साथ का रिश्ता – शुभ्रा बैनर्जी

हां सास है वे मेरी,मां नहीं।बहू हूं मैं पर बेटी नहीं।ना उन्होंने मुझे जन्म दिया,ना मैं उनकी गोद में खेली।आज पैंतीस सालों से लगातार साथ रहते-रहते हम ,सास-बहू के बीच एक अनोखा  रिश्ता बन‌ चुका है।यह रिश्तों का बंधन दुनिया को समझ नहीं आता,क्योंकि यह खून का नहीं।

पैंतीस साल पहले इस घर में अपने इकलौते बेटे की दुल्हन बनाकर वही लाईं थीं।दहेज में‌ मिली थी बस, एक पढ़ी लिखी सुंदर और सुशील‌ बहू। मुंहदिखाई वाले दिन‌ अपनी बहू की इतनी प्रशंसा की उन्होंने,

कि आस-पड़ोस की औरतें तो यह भी कहने से नहीं चूकीं कि “हां-हां, नया गुड़ ढेर महकता है, जब पुराना होने लगता है‌, तब न पता चलता है कि ई तो खराब हो गया है।फेंक देना चाहिए।” 

सुमित्रा जी ने सबकी बोलती बंद कर दी थी यह कहकर कि”लाखों में एक लड़की ढूंढ़ कर लाई हुं अपने इकलौते बेटे के लिए।इसकी आंखें तो देखो तुम लोग।कहीं कोई छल कपट दिखता है तुम लोगों को?हंसी कितनी निश्छल है,सादगी से भरी हुई।यह इस परिवार का हमेशा ख्याल रखेगी मेरी बहू। पढ़ी-लिखी है,

अपने बच्चों को सही‌ अनुशासन सिखा‌ सकेगी।मैं तो अपना सब कुछ लुटा दूं‌ इसकी मोहक मुस्कान पर।यह एक अकेली सौ दहेज के बराबर है।हम क्या कंगाल हैं , जो बेटी जैसी अमूल्य निधि के साथ दहेज भी मांगें।उसी दिन से सास से दोस्ती हो गई थी।

ससुराल में वे पहली प्राणी थीं, जिन्होंने नव्या को दिल से अपनाया था।यह बात नव्या कभी नहीं भूल सकती थी।नव्या के प्रति उनका लगाव, परिवार के अन्य सदस्यों के लिए सामान्य नहीं था।रिश्तेदारों से भरे घर में बेटे-बहू को सामीप्य नहीं मिल पा रहा था , तो उन्होंने ही हनीमून ट्रिप प्लान किया था।

सुबह अपने बेटे(रोनित)को बुलाकर कहा”तुम दोनों को कहीं घूम आओ जाकर।मेरे लिए एक पोते या पोती की मन्नत लगा कर आना।” मन तो था रोनित का भी, पर घर में उपस्थित सभी रिश्तेदारों के बारे में सोचकर बोल नहीं पा रहा था।मां की मंजूरी मिल चुकी थी, अब तैयारी करके ट्रेन में बैठ ही गए।और‌ इन‌ सबका सारा श्रेय जाता है मेरे पति , रोनित की मां का।

रोनित अपने माता-पिता से बहुत प्यार करते थे,बाकी बेटों की तरह,और यह सामान्य भी था ।खून का रिश्ता था उन‌ सबके साथ।

पर शादी के बाद से ही रोनित से ज्यादा मां नव्या की हो गई।बच्चे होने के बाद‌ से पूरी परवरिश उन्होंने ही की दोनों की।ऐसा नहीं कि उन्हें अपनी बहू से शिकायत नहीं थी।हर सास की तरह वो भी अपनी बेटियों से बहू की बुराई करतीं,और अधिकतर पकड़ी जातीं।

नव्या स्कूल से आकर जब उनसे पूछती कि बेटियों का फोन आया था क्या मां?वो बड़ी सहजता से हां कह देतीं।नव्या भी उन्हें छेड़ने के लिए पूछती” तो बुराई की या नहीं मेरी?गलत समय पर तो नहीं आ गई ना मैं?”वो शांत होकर जवाब भी देखतीं” अब मुझे क्या जरूरत पड़ी है तुम्हारी बुराई करने की?ऐसे ही खोज-खबर ले ली सबकी।पूछकर देखना कभी अपनी ननदों से,जो की हो मैंने बुराई।

“नव्या भी मुस्कुराते हुए कहती” नहीं कभी नहीं।दोनों की इसी जुगलबंदी में जाने पैंतीस साल कैसे बीत गए?नव्या भी थी तो औरत ही ना। कभी-कभी बहुत गुस्सा भी आता उन पर।इतने सालों में गिनकर दो या तीन बार ही गई होंगीं बेटियों के घर।कुछ दिन रुकने की योजना बनाकर समयावधि के पहले ही आ जातीं थीं वो हमेशा।दस साल पहले आखिरी बार गईं थीं बेटियों के पास वो।

बड़ी मुश्किल से एक महीने रुक पाईं।आते ही एक ही बात कही थी उन्होंने” अब मुझे किसी के घर मत भेजना तुम।मुझे कहीं अच्छा नहीं लगता।पोते को देखे बिना मुझे चैन ही नहीं मिलता।”नव्या उनकी अनकही पीड़ा तब भी समझ जाती थी। बुढ़ापे में मां भला किस काम की?उनकी पुरानी आदतें जो आज तक अनवरत जारी हैं,

वो शायद बेटियों को मजबूरी लगता होगा।मां है ना,अपने मुंह से कभी अपनी औलाद की बुराई थोड़े करेंगी।हर बार बेटियों को कवच पहनाना आता था उन्हें।किसी के पूछने पर यह कहना भी नहीं भूलतीं कि,”दोनों बेटियां अपने घर ले जाने के लिए बहुत कहतीं हैं,

पर मैं क्यों दामाद के घर जाकर रहूं?ये मेरे बेटे का घर है।अब वो नहीं है तो क्या हुआ,मेरा पोता है ,बहू है।” यही झूठ नव्या को खलता।कभी तो नहीं सुना उसने किसी को उन्हें साथ ले जाने की बात कहते हुए।

अब समय बीतने के साथ-साथ नव्या शायद उनके कहीं और ना जाने का कारण अच्छी तरह समझ पा रही है।इतने सालों से अपने वजूद को बिना बदले, अपने घर में रहना ही सबसे बड़ा सुख है।चाहे बेटी हो या कोई और रिश्तेदार,वहां उनकी सुविधा के हिसाब से ही रहना पड़ता है।

उम्र नव्या की भी बढ़ रही थी,सास की तरह।उनके प्रति एक अटूट बंधन बंध चुका था उसका।आइसक्रीम हो या टॉफी,बिना उन्हें दिए कभी नहीं खाया था नव्या ने।उनकी एक-एक जरूरत का ख्याल रखती थी।वो शायद सामने कभी तारीफ ना करतीं हों,पर आत्मा से आशीर्वाद जरूर देती होंगीं।

अचानक फिर से नव्या के मन में पुराना दुख उभर आया।छोटी ननद की बेटी की शादी तय हुई थी।एक साल पहले ही ननद और उसकी बेटी जब आए थे,तभी भांजी ने पूछा था” तुम आओगी ना मामी मेरी शादी में?बहाना बनाने से काम नहीं चलेगा।मामा अब नहीं हैं, तुम्हें उनकी जिम्मेदारी भी निभानी है।

हम बैचलर पार्टी करेंगे।तुम क्या पहनोगी? वैस्टर्न पहनना पड़ेगा,समझ गई ना।”और भी बहुत कुछ बोल रही थी वह।नव्या की लाड़ली थी भांजी।पता नहीं क्यों नव्या का मन उदासीन हो गया। इन बीते सालों में बहुत सारे आयोजनों में नहीं जा पाई थी,नव्या बूढ़े सास-ससुर को छोड़कर।

यहां तक कि निकटतम रिश्तेदारों के यहां भी नहीं जा पाई थी।भांजी की बात सुनकर वही पुराना दर्द आंखों से निकलने लगा,और बोल दिया उसने”नहीं थे!मुझे नहीं लगता कि उतनी दूर मैं आ पाऊंगी।दो दिन के सफर में तेरी नानी को लेकर जाना मामूली बात तो नहीं।

ट्रेन में बाथरूम की परेशानी होगी उन्हें।पैर पूरा मुड़ता नहीं, ऑपरेशन के बाद से।दो बार दिन में इंसुलिन देना पड़ता है।तू ही बता,मेरी भी तो उम्र हो रही है।उनको इतनी दूर इतनी मशक्कत करके लाऊं,और तीन चार दिन बाद फिर वापस लाऊं?मेरे बस का नहीं है रे।”भांजी ने उदास होकर कहा” अरे!ऐसे कैसे?इकलौती भांजी हूं मैं,और तुम इकलौती मामी।तुम्हारे बिना मैं शादी ही नहीं करूंगी।”

भांजी की बात पर मुस्कुरा उठी थी नव्या।”अच्छा!!!!!!मामी के बिना शादी नहीं करेगी।क्या गजब की बात बोली तू।देखूंगी मैं भी, लड़का तो मिले तुझे पहले।” उसने भी तपाक से कहा”साल भर के अंदर शादी कर लूंगी मैं,देखना।अब तुम यह बताओ,कि अगर मैं नानी को पहले लेकर चली जाऊं,तब तो आओगी ना तुम?तब तो कोई दिक्कत नहीं रहेगी ना?” नव्या ने कहा”तू तो ले जाएगी तब ना,जब नानी जाए।वो बिना मेरे साथ कहीं नहीं जाएंगी,जानती हूं मैं।”

बात आई गई हो गई। दुर्गा पूजा के समय ही खबर मिली कि,भांजी की शादी तय हो गई है।फ़रवरी में है तारीख।भांजी ने अपना वादा पूरा करते हुए रिजर्वेशन भी करवा लिया था जनवरी में।मां के साथ आकर नानी को ले जाएगी।छोटी ननद ने जैसे ही यह खबर मां को सुनाई,मानो उनका मन बुझ गया।जाना तो चाहती थीं वो,पर एक महीने पहले नहीं।इस बार छोटी बेटी और नवासी ने समझाया कि घर की पहली शादी है।उन्हें रुकना ही पड़ेगा।अब तो मां धर्म संकट में पड़ गईं।नव्या की अनुपस्थिति में काम वाली बाई के पास लगभग रोज ही कहतीं कि,उन्हें इतने दिनों के लिए नहीं रहना बेटी के घर।बहू और पोते के साथ ही जाने का मन था उनका।यहां बेटी हर हफ्ते फोन पर उन्हें याद दिलाती कि जनवरी में आएगी बेटी को लेकर,ले जाने।

नव्या से उन्होंने खुलकर कभी नहीं कहा कि वह जाना नहीं चाहतीं एक महीने पहले,पर उनके मनोभाव नव्या से छिपे नहीं थे।इतने साल से साथ में थे दोनों।किस को क्या पसंद है,क्या नहीं?दोनों अच्छी तरह जानते थे।आखिर में तय यही हुआ कि,वे एक महीने पहले बेटी -नवासी के साथ जाएंगी।शादी के चार दिन पहले नव्या अपने बेटे के साथ आएगी,और लौटते समय मां को साथ लेकर आ जाएगी।

सास-बहू के अभिशप्त संबंधों को दरकिनार कर नव्या ने अब उनका मन पढ़ना शुरू किया।ख़ुद ही सोचने लगी,कि मजबूरी में जाएंगीं मां।उसकी भी तो उम्र हो रही है,यही सब यदि उसके साथ भी हुआ तब?

नव्या का बेटा,जो अब नौकरी कर रहा था शुरू से इस योजना के खिलाफ था।उसे दादी का शादी वाले घर में इतने दिन पहले जाना पसंद नहीं था।कई बार‌ कहा भी उसने कि दादी को परेशानी होगी।बुआ को बुरा लगेगा,सोचकर उनसे कुछ नहीं कह पा रहा था।अभी शायद ईश्वर की निर्णायक भूमिका शेष थी।नव्या के बेटे ने बताया कि उसकी डिपार्टमेंटल परीक्षा फरवरी में हो सकती है।तारीख लगभग शादी वाले समय के आसपास हो सकती है।अभी शत-प्रतिशत नहीं कहा जा सकता,पर होगी फरवरी के आखिर में ही।अब नव्या के बेटे ने अपनी सोच सामने रखी।यदि उसकी परीक्षा उसी समय हुई,तो स्वाभाविक है वह नहीं जा पाएगा शादी में।नव्या को अकेले जाना पड़ सकता है।लौटते समय अकेले दादी को लेकर आना असंभव होगा।

नव्या को अब पूर्ण विश्वास हो चुका था ,मां की आत्मा की आवाज का असर है यह।उसकी पुरानी पीड़ाओं के ऊपर मानो संबंधों की मजबूती भारी पड़ गई।रात को ही ननद को फोन कर बता दिया,भतीजे की परीक्षा की बात।विदित था कि उसे अच्छा नहीं लगेगा।उसने भी हताश होकर कहा कि रिजर्वेशन कैंसिल करवा देगी यहां आने का।फोन कर के उसी ने मां को बता भी दिया अगले दिन।

स्कूल से लौटते ही बहू को उल्लास के साथ बताने बैठी एक सास “सुधा का फोन आया था।बता रही थी नहीं आएगी।नाती अगर जा नहीं पाएगा,तो मुझे कौन लेकर आएगा?देखा तुमने बहू,ईश्वर की इच्छा।एक महीने पहले चली जाऊं,ये वो भी नहीं चाहते।मुझे तो लगता है,परीक्षा शादी से पहले ही हो जाएगी।तब हम तीनों साथ में चलेंगे शादी में,साथ ही लौट आएंगे।तत्काल में भी तो हो सकता है ना रिजर्वेशन?तुम चिंता मत करना।ना ही तुम्हें मुझे यहां छोड़कर जाना पड़ेगा,और ना ही अकेले लाना पड़ेगा।तुम्हारी भांजी का मन भी रह जाएगा और——” 

“और तुम्हारा भी ना?” नव्या ने जैसे ही कहा,वे मुस्करा उठी।नव्या भी अब निश्चिंत हो गई।जाएगी शादी में तो लेकर ही जाएगी,नहीं तो नहीं जाएगी और क्या?ये कैसे अनोखे रिश्ते में बांध दिया भगवान ने?इतने सालों से उनके कहीं और ना जाने की बात पर तकलीफ होती थी,अब उनके जाने से खुश नहीं हो पा रही थी वह।

शुभ्रा बैनर्जी 

#एक रिश्ता ऐसा भी

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