आज 5 दिन बाद अस्पताल से विनय बाबू को छुट्टी मिलने वाली थी…इन दिनों में उनके साथ लगातार उनकी पत्नी सरला जी ही रहीं वरना कुछ परिचित लोग तो औपचारिकतावश उनसे मिलने आते और हालचाल पूछकर चले जाते।
अस्पताल भी घर से दूर था तो कामवाली से भी किसी मदद की उम्मीद नहीं थी अतः उसकी भी छुट्टी कर दी थी। दो बेटे थे जो नौकरीवश दूर राज्यों में जाकर परिवार सहित सैटल हो गए थे….विनय बाबू ने उन्हें विदेश जाने से यह कहकर रोक लिया था कि अपना देश अपना होता है और जरूरत पड़ने पर एक दूसरे का साथ भी मिल जाता है लेकिन इन परिस्थितियों के दिनों में भी दोनों बेटों ने आने में असमर्थता जता दी केवल फोन पर हालचाल पूछ लेते….कभी सरला जी बहुत दुखी हो जातींं कि इस बुढ़ापे में भी बेटों का सहारा नहीं है लेकिन फिर हिम्मत से काम लेती कि अगर मैं ही हार जाऊंगी तो इनका ध्यान कौन रखेगा?
विनय बाबू और सरला जी दोनों ही शिक्षा विभाग से रिटायर्ड थे और अब बुढ़ापे में एक दूसरे के सहारे ही जीवन व्यतीत कर रहे थे…सरला जी को कोई तकलीफ होती तो विनय बाबू पूरा सहयोग करते और ध्यान रखते और विनय बाबू को होती तो सरला जी।
घरेलू कामकाज में सहयोग के लिए एक कामवाली रखी थी लेकिन सरला जी अब भी खाना अपने ही हाथों से बनातीं उनका मानना था कि अपने हाथों से भोजन बनाने में प्रेम और तृप्ति दोनों होती है और इस सबमें विनय बाबू भी उनका पूरा सहयोग करते….दोनों अपने जीवन में खुश थे बस कभी–कभी बच्चों के साथ को तरस जाते खासकर बीमारी आदि में…लेकिन तुरंत ही एक दूसरे को ये कहकर समझा देते कि अब बच्चे भी क्या करें उनकी भी मजबूरी है कि उन्हें नौकरी की वजह से हमसे दूर रहना पड़ रहा है।
लेकिन इन दिनों सरला जी को समझाने वाला कोई नहीं था विनय बाबू बीमार थे अतः वो खुद को अकेला और असहाय महसूस कर रही थीं फिर खुद ही अपने मन को समझा लेती।
इन पांच दिनों में चाय पानी और भोजन आदि की व्यवस्था उन्होंने अस्पताल के पास की ही कैंटीन से कर ली थी उन्हें जो भी खाना होता या विनय बाबू को दलिया खिचड़ी आदि जो भी देना होता वह कैंटीन में ही बनवा लेती परन्तु जब रुपए देने की बात आती तो कैंटीन का मालिक यह कहकर रुपए बताने से मना कर देता था कि हिसाब बाद में होता रहेगा तब सरला जी भी यह सोचकर चुप हो जातींं कि ठीक है बाद में छुट्टी होगी तब कर दूंगी….आज जब विनय बाबू को छुट्टी मिलने वाली थी तब वह अस्पताल का बिल, मेडिकल स्टोर का बिल आदि भरने के बाद कैंटीन में बिल चुकाने पहुंची तो बिल पर जीरो अमाउंट देखकर चौंक गई–
” अरे ये कैसा मजाक है?….अब तक तो कहते रहे कि हिसाब बाद में हो जाएगा और अब बिल पर अमाउंट की जगह जीरो लिखा हुआ है….सही सही बताइए कि हमारे चाय बिस्कुट, खाने आदि का कितना बिल हो गया है?….”
“यह बिल सही है मैडम जी, शायद आपने मुझे ठीक से पहचाना नहीं, मैं सोमेश हूं आपका छात्र जिसे आप और सब बच्चे सोमू बोलते थे….जब मैं कक्षा 3 में था तब मेरे पिताजी का देहांत हो गया और मां मजबूरी में मेरी स्कूल फीस नहीं भर सकीं तब विद्यालय से मेरा नाम काटा जा रहा था उस समय आपने मेरी मदद की और फीस भरकर मेरा नाम कटने से रोक लिया और इतना ही नहीं आपने कक्षा 8 तक मुझे ट्यूशन भी बिना फीस लिए पढ़ाया तो क्या मैडम ये आज का बिल उस सबसे ज्यादा हो गया…” कहते हुए सोमेश भावुक हो गया।
सरला जी को भी याद आ गया कि शहर से दूर एक कस्बे के विद्यालय में जब उनकी पोस्टिंग थी तब यह उनकी कक्षा का विद्यार्थी था जो कि अब बहुत वर्षों बाद यहां मिला।
“अरे सोमू…..तुम….तुम तो बिल्कुल ही बदल गए और पहचान में भी नहीं आ रहे….अब यहीं रह रहे हो क्या?…”
“जी मैडम…अब मम्मी भी नहीं रहीं तो अपनी पत्नी और बेटी के साथ यहीं शहर में आ गया बस अभी 2 साल हुए हैं….बेटी का एडमिशन भी यहीं मांटेसरी स्कूल में पहली कक्षा में करवा दिया है…”
“चलो अच्छी बात है….खुश रहो और ऐसे ही तरक्की करते रहो… और अब मेरा बिल तो बता दो क्योंकि वो बात अलग थी कि मैंने तुम्हे बिना फीस के पढ़ाया था, मैंने बिना फीस लिए तुम्हें इसलिए पढ़ाया क्योंकि मैं नहीं चाहती थी कि तुम पढ़ाई के इच्छुक होते हुए भी केवल धनाभाव के कारण आगे न पढ़ सको लेकिन आज ये भी सही नहीं है कि मैं तुम्हारा बिल केवल इसलिए न चुकाऊं कि मैंने तुम्हें फ्री में पढ़ाया था या तुम्हारी फीस भरी थी…”
“मैडम क्या मैं आज समर्थ होते हुए भी अपनी गुरु को भोजन नहीं करवा सकता क्या मैं इस काबिल भी नहीं हूं कि मेरी गुरु मेरे यहां भोजन कर सकें….”सोमेश ने भावुक होते हुए कहा
“नहीं बेटा ऐसी कोई बात नहीं है….”
“तो फिर आप मुझसे बिल पूछकर मुझे और शर्मिंदा न करें….और मेरी आपसे एक और विनती है…” सोमेश ने हाथ जोड़ते हुए कहा।
सरला जी उसे आश्चर्यचकित होकर देखने लगीं
“आपको और सर जी को आपके घर तक छोड़ने मैं जाऊंगा और आज से आप दोनों का सुबह शाम का भोजन मेरे यहां से ही जायेगा….और आगे से जब भी आपको कोई परेशानी हो तब आप अकेले परेशान न होकर केवल मुझे कॉल कर देना…” सोमेश ने अपना विजिटिंग कार्ड उनकी ओर बढ़ाते हुए कहा।
“ये क्या कह रहे हो! …घर पर तो भोजन मैं बना ही लेती हूं फिर तुम्हारे यहां से क्यों…..नहीं बेटा ये ठीक नहीं है….हां हमारे साथ घर तक चलना चाहते हो ठीक है लेकिन खाना भेजना सही नहीं है….और वैसे भी मुझे अपने हाथों से बना घर का खाना ही पसंद है….”
“क्यों मैडम….क्यों सही नहीं है ….क्या गुरु शिष्य का संबंध केवल पढ़ाई तक ही सीमित होता है….क्या एक शिष्य बेटे की तरह नहीं होता… अगर आपके बेटे आपके साथ होते तो क्या आप तब भी अपने आप ही भोजन पकाती ….मैडम जब आप मुझे पढ़ातीं थी और स्कूल में भी मेरा पूरा साथ देती थीं तब आप दोनों में मुझे अपनी मम्मी और पापा नजर आते थे और सच कहूँ तो आपने मेरे मम्मी पापा से बढ़कर मेरे लिए किया है अगर आज मैं यहां तक पहुंचा हूं तो वो सब आपकी कृपा है…अगर उस दिन मेरा नाम विद्यालय से कट जाता तो मैं कहीं मजदूरी की तलाश में धक्के खा रहा होता…..आज जब मुझे अपना फर्ज निभाने का अवसर मिला है तो आप मुझे उससे क्यों वंचित कर रही हैं….कृपया करके आप मेरी विनती को मान लीजिए… यह मेरा सौभाग्य होगा ….”
सोमेश की बातें सुन सरला जी की आँखें भर आईं” ठीक है बेटा….लेकिन मेरी भी बात ध्यान से सुन लो कि जब तक मेरे हाथ पैर चल रहे हैं तब तक तुम रोज रोज भोजन के लिए परेशान मत होना; वैसे मिलने आ सकते हो और रही बात भोजन की तो वो कभी – कभी या त्यौहार आदि पर लेकर आ जाना और हां साथ में मेरी बहू और पोती को भी लेकर आना…”
“अरे ऐसी बात है तो मैं अभी उन दोनों को आपके घर आपसे मिलने बुला लेता हूं इतने दिनों में आपका घर भी अव्यवस्थित हो गया होगा वो भी मिलकर सही कर देंगे….” सोमेश खुशी से एक छोटे बच्चे की तरह चहकते हुए और चरणस्पर्श करते हुए बोला।
“अच्छा, अच्छा अब चल ….बड़े होने के साथ साथ बहुत जिद्दी भी हो गया है….”
सरला जी के साथ सोमेश भी अस्पताल में विनय बाबू के पास आ गया और विनय बाबू के चरणस्पर्श किए जिसे देख विनय बाबू ने सरला जी से इशारे में उसके बारे में पूछा।
” अरे ये!…ये बेटा है हमारा। आप भी नहीं पहचान पाए इसे… ये वही है जो हमारे यहां बचपन में पढ़ने आता था….बस अब उसी पढ़ाई की गुरु दक्षिणा देने की जिद पर अड़ गया है….बाकी की बातें रास्ते में या घर पहुंचकर सुन लेना… अब चलिए… बहुत दिन हो गए यहां…”कहते हुए सरला जी मुस्कुरा दीं और मन ही मन सोचने लगीं कि कुछ रिश्ते ऐसे भी होते हैं जो खून के रिश्तों से बड़े होते हैं।
प्रतिभा भारद्वाज ‘प्रभा’
#एक रिश्ता ऐसा भी