रिमझिम अपने पिता बंशी के साथ रोज खेतों पर जाती क्योंकि आजकल उसके स्कूल की छुट्टियां चल रही थी। वो पिता बंशी की लाडली बिटिया थी। उसके आँखों का तारा थी । उसकी मां तो उसे बचपन में ही छोड़ ईश्वर को प्यारी हो गई थी। पिता ने दूसरी शादी नहीं की वो नहीं चाहते थे रिमझिम पर सौतेली मां की छाया भी पड़े। उन्होंने अपना पूरा जीवन अपनी बेटी पर ही न्यौछावर करने की ठान ली थी । रिमझिम पढ़ने लिखने में कुशाग्र बुद्धि की बच्ची खूब पढ़ना लिखना चाहती थी। उसकी लगन देख बंशी खेतों पर खूब मेहनत से काम करते और रिमझिम को एक बड़े और अच्छे स्कूल में पढ़ा रहे थे। वैसे तो गांव में छोटे छोटे कुछ एक दो कम फीस लेने वाले स्कूल भी थे । जहां जमीन में बैठकर पढ़ाई कराई जाती थी । मगर बंशी की चाहत बेटी अच्छे से स्कूल में पढ़े, इसलिए वहीं गांव के अच्छे स्कूल में उसका दाखिला करवा दिया था। जहां सभी गांव के प्रतिष्ठित लोगों के बच्चे भी पढ़ने जाते थे।
उसके लिए बंशी को बहुत ही ज्यादा मेहनत करनी पड़ती थी। वो रात को निकट हवेली में चौकीदारी का काम कर अधिक से अधिक पैसा कमाते ताकि रिमझिम की पढ़ाई लिखाई में किसी भी प्रकार की बाधा न पहुंचे । रिमझिम पढ़ने में बहुत ही होशियार बच्ची उसके साथ पढ़ने वाले बच्चे अमीर परिवार से जिनका अधिकतर समय तफरीबाजी में ही गुजरता पढ़ने लिखने में कम ही ध्यान लगता वो सभी मौका मिलते ही रिमझिम कि मजाक उडाने का कोई मौका नहीं चूकते थे। कभी उसके कपड़ों का तो कभी उसके खाने पीने की चीजों का, लेकिन रिमझिम को कोई फर्क नहीं पड़ता वो अपनी पढ़ाई में मस्त रहती और उसे बड़ी ही लगन से करती।उसको तो बड़े होकर अच्छी शिक्षिका बनना था। और अपने ही गांव में पढ़ाना था वो अक्सर अपने पिता से कहती बाबा देखना एक दिन मैं बहुत बड़ी टीचर बनूंगी और अपने गांव का नाम रौशन करूंगी । वो अपनी मेहनत और लगन के बल पर दसवीं क्लास में आ जाती है।
एक दिन उसके स्कूल में एक वाद विवाद प्रतियोगिता का आयोजन होता है। जिसका विषय था “ कौन क्या बनेगा “। रिमझिम बड़ी मेहनत से तैयारी करती है बहुत ही सुन्दर विचार प्रस्तुत करती है। जिसमें वो प्रथम स्थान पर आती है वो लिखती हैं “मुझे शिक्षिका बनना है”।
वो बोलती है उसको भविष्य में शिक्षिका बनकर छात्रों को सकारात्मक और सहायक बनने को प्रेरित करेगी जिसमें वो समय-समय पर विधार्थियों के माता-पिता से संवाद और विधार्थियों की उन्नति का मूल्यांकन करती रहेगी।वह विधार्थियों की भावनाओं को भी समझेगी । विधालय में अच्छे सामाजिक वातावरण का निर्माण करेगी ।उसकी बातों से सभी शिक्षक, प्रिंसिपल और मुख्य अतिथि के रूप में शहर से आये प्रतिष्ठित व्यक्ति बड़े प्रभावित होते हैं । और उसको प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार मिलता है। बाकी के बच्चे मुंह ताकते रह जाते हैं झेंप मिटाने के लिए रिमझिम को किस्मत वाली का खिताब देते हुए ताने कसते ।
इससे साथ के पढ़ने वाले बच्चे उससे ज्यादा ईर्ष्या करने लगते हैं। कहते पता नहीं कहां से आ गई ये हमारे बीच ‘किस्मतवाली’ वरना तो इस कंगाल की क्या औकात जो हमारा मुकाबला करती फिरे कहां हम बड़े बड़े घर के बच्चे और कहां ये भिखारन जिसके पास एक दो ही कपड़े ,खाने को भी नहीं, सूखी रोटियां भर लाती है लंच बाक्स में …”बात बात पर उसे ताने कसते देखों चौकीदार की लड़की बड़ी टीचर बनेगी” । घर में खाने को तो है नहीं बात करती शिक्षिका बनने की । बैठे बैठे स्वप्न देखती रहती है । कभी कभी तो सभी बच्चे उसको देखकर आपस में ही खिलखिलाने लगते । रिमझिम सब सहजता से सहन करती ज्यादातर उनकी बातों पर ध्यान ही नहीं देती। जब बच्चों की कुछ बातें हद से आगे गुजर जाती तब उनको बड़ी ही दृढ़ता से विश्वास के साथ कहती हाँ.. हाँ देखना एक दिन मैं सबको शिक्षिका बनकर दिखाऊंगी। मैं अपनी मेहनत के बल पर आगे पहुंचूंगी।
रिमझिम घर आकर पिता को सारी बातें बताती है उसके पिता उसकी हिम्मत बढ़ाते उसको समझाते हुए कहते …”बेटा तुम इन बच्चों पर ध्यान मत दो ये तो नालायक बच्चे हैं, बड़े घरों के है इनके पास ढेरों दौलत है, पढ़ाई-लिखाई से इनका कोई मतलब नहीं है। इन्होंने कुछ नहीं बनना ये दूसरों को उन्नति करता नहीं देख सकते इसलिए चाहते हैं सब इनकी तरह ही बन जायें “ । लेकिन मुझे पूरा विश्वास है तुम एक दिन अपना सपना अवश्य पूरा करोगी बस हिम्मत और मेहनत बनाये रखना।
रिमझिम पिता की बातों से प्रोत्साहित हाई स्कूल गांव से ही प्रथम श्रेणी में कर लेती है। लेकिन अब बारहवीं के लिए दूर दूसरे गांव जाना था उसको, और जिसके लिए बहुत सा धन भी चाहिए था । लेकिन उसके पिता हिम्मत नहीं हारते वो बराबर उसका उत्साह बनाए रखने में उसकी मदद करते। क्योंकि वो किसी भी कीमत पर अपनी बेटी को सफल देखना चाहते थे…। वैसे भी जब बच्चे माता-पिता के अन्दर अपनी मेहनत के बल पर ये विश्वास उत्पन्न करवा देते हैं कि वो ज़िन्दगी में कुछ करना चाहते हैं और मेहनत से आगे बढ़ेंगे उसी से अपना भाग्य लिखेंगे तो ऐसी परिस्थिति में पिता की हिम्मत भी दुगनी हो जाती है। रिमझिम के पिता भी हवेली के मालिक जहां वो रात चौकीदार थे,उनसे पैसा एडवांस लेकर उसका दाखिला आगे पढ़ाई के लिए करवा देते हैं।और रोज सवेरे रिमझिम को साईकिल से स्कूल छोड़ने जाते और फिर लेने भी पहुंच जाते।
एक पिता और बेटी की मेहनत रंग लाती है।वो बारहवीं में प्रथम स्थान प्राप्त कर लेती है। फिर बीटीसी कर डिप्लोमा ले गांव के स्कूल में ही पढ़ाने लगती है। वो और आगे पढ़ना चाहती है। उसके पिता स्कूल प्रधानाचार्य की मदद से उसको स्नातक के लिए फार्म भरवा देते हैं। रिमझिम बी ए कर फिर बीएड भी कर लेती है । और सरकारी नौकरी पर लग जाती है। उसको रहने के लिए टीचर कोटे की व्यवस्था भी मिल जाती है। वो पिता को साथ रहने को कहती हैं पिता खेती का हवाला देते हैं बेटा हमारी खेती की देखभाल कौन करेगा ? तुम सरकारी निवास में रहने चली जाओ मैं बराबर तुमसे मिलने आता रहूँगा । रिमझिम कहती हैं आप चिंता मत करो मैं इस समस्या का समाधान भी कर देती हूँ । और फिर वो उस समस्या का भी समाधान कर देती है अपने सभी खेत पट्टे पर खेती के लिए दे देती है। जिससे उनके खेतों और खेती दोनों की देखभाल भी होती रहती । पिता बेटी के साथ रहने आ जाते है । बंशी और बेटी रिमझिम खुशी खुशी रहने लगते हैं। लोगों के लिए वो भले ही ‘किस्मत वाली’ रही हो लेकिन रिमझिम को अपने व्यक्तित्व में अपने संघर्ष की तपिश और आत्मसम्मान की मिठास के पल पल दर्शन होने लगे ।
लेखिका डॉ बीना कुण्डलिया
“ क़िस्मत वाली “