आदर्श बहू’ – गीतू महाजन

“सुन रही हो सुमन! देख आरव ने फिर से ड्राइंग रूम में दूध गिरा दिया है। अभी थोड़ी देर में किटी पार्टी की सहेलियाँ आने वाली हैं। अगर फर्श चिपचिपा रहा तो मेरी क्या नाक रह जाएगी? जल्दी आकर साफ कर दे!”

सासू माँ कुसुम जी की तीखी आवाज़ बेडरूम के बंद दरवाजे को चीरती हुई सुमन के कानों तक पहुँची। सुमन, जो अपने लैपटॉप पर एक बहुत ज़रूरी क्लाइंट मीटिंग में थी,

ने हड़बड़ाकर म्यूट का बटन दबाया। वह नौ महीने की गर्भवती थी। डॉक्टर ने उसे बेड रेस्ट की सख्त सलाह दी थी क्योंकि उसका ब्लड प्रेशर लगातार ऊपर-नीचे हो रहा था। उसके पैरों में इतनी सूजन थी कि चप्पल पहनना भी एक चुनौती बन चुका था।

“आ रही हूँ मम्मी जी,” सुमन ने भारी आवाज़ में जवाब दिया और मीटिंग से “दो मिनट का ब्रेक” मांगकर हेडफोन मेज पर रख दिए।

वह उठी, तो उसकी रीढ़ की हड्डी में एक तेज कसक उठी। उसने अपनी कमर पर हाथ रखा और दीवार का सहारा लेकर धीरे-धीरे कमरे से बाहर निकली।

ड्राइंग रूम में तीन साल का आरव गिरा हुआ दूध देखकर डर के मारे सोफे के पीछे छिपा था। कुसुम जी सोफे पर बैठीं टीवी का चैनल बदल रही थीं। उनके हाथ में रिमोट था, लेकिन पास पड़ा कपड़ा उठाकर दूध साफ करने की फुर्सत शायद उन्हें नहीं थी।

सुमन ने झुकने की कोशिश की, तो उसकी सांस फूल गई। पेट का आकार इतना बड़ा था कि ज़मीन छूना अब असंभव सा लगता था। फिर भी, एक लंबी सांस खींचकर वह घुटनों के बल बैठी और पोंछा लगाने लगी।

“अरे, ठीक से पोंछना। कल ही मेड नहीं आई थी, तो मैंने खुद साफ किया था। आज फिर गंदा कर दिया,” कुसुम जी ने बिना सुमन की तरफ देखे कहा।

सुमन की आँखों में आंसू तैर गए, लेकिन उसने उन्हें पलकों में ही जज़्ब कर लिया। वह सुमन, जो एक मल्टीनेशनल कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट थी, जिसके एक ईमेल पर पचास लोगों की टीम हरकत में आ जाती थी, आज अपने ही घर में एक लाचार सेविका बनकर रह गई थी।

यह कहानी उस सुमन की है जो संपन्न परिवार से थी, एमबीए टॉपर थी और लाखों का पैकेज कमाती थी। उसकी शादी रवि से हुई थी, जो खुद एक कॉर्पोरेट सेक्टर में काम करता था। शादी के वक्त रवि और उसके परिवार ने बड़ी-बड़ी बातें की थीं—”हमें तो बेटी चाहिए, बहू नहीं। हम तो चाहते हैं वो अपनी नौकरी जारी रखे।”

लेकिन शादी के बाद ‘आदर्श बहू’ का ऐसा चोला सुमन को पहनाया गया कि वह उसमें घुटने लगी। कुसुम जी का तरीका बड़ा ही बारीक था। वे कभी सीधे काम करने को नहीं कहती थीं, बल्कि ऐसी परिस्थितियाँ पैदा करती थीं कि सुमन को खुद उठना पड़े।

“अरे, मेड तो ठीक से सब्जी काटती नहीं, सुमन बेटा तुम्हारे हाथ के कटे सलाद की बात ही अलग है,” यह कहकर घंटों रसोई में खड़ा रखना। या फिर, “रवि को तो तुम्हारे हाथ की ही कॉफी पसंद है,” कहकर थकी-हारी सुमन को दोबारा किचन में भेजना।

सुमन ने पोंछा लगाया और बड़ी मुश्किल से दीवार पकड़कर खड़ी हुई। तभी घर की घंटी बजी। रवि ऑफिस से आ गया था। सुमन को लगा शायद रवि उसे देखेगा, उसकी हालत समझेगा।

रवि अंदर आया, माँ के पैर छुए और सोफे पर बैठ गया। “उफ्फ! आज तो बहुत थकान है। सुमन, एक कप स्ट्रॉन्ग कॉफी मिलेगी? और हाँ, आरव को संभालो यार, बहुत शोर मचाता है।”

सुमन वहीं खड़ी थी। पसीने से लथपथ, सांस फूलती हुई। उसने रवि को देखा। “रवि, मेरी मीटिंग चल रही है। और मेरी तबीयत ठीक नहीं लग रही। क्या तुम कॉफी खुद बना लोगे?”

रवि ने चौंककर देखा, जैसे सुमन ने कोई गुनाह कर दिया हो। कुसुम जी तुरंत बोल पड़ीं, “अरे बेटा, तू बैठ। मैं बना देती हूँ। आजकल की बहुओं को तो बस काम से जी चुराना आता है। हम भी गर्भवती होते थे, नौवें महीने तक चक्की पीसते थे, खेत का काम करते थे। यहाँ तो एसी में रहकर भी मीटिंग का बहाना है।”

यह ताना तीर की तरह सुमन के सीने में लगा। रवि ने माँ को रोकने के बजाय कहा, “अरे माँ, आप क्यों उठोगी? सुमन, बना दो न। पांच मिनट ही तो लगेंगे।”

सुमन चुपचाप किचन में चली गई। उस दिन उसे समझ आ गया कि उसकी डिग्रियाँ, उसका पद, उसका पैसा—सब इस घर की दहलीज के बाहर ही मायने रखते हैं। अंदर वह सिर्फ एक ‘बहु’ है जिसे मशीन की तरह खटना है।

शाम होते-होते सुमन की तबीयत बिगड़ने लगी। पेट में हल्का दर्द शुरू हो गया था। उसने सोचा शायद थकान की वजह से है। वह आरव को खाना खिला रही थी, जो बार-बार नखरे कर रहा था। कुसुम जी अपने कमरे में फोन पर किसी रिश्तेदार से बुराई करने में व्यस्त थीं—”हाँ बहन, क्या बताऊँ, बड़े घर की बेटी है न, नज़ाकत तो होगी ही। कामचोर है और कुछ नहीं।”

रात के ग्यारह बजे सुमन ने रवि को जगाया। “रवि, मुझे दर्द हो रहा है। अस्पताल चलना होगा।”

रवि ने नींद में बड़बड़ाते हुए कहा, “सुमन, अभी तो दो हफ्ते बाकी हैं डेट में। गैस होगी। सो जाओ, सुबह देखेंगे।”

“रवि, प्लीज़! यह लेबर पेन है,” सुमन चिल्लाई।

रवि हड़बड़ाकर उठा। गाड़ी निकाली गई। कुसुम जी पीछे की सीट पर बैठीं, लेकिन सांत्वना देने के बजाय बुदबुदाती रहीं, “इतनी रात को तमाशा खड़ा कर दिया। सुबह तक का इंतज़ार नहीं हो रहा था।”

अस्पताल पहुँचते-पहुँचते सुमन की हालत खराब हो गई थी। ब्लड प्रेशर खतरनाक स्तर पर पहुँच चुका था। डॉक्टर ने तुरंत उसे इमरजेंसी में लिया।

ऑपरेशन थिएटर के बाहर डॉक्टर ने रवि को जमकर फटकार लगाई। “मिस्टर रवि, आपकी पत्नी की हालत बहुत क्रिटिकल है। वह शारीरिक और मानसिक रूप से पूरी तरह टूट चुकी हैं। उनके शरीर में हीमोग्लोबिन कम है, पैरों में सूजन है और स्ट्रेस लेवल बहुत हाई है। क्या आप लोग ध्यान नहीं देते? अगर कुछ ऊंच-नीच हो गई तो हम जिम्मेदार नहीं होंगे।”

रवि सन्न रह गया। कुसुम जी ने अपना पल्ला झाड़ते हुए कहा, “डॉक्टर साहिबा, हम तो पूरा ख्याल रखते हैं, यही खाने-पीने में नखरे करती है।”

डॉक्टर ने घूरकर कुसुम जी को देखा, “मैडम, मैं रिपोर्ट देख रही हूँ। यह कुपोषण और अत्यधिक श्रम का नतीजा है। कृपया यहाँ शांत रहें।”

दो घंटे के तनावपूर्ण इंतज़ार के बाद, नर्स बाहर आई। “बधाई हो, बेटी हुई है।”

रवि के चेहरे पर खुशी आई, लेकिन कुसुम जी का चेहरा लटक गया। “फिर से लड़की? हमें तो लगा था इस बार तो कुलदीपक आएगा। चलो, भगवान की मर्जी।”

रवि ने पहली बार माँ को टोकने की हिम्मत की, “माँ, बस करो। सुमन और बच्ची ठीक हैं, यही काफी है।”

सुमन को होश आया तो उसने देखा कि बगल के पालने में एक नन्हीं सी जान सो रही थी। उसने उसे देखा—वही मासूमियत, वही नाजुकता। अचानक सुमन के अंदर एक बिजली सी कौंधी। उसने अपनी बेटी को देखा और फिर अपने बीते हुए पांच सालों को याद किया। क्या उसकी बेटी का भविष्य भी यही होगा? पढ़ना-लिखना, काबिल बनना और अंत में किसी की रसोई में पसीना बहाते हुए अपनी पहचान खो देना?

“नहीं!” सुमन के मन ने चीखकर कहा। “मैं अपनी बेटियों के लिए यह मिसाल नहीं बनूँगी कि औरत को सब कुछ सहना चाहिए।”

दो दिन बाद सुमन को डिस्चार्ज मिला। रवि उसे लेने आया। घर पहुँचते ही कुसुम जी ने फिर अपना पुराना राग अलापा, “चलो, अब आ गई हो तो घर की रौनक लौटेगी। मेड भी दो दिन से नखरे कर रही है।”

सुमन ने रवि का हाथ झटक दिया और सीधे अपने कमरे में चली गई। उसने अपनी नवजात बच्ची को पालने में लिटाया और फिर बाहर ड्राइंग रूम में आई। कुसुम जी और रवि वहीं खड़े थे।

सुमन ने बहुत ही शांत लेकिन बेहद सख्त आवाज़ में कहा, “मम्मी जी, रवि… बैठिए। मुझे कुछ बात करनी है।”

उसकी आवाज़ में ऐसा कुछ था कि कुसुम जी भी चुपचाप बैठ गईं।

“पिछले पांच सालों से मैं एक ‘आदर्श बहू’ बनने की कोशिश कर रही थी। मैंने अपनी सेहत, अपना करियर और अपना आत्मसम्मान सब दांव पर लगा दिया। लेकिन मुझे बदले में क्या मिला? उपेक्षा, ताने और यह बीमारी?”

सुमन ने एक गहरी सांस ली। “आज मैं जो फैसला ले रही हूँ, वह मेरे और मेरी बेटियों के लिए है। कल से इस घर में दो फुल टाइम मेड आएँगी—एक घर के काम के लिए और एक बच्चों को संभालने के लिए।”

कुसुम जी तमतमा उठीं, “दो-दो नौकरानियाँ? पैसे क्या पेड़ पर उगते हैं? रवि, देख अपनी बीवी के तेवर।”

सुमन ने हाथ उठाकर उन्हें रोका। “पैसे पेड़ पर नहीं उगते मम्मी जी, मैं कमाती हूँ। मेरी सैलरी रवि से ज्यादा है, यह शायद आप भूल गई हैं क्योंकि मैं कभी इसका ज़िक्र नहीं करती। इन दोनों मेड्स की सैलरी मैं अपनी जेब से दूँगी। और खबरदार, अगर किसी ने उन्हें काम से रोका या निकाला।”

फिर वह रवि की ओर मुड़ी। “और रवि, तुम… तुम मेरे पति हो, मालिक नहीं। अगर तुम्हें मेरी हाथ की कॉफी चाहिए, तो तुम्हें भी कभी मेरे पैर दबाने होंगे। यह एकतरफा सेवा अब नहीं चलेगी। मैं तुम्हारी अर्धांगिनी हूँ, नौकरानी नहीं। अगर तुम्हें यह मंजूर नहीं है, तो मेरे पास अपना घर खरीदने की भी क्षमता है और अकेले बच्चों को पालने की भी।”

कमरे में सन्नाटा छा गया। कुसुम जी का मुंह खुला का खुला रह गया। वे जिस बहू को ‘कमज़ोर’ और ‘दब्बू’ समझती थीं, आज वह एक शेरनी की तरह दहाड़ रही थी।

रवि ने सुमन की आँखों में देखा। वहां अब याचना नहीं थी, निर्णय था। उसे अपनी गलती का अहसास हुआ। उसे डॉक्टर के शब्द याद आए। उसे याद आया कि कैसे सुमन ने अपनी तकलीफों को छिपाकर घर को संभाला था।

रवि उठा और माँ के सामने खड़ा हो गया। “माँ, सुमन सही कह रही है। हमने उस पर बहुत जुल्म किया है। अनजाने में ही सही, पर मैंने उसे गृहिणी बनाकर उसकी प्रतिभा का गला घोंट दिया। अब से इस घर के नियम बदलेंगे।”

कुसुम जी बड़बड़ाईं, “जोरू का गुलाम…”

रवि ने दृढ़ता से कहा, “नहीं माँ, इसे साझेदारी कहते हैं। जो शायद पिताजी ने नहीं की, पर मैं करूँगा।”

अगले कुछ हफ्तों में घर का नक्शा बदल गया। नौकरानियों ने घर का काम संभाल लिया। सुमन अब सुबह अपनी कॉफी पीते हुए रिलैक्स करती थी। उसने मैटरनिटी लीव के दौरान अपनी सेहत पर ध्यान देना शुरू किया।

एक दिन, जब सुमन अपनी दोनों बेटियों—आरव (जो अब बड़ा भाई बन गया था) और छोटी ‘नव्या’—के साथ खेल रही थी, तो कुसुम जी धीरे से कमरे में आईं। उनके हाथ में हलवे की कटोरी थी।

“ले, खा ले। दूध बन रहा है, तो तुझे ताकत की ज़रूरत है,” कुसुम जी ने बिना नज़र मिलाए कहा और कटोरी मेज पर रख दी।

सुमन मुस्कुरा दी। वह जानती थी कि कुसुम जी का स्वभाव रातों-रात नहीं बदलेगा। उनके ताने अभी भी कभी-कभी सुनाई देते थे, लेकिन अब उनका असर नहीं होता था। क्योंकि सुमन ने अपनी ‘लक्ष्मण रेखा’ खींच दी थी—वह रेखा जहाँ उसका आत्मसम्मान शुरू होता था।

सुमन ने अपनी नवजात बेटी को गोद में उठाया और उसके कान में धीरे से फुसफुसाया, “मेरी जान, याद रखना… दुनिया तुम्हें तभी पूजेगी जब तुम खुद को पूजना सीखोगी। झुकना अच्छा है, पर इतना नहीं कि कमर ही टूट जाए।”

उस रात, रवि ने खुद उठकर आरव को सुलाया और नव्या के डायपर बदले। सुमन ने करवट ली और चैन की नींद सोई। उसे अब किसी के ‘स्वीकृति’ की ज़रूरत नहीं थी। उसने अपनी जगह मांग कर नहीं, छीन कर ली थी। और यही उसकी सबसे बड़ी जीत थी।

यह कहानी उस हर औरत की है जो सोचती है कि खामोश रहकर वह रिश्तों को बचा रही है, जबकि असल में वह अपने वजूद को मिटा रही होती है। सुमन ने सिखा दिया कि एक नारी का असली सौंदर्य उसके त्याग में नहीं, उसके स्वाभिमान में है।

मूल लेखिका : गीतू महाजन 

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