रोज की तरह सॉफ्टवेयर इंजीनियर अभय सिंह ने अपने घर आकर गैराज में गाड़ी पार्क की, हाथ मुँह धोये और आराम कुर्सी पर अधलेटे पिताजी के चरण स्पर्श करके उनके बराबर में पड़ी कुर्सी पर बैठ गए.
“पापा, कंपनी मेरा प्रमोशन करके तीन साल के लिए ऑन डैप्युटेशन जर्मनी भेजना चाहती है. मैंने तो मना कर दिया.”
“मना कर दिया. क्यों मना कर दिया भई. ऐसे अवसर क्या बार बार आते हैं….. और प्रमोशन! प्रमोशन के लिए मना कर दिया.” पिता प्रखर सिंह ने किताब से चेहरा बहार निकालकर कहा.
“नहीं पापा. मुझे नहीं जाना आप दोनों को अकेला छोड़कर इतनी दूर. आप की भी तबियत ठीक नहीं रहती और माँ की भी उम्र हो गई है.”
“पागल हो गए हो क्या अभय. नूतन के विकास में पुरातन अवरोध बन जाय, ये प्रकृति के नियमो के प्रतिकूल है बेटा. नव वसंत के आगमन से पहले पुराने मृत पत्तों को झड़ जाना होता है. मृत पत्तों की उर्वरक से नए अंकुर स्फुटित होते हैं. यही कुदरत का कानून है.”
“पापा आप की ये टिपिकल साहित्यिक बातें मेरे पल्ले नहीं पड़तीं. मैं ठहरा विज्ञान का आदमी. मगर इतना जनता हूँ कि आप को अकेला छोड़कर नहीं जाऊँगा. क्या इसलिए आप ने मुझे पैदा किया, पाल पोसकर बड़ा किया, ऊंची शिक्षा दिलवाई, कि आप की वृद्धावस्था में मैं अपना कैरियर बनाने हजारों मील दूर चला जाऊं. क्या इंसान औलाद इसलिए पैदा करता है कि बच्चे स्वार्थ के वशीभूत अपना जीवन संवारते रहें और माता पिता को कोई पानी देने वाला भी न हो.”
“इंसान औलाद किस लिए पैदा करता है! ……. क्या इसलिए कि जब बेटा जवान होकर जीवन में आगे बढ़ने को गतिमान हो तो माँ बाप ‘सिन्दबाद के जिन’ की तरह उसकी पीठ पर सवार होकर पांवों में बेड़ियाँ डाल दें. कोई अविभावक इतना स्वार्थी कैसे हो सकता है. देखो राघव, दुनिया के जितने भी जीव हैं, इंसान को छोड़कर, वो सब भी अपनी संतति उत्पन्न करते हैं. उन्हें पूरा वात्सल्य देते हैं. पालते पोसते हैं. उड़ना, दौड़ना, शिकार करना या तैरना सिखाते हैं और बिना कोई अपेक्षा रखे उन्हें इस दुनिया में अपना जीवन जीने को स्वतन्त्र छोड़ देते हैं. फिर उनसे कोई अपेक्षा नहीं रखते. क्या किसी शेर को शिकार करके अपने बूढ़े बाप को खिलाते देखा है. औलाद पैदा करने के और भी कारण हैं. अपनी नस्ल को आगे बढ़ने की नैसर्गिक इच्छा और वात्सल्य के अमृत से हृदय को तृप्त करने की भावना. कुदरत ने हर जीव मात्र में ये प्रकृति प्रदत्त जैविक इच्छाएं होती हैं. केवल मानव मात्र अपने बच्चों से मृत्यु तक उम्मीद लगाए रहता है.”
“पापा मैं आप का इकलौता बेटा नहीं होता और मेरे जाने के बाद आप की देखभाल करने वाला कोई होता तो मुझे जाने में कोई संकोच नहीं होता… मगर.”
प्रखर सिंह थोड़ा मुस्कराये. फिर बेटे के सर पर हाथ फिराते हुए कहा “इकलौता होना तुम्हारे जीवन के लिए अभिशाप साबित होना चाहिए या वरदान. इकलोता होने पर इस वंश की कीर्ति स्थापित करने के प्रति तुम्हारा दाइत्व और भी बढ़ जाता है. पीछे मुड़कर मत देखो. आगे बढ़ो और कंपनी का आदेश मानकर जीवन की ऊँचाईयों की और एक बड़ा कदम बढ़ाओ. पिता का इतना सम्मान करते हो तो इसे पिता का आदेश भी मान सकते हो.”
अभय ने छोटे बच्चे की तरह पिता के कंधे पर अपना सर टिका दिया.
एक डॉक्टर नियुक्त किया गया जो अभय के माता पिता का हाल जानने रोज घर आएगा. अभय ने इंटरनेट कनेक्शन दुरुस्त कराया और अपना नया लैपटॉप पिता को समर्पित कर दिया ताकि रोज स्काइप पर हालचाल जाना जा सके.
अभय सिंह की विदेश के लिए विदाई के समय घर, दोस्तों और रिश्तेदारों से भरा हुआ था. अभय सिंह एक एक से अपने माता पिता का ख़याल रखने की गुहार लगा रहा था. भारत के माध्यम वर्गीय परिवारों के पास और कुछ हो न हो, एक दूसरे में समन्वय, प्रेम और सुख दुःख का साथ बड़ा अच्छा होता है. उच्च वर्ग में शामिल होते होते इंसान एक भय से घिर जाता है कि कहीं कोई कुछ मांग न ले, मेरी कुलीनता को किसी की नजर न लग जाय. पैसा अपने साथ अकेलापन और कुटिलता लेकर आता है.
सुबह के ग्यारह बजते बजते प्रखर सिंह और उनकी पत्नी नहा धोकर, नाश्ता करके कंप्यूटर ऑन करते. उधर जर्मनी में बेटा लगभग उसी समय बिस्तर छोड़ता और स्काइप पर आ जाता. माता पिता से बात करते हुए ही ब्रश करता, अपने लिए चाय बनता, टोस्टर में टोस्ट गर्म करता, उनपर जैम लगाकर बात करते हुए कुर्कुराता रहता. माता पिता मुग्ध भाव से पुत्र की दैनिक गतिविधियों को निहारते रहते और बीच बीच में बात भी होती रहती थीं और निर्देश भी दिए जाते. “वो टोस्ट जल गया है. उसे छोड़ दो. बिस्तर छोड़ते ही उसे संवारना शुभ होता है” वगैहरा.
अभय ने बताया कि प्रोजेक्ट बहुत महत्वपूर्ण है. इसे बीच में छोड़कर नहीं जाया जा सकता अन्यथा कंपनी ब्लैकलिस्ट कर देगी और कैरियर खराब हो जायेगा. मैं तो चाहता हूँ कि आप भी यहीं आ जाएँ ताकि सब साथ रह सकें किन्तु प्रखर सिंह अपनी मित्र मंडली, मेले त्यौहार, बदलते मौसम के मजे, साहित्य समारोह और देश में रोज होने वाले राजनैतिक तमाशे छोड़कर विदेश जाने को तैयार नहीं थे. पूरी जिंदगी जिस मिट्टी में गुजारी उस से उखड़कर जड़ें कहाँ जम पाएंगी भला. फिर बेटे से आमने सामने रोज होनी वाली बातचीत से पर्याप्त सुकून और निकटता का अहसास मिल जाता था. ऐसा लगता कि वो एकदम घर में ही है.
बेटे को गए आठ महीने गुजर गए. सिंह दम्पति भरसक प्रयास करते कि उनकी किसी परेशानी से पुत्र का ध्यान अपने दुरूह लक्ष्य से विमुख न हो. उसके सामने स्वयं को एकदम प्रसन्न और स्वस्थ दिखाने का प्रयास करते. उसे खाने पीने और समय पर सोने की हिदायतें देते और खूब बतियाते. अभय भी कभी माता पिता की बातों से उकताता नहीं था बल्कि समय निकालकर उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास करता.
बरसात का मौसम अब गुजर रहा था. शहर में बुखार के साथ साथ डेंगू और चिकनगुनिया की भी खबरे आ रही थीं. न जाने किस रोग के मच्छर का विष डंक लगा कि प्रखर सिंह को बुखार ने घेर लिया. ढलती उम्र में थोड़ी सी बीमारी भी आदमी के घुटने तोड़ देती है किन्तु वे चाहते थे की संवेदन शील पुत्र को इसकी खबर नहीं लगनी चाहिए इस लिए बुखार से शरीर तपने के उपरांत भी ठीक समय पर स्वस्थ दिखने के लिए शेव करते. नहाना भी संभव न होता तो धुला कुरता पहनते और बेटे से हंस हंस कर बातें करते. अधिक समय तक उसकी माँ को कंप्यूटर के सामने रखते और इधर उधर कि बातों से गिरते स्वास्थ्य की बात छुपाने का प्रयास करते. “हरी सब्जियां मिल जाती हैं क्या. भारत के रुपये के हिसाब से भिन्डी और गोभी का क्या भाव है. कभी रेस्टोरेंट पर खाना पड़े तो वैजिटेरियन खाना मिल जाता है क्या. फल रोज खाना और दूध जरूर पीना. तेरे रिश्ते के लिए लोग पूछ रहे हैं” इत्यादि लम्बी वार्ताएं.
एक रात को तबियत ज्यादा खराब हो गई तो प्रखर सिंह जी को हस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा.
सुबह के लगभग दस बजे थे. डॉक्टर अभी अभी रूटीन चैकअप करके गया था. ऊपर टंगी बोतल से एक एक बूँद ग्लूकोस नसों में प्रवेश कर रही थी. प्रखर सिंह जी को साँस लेने में थोड़ी दिक्कत हो रही थी इसलिए नर्स ऑक्सीजन लगाकर चली गई. वे आंख बंद किये लेटे थे. पत्नी धीरे धीरे बालों में हाथ फिरा रही थी. लगभग साढ़े दस बजे उन्होंने चौंककर ऑंखें खोलीं और रुग्ण स्वर में कहा “क्या कर रही हो. जल्दी से घर जाओ. अभय का वीडियो कॉल आता ही होगा. कोई नहीं मिलेगा तो उसे शक नहीं हो जायेगा. सुनो, उस से कहना कि मैं बाजार गया हूँ. सब्जी लेने. ‘सरिता’ तुम कॉलेज में रंगमंच करती थीं न. आज तुम्हारे अभिनय की परीक्षा है. उसे कुछ पता नहीं चलना चाहिए कि मैं हॉस्पिटलाइज हूँ. सब काम छोड़कर भागा चला आएगा. कैरियर चौपट कर लेगा बुद्धू कहीं का.”
आठ महीने में ये पहली बार था कि सरिता ने अकेले बेटे से बात कि थी. उन्हें कभी टोंटी बंद करने के बहाने तो कभी ‘गेट पर कोई है’ कहकर बार बार स्क्रीन के आगे से हट जाना पड़ता था. भावनाओं के अतिरेक में बेअदब आंसू अनियंत्रित होकर बह निकलते थे.
शाम के पांच बजे थे. कई मित्र और रिश्तेदार बैड को घेरे खड़े थे. नर्स बुखार नापकर ऊपर टंगे चार्ट में एक सौ चार नोट करके चली गई. थोड़ी ही देर में डॉक्टर रूटीन विजिट करने आये. उन्होंने गंभीरता से चार्ट को पढ़ा और माथे पर सिलवट डालते हुए बोले “आप को अपने बेटे को बुला भेजना चाहिए. क्या पता उसका बिछोह ही आप को भीतर भीतर खाये जा रहा हो. दवाइयां रिएक्ट नहीं कर रही हैं.”
एक सौ चार बुखार में भी प्रखर सिंह तमककर बोले. “क्यों! क्यों बुला लूं उसे. ताकि उसके प्रोजेक्ट में बाधा आ जाय. उसकी जॉब चली जाय. उसका कैरियर खराब हो जाय. इसलिए। पिता हूँ उसका या दुशमन.”
दोस्तों ने समझाया “देखो, परिवार में तुम कुल जमा तीन जीव हो. एक ही बेटा है तुम्हारा. सुख दुःख में भी साथ नहीं रहेगा तो ऐसी नौकरी का क्या फायदा.”
“फायदा! किस का फायदा. मेरा या उसका. मैंने क्या उसे अपना दास बनाने को पैदा किया है. डॉक्टर है वो? जो मुझे आते ही चंगा कर देगा? एक तनिक सी बीमारी से उसके भविष्य के साथ खेल जाऊं.” फिर तनिक गर्व से बोले “सॉफ्टवेयर इंजीनियर है मेरा बेटा. वो भी जर्मनी में. डेपुटेशन का चीफ बनकर गया है. कोई मजदूरी नहीं कर रहा वहां, कि दिहाड़ी तोड़कर भागा चला आएगा.”
“कैसी बातें करते हो प्रखर. तुम बीमार हो. कल को तुम्हे कुछ हो गया तो …… क्या ऐसे समय अपने बेटे को देखना नहीं चाहोगे.”
“रोज तो देखता हूँ लेपटॉप की स्क्रीन पर. उसकी प्रग्रति ही मेरा सुख है. कुछ हो गया तो तुम लोग हो न मेरे पास.” क्षीण स्वर में उन्होंने कहा और आँखें मीच लीं.
अगली सुबह उनकी तबियत और बिगड़ गई. डॉक्टर ने चेतावनी के स्वर में कहा “प्लेटलेट्स गिर रही हैं. हीमोग्लोबीन भी घट गया है. ओक्सीजन सेचुरेशन भी कम है. बुखार उतरने का नाम नहीं ले रहा. डेंगू कन्फर्म है. हमें किसी भी वक्त उन्हें वेंटिलेटर पर लेना पड़ सकता है”.
साढ़े दस बजे थे. उन्होंने धीरे से ऑंखें खोलीं. सरिता की और देखा और अत्यंत कमजोर स्वर में कहा “घर नहीं जाओगी. अभय का कॉल आता ही होगा. उसे पता चल गया तो. उस से कहना कि अचानक मेरे एक दोस्त कि तबियत बिगड़ गई है इसलिए मुझे वहां जाना पड़ा. ये बिलकुल मत बताना की मैं ……. ” और वो हांफने लगे.
“पता चल गया है पापा. मैं आ गया हूँ आप से झगड़ा करने. मैंने कब कहा था कि मुझे छुट्टी भी नहीं मिलेगी. बेटा हूँ आप का. आप के और माँ के हाव भाव देखते देखते बड़ा हुआ हूँ. मुझे पता नहीं चलेगा कि माँ बात करते करते बार बार ऑंखें पोंछ रही थीं.” बोलते बोलते उसक गाला रुंध गया था.
अभय ने बैड पर बैठकर पिता का सर गोद में रख लिया. उस की आँखों से जार जार आंसू बहकर पिता के चहरे को भिगो रहे थे और पिता के आंसू तकिये को.
बेटे के आगमन ने संजीवनी का काम किया. चार दिन बाद अभय पिता को सहारा दिए घर ले जा रहा था. बस उसने एक ही बात कहीं “हम पंछी नहीं है पापा. इंसान हैं. भावनाओं से ओतप्रोत और रिश्तों की डोर से बंधे हुए. जवान ‘शेर’ अपने बूढ़े बाप को शिकार खिलाने नहीं जाता तो बूढा शेर भी अपने पुत्र का हाल जानने को कभी उतावला नहीं होता.”
रवीन्द्र कांत त्यागी