या ज़रूरत है? मैं कमा तो रहा हूँ,” रोहन ने कहा।

“तुम्हारी कमाई से मेरा पेट भरता है रोहन, मेरी आत्मा नहीं,” सुमेधा जी ने कहा। “और रही बात घर के कामों की, तो मैंने अपनी सैलरी से एक फुल-टाइम मेड का इंतज़ाम करने का सोचा है जो सुबह-शाम का खाना बनाएगी और सफाई करेगी। उसका खर्चा मैं उठाऊंगी। ताकि तनीषा को यह कहने का मौका न मिले कि ‘काम नहीं हुआ’। और कबीर… कबीर को मैं स्कूल बस तक छोड़ आऊंगी, क्योंकि वो मुझे अच्छा लगता है, मेरी मजबूरी नहीं है।”

तनीषा गुस्से से खड़ी हो गई। “मम्मी जी, यह क्या ड्रामा है? लोग क्या कहेंगे कि इतने बड़े घर की बुजुर्ग महिला नौकरी कर रही है?”

सुमेधा जी मुस्कुराईं। “लोग तब भी बातें करते थे जब तुम मुझ पर चिल्लाती थीं और मैं चुप रहती थी। अब कम से कम वो यह कहेंगे कि सुमेधा अपने पैरों पर खड़ी है। तनीषा, मैं तुम्हारी दुश्मन नहीं हूँ। मैं बस यह चाहती हूँ कि तुम मुझे ‘मशीन’ समझना बंद करो। अगर तुम मेरी इज़्ज़त करोगी, तो मैं इस घर को स्वर्ग बना दूंगी। लेकिन अगर तुम मुझे दबाओगी, तो याद रखना, मैं वो स्प्रिंग हूँ जो दबने पर उछलती भी है।”

कमरे में सन्नाटा छा गया। रोहन ने नियुक्ति पत्र उठाया। उसमें सुमेधा जी का पद और सम्मान साफ़ लिखा था। उसे पहली बार अपनी माँ पर गर्व और अपनी हरकतों पर शर्म महसूस हुई। उसे याद आया कि बचपन में माँ कैसे गाती थीं और पूरा मोहल्ला सुनने आता था। उसने उस कला को घर की चारदीवारी में दफ़न कर दिया था।

रोहन ने धीरे से तनीषा का हाथ पकड़ा, जो कुछ और बोलने जा रही थी, और उसे इशारे से चुप करा दिया। वह माँ के पास गया और उनके चरणों में बैठ गया।

“माँ, हमसे गलती हो गई। हमें लगा कि आप… आप बस ‘माँ’ हैं और आपका काम सिर्फ़ देना है। हम भूल गए थे कि आपके भी सपने हैं। आप ज़रूर जाइये। और मेड का खर्चा आप नहीं, मैं दूंगा। यह मेरी ज़िम्मेदारी है।”

तनीषा अभी भी अपनी ईगो से लड़ रही थी, लेकिन सुमेधा जी के व्यक्तित्व में आए बदलाव ने उसे भी सोचने पर मजबूर कर दिया था। सुमेधा जी ने कबीर को आवाज़ दी।

“कबीर, इधर आओ। दादी तुम्हें एक नया गाना सुनाए?”

कबीर दौड़कर आया और दादी की गोद में बैठ गया। सुमेधा जी ने गुनगुनाना शुरू किया। घर का तनाव संगीत की लहरों में घुलने लगा।

उस रात, सुमेधा जी ने खुद अपने हाथों से राजमा चावल नहीं बनाए, बल्कि सबने मिलकर किचन में खिचड़ी बनाई। तनीषा ने सब्ज़ी काटी और सुमेधा जी ने उसमें तड़का लगाया। चाय सुमेधा जी ने नहीं, रोहन ने बनाई।

अगली सुबह जब सुमेधा जी उठीं, तो तनीषा जिम जाने के लिए तैयार खड़ी थी, लेकिन इस बार उसने आदेश नहीं दिया।

“मम्मी जी, चाय बना दी है, टेबल पर रखी है। कबीर को मैं छोड़ आती हूँ, आप आराम से तैयार हो जाइएगा,” तनीषा ने नज़रे झुकाकर कहा।

सुमेधा जी ने मुस्कुराते हुए चाय का कप उठाया। वह चाय सिर्फ़ चाय नहीं थी, वह उनके स्वाभिमान और जीत का स्वाद थी। उन्होंने जान लिया था कि दुनिया आपको तभी सम्मान देती है जब आप खुद अपना सम्मान करना सीखते हैं। ‘खामोशी’ जब टूटती है, तो वो शोर नहीं मचाती, बल्कि संगीत बन जाती है, अगर उसे सही सुर मिले तो।

सुमेधा अब सिर्फ एक सास नहीं थीं, वे एक कलाकार थीं, और यह घर अब एक पिंजरा नहीं, उनका आशियाना था।

मूल लेखिका 

हेमलता गुप्ता 

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