एक अनोखा रिश्ता – मंजू ओमर

यह क्या निमिषा तुम फिर रो  रही हो ,कैसे चलेगा यह सब तुम रोज-रोज अपनी मम्मी पापा के घर चली जाती हो   घर कैसे संभालेगा । सारी चीजें अस्त व्यस्त  हो जाती है  तुम्हारे न होने  पर। अपनी जिम्मेदारी को समझों  निमिषा मेरा ऑफिस है  छोटा सा अर्जुन है ,और मम्मी पापा है अभी तो तुम छुट्टी पर हो लेकिन जब ऑफिस जाने लगोगी तो क्या होगा तो ।

इसी तरह रोज मम्मी  पापा के घर जाती रहोगी तो कैसे होगा सब कुछ ।अभी तो मम्मी  मना कर  रही है , लेकिन अब तो मैं भी   मना कर रहा  हूं  तुम्हें जाने से। लेकिन अब मैं भी ,रोज-रोज तुम्हारा घर से बाहर मुझे परेशानी में  डाल देता है । निमिषा हां मैं समझती हू सब परेशानी लेकिन मां ने मुझे इस तरह से  डांटा तो मुझे अच्छा नहीं लगा ।

और इस समय मेरे पापा बीमार हैं और कोई पापा के  पास है नहीं अकेले हैं , उनको अकेले अस्पताल जाना और तमाम तरह के टेस्ट  करवाना है , उनसे अकेले नहीं हो पाता है ऐसे समय में उनके साथ ना दूं तो क्या करूं। और यहां तो मांजी है और नौकर चाकर हैं थोड़ा खाना-पीना देखना पड़ता है

बस किसी के मुश्किल समय में किसी का साथ देना ही तो इंसानियत ही होती है ना ।और फिर वह और कोई नहीं मेरे मम्मी  पापा है ।जब परेशान होकर मम्मी मुझको फोन करती है तो मुझसे रहा नहीं जाता है इस उम्र में उनका सहारे की जरूरत है और किसी की मदद भी चाहिए।

           निमिषा और मनीषा दो बहने थी कोई भाई नहीं था निमिषा के। मनीषा बड़ी थी वह शादी करके अमेरिका मैं रहती थी।निमिषा की शादी 2 साल पहले रजत से हुई थी और एक ही शहर में मायका और ससुराल दोनों था। निमिषा अपने ऑफिस के काम करने वाले रजत को पसंद करती थी ।

जब यह बात उसने अपने पापा को बताई तो उन्होंने रजत के बारे में जानकारी हासिल करी सब कुछ ठीक-ठाक होने पर दोनों का विवाह कर दिया। रजत के परिवार में मम्मी पापा और एक बहन थी ।बहन बड़ी थी तो उसकी शादी रजत से पहले हो गई थी ।

रजत के मम्मी-पापा रजत के साथ ही रहते थे।निमिषा की मम्मी पापा आराम से रिटायरमेंट की जिंदगी बसर कर रहे थे। कोई परेशानी नहीं थी ।लेकिन एक दिन अचानक से निमिषा के पापा की तबीयत खराब हुई बेचैनी बढ़ी और उनको पैरालिसिस का अटैक आ गया अब उनको साहारे की जरूरत थी ।डॉक्टर के पास जाने को , दिखाने को।

          आजकल तो इलाज भी तभी शुरू  होता है जब सारे टेस्ट हो जाते हैं ।इसके लिए एक इंसान की जरूरत होती है जो भाग दौड़ कर सके ।लेकिन निमिषा के पापा के पास में कोई ऐसा नहीं था। निमिषा की मां सुधा  जी ने बेटीको फोन कर दिया ।पापा की खबर सुनकर निमिषा परेशान हो गई जल्दी-जल्दी काम निपटाने  लगी ।

और रजत से बोली  सुनो ऑफिस जाते समय मुझे मम्मी के घर  छोड़ देना पापा की तबीयत खराब है अस्पताल लेकर जाना है। तो क्या है अब तुम ही लेकर जाओगी क्या अस्पताल। कैसी बात कर रहे हो रजत अब और कौन है जो लेकर जाएगा।

और अगर तुम यहां ना होती तो कौन लेकर जाता रजत बोला ।तब की तब देखी  जाती,लेकिन इस समय यहां पर मैं हूं तो मैं ही जाऊंगी न। अच्छा ठीक है  मम्मी से पूछ लो ,पूछना क्या है जाते समय मैं बता दूंगी मम्मी को।

          अब जाते समय निमिषा ने सासू मां से कहा  मम्मी मैं मम्मी के घर जा रही हूं तो, वह बिदक  गई ,बहु यह क्या है मायका पास में होने का यह मतलब तो नहीं है कि तुम रोज-रोज मायके ही पहुंची रहो ।

मम्मी जी पापा बीमार है उन्हें लेकर अस्पताल  जाना है अच्छा ठीक है ठीक है जाओ और  निमिषा चली गई। वहां जाकर पापा को अस्पताल ले गई और भाग भाग कर सारे टेस्ट करवाए ।अब  निमिषा को मायके में दो दिन रुकना पड़ा क्योंकि आनंदजी कों  नसों में ब्लाकेज  था,उनकी इंज्योग्राफी  होगी इसलिए निमिषा को वहां रुकना पड़ा।

            यहां रजत और मम्मी गुस्सा हो रहे थे। रजत की मम्मी करूणा जी रजत से बड़बड़ा रही थी कि ये रोज रोज निमिषा का मायके जाना मुझे ठीक नहीं लगता।भाई मम्मी सही कह रही हो आप, आने दो इस बार बात करता हूं।रजत के पापा अशोक जी सब बातें सुन रहे थे।

रजत आफिस चला गया तो अशोक जी पत्नी करूणा से बोलें, देखो अब निमिषा के पापा बीमार है तो निमिषा को ही देखना पड़ेगा न।

अब यहां और कोई नहीं है तो उसी की जिम्मेदारी बनती है न ।तो क्या ससुराल की कोई जिम्मेदारी नहीं है उसकी।अरे क्यों नहीं है। लेकिन यहां तो तुम हो ,रजत है सब मिलजुल कर कर लेंगे। लेकिन आनन्द जी के पास तो कोई नहीं है।आप तो बस बहू का ही पक्ष लेते हैं हर वक्त।

         अभी तो निमिषा लौट आई मायके से लेकिन दो दिन बाद उसे फिर से पापा को लेकर अस्पताल जाना था।और जब आज निमिषा ने मायके जाने की बात की तो घर में हंगामा हो गया। करूणा जी कहने लगी ये तुम रोज-रोज का आना-जाना खत्म करो नहीं तो ठीक होगा। क्या करूं मम्मी जी मम्मी पापा को हमारी जरूरत है तो जाना ही पड़ेगा।

अशोक जी सास बहू और बेटे की बहस को देखकर सोचने लगे कि क्यों न इसका कोई परमानेंट हल निकाला जाए । अशोक जी जब आज शाम सैर को निकलें तो मित्र नारायण जी से मुलाकात हुई। बात बात में उन्होंने घर की समस्या का जिक्र किया तो नारायण जी ने एक सिंपल और सरल सा उपाय बता दिया।

यार अशोक मेरी बात मान तो एक सलाह दू तुम्हें, हां हां बता न।अब तेरे बहू के कोई भाई तो है नहीं तो क्यों न दोनों परिवार साथ रह ले , रोज़ रोज़ बहू का मायके भागना खत्म हो जाएगा। हां यार तूने सलाह तो सही दी है। इसके लिए पहले हमारे घर वाले और बहू के मम्मी पापा राजी होंगे तभी तो बात बनेगी न । हां बात करके देख घर में ।

           बहू के मायके रोज रोज जाने से घर का माहौल तनावपूर्ण हो रहा था।आज जब सभी लोग डायनिंग टेबल पर खाना खाने को बैठे तो अशोक जी ने अपनी बात रखी। सभी सुनकर एक बार तो चौंक गए। फिर अशोक जी बोले इसमें हर्ज ही क्या है।यही बगल वाला फ्लैट खाली है यही आकर रह ले तुम्हारे मम्मी पापा क्यों बहू।

तुम्हें भी सुविधा हो जाएगी आखिर वहां भी तो अकेले ही रह रहे हैं न।और ये तुम्हारा रोज रोज का भागना नहीं होगा। निमिषा को भी ठीक लगा लेकिन अभी कोई जवाब नहीं दिया। निमिषा ने जाकर मम्मी पापा से बात की तो आनन्द जी बोले अरे नहीं बेटा रिश्ता ऐसा है कि इतने पास में रहना ठीक नहीं है।

फिर जब ये बात सबके बीच में रखी गई तो सबने अपना अपना नजरिया पेश किया । बात इतनी मामूली भी नहीं थी कि आसानी से मान ली जाए। लेकिन कोशिश जारी रही और ये बात रखी गई कि यदि नहीं ठीक लगा तो फिर अपने घर वापस चले जाएं ।इस बात से दोनों परिवारों में सहमति बन गई ।

           अब सुधा और आनन्द  जी आ गए पड़ोस में रहने। निमिषा को अब बार बार भागने की जरूरत नहीं पड रही थी। धीरे-धीरे सब ठीक होने लगा। दोनों के मम्मी-पापा चाय इकठ्ठे बैठकर पीने लगे। कभी सुधा जी कुछ बना कर लाती तो कभी करूणा जी कुछ बना कर दें जाती। नजदीकि या बढ़ने लगी और एक दूसरे का साथ अच्छा लगने लगा।

आनन्द जी और अशोक जी सुबह-शाम सैर को इकठ्ठे जाने लगे।इधर सुधा और करूणा जी साथ साथ मंदिर और कीर्तन भजन में जाने लगी।

दोनों को एक दूसरे का साथ अच्छा लगने लगा।अब तो निमिषा या रजत की जरूरत ही नहीं पड़ती थी कि कोई किसी का साथ ढूंढे ।आपस में मिल बांट कर हो जाता था काम।

            दो महीने बीत गए सबकुछ अच्छा चल रहा था।अब एक दिन अशोक जी ने पूछा सबसे कहो भाई कैसी रही हमारी प्लानिंग, सबके चेहरों पर मुस्कुराहट आ गई। अशोक जी ने आनन्द जी से पूछा कहिए भाई साहब क्या अपने घर वापस जाना चाहेंगे।तो आनन्द जी ने मना कर दिया,

नहीं आप सब लोगों का साथ मिल जाने से मेरी तबियत सही रहने लगी है । जीवन में अकेलापन भी तो सबसे बड़ी बीमारी है। यहां सामने बेटी दामाद और ये नन्हा सा अर्जुन है सबके साथ बहुत अच्छा लगता है।अब मैं कहीं नहीं जाना चाहता।

         और फिर दोनों समधी समधन का ऐसा दोस्ताना रिश्ता बन गया जो बहुत कम देखने को मिलता है।अब सब परिवार में खुश हैं। निमिषा को भी कहीं भागना नहीं पड़ता। कोई परेशानी हो तो रजत और निमिषा मिल बांट कर उठा लेते। नन्हा अर्जुन भी इधर नाना नानी और दादा दादी दोनों के लाड़ प्यार से बडा हो रहा था। दोनों के ही संस्कार मिल रहे थे और पूरा परिवार खुशहाल हैं ।

मंजू ओमर 

झांसी उत्तर प्रदेश 

15 जनवरी

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