“सुरभि वैसे भी अपनी सास शारदा के आये दिन अनाथालय जाने, अनाथालय में जाकर दान करने वहाँ के बच्चों में सामान बाँटने से तंग आ गयी थी कितनी बार मना कर चुकी थी लेकिन शारदा है कि मानती ही नहीं थी।
यहाँ तक तो फिर भी ठीक था लेकिन, आज तो हद हो गयी जब शारदा एक अनाथ बच्चे को उठाकर घर ले आई और कहने लगी कि अब यह बच्चा यहीं हमारे साथ ही रहेगा।
सुरभि ने अपने पति सौरभ को तुरंत फोन लगाकर सब बातें बताया और फौरन घर आने को कहा। सौरभ सब सुनते ही फौरन भागा-भागा घर आया और आते ही माँ पर बरस पड़ा। माँ ये सब क्या है? आये दिन आप अनाथालय जाकर अनाथ बच्चों को दान करती रहती हो ये क्या कम है जो अब आप अनाथ बच्चों को घर में भी लेकर चली आयीं।
ये हमारा घर है हमने कोई अनाथआश्रम नहीं खोल रखा है। आपको क्या लगता है पैसे यहाँ कोई पेड़ पर उगते हैं। सौरभ और सुरभि ने साफ कह दिया कि वह बच्चा इस घर में नहीं रहेगा, उसे जहाँ से लाये हैं वहीं छोड़ आये। सौरभ बड़बड़ाने लगा, यहाँ अपने ही दो बच्चों को पालना मुश्किल है क्या वैसे भी कोई मंहगाई कम है क्या!
जो घर में किसी बाहर के बच्चे को रखें, ऊपर से आजकल की पढ़ाई-लिखाई। कितना मुश्किल होता है दो बच्चों को पढ़ाना-लिखाना। अगर, इसी तरह से अनाथ बच्चों को घर में लाते रहे तो हमारा तो जीना मुश्किल हो जायेगा।
पता नहीं लोग बच्चे क्यों, पैदा करते हैं? बच्चे पैदा करके छोंड़ जाते हैं अनाथ आश्रम में हम जैसे भले लोगों को परेशान करने के लिये। अब तो ये अनाथ आश्रम की मुसीबत हमारे गले पड़ रही है। अब तो बहुत हो गया अब माँ को समझाना ही पड़ेगा।
सुरभि और सौरभ ने साफ कह दिया कि वह बच्चा उनके साथ नहीं रहेगा। लेकिन, शारदा भी मानने को तैयार नहीं थी, शारदा ने तो यहाँ तक कह दिया कि यदि वे लोग उस बच्चे को घर में नहीं रखेंगे
तो वह उस बच्चे को लेकर अलग मकान में रह लेगी और अकेले ही उसकी परवरिश करेगी। जब शारदा ने किसी भी तरह से नही माना तब सुरभि ने अपनी माँ रेखा को फोन करके बुलवा लिया ताकि वह सुरभि को समझा सके।
शारदा और रेखा दोनों पक्की सहेलियां थीं। दोनों की आपस में खूब बनती थी, दोनो एक दूसरे की बात को अच्छी तरह से समझते भी थे और मानते भी थे। सुरभि और सौरभ को पक्का यकीन था कि रेखा के आते ही सब ठीक हो जायेगा, रेखा, शारदा को जरुर मना लेगी।
सुरभि के फोन करते ही रेखा तुरंत आ गयी। लेकिन, ये क्या! वह तो शारदा को समझाने के बजाय उसका साथ दे रही थी। जो बात शारदा कह रही थी वही बात अब रेखा भी कह रही थी कि वह बच्चा अब यहीं रहेगा। रेखा ने तो ये भी कह दिया कि यदि वे लोग इस घर में नहीं रखेंगे तो शारदा और उस अनाथ बच्चे को रेखा अपने साथ ले जायेगी अपने घर।
और हुआ भी यही, दूसरे दिन, शारदा और रेखा उस बच्चे को साथ लेकर जाने के लिये तैयार हो गये। सौरभ और सुरभि के लाख समझाने पर भी नहीं माने।और बच्चे को साथ लेकर चले गये। सुरभि और सौरभ दोनों को बहुत बुरा लग रहा था कि, उनकी माँओ ने उनके साथ ऐसा किया।
एक अनाथ बच्चे की खातिर अपने बच्चों को छोड़ दिया उन्हे हमारे बच्चों का भी ध्यान नहीं आया। बच्चे भी बहुत मायूस लग रहे थे दादी और नानी के इस तरह से चले जाने से। शारदा और रेखा दोनो वापस तो नहीं आये थे और न ही बच्चे को छोड़ने को तैयार थे फिर भी स्थिति कुछ सामान्य सी हो रही थी हर कोई परिस्थिति को स्वीकार करने लगा था। अब धीरे-धीरे होली भी करीब आने लगी थी।
लेकिन इस बार होली में सब कुछ अनमना सा लग रहा था। पहले होली में रेखा भी यहीं आ जाती थी। शारदा और रेखा दोनो मिलकर बच्चों के साथ बिल्कुल बच्चे बन जाते थे।
सुरभि घर के साफ-सफाई में लगी थी। होली पर सब जान-पहचान वाले आते थे घर मिलने के लिये। जब पूरे घर की साफ-सफाई हो गयी तब सुरभि ने सोचा कि माँ के कमरे की भी साफ-सफाई कर देती हूं। वैसे तो अपने कमरे की साफ-सफाई शारदा अपने सामने ही करवाती थी।
एक-एक सामान को ध्यान से रखवाती थी किताबों से धूल तो अपने हाथों से झाड़ती थी। सुरभि को डर था कि कहीं माँ आयेगी तो नाराज न हो जाये कहीं शारदा ये न कहे कि उसकी अनुपस्थिति में उसके सामानों को हाथ किसने लगाया। लेकिन, सुरभि ये भी सोच रही थी कि यदि मैने माँ के कमरे को साफ नहीं किया और यहाँ गर्त जमीं रही
तो कहीं माँ को ऐसा ना लगे कि मैने कमरे का ध्यान ही नहीं रखा। यही सब सोचते-सोचते सुरभि कमरे में रखे एक-एक चीज को बड़े ध्यान से साफ कर-कर के रखती जा रही थी। शारदा को किताबें पढ़ने का बहुत शौक था। इतनी किताबें इकट्ठा कर रखी थी कहीं भी जाती तो दो-चार किताबें तो खरीद ही लाती।
अब तो अलमारी में भी जगह नहीं रह गया था। सुरभि बहुत ध्यान से सभी सामानों को रखती जा रही थी कि कहीं कोई गलती न हो जाये। मन-ही-मन सोच रही थी कि, क्या माँ कि खुशी के लिये उस अनाथ बच्चे को घर में रख लेना चाहिये था। लेकिन, कब तक?
आखिर, कब तक हम उस बच्चे को अपने पास रख पाते और कैसे रखते! अपने ही बच्चों की परवरिश क्या आसान है? मैने माँ को भी बुलवाया था ताकि वो उन्हें समझा सके पर, वो तो उल्टा उन्हीं का साथ देने लगी उन्हें अपने साथ ले गयी। पता नहीं आखिर दोनों चाहते क्या हैं!
दोनो को समझ में क्यों नहीं आता। सुरभि इसी उधेड़ बुन में लगी किताबों को उलट-पलट रही थी कि अचानक उसके हाथ में कागज मिला जिसे माँ ने शायद बडा़ ही सम्हाल कर रखा था। सुरभि उसे खोल कर पढ़ने लगी पढ़ते ही सौरभ के तरफ भागी और जाकर वह कागज सौरभ को दे दिया। सौरभ ने जैसे ही उसे पढ़ा ऐसा लगा जैसे उसके पाँव के नीचे से जमीन खीसक गयी हो और वह उसी में समा जायेगा।
सौरभ के आँखों के आगे अंधेरा छाने लगा। सौरभ वहीं सोफे पर बैठ गया। सुरभि और सौरभ काफी देर तक ऐसे ही बैठे रहे कोई कुछ बोल नहीं पा रहा था। अचानक सौरभ उठा और सुरभि से कहने लगा चलो माँ के पास चलते हैं परंतु, उन्हें ये मत बताना कि हमें ये सब पता चल चुका है। बच्चों को भी कभी कुछ नहीं बताना है। दोनों कार में बैठ गये और निकल पड़े रेखा के घर की ओर जहाँ शारदा और रेखा दोनो अभी रह रहे थे।
सुरभि और सौरभ को इस तरह से अचानक आया हुआ देखकर दोनो को बहुत आश्चर्य हुआ। सौरभ ने माँ से कहा कि वह उसे लेने आया है और उस बच्चे को भी साथ ले जायेगा वह बच्चा अब उन्हीं के साथ रहेगा। शारदा सौरभ और सुरभि के साथ घर आ गयी।
सौरभ के मन को कई सवाल कचोटने लगे वह अंदर ही अंदर बहुत बेचैन रहने लगा।सौरभ को तलाश थी उस कागज पर नीचे लिखे हुये नाम और पते कि वह तलाशता रहा और आखिर में उसकी तलाश पूरी हुई। सौरभ उस जगह पर पहुँच गया साथ में सुरभि को भी ले गया। उस पते पर तो पहुँच गये अब तलाश थी उस नाम की। थोड़ी कोशिश करने पर वह भी मिल गयी।
सौरभ ने उनको अपना परिचय दिया और अपनी माँ शारदा के बारे में बताया। शारदा का नाम सुनते ही वो चहक उठे, अरे!! शारदा, कैसी है? और कहाँ है अभी! और रेखा कैसी है? और वो बच्ची सुरभि कहाँ है, कैसी है? सौरभ और सुरभि दोनों आश्चर्य से उनकी तरफ देखे जा रहे थे। शारदा और रेखा को वो कैसे जानते हैं और सौरभ और सुरभि के बारे में उन्हें क्या कुछ पता है सब उनसे जानना चाह रहे थे।
उन्होंने बताया कि शारदा और रेखा नाम कि दो लड़कियाँ यहाँ पढ़ने के लिये आयी थीं। एक बार एक चैरिटी शो हुआ यह शो अनाथ बच्चों के लिये था। मैं इसमें मुख्य अतिथि था। इसी कार्यक्रम में शारदा और रेखा भी आई थीं। वहीं इनसे मेरी पहली मुलाकात हुई। अनाथ बच्चों के लिये कुछ करने की इन लोगों ने इच्छा जाहिर की।
उसके बाद ये दोनों अक्सर अनाथ आश्रम में आने लगे। यहाँ आकर यहाँ के बच्चों को पढ़ाने लगे। मैं जब भी बाहर जाता तो ये लोग अच्छी तरह से सम्हाल लिया करते थे। एक बार मेरा बाहर जाना हुआ इसी बीच अनाथ आश्रम में दो नये बच्चे आये। एक तीन महीने का बच्चा था
और दूसरी एक सात दिन की नवजात बच्ची थी। अनाथ आश्रम में कोई छोड़ गया था। रेखा और शारदा ने उन्हें अच्छे से सम्हाल लिया और उन्होने ही इन बच्चों का नाम रखा था; ‘सौरभ और सुरभि’। कुछ दिनों में ही इन बच्चों से इनको इतना लगाव हो गया और इन बच्चों को भी इनकी इतनी आदत हो गई कि इनके बिना रहते ही नहीं थे। कुछ दिनों बाद इनकी पढ़ाई खत्म हो गयी तब इनको वापस अपने गाँव जाना पड़ा।
परंतु, गाँव जाकर इनको उन बच्चों की इतनी याद आई कि ये लोग वापस आ गये। बच्चे भी इनके जाने अक्सर रोते रहते थे इन्हें देखकर बहुत खुश हुये। इस बार ये लोग जाते-जाते अपने साथ सौरभ और सुरभि को भी ले गये। शारदा ने सौरभ को और रेखा ने सुरभि को कानूनन गोद ले लिया।
शारदा और रेखा जब इन बच्चों को लेकर अपने-अपने घर गईं और इन बच्चों के बारे में बताया तो इनके घर वालों को एतराज हुआ उन्होंने इन बच्चों को रखने से इनकार कर दिया। रेखा और शारदा दोनों ने गाँव छोड़कर शहर में रहने का फैसला कर लिया और जॉब करने लगीं साथ में इन बच्चों की परवरिश भी करने लगीं।
इनके घर वाले इनकी शादी करना चाहते थे लेकिन कोई इनके साथ इन बच्चों को अपनाना नहीं चाहता था। रेखा और शारदा दोनों ने तय किया कि अब वे शादी ही नहीं करेंगी। इन बच्चों के सहारे ही अपनी जिंदगी गुजार देंगी।
रेखा और शारदा को अपने जॉब के कारण अलग-अलग शहरों में जाना पड़ा। जाते-जाते दोनो ने ये तय किया था कि दोनों सौरभ और सुरभि को अपने बच्चे की तरह से पढ़ायेंगे-लिखायेंगे और जब दोनों बड़े हो जायेंगे तो उनकी शादी कर देंगे। सौरभ और सुरभि की शादी तभी तय हो गयी थी। कुछ दिनों तक तो बराबर उन दोनों का खत आता रहा परंतु, बाद में
मुझे वहाँ से छोड़कर यहाँ आना पड़ा उसके बाद खत का सिलसिला बंद हो गया लेकिन, मैं अक्सर उन्हें याद करता था और उन बच्चों के बारे में सोचता था।आज इतने दिनों के बाद उनकी खबर मिली तो मुझे बहुत अच्छा लगा। तुम सौरभ हो और सुरभि, वो कहाँ है? अब तक सुरभि चुपचाप खड़ी थी। सौरभ ने बताया कि यही है सुरभि।
सौेरभ और सुरभि को इस तरह से साथ देखकर उनको अपार प्रसन्नता हो रही थी। दोनों को उन्होंने खूब आशीर्वाद दिया। दोनों ने वहाँ से विदा लिया और जाते-जाते ये भी कहा कि अब से इस अनाथ आश्रम की सारी जिम्मेदारी उनकी होगी।
दोनों घर वापस आ गये। घर में शारदा और बच्चे उनका रास्ता देख रहे थे। क्योंकि, ये लोग किसी को कुछ बताकर नहीं गये थे। किसी को कुछ पता नहीं था कि ये लोग कहाँ गये हैं। सौरभ और सुरभि दोनों को अपने उस बच्चे के प्रति अपने बर्ताव पर ग्लानि हो रही थी। दोनों को ही अपने बचपन से लेकर अब तक का हर वाकया याद आ रहा था कि रेखा और शारदा ने किस तरह से उनकी परवरिश की थी।
उन्हें पढ़ाया-लिखाया, बड़े ही धूमधाम से शादी भी की। इतना सब करने के बावजूद भी उन्होंने इनसे कभी कुछ नहीं कहा, कभी कुछ नहीं माँगा। हम अनाथ बच्चों की परवरिश की खातिर उन्होंने अपनी जिन्दगी दाँव पर लगा दी और हमने उन्हें कितना बुरा भला कहा।
दोनों शारदा के पैरों में गिर गये, शारदा ने उन्हें उठाकर सीने से लगा लिया। सुरभि और सौरभ को यह जानकर मन ही मन बहुत खुशी हुई कि माँ नाराज नहीं है। दोनों ने उस बच्चे को भी सीने से लगा लिया। उस बच्चे में इन्हें अपना बचपन दिखाई देने लगा। सुरभि और सौरभ के कहने पर, शारदा ने रेखा को भी यहीं अपने साथ रहने के लिये बुलवा लिया।
अब सब एक साथ हँसी-खुशी रहने लगे। किसी में आपस में खून का रिश्ता न होकर भी खून के रिश्ते बढ़कर एक गहरा एहसास था। सब एक-दूजे पर जान छिड़कते थे। हाँ प्रीत की रीत यही है जहाँ लगाव हो जाता है फिर रिश्ते नाते, जात-पाँत नहीं देखता। बिना किसी उम्मीद; सब कुछ न्यौछावर करने को तैयार हो जाता है।
**अंजली शर्मा **
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )