भाभी का सम्मान – लतिका पल्लवी

रिश्ते बनाए नहीं जाते है बन जाते है और जो रिश्ता दिल से बन जाता है सही मायने मे वही रिश्ता होता है और वही रिश्ता सही से निभता भी है। आज मै आपको एक ननद -भाभी के रिश्ते की कहानी सुनाती हूँ जो थोड़ा फंतासी लगेगा पर सच के बहुत ही करीब है।

बस कहानी बनाने के लिए मैंने थोड़ा बदलाव किता है। 90 का दशक था। टेलीफोन कुछ घरो मे आ गया था पर सभी के यहाँ नहीं था। मोबाईल तो अभी दूर की कौड़ी थी। रमा के घर मे फोन था जिसमे प्रायः पड़ोसियो के रिश्तेदारों के भी फोन आया करता था। रमा या उसका छोटा भाई  जाकर उन पड़ोसियों को बुला लाते जिसके रिश्तेदार का फोन आया होता था।

रमा के पड़ोस के एक भैया का विवाह हुए अभी कुछ ही दिन हुए थे। बहू रमा की उम्र की थी जिसके कारण रमा का उससे बहुत पटरी बैठता था। वह प्रायः शाम को उनके घर जाती और बहू से गप्प करती।उस दौड़ मे नई बहुए पड़ोस मे नहीं जाती थी इसलिए बहू के मायके से जब भी फोन आता तो रमा जाकर पूछ आती “भाभी आपके मायके से फोन आया है।

आपको कुछ संदेश देना है तो कह दीजिए। मै बोल दूंगी।” इस तरह से रमा की भाभी आरती धीरे धीरे रमा के सामने खुलने लगी और मायके वालो से कुछ भी बोलना होता तो वह बेझिझक रमा को बता देती। फिर रमा उसके मायके वालो को भाभी की कहीं बात फोन पर बता देती थी।

दोनों ननद भाभी का रिश्ता दिन ब दिन प्रगाढ़ होता गया। उनको देखकर कोई कह ही नहीं सकता था कि दोनों अपनी ननद भाभी नहीं है। शायद इतना प्रेम तो ननद भाभी मे होता ही नहीं है। वे दोनों तो बहन, बहन से बढ़कर सहेलियाँ बन गई थी। कुछ वर्षो बाद रमा की पढ़ाई पूरी हो गई तो उसका भी विवाह हो गया और वह अपने ससुराल चली गई पर दोनों मे प्रेम पहले की तरह ही रहा।

रमा जब भी मायके आती तो समान रखकर पहले भाभी से मिलने भागती। रमा की भाभी आरती के विवाह को सात वर्ष हो गए,फिर भी बच्चा नहीं हुआ तब उसकी सास को चिंता हुई।क्योंकि अभी तक तो सभी को समझ थी कि कम उम्र मे विवाह हुआ है तो बच्चा देर से हो सकता है पर जब उस उम्र की सभी बहुओं को बच्चा हो गया तो आरती की सास को भी चिंता हुई। चुकी पहले लोग डॉक्टर के पास जल्द नहीं जाते थे

इसलिए उसकी सास नें पहले पूजा -पाठ, झाड़फूक आदि का सहारा लिया। इन सब मे भी दो तीन वर्ष बीत गया।जब कुछ रिजल्ट नहीं आया तो थककर आरती की सास उसे डॉक्टर के पास ले गई। डॉक्टर नें सभी जांच करने के बाद बताया कि आरती को बच्चा नहीं हो सकता है उसके शरीर मे अंदरूनी इन्फेक्शन के कारण कुछ समस्या आ गई है। यह कोई बहुत अजुबा बात नहीं थी।

तब लोग माहवारी के वक़्त साफ सफाई पर ध्यान नहीं रखते थे और गंदे कपड़ो के इस्तेमाल से इन्फेक्शन होने का खतरा रहता ही है। आरती पर तो जैसे बिजली ही टूट पड़ी। अभी तक तो वह बच्चा नहीं होने के कारण ही दुखी थी पर एक आशा तो थी पर अब तो वह भी टूट गई थी। यह दुख सिर्फ आरती की नहीं थी यह तो उसके पति और सास का भी दुख था। आरती के पास समस्या का समाधान नहीं था पर उनके पास था और उन्होंने किया भी।

कुछ दिनों बाद उन्होंने एक गरीब घर की लड़की देखकर चोरी छुपे आरती के पति की दूसरी शादी करवा दी।आरती अभी एक सदमा से नहीं उबरी थी कि उसे दूसरा सदमा भी दे दिया।आरती के दुख को सुनकर रमा बहुत दुखी हुई और उसने आरती को ढाढ़स बधाया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपने भाभी का दुख कैसे कम करे।एक वर्ष तक तो सब सही रहा पर जब दूसरी बहू को बच्चा हो गया तो आरती का ससुराल मे जीना दुश्वर हो गया।

उसके कष्ट को देखकर उसका भाई उसे लेकर मायके आ गया। आरती के मायके जाने के कुछ महीने बाद रमा अपने भाई के विवाह मे अपने मायके आई तो अपनी माँ के मना करने के बावजूद आरती से मिलने उसके मायके  गई। फोन पर बात करना और सामने मिलने मे बहुत अंतर होता है आरती को देखकर लग रहा था कि जैसे वह वर्षो से बीमार हो। उसकी स्थिति देखकर रमा के आँखो मे आँसू आ गए।

दोनों सहेलियाँ गले मिलकर खूब रोइ जैसे वर्षो का बाँध टूट पड़ा हो। रमा नें आरती से कहा भाभी तुम मेरे घर चलो। आरती के मना करने पर रमा नें बहुत समझाया और कहा भाभी बेटी जब आठ दिन के लिए आती है तो पलकों पर रहती है पर वही बेटी जब हमेशा के लिए आ जाए तो बोझ बन जाती है।

ससुराल मे तो फिर भी हर परिस्थिति मे हक रहता है पर मायके मे वह भी नहीं होता है। आरती नें जब अपने परिवार की इज्जत की बात कहीं तब रमा नें कहा भाभी आज के समय मे तुम दोनों घर के लिए बोझ बन गई हो।लेकिन वे यह स्वीकार भी नहीं सकते है।

इसलिए तुम मेरे घर चलो। मै वहाँ तुम्हे सिलाई कढ़ाई सीखा दूंगी। बड़ा शहर है काम की कमी नहीं होंगी। हम यहाँ किसी से कुछ नहीं कहेंगे। भाई के विवाह के बाद मै गाड़ी लेकर आउंगी और तुमको ले जाउंगी किसी को कुछ बताना मत। कुछ दिन सभी रोएँगे पर फिर सोचेंगे कि बला टली। पूछने पर सम्मान के नाम पर जाने नहीं देंगे।

इसतरह रमा आरती को अपने साथ लेकर दिल्ली आ गई। रमा नें कहा दीदी मै बाहर कोई काम नहीं करूंगी। आपके घर के सारे काम करूंगी। पिछले जन्म मे तो पता नहीं क्या चूक हुई थी जो यह दिन देखना पड़ रहा है। अब मै सोचूंगी की ननद और भांजा-भांजी की सेवा कर के कुछ पुण्य कमा लू।

आप भी बस इसके बदले दो रोटी खिला देना। रमा नें ज्यादा जोर नहीं डाला। आरती घर के सारे काम कर देती। रमा के मना करने पर भी नहीं मानती थी। कहती बस भाभी का सम्मान बनाए रखना। रमा के पति इंजिनियर थे और विदेश मे रहते थे चार पांच महीना पर कभी उनका घर आना होता था। समय व्यतीत होते होते चार वर्ष और बीत गया।आरती के आने के बाद रमा नें भी नौकरी ज्वॉइन कर लिया था,

क्योंकि आरती बच्चो को अपने बच्चो के समान प्यार और देखभाल करती थी। बच्चे भी उसे बहुत प्यार करते और मामी मामी कहते नहीं थकते थे।सब अच्छा चल रहा था फिर भी आरती को देखकर रमा दुखी रहती। उसे लगता जैसे उसने अपनी भाभी को आया बना दिया है। रमा के पति जब भी छुट्टी मे आते तब उनका अपने दोस्तों के साथ सपरिवार घूमने का प्रोग्राम बनता था।

उनका एक बिजनेस मैन दोस्त अनिल था। उससे उनकी गहरी छनती थी। अनिल के दो बच्चे थे पर उनकी पत्नी की मृत्यु हो गई थी।उम्र चालीस के आस पास ही था पर अनिल घर मे सबसे बड़े थे। छोटे तीन भाई बहनो का विवाह हो गया था। सभी अपने परिवार मे व्यस्त थे इसलिए शायद जब अनिल की पत्नी का देहांत हुआ तो उन्होंने भाई की दूसरी शादी के बारे मे नहीं सोचा।

छुट्टी मे जब रमा के पति घर आए तो अनिल और उनके बच्चो के साथ बाहर खाने का प्रोग्राम बना पर अचानक ही रमा के पति की तबियत थोड़ी खराब हो गई। बच्चो का मन रखने के लिए रमा नें अनिल और उनके बच्चो को घर पर ही खाने पर बुला लिया। आरती खाना बहुत ही अच्छा बनाती थी।

खाना खाते ही अनिल नें कहा भाभी जी आपकी खाना बनाने वाली तो बहुत ही अच्छी है क्या शानदार खाना बनाया है। खाकर मज़ा आ गया। थैंक्स यार बीमार पड़ने के लिए। इस तरह से उन्होंने खाने की खूब तारीफ की और कहा भाभी अपनी कामवाली को मेरे घर भी खाना बनाने के लिए बोल दीजिए ना।

उनकी बात को सुनकर रमा के मन मे अचानक एक ख्याल आया और उसने कहा आपके घर चली तो जाएगी पर उसे आपको विवाह करके ले जाना होगा। रमा की बात सुनकर अनिल अचानक चुप हो गए। रमा के पति नें कहा यह कैसा मजाक है? मज़ाक नहीं है रमा नें कहा।

भाभी आप क्या कह रही है? अनिल नें पूछा। बात को संभालने के उदेश्य से रमा के पति नें कहा अरे कामवाली नहीं है। इनकी भाभी नें खाना बनाया है इसलिए शायद रमा को बुरा लग गया। अच्छा, सॉरी भाभी अनिल नें माफ़ी मांगते हुए कहा। माफ़ी की कोई बात नहीं है। मै सीरियस हूँ इस मुद्दे पर रमा नें अपनी बात फिर दोहराई और आरती के साथ हुए सभी घटना को बता दिया। रमा नें कहा भाभी बहुत ही बड़े घर की बेटी और बहू है।आप चाहे तो पता लगा सकते है।

फिर यह भी बताया कि जब भाभी यहाँ आई थी तो मैंने उनका अकाउंट खुलवा कर कुछ पैसे देने चाहे तब भाभी नें कहा था कि दीदी भाभी ही रहने दो कामवाली मत बनाइये। सोचिये इनकी सोच कितनी ऊँची है। आप इस विषय मे सोचियेगा जरूर और यदि सही लगे तो कल अपनी माता जी को लेकर आइएगा।अभी मै आपको भाभी से मिलवा देती हूँ. यह कह कर रमा नें आरती और अनिल का आपस मे परिचय करवा दिया।

अनिल घर जाकर पूरी रात आरती के विषय मे सोचता रहा।आरती देखने मे भी ठीक थी। उसनें जब अपने मन को टटोला तब उसे महसूस हुआ कि पत्नी की जरूरत तो उसे बहु है और आरती को भी पति की जरूरत है।इसलिए यह रिश्ता सही ही रहेगा। आरती को बच्चा नहीं हो सकता है इसलिए वह मेरे बच्चो को भी प्यार करेगी।अगले सुबह वह अपनी माता जी के साथ रमा के घर आया।

उसकी माताजी आरती से मिली।उसके रूप गुण को देख सुनकर प्रभावित हुई और पूछा तुम्हे यह रिश्ता पसंद है। रमा नें रात मे ही आरती को सब बात बता दिया था क्योंकि उसे पूरा विश्वास था कि कल अनिल माताजी के साथ आएंगे। आरती नें कहा दीदी मेरे लिए जो भी फैसला लेंगी मुझे वह स्वीकार होगा। बात पक्की हो गई। आज जाकर रमा के मन को चैन मिला। वह आज बहुत खुश थी। उसने आज अपनी भाभी को भाभी का सम्मान दिलाने मे कामयाबी पा ली थी।

विषय -एक रिश्ता ऐसा भी 

लतिका पल्लवी 

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