इस गुनाह की माफी नहीं – बबीता झा

राकेश अपने परिवार से बहुत प्यार करता था। रिया पर तो वह अपनी जान निछावर करता था। रिया उसकी छोटी, लाडली बहन थी, जो शादी के लायक हो गई थी, फिर भी घर में इतनी उछल-कूद करती थी मानो दो-तीन साल की बच्ची हो। राकेश के डर से उसके मम्मी-पापा, यानी अवधेश और आकांक्षा भी उसे कुछ नहीं कहते थे, तो भाभी अनु की क्या मजाल थी कि कुछ कह दे।

लेकिन अनु के मन में कहीं न कहीं रिया के लिए द्वेष की भावना थी। इसका थोड़ा-बहुत एहसास आकांक्षा को होता था।

एक दिन सब लोग बैठे थे और रिया के रिश्ते की बात चल रही थी। आकांक्षा ने कहा,

“राकेश, अब तुम और अनु दोनों मिलकर रिया के लिए एक अच्छा लड़का ढूंढो, जो उसे ससुराल में भी सर आँखों पर रखे।”

रिया हँसते हुए बोली,

“मेरे लिए भैया ढूंढ ही लेंगे, है ना भैया?”

सब लोग हँस पड़े। तभी अनु बोली,

“रिया के लिए एक लड़का मैंने देखा हुआ है। अगर आप सबको पसंद आ जाए तो मैं बात आगे बढ़ाऊँ।”

देव के घर पहुँचने पर जब रिया के साथ लाया गया सामान देखा गया, तो ससुराल वालों की उम्मीदें टूट गईं। उन्होंने सोचा था कि रिया बहुत ज़्यादा सामान लेकर आएगी, क्योंकि वह अपने घर की लाडली बेटी थी।

उधर, अनु अंदर ही अंदर खुश थी। आकांक्षा को उसके व्यवहार पर शक होने लगा, लेकिन वह खुद को समझाती रही।

देव की माँ ने अनु को फोन किया और शिकायत की। अनु ने बात टाल दी, लेकिन आकांक्षा ने सब सुन लिया।

पग-फेरे पर रिया आई, घर में रौनक तो थी, लेकिन रिया के चेहरे पर उदासी थी। रात को देव की तेज़ आवाज़ें सुनकर आकांक्षा बेचैन हो गई।

सुबह जाते समय रिया ने बस इतना कहा,

“माँ, उन्हें बहुत उम्मीदें थीं, जो पूरी नहीं हुईं।”

कुछ दिन बाद, एक सुबह राकेश ऑफिस जा रहा था। तभी उसने देखा—रिया अकेली, बैग लेकर गेट पर खड़ी थी।

रिया राकेश से लिपटकर फूट-फूट कर रोने लगी और बोली,

“भैया, वे लोग बहुत बुरे हैं।”

यह सुनकर राकेश के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। गुस्से में उसने पीछे मुड़कर अनु की ओर देखा और चिल्लाकर बोला,

“अनु, क्या तुम्हें उन लोगों के बारे में पहले से पता था?”

रिया रोते-रोते बोली,

“हाँ भैया, भाभी को सब पता था। वे लोग खुद कह रहे थे कि अनु को सब मालूम था, फिर भी ननद को ऐसे ही भेज दिया।”

अनु सन्न रह गई। घबराकर बोली,

“मुझे नहीं पता था कि वे इतने बुरे होंगे। मैंने तो सोचा था कि रिया इतना सब लेकर जाएगी तो सब खुश हो जाएंगे। मुझसे गलती हो गई। मुझे माफ कर दो।”

इतना सुनते ही राकेश ने अनु को ज़ोर से थप्पड़ मारा और गुस्से में बोला,

“माफी? अनु, इस गुनाह की कोई माफी नहीं होती।”

“तुम जानती हो, रिया तुम्हें दुनिया की सबसे अच्छी भाभी मानती थी। जब हमारा बेटा हुआ था, तब रिया ने तुम्हारा कितना ख्याल रखा था। मुन्ने के लिए रात-रात भर जागती थी। पूरे मोहल्ले में तुम्हारी तारीफ करती नहीं थकती थी।”

“और तुमने उसके साथ क्या किया? तुम जानती थी कि मैं रिया की आँखों में एक भी आँसू नहीं देख सकता, और तुमने उसकी आँखों में ज़िंदगी भर के आँसू भर दिए।”

“मैं तुम्हें कभी माफ नहीं कर सकता।”

यह कहकर राकेश फूट-फूट कर रो पड़ा। अनु भी अपनी गलती पर रोने लगी, लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी। उसने सिर्फ अपना राज चाहा था और बदले में रिया की ज़िंदगी तबाह कर दी।

समाप्ति नोट:

कुछ गुनाह अनजाने में नहीं, सोच-समझकर किए जाते हैं। और ऐसे गुनाहों की सच में कोई माफी नहीं होती।

लेखिका बबीता झा

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