आज सोहन मंडल अपने भाई रमेश मंडल को सुनाकर कह रहा था “मैं गांव का कुछ भी नहीं दूंगा।पूरी जिंदगी यहीं बरवाद कर दी।यह शहर में घूमता रहा था”। दूसरी ओर रमेश मंडल चुपचाप बड़ा भाई होने के नाते तेरहवीं और बाकी कर्मों को निपटा रहा था।वह बाहर के कमरे में पत्नी के साथ टिका था और काम कर रहा था।
सो आज जब सब-कुछ खत्म हो गया तो सरपंच, मुखिया और सारे प्रबुद्ध लोगों को बुलाया और एक पंक्ति कही-मैं मां के कहने पर बाहर कमाने गया। वहां से हर साल खेत की मालगुजारी और घर का वार्षिक कर भी अदा किया जबकि कायदे से यह सारा फसल , पिताजी का पेंशन खाता था।”
आज भी श्राद्ध का सारा खर्च बड़ा ही उठाया था।छोटा बस बंटवारे की बात करता। मां से झगड़ा करता था।उस दिन दोनों पति पत्नी मिलकर मां का अंगूठा लेने के लिए डंडे से मारे थे जबकि मुखियाजी आकर मां को ले गये थे फिर यह दिल्ली लेकर गया था।
अब बताइये क्या होना चाहिए -पंच के मुख में परमेश्वर का बास होता है।-बडे की बातें सुनकर मुखिया जी और सरपंच ने इससे पूछा-तुम्हारा क्या कहना है?
वह ढिठाई से बोला-मैं कुछ नहीं देनेवाला।चाहे मुखिया बोले या सरपंच। यहां की सारी चीजें हमारी है।
देखा मुखिया जी एक तो चोरी ऊपर से सीना जोरी,बताइये जो जीते जी चंद रूपये के लिए बूढ़ी मां को मारे, यहां सारे पंच ,सरपंच , मुखियाजी किसी की बात न माने ,उससे क्या उम्मीद -कानून यह मानता नहीं।-बडे भाई ने विनम्रतापूर्वक कहा।
आखिर कानून और सामाजिक नियम भी होता है-इसकी मनमानी नहीं चलेगी।-मुखियाजी कठोर स्वर में बोले।
सो जो समझो मुखिया , मैं इसे कुछ नहीं देनेवाला।-वह हंसते और कर्कश स्वर में बोला।
मगर दांव उल्टा पड़ गया सारा कागज और टैक्स के पेपर सब बड़े भाई के नाम से मिले।अब सरपंच सबकुछ देखकर बोला -तमाम सबूत और गांव के लोगों के बयान से यह पता चला कि सोहन मंडल ने एक भी कर्तव्य का पालन नहीं किया।वह गांव में बस माता पिता की संपत्ति पर ऐश करता था।वह मां तक से जायदाद के लिए मारपीट करता था।उसी की खेत का खाना नहीं देता था।सो गांव की पंचायत इसे सारे जमीन मकान सहित सभी अधिकार से बेदखल करती है।यह दस दिन के अंदर गांव छोड़कर चला जाय।
मैं कहीं नहीं जा रहा ना कुछ खाली करूंगा।
बस फिर क्या था-पुलिस बुलाकर उसे थाने में भेज दिया और कुटाई करवा दी।
अब उसे समझ में आ गया कि भाई से बड़ा अपना कोई नहीं होता मगर वही भाई यदि गुस्से में आ जाय तो उससे बुरा कोई नहीं होता है।
अब सभी लोग पंच परमेश्वर का जय-जयकार करने लगे वहीं सोहन मंडल की गर्मी झड़ गयी थी।वह जायदाद तो दे ही दिया बस रहने के लिए थोड़ी जगह की सिफारिश करने लगा।
मैं सगा भाई हूं,एक मां बाप की औलाद -क्या अच्छा लगता है?-वह रो रहा था।
क्यों नहीं इतने साल जायदाद हड़प बैठे थे। पंचायत की बात नहीं मान रहे थे।-बडा डांटते बोला तो वह पांव पकड़कर रोने लगा।
#रचनाकार-परमा दत्त झा, भोपाल।
(रचना मौलिक और अप्रकाशित है इसे मात्र यहीं प्रेषित कर रहा हूं)