सावित्री – गीतू महाजन

शमशान घाट की उस पथरीली ज़मीन पर घुटनों के बल बैठे आर्यन का विलाप वहां मौजूद हर शख्स का कलेजा चीर रहा था। चिता की लपटें आकाश को छूने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन आर्यन की नज़रें सिर्फ़ उस लकड़ी के ढेर पर टिकी थीं, जहाँ उसकी माँ, सावित्री देवी, का नश्वर शरीर पंचतत्व में विलीन हो रहा था।

वह बार-बार अपनी छाती पीट रहा था और बुदबुदा रहा था, “माँ… मैं हार गया माँ… मैं तुम्हारा बेटा कहलाने लायक नहीं रहा। तुमने मुझे आवाज़ दी, और मैंने तुम्हारी ही आवाज़ अनसुनी कर दी। मुझे माफ़ कर दो… एक बार उठ जाओ और मुझे डांट लो, पर यूँ खामोश मत जाओ।”

गाँव के बुजुर्ग, मास्टर दीनानाथ और उनके साथी, बड़ी मुश्किल से आर्यन को पकड़कर पीछे खींच रहे थे। आर्यन, जो शहर का एक मशहूर और रसूखदार लेखक था, जिसके एक हस्ताक्षर के लिए लोग कतारों में खड़े रहते थे, आज यहाँ एक असहाय बच्चे की तरह बिलख रहा था। उसकी इस्तरी की हुई महंगी शर्ट धूल और आंसुओं से सनी थी।

सावित्री देवी की अंतिम यात्रा में पूरा कस्बा उमड़ आया था। वे इस कस्बे के सबसे पुराने स्कूल के प्रधानाचार्य की पत्नी थीं। जब वे ब्याह कर इस घर में आई थीं, तो लोग कहते थे कि वे बहुत कम बोलती हैं। लेकिन उनकी खामोशी में एक ऐसा ठहराव था जिसने धीरे-धीरे पूरे मोहल्ले को अपना बना लिया था।

वे किसी बड़े ओहदे पर नहीं थीं, न ही उन्होंने कभी घर की देहरी लांघी थी, मगर हर घर के सुख-दुःख में सावित्री देवी की उपस्थिति अनिवार्य होती थी।

आग ठंडी होने लगी थी और लोग धीरे-धीरे अपने घरों को लौटने लगे थे, लेकिन आर्यन वहीं बैठा रहा। उसकी आँखों के सामने पिछले पंद्रह सालों का वो चलचित्र घूम रहा था, जिसने आज उसे अपराधी बना दिया था।

आर्यन को बचपन से ही लिखने का शौक था। उसे लगता था कि यह प्रतिभा उसे ईश्वर से मिली है। उसने अपनी माँ को हमेशा एक साधारण गृहणी के रूप में देखा था—जो सुबह चार बजे उठतीं, गाय का दूध निकालतीं, पिताजी के कपड़े धोतीं और रात को सबके सोने के बाद रसोई समेटतीं। आर्यन को अपनी माँ का जीवन ‘नीरस’ और ‘बौद्धिक रूप से शून्य’ लगता था।

जब आर्यन ने अपनी पहली किताब लिखी और वह बेस्टसेलर बनी, तो उसने एक इंटरव्यू में कहा था, “मेरी प्रेरणा मेरा अपना संघर्ष है। मेरे घर का माहौल बहुत रूढ़िवादी था, वहां कला की कद्र नहीं थी, फिर भी मैं खिला।” उसने अनजाने में अपनी माँ के अस्तित्व को नकार दिया था।

अंतिम संस्कार के बाद जब आर्यन उस पुरानी हवेली में लौटा, तो सन्नाटा उसे खाने को दौड़ रहा था। पिताजी का देहांत पाँच साल पहले हो चुका था। सावित्री देवी अकेली रहती थीं। आर्यन साल में एक बार, दीवाली पर रस्म अदायगी के लिए आता और दो दिन रहकर वापस अपनी ‘आधुनिक’ दुनिया में लौट जाता।

रात गहरी हो चुकी थी। मास्टर दीनानाथ ने आर्यन के कंधे पर हाथ रखा, “बेटा, जाओ थोड़ा आराम कर लो। माँ की आत्मा को शांति तभी मिलेगी जब तुम खुद को संभालोगे।”

आर्यन लड़खड़ाते कदमों से माँ के कमरे की ओर बढ़ा। यह वही कमरा था जहाँ बचपन में वह माँ की गोद में सिर रखकर कहानियां सुनता था। कमरे में अगरबत्ती की हल्की खुशबू और माँ की पुरानी साड़ियों की महक बसी हुई थी। बिस्तर के पास वाली मेज पर आर्यन की लिखी हर किताब सलीके से सजाई गई थी। उन पर धूल का एक कण भी नहीं था।

आर्यन की नज़र कमरे के कोने में रखे एक पुराने, जंग लगे लोहे के संदूक (ट्रंक) पर पड़ी। उसे याद आया कि माँ इस संदूक को हमेशा ताला लगाकर रखती थीं। बचपन में आर्यन को लगता था कि इसमें शायद माँ के गहने या पैसे होंगे।

आज चाबियों का गुच्छा आर्यन के पास था। एक अजीब सी उत्सुकता और भारी मन के साथ उसने कांपते हाथों से वह ताला खोला।

संदूक का ढक्कन उठाते ही, आर्यन सन्न रह गया।

उसमें कोई गहने नहीं थे। कोई संपत्ति के कागज़ात नहीं थे। उसमें थीं—डायरियाँ। दर्जनों पुरानी, पीली पड़ चुकी डायरियाँ और कुछ हाथ से सिले हुए कागज़ों के बंडल।

आर्यन ने सबसे ऊपर रखी एक डायरी उठाई। पहले पन्ने पर कांपती हुई लिखावट में लिखा था— “मेरे अनकहे शब्द, मेरे आर्यन के लिए।”

आर्यन का दिल जोर से धड़का। वह पन्ने पलटने लगा।

उसमें कविताएं थीं। कहानियां थीं। ऐसे विचार थे जो आर्यन की सोच से भी गहरे थे। उसने पढ़ना शुरू किया। एक कविता का शीर्षक था—’पिंजरे का आकाश’।

कविता की पंक्तियाँ कुछ इस तरह थीं:

“उड़ान सिर्फ़ पंखों से नहीं होती,

रसोई के धुएं में भी बादलों का अक्स दिखता है,

मैं नहीं उड़ी, ताकि मेरा अंश आकाश छू सके,

मेरी स्याही सूख गई, ताकि उसकी कलम में रक्त बह सके।”

आर्यन के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। यह शैली… यह शब्दों का चयन… यह तो बिल्कुल वैसा था जैसा आर्यन लिखता था। नहीं, उससे भी बेहतर।

वह पागलों की तरह दूसरी डायरियाँ पढ़ने लगा। उसे अपनी कई प्रसिद्ध कहानियों के मूल विचार उन डायरियों में मिले। उसे याद आया कि बचपन में जब वह स्कूल से आकर माँ को अपने दिन भर के किस्से सुनाता था, तो माँ अक्सर उसे बातों-बातों में कोई कहानी सुनाती थीं या किसी घटना का नया नज़रिया देती थीं। आर्यन उन्हीं बातों को अपने शब्दों में लिख लेता था और वाहवाही बटोरता था। उसे लगता था कि वह उसकी अपनी उपज है।

एक पन्ने पर तारीख लिखी थी—15 साल पहले की। उस दिन आर्यन ने अपना घर छोड़ा था। वहां लिखा था:

“आज वह जा रहा है। उसे लगता है कि मैं उसे समझती नहीं हूँ। उसने कहा कि ‘माँ, तुम तो बस अचार डालना जानती हो, साहित्य क्या है, तुम्हें क्या पता?’ मेरा बेटा नहीं जानता कि जिस कलम से वह दुनिया जीतना चाहता है, उसकी स्याही मैंने अपने आंसुओं से बनाई है। पर मैं खुश हूँ। मेरा मौन, उसका स्वर बनेगा।”

आर्यन घुटनों के बल वहीं फ़र्श पर गिर पड़ा। उसके हाथ से डायरी छूट गई। वह जिसे ‘अनपढ़’ और ‘पिछड़ी हुई’ औरत समझता था, वह असल में एक महान लेखिका थी जिसने अपनी प्रतिभा की बलि इसलिए दे दी ताकि उसके बेटे का अहंकार न टूटे। उसने कभी आर्यन को यह अहसास नहीं होने दिया कि उसके विचारों का स्रोत उसकी माँ थी।

आर्यन को वो फ़ोन कॉल्स याद आने लगे जो वह अक्सर यह कहकर काट देता था कि “माँ, मैं बिज़ी हूँ, मीटिंग में हूँ, बाद में बात करूँगा।” माँ बस इतना कहती थीं, “ठीक है बेटा, बस अपना ख्याल रखना और कुछ नया लिखना।”

वह ‘नया’ लिखने को कहती थीं, लेकिन आर्यन को अब समझ आया कि वह असल में यह कह रही थीं कि ‘मेरे हिस्से का भी तुम ही जी लेना’।

कमरे के सन्नाटे में आर्यन की सिसकियाँ गूंजने लगीं। यह दुःख सिर्फ़ माँ के जाने का नहीं था, यह दुःख उस अपराधबोध का था जो अब ताउम्र उसके साथ रहने वाला था। उसने उस औरत को कभी ‘माँ’ से बढ़कर ‘इंसान’ समझा ही नहीं। उसने एक कलाकार की हत्या की थी—हर रोज़, अपने दंभ से।

तभी उसकी नज़र संदूक के सबसे निचले हिस्से में रखे एक लिफाफे पर पड़ी। उस पर लिखा था— “जब मैं न रहूँ, तब पढ़ना।”

आर्यन ने कांपते हाथों से लिफाफा खोला।

“मेरे प्यारे आर्यन,

जब तुम यह पढ़ रहे होगे, मैं नहीं होऊंगी। बेटा, कभी यह मत सोचना कि मैंने कोई त्याग किया। एक माँ के लिए उसकी संतान की सफलता ही उसका मोक्ष है। मेरी डायरियां तुम्हें सौंप रही हूँ। इन्हें छापना मत। यह कच्ची हैं, अधूरी हैं। तुम इन्हें पूरा करना। तुम मेरी अधूरी कहानियों को वो अंजाम देना जो मैं अपनी चारदीवारी में बैठकर नहीं दे पाई।

और हाँ, रोना मत। क्योंकि लेखक रोते नहीं हैं, वे अपने दर्द को शब्दों में ढालकर अमर कर देते हैं। मुझे माफ़ करने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि मैंने कभी तुमसे कोई शिकायत रखी ही नहीं।

तुम्हारी,

सावित्री (तुम्हारी पहली पाठक और तुम्हारी छाया)।”

आर्यन ने खत को अपने सीने से लगा लिया। वह चीखना चाहता था, “माँ, ये कहानियां अधूरी नहीं हैं, मैं अधूरा हूँ! तुम मुझसे कहीं ज्यादा बड़ी लेखिका थीं!”

रात भर आर्यन उस संदूक के पास बैठा रहा, एक-एक शब्द को पीता रहा। सुबह की पहली किरण जब खिड़की से अंदर आई, तो आर्यन बदल चुका था। वह अब वो अहंकारी लेखक नहीं था जिसे अपनी शोहरत पर गुमान था।

सुबह, जब गाँव के लोग सांत्वना देने आए, तो उन्होंने देखा कि आर्यन शांत था। उसकी आँखों में आंसू नहीं, एक दृढ़ संकल्प था।

उसने मास्टर दीनानाथ से कहा, “काका, मैं अभी शहर वापस नहीं जा रहा।”

“क्यों बेटा? वहाँ तुम्हारा काम है, तुम्हारी दुनिया है,” मास्टरजी ने पूछा।

“मेरी दुनिया यहाँ इस कमरे में बंद थी, काका, जिसे मैं अब तक पहचान नहीं पाया,” आर्यन ने कहा। “मैं माँ की इन डायरियों पर काम करूँगा। मैं दुनिया को बताऊंगा कि असली ‘आर्यन’ कौन था। मैं अपने नाम से नहीं, अब ‘सावित्री-पुत्र’ के नाम से लिखूंगा।”

अगले एक साल तक आर्यन उसी हवेली में रहा। उसने माँ की उन तमाम अधूरी कविताओं और कहानियों को संजोया। उसने महसूस किया कि माँ सिर्फ़ एक घरेलू औरत नहीं थीं, वे एक दार्शनिक थीं जिन्होंने जीवन को रसोई की खिड़की से देखकर भी, ब्रह्मांड की गहराई को नाप लिया था।

एक साल बाद, आर्यन की नई किताब आई। शीर्षक था— “सावित्री की कलम से”

किताब के विमोचन पर, जब पत्रकारों ने उससे पूछा, “सर, यह आपकी अब तक की सबसे बेहतरीन कृति है। यह बदलाव कैसे आया?”

आर्यन ने माइक थामा, उसकी आँखें नम थीं, पर होंठों पर एक सुकून भरी मुस्कान थी। उसने कहा, “यह मेरी कृति नहीं है। मैं तो बस एक पोस्टमैन हूँ। यह खत उस पते से आए हैं जिसे मैंने जीवन भर नज़रअंदाज़ किया। यह मेरी माँ की आवाज़ है। मैं तो बस गूँज हूँ।”

उस दिन, गाँव में भी जश्न था। सब कह रहे थे कि सावित्री देवी का बेटा बड़ा आदमी बन गया। लेकिन आर्यन जानता था कि वह ‘बड़ा’ आदमी तब बना, जब उसने अपनी माँ के कद को पहचाना।

जानकी देवी के शरीर से लिपटने वाला वह जतिन बाबू हो या सावित्री देवी की डायरी पढ़ने वाला आर्यन—दर्द का रूप अलग हो सकता है, लेकिन माँ को खोने के बाद जो खालीपन आता है, उसे दुनिया की कोई शोहरत, कोई कामयाबी नहीं भर सकती। बस रह जाती हैं तो यादें, और वो सीख जो वे जाते-जाते दे जाती हैं।

आर्यन ने हवेली को अनाथालय में बदल दिया और उसका नाम रखा— “सावित्री सृजन केंद्र”। वहां अब गाँव की लड़कियां न सिर्फ़ कढ़ाई-बुनाई सीखती थीं, बल्कि कविताएं भी लिखती थीं। आर्यन हर बच्ची में अपनी माँ को ढूंढता, और सोचता—शायद इसी तरह, मेरी माँ की अधूरी उड़ान पूरी हो जाए।

कहानी ख़त्म हो गई थी, लेकिन एक नई विरासत की शुरुआत हो चुकी थी।

मूल लेखिका : गीतू महाजन

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