मुंबई के एक पॉश बैंक्वेट हॉल में झूमर की रोशनी और शहनाई की धुन के बीच मेहमानों का तांता लगा हुआ था। अवसर था ‘आरव’ का अन्नप्राशन संस्कार। आरव, जो शिखा और मयंक का पहला बेटा था, आज मखमल की शेरवानी में किसी राजकुमार से कम नहीं लग रहा था।
मीरा अपने पति, आकाश, के साथ अभी-अभी दिल्ली से मुंबई पहुंची थी। फ्लाइट लेट होने के वजह से वे लोग सीधे समारोह स्थल पर ही आए थे। हॉल के अंदर घुसते ही मीरा की आँखें अपनी सास, सावित्री जी और ससुर, दीनानाथ जी को ढूंढने लगीं। वे दोनों एक महीने पहले ही बेटी शिखा की मदद के लिए मुंबई आ गए थे।
कोने वाली एक मेज पर दीनानाथ जी अपने पुराने, मगर सलीके से इस्त्री किए हुए सूट में बैठे थे। उनके चेहरे पर थकान थी, लेकिन होठों पर एक संतोषजनक मुस्कान चिपकी हुई थी। सावित्री जी शायद शिखा के साथ रस्मों में व्यस्त थीं।
मीरा ने आकाश को इशारे से कहा कि वह सामान एक तरफ रख दे और वे पहले मम्मी-पापा से मिलें। दीनानाथ जी ने जैसे ही अपने बेटे-बहू को देखा, उनकी आँखों में चमक आ गई।
“आ गए तुम लोग? बहुत देर कर दी, मुख्य पूजा तो हो भी गई,” दीनानाथ जी ने उठते हुए कहा।
“क्या करें पापा, फ्लाइट ही लेट थी,” आकाश ने पिता के पैर छूते हुए कहा।
तभी शिखा वहां आई। वह भारी कांजीवरम साड़ी और हीरे के गहनों में लदी हुई थी। लेकिन मीरा ने गौर किया कि शिखा की मुस्कान आँखों तक नहीं पहुँच रही थी। उसके चेहरे पर एक तनाव था, एक खिंचाव था जो अक्सर तब आता है जब इंसान किसी बात से नाखुश हो लेकिन उसे दुनिया के सामने ज़ाहिर न कर सके।
“अरे भाभी, भैया, आप लोग आ गए,” शिखा ने औपचारिकता निभाते हुए कहा। “अच्छा हुआ अभी आ गए, गिफ्ट सेरेमनी शुरू होने वाली है। मेरे ससुराल वाले—सासू माँ और जेठानी जी—सब बड़े-बड़े तोहफे लेकर आए हैं। आप लोग फ्रेश हो जाइए, फिर मंच पर आ जाना।”
मीरा ने शिखा के लहज़े में छिपी कड़वाहट को भांप लिया। वह शिखा को बचपन से जानती थी। शिखा दिल की बुरी नहीं थी, लेकिन ससुराल की रहीसियत और दिखावे की होड़ ने उसके स्वभाव पर एक परत चढ़ा दी थी।
थोड़ी देर बाद, जब रस्म शुरू हुई, तो शिखा की सास ने आरव को सोने की एक भारी चेन और ब्रेसलेट पहनाया। हॉल तालियों से गूंज उठा। शिखा का सीना गर्व से फूल गया। उसके बाद उसकी जेठानी ने एक चांदी का पूरा डिनर सेट गिफ्ट किया। एक-एक करके ससुराल पक्ष के लोगों ने कीमती तोहफे दिए।
अब बारी नाना-नानी की थी।
दीनानाथ जी मंच पर चढ़े। उनके हाथ कांप रहे थे। उन्होंने अपनी जेब से एक छोटा सा मखमली डिब्बा निकाला। सावित्री जी उनके बगल में खड़ी थीं, उनकी नज़रें झुकी हुई थीं। दीनानाथ जी ने डिब्बा खोला। उसमें सोने की एक पतली सी चेन थी, जिसके पेंडेंट पर ‘ॐ’ बना हुआ था। वह चेन बहुत हल्की थी, शायद 4-5 ग्राम की रही होगी।
जैसे ही उन्होंने आरव के गले में वह चेन पहनाई, शिखा के चेहरे का रंग उड़ गया। उसने जल्दी से अपनी सास की तरफ देखा, जो अपनी नाक सिकोड़ रही थीं। शिखा ने जबरदस्ती मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन उसकी आँखों में शर्मिंदगी साफ़ झलक रही थी।
समारोह के बाद, जब मेहमान खाना खाने में व्यस्त हो गए, मीरा शिखा को ढूंढते हुए ग्रीन रूम की तरफ गई। दरवाजा थोड़ा खुला था। अंदर से शिखा की तेज़ आवाज़ आ रही थी।
“माँ, आपको समझ नहीं आता क्या? यह मुंबई है, मेरा ससुराल है। यहाँ लोग ब्रांड और वजन देखते हैं। आपने वो चेन देखी? धागे जैसी पतली थी। मेरी सासू माँ ने आरव को 20 ग्राम की चेन दी है, और मेरे मायके से यह? मेरी जेठानी हंस रही थी। कम से कम एक ढंग का लॉकेट तो बनवा लेते। पापा रिटायर्ड हैं, मैं मानती हूँ, लेकिन यह तो इकलौता नाती है उनका। नाक कटवा दी मेरी सबके सामने।”
अंदर सावित्री जी की दबी हुई आवाज़ आई, “बेटा, तेरे पापा ने अपनी क्षमता से बढ़कर ही किया है। आजकल सोना कितना महंगा है तुझे पता है…”
“महंगाई का बहाना मत बनाओ माँ!” शिखा चिल्लाई। “जब भैया की शादी हुई थी तब तो पापा ने भाभी को भारी सेट चढ़ाया था। और बेटी के टाइम पर गरीबी याद आ गई? मैंने पहले ही इशारा किया था कि यहाँ सब हैवी गिफ्ट्स देते हैं। अगर नहीं था पैसा, तो कुछ न देते, शगुन का लिफाफा दे देते। कम से कम यह तौहीन तो न होती।”
मीरा से अब रहा नहीं गया। उसने दरवाजा धक्का देकर खोला। शिखा अपनी भाभी को अचानक देखकर चुप हो गई, लेकिन उसका गुस्सा अभी भी ठंडा नहीं हुआ था। सावित्री जी पल्लू से अपनी आँखें पोंछ रही थीं।
मीरा ने अंदर आकर दरवाजा बंद किया। वह शिखा के पास गई और बेहद शांत स्वर में बोली, “शिखा, आवाज़ नीचे। बाहर तुम्हारे ‘रईस’ रिश्तेदार खड़े हैं। अगर उन्हें पता चला कि तुम अपने बूढ़े माँ-बाप से तोहफों का हिसाब मांग रही हो, तो असली नाक तब कटेगी।”
“भाभी, आप बीच में मत बोलिये,” शिखा ने झल्लाते हुए कहा। “आप नहीं समझेंगी। ससुराल में इज़्ज़त बनाने में बरसों लग जाते हैं और मायके की एक गलती उसे मिटटी में मिला देती है। पापा ने यह चेन देकर साबित कर दिया कि वो मुझे या आरव को अहमियत नहीं देते।”
मीरा ने एक गहरी सांस ली। उसने सावित्री जी की ओर देखा, जो सिर झुकाए खड़ी थीं। मीरा को पता था कि अब सच बोलने का वक़्त आ गया है, चाहे वो कितना भी कड़वा क्यों न हो।
“अहमियत?” मीरा ने शिखा की आँखों में सीधे देखते हुए पूछा। “तुम्हें लगता है यह चेन पापा ने अपनी पेंशन के बचे हुए पैसों से खरीदी है?”
शिखा ने मुंह बनाया, “और नहीं तो क्या? पेंशन तो आती ही है न उनकी।”
“गलत,” मीरा ने कठोरता से कहा। “पापा की पेंशन पिछले छह महीने से बैंक की ईएमआई भरने में जा रही है। वो ईएमआई, जो उन्होंने उस ‘पर्सनल लोन’ के लिए शुरू करवाई थी, जो उन्होंने छह महीने पहले तुम्हारे पति, मयंक को दिया था।”
शिखा सन्न रह गई। “क्या? मयंक को? लोन?”
“हाँ,” मीरा ने खुलासा किया। “तुम्हारे पति का बिजनेस डूब रहा था शिखा। उन्हें अर्जेंट 10 लाख रुपयों की ज़रूरत थी। मयंक ने पापा को फोन करके रोते हुए कहा था कि अगर पैसे नहीं मिले तो वो बर्बाद हो जाएंगे, लेकिन यह भी कसम दी थी कि तुम्हें कुछ न बताएं क्योंकि तुम प्रेग्नेंट थी और वो तुम्हें तनाव नहीं देना चाहते थे। पापा ने अपना पीएफ (Provident Fund) का बचा हुआ पैसा और अपनी पुरानी कार बेचकर वो 10 लाख रुपये मयंक को दिए। उस वक़्त पापा ने यह नहीं सोचा कि उनका बुढ़ापा कैसे कटेगा, उन्होंने सिर्फ़ यह सोचा कि उनकी बेटी का घर उजड़ने से बच जाए।”
शिखा के चेहरे से रंगत गायब हो चुकी थी। वह मूर्तिवत खड़ी थी।
मीरा आगे बढ़ी और सावित्री जी का हाथ अपने हाथ में लिया। सावित्री जी की कलाई सूनी थी, बस कांच की दो चूड़ियाँ थीं।
“और रही बात इस सोने की चेन की,” मीरा ने सावित्री जी का हाथ शिखा के सामने करते हुए कहा, “तो ज़रा माँ की कलाई देखो। उनकी सोने की वो चार चूड़ियाँ कहाँ गईं जो वो हमेशा पहनती थीं? तुम्हें क्या लगा, वो फैशन में नहीं पहन रहीं? उन्होंने अपनी वो आखिरी निशानी बेच दी, शिखा। इसलिए नहीं कि उन्हें दिखावा करना था, बल्कि इसलिए कि उनकी बेटी का मन न छोटा हो जाए। उन्होंने सोचा कि नाती के गले में कुछ तो सोना होना चाहिए। उन्होंने अपनी कलाई सूनी करके तुम्हारे बेटे का गला सजाया है। और तुम… तुम उस सोने का वज़न तौल रही हो?”
कमरे में सन्नाटा पसर गया। बाहर बैंक्वेट हॉल का शोरगुल अब बहुत दूर लग रहा था। शिखा के कानों में सिर्फ़ अपनी भाभी के शब्द गूंज रहे थे। उसे वो रातें याद आईं जब मयंक बहुत परेशान रहते थे, और फिर अचानक उनकी परेशानी दूर हो गई थी। मयंक ने कहा था कि ‘एक इन्वेस्टर मिल गया’। उसे क्या पता था कि वो इन्वेस्टर कोई और नहीं, उसके रिटायर्ड पिता थे जिन्होंने अपनी जीवन भर की जमापूंजी उसकी खुशियों पर वार दी थी।
शिखा की आँखों से आंसुओं की धार बह निकली। वह शर्मिंदगी के बोझ तले दब गई थी। जिस ‘धागे जैसी’ चेन को वह अपनी बेइज्जती मान रही थी, वह दरअसल उसके माता-पिता के त्याग का सबसे भारी गहना था। उसकी सास और जेठानी के दिए हुए हीरे-जवाहरात उनकी तिजोरी की अतिरिक्त संपत्ति थी, लेकिन उसके पिता का दिया वह तोहफा, उनकी ‘पूरी संपत्ति’ थी।
शिखा धीरे-धीरे घुटनों के बल बैठ गई और सावित्री जी के पैर पकड़ लिए। “माँ… मुझे माफ़ कर दो। मैं… मैं कितनी अंधी हो गई थी। मुझे मयंक ने बताया ही नहीं। मुझे लगा पापा… मुझे लगा आप लोग…”
सावित्री जी ने तुरंत झुककर अपनी बेटी को उठाया और गले लगा लिया। “पगली, माँ-बाप से माफ़ी कैसी? मयंक ने तुझे इसलिए नहीं बताया क्योंकि तेरी हालत नाज़ुक थी। और हमने भी सोचा कि जाने दे, बच्चों की गृहस्थी ठीक रहे, यही हमारी दौलत है।”
तभी दरवाजा खुला और दीनानाथ जी अंदर आए। उन्हें लगा शायद झगड़ा बढ़ गया है। “क्या हुआ? तुम लोग यहाँ क्यों हो? बाहर सब आरव को ढूंढ रहे हैं।”
शिखा दौड़कर पिता के गले लग गई और फूट-फूट कर रोने लगी। “पापा, आप दुनिया के सबसे अमीर पिता हैं। और मैं… मैं सबसे गरीब बेटी, जो हीरे की परख नहीं कर पाई।”
दीनानाथ जी हक्का-बक्का रह गए। उन्होंने मीरा की तरफ देखा। मीरा ने आश्वस्त भरी नज़रों से उन्हें देखा, जैसे कह रही हो कि ‘सब ठीक हो गया है’।
दीनानाथ जी ने शिखा के सिर पर हाथ फेरा। “अरे, रोती क्यों है? पगली, मैं जानता हूँ वो चेन हल्की थी। पर मेरा आशीर्वाद बहुत भारी है बेटा, आरव को कभी झुकने नहीं देगा।”
शिखा ने आंसू पोंछे। उसने मीरा का हाथ दबाया, एक मूक धन्यवाद के रूप में। फिर उसने अपना मेकअप ठीक किया और बाहर हॉल में आई।
मंच पर मयंक खड़ा था, मेहमानों से बातें कर रहा था। शिखा उसके पास गई, आरव को अपनी गोद में लिया। उसने आरव के गले में पड़ी उस पतली सी चेन को अपनी साड़ी के पल्लू से बाहर निकाला और सबसे ऊपर कर दिया, जबकि सास की दी हुई भारी चेन को कपड़ों के नीचे छुपा दिया।
माइक हाथ में लेकर शिखा ने सबके सामने कहा, “आज मेरे बेटे को बहुत सारे कीमती तोहफे मिले हैं। लेकिन एक तोहफा मेरे लिए सबसे अनमोल है। यह चेन, जो मेरे पापा ने दी है। यह सोने की नहीं, यह उनके आशीर्वाद और त्याग की बनी है। मेरे पापा ने मुझे सिखाया है कि देने वाले की हैसियत नहीं, उसकी नीयत देखी जाती है। और मेरे माता-पिता की नीयत से ज्यादा अमीर इस हॉल में कोई नहीं है।”
मयंक ने शिखा की ओर देखा और समझ गया कि उसे सच पता चल चुका है। उसने कृतज्ञता से अपने ससुर की ओर देखा और सिर झुका लिया।
शिखा की सास और जेठानी, जो अब तक व्यंग्य कर रही थीं, शिखा के इस आत्मविश्वास और भावनात्मक भाषण को सुनकर चुप रह गईं। पूरे हॉल में एक सम्मानजनक खामोशी छा गई, और फिर तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी।
उस रात जब मीरा और आकाश वापस होटल जाने लगे, तो मीरा के मन में एक सुकून था। उसने देखा कि शिखा अब दीनानाथ जी के पास बैठी हंस रही थी, और दीनानाथ जी की थकान गायब हो चुकी थी।
आकाश ने कार में बैठते हुए पूछा, “तुमने शिखा को क्या जादू की छड़ी घुमाई? वो तो आग बबूला थी।”
मीरा मुस्कुराई और खिड़की से बाहर चमकते मुंबई शहर को देखते हुए बोली, “जादू नहीं आकाश, बस उसे एक ऐसा आईना दिखाया जिसमें उसे सोने की चमक के पीछे छिपा पसीने का दाग दिख गया। रिश्ते जब तोले जाते हैं तो टूट जाते हैं, लेकिन जब उन्हें समझा जाता है, तो वो अनमोल हो जाते हैं।”
मूल लेखिका
शुभ्रा बनर्जी