हां मैं स्वार्थी हूं। – मधु वशिष्ठ

जी हां हो गई हूं मैं स्वार्थी इतना कहकर रीना अपनी बेटी श्रेया को पढाती रही। बाहर से गुस्से से भरी आवाजें आती रही। रसोई में भी  बर्तनों का बजना जारी था।

     आइए आपको रीना के परिवार से मिलाऊं। रीना संयुक्त परिवार में थी जिसमें कि उसके दो देवर और दो ननदें थी। आम संयुक्त परिवारों के जैसे ही घर का सारा काम करना बहू की ही जिम्मेदारी मानी जाती थी,

यूं भी रीना अपनी जिम्मेदारी से विमुख नहीं होती थी। उसकी एक बेटी भी थी घर में झाड़ू पोछा बर्तन के लिए रज्जू बाई आती थी। विवाहित ननद भी अक्सर घर में अपने बच्चों के साथ आई ही रहती थी। उसके पति पवन पिता के साथ ही कपड़ों की दुकान पर बैठा करते थे।

देवर गगन नौकरी करता था और छोटा देवर मनन स्कूल में पढ़ता था। सासू मां के सहयोग और अनुशासन से घर सुचारू रूप से चल रहा था। सासू मां रीना को भी अपनी बेटियों के समान ही प्यार करती थी। घर का काम सब मिलजुल कर और अनुशासित तरीके से करते थे।

रीना को अपनी बेटी श्रेया को पढाने का भी समय मिल जाता था। उनकी विवाहित बेटी मीरा और छोटी बेटी रिया भी घर के काम में पूरा सहयोग करती थी। हालांकि कई बार घर में मीरा जब अपने बच्चों के साथ आती और वह स्वयं का मेहमान के जैसे स्वागत चाहती तो वह उसे नहीं मिल पाता था क्योंकि सासू मां सारा भार बहु पर नहीं डालती थी।

मीरा हमेशा खुद को छला हुआ ही महसूस करती थी ससुराल में भी उसे बहुत सारा काम करना पड़े और मायके में भी मां भाभी को ज्यादा प्यार करें बस यही किलस जब मैं नहीं सहन कर पाती थी तो छोटी बहन रिया को भी भाभी के खिलाफ भड़काती रहती थी। मीरा की ससुराल में भी किसी से नहीं बनती थी

इसलिए वह अपना अधिकतर समय लड़ झगड़ कर आने के बाद अपने मायके में ही बिताती थी। परंतु क्योंकि रीना सबकी लाडली थी तो वह दोनों चाह कर भी उसको कुछ कह नहीं पाती थी।

       अचानक से एक दिन सासू मां घर की सीढ़ियों से उतरती हुई गिर गई और उनके पैर की हड्डी टूट गई थी जिसके लिए कि उनका अस्पताल में ऑपरेशन होकर एड़ी में प्लेट डालनी थी।

उनके हाथ का भी काफी जगह से मांस फट गया था। जब वह अस्पताल में दाखिल हुई तो रीना उनके साथ ही रही। अस्पताल में रीना अपनी सासू मां का इतना ख्याल करती थी की और लोग भी यही समझते थे कि रीना उनकी बहू नहीं बेटी है। 

        अब घर का सारा काम घर की दोनों बेटियों के ऊपर ही आप पड़ा था। मीरा को अपने बच्चे तो संभालने ही थे इसके अतिरिक्त पिता और भाइयों का खाना बनाने का काम भी उस पर ही आ पड़ा था। उसके पापा अस्पताल में चले जाते थे इस कारण दुकान का सारा काम रीना के पति पवन को ही संभालना पड़ा।

छोटी बहन रिया और दोनों भाई भी मीरा के घर संभालने में सहायता तो कर रहे थे परंतु फिर भी मीरा को यही लग रहा था कि भाभी रीना तो अस्पताल में मां के साथ मजे ही कर रही है। यहां उसकी बेटी को भी हम सबको ही संभालना पड़ रहा है। घर में अव्यवस्था पूर्ण रूप से फैल चुकी थी। 

5 दिन बाद जब रीना और सासू मां वापस घर आए तो सासु मां अभी इस हालत में नहीं थी कि घर को देख सके और रीना भी बेहद थक चुकी थी। 

       श्रेया के पेपर नजदीक थे हालांकि वह अभी दूसरी क्लास में ही थी परंतु पिछले 5 दिनों से उसे भी स्कूल नहीं भेजा गया था। पवन सुबह से रात तक अकेला ही दुकान संभाल रहा था। घर की सहायिका रज्जू बाई से भी शायद रूटीन से अलग काम करवाया जाता होगा या जो भी कारण रहा हो रज्जू बाई ने रीना के कमरे को तो साफ़ ही नहीं किया था।

रीना जाकर सासू मां के कमरे मी बैड वगैरह ठीक करवा रही थी। अपने कमरे को भी उसने साफ किया। वह खुद भी बहुत थक चुकी थी नहा धोकर थोड़ी देर में वह अपने कमरे में श्रेया के साथ सो गई थी। सासू मां से मिलने जुलने वाले लोग आ रहे थे।

उठने के बाद रीना श्रेया को डांटते हुए उसे पढ़ा रही थी। मीरा का गुस्सा सातवें आसमान पर था वह और रिया मिलकर  चिल्ला रहे थे क्योंकि वह  चाहते थे रीना अब घर आने के बाद घर का काम भी संभाल ले। उन दोनों के कहने से ही देवर गगन रीना के कमरे में आया और गुस्साते हुए बोला भाभी आपकी भी जिम्मेदारी बनती है

कि दीदी के साथ में घर के काम में हाथ बंटाओ। इतना स्वार्थी होना ठीक नहीं है। हैरान परेशान थकी हुई रीना भी बोली हां मैं हूं स्वार्थी। जब सबको मेरा आज तक करा हुआ काम नहीं देखा तो अब दिखेगा मैं तो इसकी उम्मीद भी नहीं कर रही पर मैं स्वार्थी हूं और अभी मैं सिर्फ श्रेया को पढ़ाऊंगी। 

       पाठकगण कृपया कमेंट में बताइए क्या रीना वास्तव में स्वार्थी है?

मधु वशिष्ठ फरीदाबाद हरियाणा 

विषय के अंतर्गत लिखी गई कहानी।

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