मेरे बेटे – एम. पी. सिंह.

मैं 65 वर्षीय रिटायर्ड व्यक्ति अपने पुत्र के साथ हॉस्पिटल से निकल कर दवाई लेने मेडिकल स्टोर गया. मेरा बेटा दवाई ले रहा था और दुकानदार मुझे बड़े गौर से देख रहा था. दवाई देने के बाद दुकानदार ने बिल बनाते हुए नाम पूछा, तो बेटा बोला, अर्जुन. दुकानदार मेरी तरफ देखकर बोला,

तुम्हारा नहीं, पेशेंट का. अशोक, बेटे ने जवाब दिया. वो बोला, अशोक सिंह राजावत? मैं अपना पूरा नाम सुनकर चौक गया और दुकानदार को ध्यान से देखा और हाँ मैं सिर हिला दिया. तभी वो बोला, 1985 बैच, एम. जी. एम. कॉलेज? मैं हैरान होकर उसकी तरफ देखता हुआ

पहचानने की कोशिश कर रहा था. वो फिर बोला, मैं अनिल जैन, तुम्हारा क्लास मेट, याद आया? अरे हाँ, अनिल तू, यहाँ,  सब याद आ गया, बहुत सालों बाद मिला, वो भी अनजान सी जगह. और सब कैसा है? उसने बताया, ये मेरा बेटा है जो दवाई दे रहा है.

मैं बस थोड़ी देर के लिए आता हूँ, वो मुझे अपने घर ले गया जो पास मैं ही था. घर पहुंच कर मैंने बेटे को घर भेज दिया और बोला मैं एक घंटे बाद आ जाऊगा, पर वो बोला, आप यही रहना, मैं लेने आ जाउगा. चाय पीते पीते उसने बताया की डिग्री करने की बाद सालभर नौकरी नहीं मिली

तो लोन आदि लेकर मेडिकल स्टोर खोला, फिर शादी और एक बेटा. बेटे ने डी. फार्मा किया है और अब वो ही दुकान संभालता है. तुम तो टॉपर थे,

तुमने क्या किया?  5 साल पहले फार्मा कम्पनी से रिटायर हुआ. शादी के बाद पहला लड़का हुआ, फिर लड़की की चाह मैं 2 और बेटे हो गए. दोनों बड़े बेटे आई. टी. इंजीनियर है. आगे की पढ़ाई के लिए लोन आदि लेकर विदेश भेजा और वहीं नौकरी कर रहे है.

दोनों ने वहीं शादी करली और वहीं के हो गये. कई सालों से इंडिया नहीं आये. पता नहीं मेरे मरने पर भी आएंगे या नहीं. मैं आज भी अपनी पेंशन से उनकी पढ़ाई के लोन की किस्तें चुका रहा हूँ. मुझे आज इस बात की तसल्ली है की मेरा छोटे वाला बेटा ज्यादा नहीं पढ़ा वरना ये भी बाहर चला जाता.

प्राइवेट कम्पनी मैं क्लर्क है पर मेरे साथ तो है, मेरी देख भाल करता है, मेरे बुढ़ापे का सहारा. अनिल, एक बात बताना, जो माँ बाप अपनी हैसियत से बढ़कर अपनी ओलाद को पढ़ाते है, क्या वो कोई गुनाह करते है जिसकी सज़ा बुढ़ापे मैं मिलती है. थोड़ी देर मैं अशोक मुझे लेने आ गया. मुझे भावुक होते

देख अनिल बोला, आजकल की ओलाद को पता नहीं क्या हो गया, एकदम संवेदन हीन हो गई है. कभी कभी मुझे लगता है की अपनी ओलाद को ज्यादा पढ़ाना,खुद पर अत्याचार करने जैसा है.

वो केवल अपना आज देख रहे है, उन्हें आने वाला कल दिखाई नहीं दे रहा है. उनकी ओलाद भी वहीं करेगी जो वो देख /समझ रही है. 

साथियो, बड़े शहरों का तो पता नहीं, पर छोटे शहर के लोग अक्सर पढ़ लिख कर महानगरों मैं नौकरी के लिए चले जाते है और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखते. 

क्या बच्चों को ज्यादा पढ़ाना हमारे बुढ़ापे के दुःख का कारण है?  अपनी राय अवश्य दे. 

धन्यवाद 

एम. पी. सिंह.

(Mohindra Singh)

स्वरचित, अप्रकाशित 

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