आज सुखिया और दिलभजन मंडल पर पंचायत बैठी थी।गांव के पंच परमेश्वर और सरपंच राम चौधरी,मुखिया जुम्मन शेख सहित लगभग चार सौ लोग उस पीपल पेड़ तले बैठे थे।
सरपंच हुजुर,सुखिया को गांव से बाहर निकाला जाय, हुक्का पानी बंद किया जाए -यह कंटीर मिश्रा थे जो सुखिया पर आंख गड़ाए थे।
हां हुजूर कंटीर जी सच कह रहे हैं -यह त्रिलोकी सिंह थे जिसकी गलत निगाह सुखिया पर थी।
अब सरपंच ने सुखिया और फिर दिलभजन को अपना पक्ष रखने को कहा।
सुखिया खड़ी होकर बोली-पंच में परमेश्वर का बास होता है और आपकी न्याय पर भरोसा है।मगर एक सवाल इन दोनों से पूछना है -पूछो इजाजत है -सरपंच ने हामी भरते कहा।
क्या विधवा औरत नहीं होती?क्या उसकी इज्जत नहीं होती-यदि हां तो ये लोग छुपकर तालाब पर मुझे तब देखते हैं जब मैं नहाने जाती हूं।इतना ही नहीं जब मैं बच्ची को दूध पिलाती हूं तब ये मेरी छाती देखते हैं,यह क्या है?
अब तो दोनों परेशान हो गये और सरपंच ने तत्काल प्रभाव से उन्हें बाहर निकाल दिया।
अब मुद्दे की बात -मेरे ससुराल में उस दिन देवर की शादी थी।सारे रिश्तेदार आये थे और उसी में वे मामाजी सपरिवार आये थे। अचानक बारिश,पानी फिर ठनका(आकाशीय बिजली)गिरी जिसमें पूरा परिवार जलकर मर गया बची मैं और मामाजी यानिदिलभजन मंडल जी।अब सबने मुझे अभागन और मनहूस कहा,मानो मैंने ही बादल और बरसात किए हैं।
नहीं इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं ना ही किसी ने कुछ कहा है।बस लोगों का यह कहना है कि दिलभजन के साथ तुम्हारे अवैध संबंध हैं।
हुजुर मुझे बोलने की इजाजत है?-यह दिलभजन मंडल था।
बोलो क्या कहना है!
सुखिया गरीब बिना मां बाप की बेटी है जिसे मेरी बहन अपनी बहू रूप में मदना से ब्याही थी,आज इस बात को दस साल हुए कोई लेने नहीं आया।
फिर दुर्घटना के बाद मेरा भी कोई नहीं था और इसका कोई नहीं था तो हुजुर माई बाप,यहीं सरपंच और मुखिया जी सहित सबने मुझे रखने की सलाह दी।यह दो बच्चे को खोयी है, वहीं अभी साल भर की छोटी की मां है , मैं इसे अपनी क्षमता भर सुविधा संग रखें हूं।-यह कहकर दिलभजन ने पूरे पंचायत को आइना दिखाया।
सब सिर नीचे कर बैठ गये।
सुनो बात को घुमाओ मत-तुम्हारा सुखिया संग अवैध संबंध हैं।-यह रामटहल मिश्रा थे जिनके सारे दोस्तों की बेइज्जती हो रही थी और आप भी आंशिक थे जो रात के अंधेरे में सुखिया को भोगना चाहते थे।
मुझे माफ़ करना-सरपंच जी ये तो खुलेआम शाम के समय मेरा आंचल पकड़े थे।-यह सुखिया थी।
क्या यह सच है -सरपंच ने घूरकर पूछा।अब रामटहल जी हां ना करते बंगले झांकने लगे।
पंचायत इन तीनों को गांव की माहौल खराब करने और एक अबला ,विधवा पर गंदी नजर रखने के आरोप में पचास पचास का अर्थदंड लगाती है।ये परसों तक पैसे जमा करेंगे और यदि नहीं करते तो हुक्का पानी बंद कर इन्हें गांव सीमा से बाहर किया जाय।आप तीनों को बेटी समान लड़की से हरकत करते शर्म नहीं आती।
अब तो उल्टा मामला हो गया और आधे से ज्यादा लोग उठकर भाग निकले।अरे बाप रे , कहीं सुखिया ने हम सबको भी देखा होगा और बोल दिया तो कितनी बेइज्जती होगी।बेटी बहू नाती पोते बीच नजर मिलाने लायक नहीं बचेंगे ,बेहतर है मदद करो-
हम सभी थोड़ी थोड़ी इसकी मदद करना चाहते हैं।
रामधनी बोले इसके मकान में जितनी ईंटे लगेगी वह मेरी ओर से,पचास हजार के अलावे मैं यह दूंगा,यह आज से मेरी बेटी है।
इसी प्रकार रामटहल जी ने सिमेंट देने का वचन दिया।फिर क्या था? पंचायत का रूप बदल गया।
आज सरपंच बख्शने के मुड में नहीं थे सो झट से सुखिया को पूछा -लोग कहते हैं कि मामा श्वसुर से तुम्हारे अवैध संबंध हैं ,यहां तक कि तुमने अपना दूध पिलाया है-इस बारे में क्या कहना है?
पहली बात मामाजी का पूरा परिवार यानि बीबी और बच्चे उस ठनके में जल मरे थे।दूसरी बात उन्होंने पूरा सहारा दिया।आज भी मधुबनी -गांव सुबह से रात तक टैम्पो चलाते हैं और अपने परिवार सा पालते हैं। इन्होंने मुझे बहू बेटी सा पूरा मान दिया है। कहीं भी ग़लत या अवैध कुछ नहीं है।-वह रोती हुई बोली।
फिर दूध पिलाने की घटना –अब सरपंच का नजरिया बदल चुका था।
कुछ नहीं,अभी दो महीने पहले इन्हें खतरनाक मोमरखा हो गया था जिसकी दवा दूध के साथ पिलाने को कहा गया।मुझे खूब दूध उतरता है और वह व्यक्ति जो मुझे मान सम्मान के साथ रखें है उसे मैं मरने कैसे देती सो मैंने चम्मच में दूध निकाल कर दवाई बनाकर पिलाया है।वे बेसुध थे। उन्हें कुछ पता नहीं है?
क्या मामा श्वसुर इंसान नहीं होता,क्या बहू मां नहीं होती। मैं इस घर की इज्जत हूं तो वे भी मेरे अपने हैं मैंने उन्हें बचाने के लिए जो ठीक लगा वह किया और आगे भी करूंगी।
अब तो सरपंच मुस्कुराने लगे मगर आंखें साथ नहीं दे रही थी।
बस माफ कर दे बेटी -सरपंच ने हाथ जोड़ते हुए कहा।
बाकी पंच और उपस्थित सभी मान्यवर सज्जनों आपको और कुछ पूछना है।
सबने ना में सिर हिलाया। कुछ नहीं -ये दोनों बेदाग हैं,इनपर आरोप गलत हैं -सारी जनता चिल्लाई।
हम सभी अपने किए पर शर्मिन्दा हैं -वे चारो हाथ जोड़कर बोले।
जब कोई व्यक्ति दूसरे के घर में आग लगाता है तो उसे बड़ा मज़ा आता है मगर जब खुद का घर जलता है तो?—वही हाल चारों का था ,वे किसी भी कीमत पर अपनी इज्जत बचाना चाहते थे।रामटहल तो मुखिया के दावेदार थे पिछले चुनाव में बस चालीस वोट से हारे थे सो लाख रूपए खर्च कर माहौल सुधारना फायदे का सौदा था।
अब सरपंच आगे बोले -गुनाह सुखिया और दिलभजन मंडल ने नहीं किया है बल्कि ये चारों लोगों ने किया है।किसी बेगुनाह पर गलत आरोप लगाकर परेशान करना, प्राकृतिक आपदा से परेशान को गंदी निगाह से देखना एक भयंकर पाप है।आप सभी ब्राह्मण समाज के कलंक हैं?गांव के कलंक हैं,आप सभी को माफी नहीं मिल सकती।ये चारों एक साल तक किसी राजनैतिक और गांव के किसी काम में भागीदारी नहीं करेंगे।अगर इनका चरित्र और स्वभाव ठीक होता है तभी ये सही जीवन जी सकते हैं।वरना–?यह पंचायत इन्हें निर्धारित अर्थ दंड नियत समय पर जमा करने का हुक्म देती है ।आप दोनों सुखिया और दिलभजन मंडल को सम्मान के साथ वरी करते हुए मकान निर्माण में सहयोग करती हैं।
#इस गुनाह की माफी नहीं?
रचनाकार-परमा दत्त झा, भोपाल।