बदलाव – रोनिता कुंडु

“बस बहुत हो गया!”
दहलीज़ पर खड़ी इशिता की आवाज़ में आज पहली बार काँप नहीं, आग थी। हाथ में उसके पुराने सर्टिफिकेट्स की फाइल थी और आँखों में वह चमक, जो वर्षों से भीतर दबाई गई थी। ड्रॉइंग रूम में सब बैठे थे—सास पद्मा देवी, पति नील, ननद सृष्टि, नील के मामा-मामी और दो-तीन रिश्तेदार, जो किसी बहाने आए थे और असल में तमाशा देखने।

पद्मा देवी ने तमतमाकर कहा, “किस बात का तमाशा कर रही हो? घर की बातें घर में रखो, बाहर नहीं। औरत हो, मर्यादा में रहो।”

इशिता ने हल्की-सी हँसी हँसी—पर वह हँसी व्यंग्य नहीं, चोट का जवाब थी। “मर्यादा?” उसने धीरे से कहा, “मर्यादा तो मैंने तब भी निभाई थी जब आपने मेरे हाथों के छींटे देखकर कहा था—‘ये बहू पढ़ी-लिखी है या बस पोछा लगाने आई है?’”

कमरे में सन्नाटा उतर आया। नील ने कुर्सी पर बेचैनी से करवट बदली। सृष्टि ने होंठ दबाए। मामी ने आंखें फेर लीं, मानो कुछ सुना ही नहीं।

पद्मा देवी ने बात पलटनी चाही, “अरे, मैं तो ऐसे ही कह देती हूँ। पर तुम बात का बतंगड़—”

“ऐसे ही कह देती हैं,” इशिता ने वाक्य पूरा किया, “और वही ‘ऐसे ही’ मेरे भीतर रोज़ मरता रहा।”
उसने फाइल टेबल पर रख दी और आगे बढ़कर बोली, “माँजी, आप हमेशा कहती थीं कि पढ़ाई-लिखाई बस दिखावे के लिए है, असली औरत वही जो घर संभाले। फिर आपकी बेटी सृष्टि…

वो तो पूजा-पाठ भी कम करती है, घर का काम तो बिल्कुल नहीं करती, लेकिन उसकी नौकरी पर आपको गर्व होता है। और मैं, जो सुबह पाँच बजे उठकर आपके लिए चाय बनाती, पापा जी की दवा याद रखती, रसोई से लेकर पूजा तक सब संभालती… आप मुझसे शर्मिंदा होती थीं।”

नील ने धीरे से कहा, “इशिता, आज ये सब कहने की जरूरत—”

“जरूरत है नील,” इशिता ने पहली बार उसे नाम लेकर ऐसे पुकारा जैसे वह पति नहीं, एक गवाह हो। “क्योंकि आज तक मैंने चुप रहकर सबको आदत डाल दी थी कि मैं सह लूँगी।”

पद्मा देवी ने ताना मारा, “तो अब क्या? नौकरी चाहिए तुम्हें? घर छोड़कर भाग जाओगी?”

इशिता ने सिर हिलाया। “मैं भाग नहीं रही। मैं लौट रही हूँ—अपने उस हिस्से की तरफ, जो मैंने आपकी ‘इज्ज़त’ के नाम पर दफना दिया।”
उसने सांस लेकर कहा, “आपको याद है, जब आपकी सहेली आई थीं और उन्होंने सृष्टि की तारीफ की थी कि ‘आजकल लड़कियाँ कमाने लगीं तो हर काम के लिए नौकर मिल ही जाते हैं’? आपने तब मेरी तरफ देखकर कहा था—‘हमारी बहू तो… बस घर में ही सिमटकर रह गई।’”

कमरे में बैठे रिश्तेदारों की आँखें एक-दूसरे से बचने लगीं। क्योंकि ‘बस घर में सिमटकर’ कहना साधारण वाक्य नहीं था—वह वाक्य किसी के सपनों पर ठप्पा था।

इशिता ने उसी पल धीरे-धीरे अपनी बात रखी, “उस दिन मैंने तय किया था—जब मेरा काम नौकर भी कर सकता है, तो मेरे सपनों की कुर्बानी क्यों? मैं अपने अधूरे सपनों को पूरा करूँगी। आपके उस अपमान ने मेरे लिए वरदान का काम किया… क्योंकि पहली बार मुझे समझ आया कि घर जितना भी संभाल लो, अगर तुम्हारी पहचान खुद तुम्हारे पास न हो, तो तुम्हें कभी पूरा सम्मान नहीं मिलेगा।”

नील ने यह सुनकर गहरी सांस ली। उसे आज पहली बार एहसास हुआ कि इशिता के ‘सब ठीक है’ के पीछे कितना कुछ टूटा पड़ा था।

मामी ने धीरे से कहा, “बेटा… घर टूट जाएगा इस तरह की जिद में।”

इशिता ने शांत स्वर में जवाब दिया, “घर टूटता नहीं है मामी… घर तब टूटता है जब किसी एक इंसान को तोड़कर उसे घर कहा जाए।”

पद्मा देवी ने अपनी कुर्सी पर खिसकते हुए कहा, “तो क्या करोगी अब? कौन सा तीर मारोगी?”

इशिता ने मुस्कुराकर कहा, “तीर नहीं… अपना रास्ता।”
फिर उसने फाइल खोलकर सबसे ऊपर वाला प्रमाणपत्र निकाला। “ये देखिए—एम.ए. था मेरा। और ये”—उसने दूसरा पन्ना निकाला—“यूजीसी नेट की तैयारी के नोट्स। मैंने सब छोड़ दिया था, क्योंकि आप कहती थीं—‘इतना पढ़-लिखकर क्या करोगी? घर की रोटियाँ कौन बनाएगा?’”

नील ने पहली बार रुककर पूछा, “तुमने मुझे कभी बताया क्यों नहीं कि तुम्हारी तैयारी—”

“क्योंकि तुम भी वही सुनते थे जो घर सुनना चाहता था,” इशिता ने बिना कटुता के कहा। “तुम ‘मेरी’ बात सुनने के लिए कभी रुके ही नहीं।”

कमरा फिर से शांत हो गया। बाहर गली में बच्चों के खेलने की आवाज़ आ रही थी, और भीतर एक औरत अपने भीतर की दुनिया की लड़ाई लड़ रही थी।

इशिता ने बहुत स्थिर होकर कहा, “आज से मैं एक कोचिंग जॉइन कर रही हूँ। हाँ, फीस लगेगी। हाँ, समय लगेगा। हाँ, घर के कुछ काम बंटेंगे। और अगर जरूरत पड़ी तो हम घरेलू सहायिका रखेंगे—क्योंकि आप ही तो कहती थीं कि कमाने पर नौकर मिल जाते हैं। मैं कमाने जा रही हूँ, माँजी। और अपने सपनों की कीमत खुद चुकाऊँगी।”

पद्मा देवी का चेहरा लाल हुआ, “मेरे घर में रहकर मेरी मर्जी के बिना—”

“माँजी,” इशिता ने पहली बार बहुत विनम्र लेकिन दृढ़ होकर कहा, “ये घर आपका है, लेकिन ये जिंदगी मेरी है। और मैं आपकी अनुमति के लिए पैदा नहीं हुई हूँ।”

नील की आँखें भर आईं। वह अचानक समझ गया कि जिस ‘अच्छी बहू’ पर वह गर्व करता रहा, वह असल में एक ‘चुप लड़की’ थी जिसे उसने भी चुप रहने दिया।

सृष्टि, जो अब तक शांत बैठी थी, अचानक बोली, “माँ… इशिता भाभी सही कह रही हैं। आप मेरी नौकरी पर गर्व करती हैं, तो भाभी की पढ़ाई पर क्यों नहीं?”

पद्मा देवी हकबका गईं। बेटी की जुबान से ‘सही’ सुनना उन्हें चुभा।

रात तक घर में चर्चा चलती रही। कोई इशिता को “जिद्दी” कह रहा था, कोई “जागृत”। नील ने किसी से कुछ नहीं कहा। जब सब चले गए, वह इशिता के पास आया।
“मैंने तुम्हें कभी रोका नहीं… पर शायद मैंने तुम्हारा साथ भी नहीं दिया,” उसने धीमे से कहा।

इशिता ने उसकी तरफ देखा—“साथ देने का मतलब सिर्फ ‘रोकना नहीं’ होता नील। साथ देने का मतलब है—किसी के सपने को अपना समझना।”

नील ने सिर झुकाया। “मैं कोशिश करूँगा।”

अगले हफ्ते इशिता ने कोचिंग जॉइन कर ली। सुबह वह जल्दी उठती, घर का जरूरी काम करती, फिर क्लास जाती। शुरुआत में पद्मा देवी हर रोज़ कोई न कोई बात कह देतीं—“अब देखो, रसोई की हालत,” “चाय में शक्कर कम है,” “बहू को घर का ध्यान नहीं”—लेकिन इशिता अब बिखरती नहीं थी। वह बस सुनती, मुस्कुराती, और अपना काम करती। क्योंकि अब उसका आत्मविश्वास किसी के ‘वाह’ से नहीं, उसके अपने फैसले से आता था।

धीरे-धीरे घर में बदलाव दिखने लगा। नील ने खुद रोटी सेकनी सीख ली। कभी-कभी सृष्टि सब्जी काट देती। पद्मा देवी भी मजबूरी में नहीं, धीरे-धीरे समझ से बदलने लगीं। उन्हें पहली बार लगा कि बहू का बाहर जाना ‘अपमान’ नहीं, ‘उठान’ हो सकता है।

एक दिन पड़ोस की महिलाएँ आईं। वही पुरानी बातें—“बहू को घर छोड़कर बाहर भेज दिया?”
पद्मा देवी ने पहले जैसा जवाब देने के लिए होंठ खोले… फिर रुक गईं।
उन्होंने पहली बार कहा, “हां, भेज दिया। क्योंकि घर सिर्फ दीवार नहीं, सोच भी होता है। और मेरी बहू की सोच बड़ी है।”

इशिता रसोई से यह सुन रही थी। उसका दिल भर आया। उसे लगा जैसे वर्षों का बोझ थोड़ा हल्का हुआ।

कुछ महीनों बाद इशिता का चयन हो गया—एक कॉलेज में अतिथि प्रवक्ता के रूप में। यह छोटी शुरुआत थी, पर उसके लिए बहुत बड़ी। वह जब नियुक्ति पत्र लेकर घर आई, तो नील ने उसे उठाकर खुशी से घुमा दिया। सृष्टि ताली बजाने लगी।
और पद्मा देवी… वे कुछ देर तक कागज को देखती रहीं, फिर अचानक बोलीं, “तूने कर दिखाया।”

इशिता ने हल्के से कहा, “मैं तो हमेशा कर सकती थी, माँजी… बस मुझे करने दिया जाए, यही चाहिए था।”

पद्मा देवी की आँखें नम हो गईं। “मैंने डर के कारण तुझे रोका… समाज क्या कहेगा, लोग क्या बोलेंगे… यही सोचती रही। पर आज समझ आया, खुशमिज़ाज लड़की ही खुशहाल परिवार की नींव रखती है।”

इशिता ने उनके पैर छुए। “और खुशमिज़ाज लड़की बनने के लिए उसे अपने ख्वाहिशों को संभालने देना पड़ता है।”

उस शाम घर में दीये जले। बाहर से देखने पर सब सामान्य लगता—एक मध्यमवर्गीय घर, एक बहू, एक सास, एक पति।
लेकिन भीतर एक बहुत बड़ा बदलाव हो चुका था—अब उस घर में किसी औरत की पढ़ाई “एहसान” नहीं थी, “अधिकार” था।

और सबसे बड़ी बात—इशिता ने अपनी जीत को किसी की हार नहीं बनाया। उसने बस इतना किया कि अपने सपनों को वापस अपने हाथों में रख लिया।
क्योंकि औरत चाहे तो क्या नहीं कर सकती?
वह जब चाहे तो मोम भी बन सकती है… और जब उसे ललकारा जाए, तो अपने आत्मसम्मान के लिए रौद्र भी।

मूल लेखिका : रोनिता कुंडु

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