रेशम के धागे – रवीन्द्र कान्त त्यागी

“ग्रेवाल साहब से मिलना है” केबिन के बाहर से किसी नारी का स्वर सुनाई दिया।

“ग्रेवाल साहब तो… अब यहाँ दीक्षित सर देखते हैं।“ रिसेप्सनिस्ट ने उत्तर दिया।

एक दंपति ने मेरे केबिन में प्रवेश किया। कुछ पल तो एक फाइल में उलझा रहा। फिर गर्दन उठाई तो सामने हमारे कौलेज की सब से चर्चित सौंदर्य प्रतिमा मेरी सहपाठी रम्या खड़ी थी।

“ओ माय गौड़। व्हाट अ प्लाजेंट सरप्राइज़। आफ्टर ए लॉन्ग टाइम रम्या। ओह अभय भी है। अरे बैठो बैठो यार। बड़ी खुशी हुई आप दोनों से मिलकर बट… तुम लोग यहाँ अपेक्षित नहीं थे। वकील के केबिन में। हा हा !”

“मगर ये तो मिस्टर ग्रेवाल की फर्म… तुम यहाँ क्या कर रहे हो बदमाश।“ अभय ने उदास से चेहरे पर हल्की सी मुस्कान लाते हुए कहा।

“वो मेरे स्वसुर साहब होते थे अभय। अब नहीं हैं। खैर। इतने बरस बाद मिले हो। कोई खराब खबर मत सुनाना प्लीज। सब ठीक तो है न। वकील के पास कोई ऐसे ही तो आता नहीं।”

“अबे साले, डाइवोर्स लेने आए हैं तेरे पास। अभय ने उसी कॉलेज वाली बेबाकी से कहा।”

मैंने नजरें घुमाकर रम्या के उदास चेहरे की ओर सवालिया निगाह से देखा। कई पल उसकी नजरें झुकी रहीं। फिर उसने धीरे से कहा “आज यही कड़बी सच्चाई है यार इस दस साल पुराने रिश्ते की। हम ने दरार को भरने का बहुत प्रयास किया रजत मगर…।”

“आमा छोड़ो यार। ये मिया बीवी को टूटते बिगड़ते सम्बन्धों की दुख भारी दास्तां सुनते सुनते पक गया हूँ। पहले ये बताओ खाओगे क्या।“

“अबे कंजूस, कॉलेज में तो कभी जेब में हाथ डालता नहीं था। हा हा हा। अच्छा चल आज वही मांगा ले अपने जमाने के मिर्ची बड़े और कोफ्ते। थोड़ा दूर है झुमरू की दुकान मगर…।”

“अरे लद गए जमाने दूर पास के। अब तो स्वीगी और जमैटो है न। बस एक फोन। देख यार, वो वक्त तो कब का पीछे छूट गया। मगर कभी कभी बड़ी याद आती है कॉलेज के दोस्तों की।”

“अब छोड़ यार। गुजरा जमाना क्या वापस आता है। बस यादें हैं। खैर… बात दरअसल ये है कि… हम दोनों…।” अभय ने बात को गंभीरता की ओर मोड़ना चाहा था।

“अरे ये झुमरू अभी भी वैसे ही पकौड़े बनाता है। अब तक तो मर खप गया होगा। मैंने तो बड़े दिन से खाये नहीं। अच्छा आइसक्रीम भी मंगा लेता हूँ। मुझे भी भूख लगी है।” मैंने उदास बैठी रम्या की ओर एक उचटती सी निगाह डालकर कहा। उसने कोई उत्तर नहीं दिया।

“तुझे याद है अभय, एक बार तू गर्ल्स हौस्टल में घुस गया था और पकड़ा गया। जब तू पिट रहा था तो बाहर तेरा इंतजार करते हम तीनों दोस्त भी तुझे बचाने जा घुसे थे। फिर हम चारों की खूब धुनाई हुई। हा हा हा।”

“अबे डरपोक। तूने तो वार्डन मैडम के पाँव ही पकड़ लिए थे। हमें पुलिस में मत देना प्लीज।” अभय ने चिड़ाते हुए कहा।

“बाद में मैडम सब लड़कियों से पूछती रहीं कि किसके लिए आए थे ये बदमाश।” रम्या ने थोड़ा सहज  होकर कहा।

“किसी लड़की को पता ही नहीं होगा?”

“अरे सब को पता था अभय। इन आशिक महोदय के तो पूरे कॉलेज में चर्चे थे।”

“सही कहा तुम ने। कॉलेज का आशिक नंबर वन। हम चारों दोस्त किसी भी विषय पर बात करें। घूमा फिरकार इसकी एक ही बात रहती थी। रम्या ऐसी है। रम्या वैसी है। उसकी आँखें… माथे पर बिखरी लटें। रम्या की सौम्य मुस्कान। उसकी गंभीरता। उसके चेहरे पर चरित्र के उच्च मापदंड की आभा। ऐसी लड़की जिंदगी में आ जाए तो जीवन स्वर्ग ही बन जाएगा यारो।”

रम्या ने कनखियों से अभय की ओर देखा।

“फिर मैंने ही बीड़ा उठाया तुम्हारी मुलाक़ात कराने का।”

“क्यूँ… तुम ने क्यूँ?

“अरे रजत यार था अपना! और फिर उसकी मुहब्बत में आग ही इतनी थी कि… कभी कभी तो लगता कि तुम्हारे लिए सारी कायनात को जलाकर राख कर देगा या क्या पता खुद को ही…।

“मगर आज हम दोनों तुम्हारे पास…।”

“अब इतने बरस बाद तुम्हें क्या बताऊँ रम्या। उसकी डायरी तुम्हारी आशिक़ी से भारी रहती थी। जमाना अलग था। जब सारे प्रयास करने के बाद भी तुम से एक मुलाक़ात तक नहीं हो पा रही थी तो विक्षिप्त सा हो गया लल्लू लाल। अकेल बैठा कभी हंसने लगता तो कभी रोने लगता। तब मुझे लगा कि कुछ तो करना पड़ेगा।” मैंने रम्या की बात को बीच में ही काटते हुए कहा।

“और मैं हैल्प नहीं करता था तेरी साले। मल्लिका से मुलाक़ात कराने में। अहसान फरामोश।”

“और छुप छुपकर हमारी बातें भी तो सुनता था। ताकि वही डाइलौग बाद में रम्या को सुना सके।”

“अबे आज सारी ही पोल खोलेगा क्या दुशमन कहीं के। जब तुम मंदिर के पीछे मिलने जाते तो तुम्हारे लिए समोसे और ठंडा भी तो मैं ही भिजवाता था।”

“मल्लिका… मल्लिका ग्रेवाल। ग्रेवाल ही थी न वो। ओह तो ये बात है।” रम्या ने शरारत से मुस्कराते हुए कहा।

“अरे रम्या मेरा तो कुछ नहीं। तुम्हारे आशिक साहब तो एक दिन सब कुछ छोड़ छाड़कर हिमालय पर जाने को तैयार हो गए थे। अपनी किताबें जला डालीं। महंगे कपड़े तक फाड़ दिये। अचानक एक जुनून सा पैदा होता था इसके दिमाग में तुम्हारे लिए। फिर हम सब ने चंदा करके तो इसे किताबें दिलवाई थीं।”

रम्या ने पहली बार अनुराग भरी आँखों से अभय की ओर देखा।

“कॉलेज के अंतिम वर्ष में ही इसके पिताजी ने इसकी शादी की चर्चा छेड़ रखी थी। अरे रईस बाप का इकलौता बेटा था। बड़े बड़े लोग हौस्टल में ही इसे देखने आते। फिर हम यारों की ज़िम्मेदारी होती थी उन्हे निराश करके लौटाने की। कभी हम उसके शराबी होने का ड्रामा करते तो कभी ऐय्याश होने का। उसके कमरे में सिगरेट का धुआं भर देते या दो तीन बोतलें लुड़का देते। हा हा हा। बड़े नाटक करने पड़ते थे यार।

फिर एक दिन रजत के पिताजी आ धमके। बड़े भले और बेटे पर समर्पित इंसान हैं यार।”

“हैं नहीं थे।”

“ओह सौरी। यार मैं तो अगर लेखक होता तो तेरी प्रेम कहानी पर उपन्यास लिखता। कहाँ मिलती है ऐसी मुहब्बत और कहाँ होता है ऐसा सुखद दि एंड। वो फिल्मों में दिखाते हैं न कि प्रेमी प्रेमिका समुद्र के किनारे मरे पड़े हैं या रेत में दब गए।”

दोनों ने पहले कुछ क्रोध से फिर थोड़ा सहज सा होकर एक दूसरे की ओर देखा। तभी एक डिलीवरी बॉय खाने का समान देकर चला गया।

“और बता तेरी ग्रहस्ती कैसी चल रही है रजत। बच्चे वगहरा।” रजत ने स्वाद लेते हुए कहा।

“जबर्दस्त। देखो भाई, सुहाग रात को हमने अपनी अपनी डायरी एक दूसरे को भेंट कीं। इसमें एक दूसरे के लिए आशिक़ाना शायरी और जज़्बात लिखा करते थे। ये हम दोनों का एक दूसरे के लिए सब से अमूल्य तोहफा था। फिर हम ने तय किया कि आज के बाद जिंदगी में जो भी सुखद पल होगा उसे डायरी में लिखेंगे और जब भी लड़ाई होगी अलग अलग कमरे में बैठकर उसे पढ़ेंगे। कब हम प्यार की गहराई में इतना डूब गए कि उसी रात बेटे का अंकुरण हुआ। वो बीमार हुई तो मैं रात भर जागता रहा और मेरा एक्सीडेंट हुआ तो वो नंगे पाँव दौड़ती हुई हस्पताल में पहुँच गई। वो सब लिखा उस डायरी में। अरे अपनी जिंदगी के समर्पित क्षणों को एक बार याद करके तो देखो। देख भाई, अपना तो ये है कि उसी रात तय कर लिया था। ये जो ईगो नाम की सौतन है न इस को अपने बीच कभी नहीं आने देंगे। लड़ाई होती है मगर फिर दोनों को जल्दी रहती है कि कौन पहले सौरी कहता है। अरे ग्रहस्थि है तो सब चलेगा न। लड़ाई भी होगी और प्यार भी। मगर सुईं धागा साथ रखते हैं। रफू करने को। अरे कोई छोटी मोटी दीवार उग भी आए तो उसे चुप चाप अंधेरे में ही गिरा देना चाहिए कि कोई देख न ले और प्यार बदनाम न हो जाये।”

कुछ पल मौन रहा।

“घर आओ न किसी दिन दोनों। खूब गप्पें मरेंगे। पुराने दिनों को याद करेंगे।” मैंने बातों का फ़्लो बदलते हुए कहा।

“नहीं तुम आओ रजत पहले हमारे यहाँ। बताओ कब आओगे।” रम्या चेहरे पर लौट आई मुस्कान के साथ बोली। जैसे उसने कुछ निश्चय सा कर लिया हो।

“अरे जब तुम बुलाओ। अगले संडे को ही रखते है। अ अ अ अच्छा तुम दोनों किसी काम से तो नहीं आए थे।”

दोनों ने एक दूसरे की ओर देखा। हल्का सा मुस्कराए। “फिर संडे को पक्का न। मल्लिका को लेकर आना।” और दोनों चले गए।

रवीन्द्र कान्त त्यागी

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