किस्मत वाली – रंजना गुप्ता

सीमा चंदनपुर गाँव के सरकारी स्कूल में अध्यापिका बनकर आयी है और गाँव वाले उसका फूलों के हार पहना कर स्वागत कर रहे हैं।

उसकी आँखों से आँसू छलकते हैं और होठों पर मुस्कुरुहट। कभी वह इसी स्कूल की छात्रा थी। सब लोग उस पर फूलों की वर्षा कर रहे हैं और तालियाँ बजा रहे हैं उन्हीं तालियों की गड़हड़ाहट में वह अपने अतीत में खो जाती है।

गाँव के आख़िरी छोर पर बसा था। चंदनपुर छोटा-सा, शांत, लेकिन अपनी सीमाओं में सिमटा हुआ गाँव। वहीं एक कच्चे मकान में रहती थी सीमा। लोग उसे अक्सर तानों में कहते थे अरे, ये तो बड़ी किस्मत वाली है!

पर कोई नहीं जानता था कि यह शब्द उसके लिए तारीफ़ नहीं, बल्कि तंज़ था।

सीमा का जन्म एक बेहद गरीब परिवार में हुआ था। पिता दिहाड़ी मज़दूर और माँ बीमार। बचपन से ही उसने अभाव देखे थे फटे कपड़े, अधूरी किताबें, और कभी कभी भूखे पेट भी सोना पड़ता था। फिर भी उसकी आँखों में एक अजीब-सी चमक थी कुछ कर दिखाने की चमक। वह पढ़ना चाहती थी, आगे बढ़ना चाहती थी, पर किस्मत हर कदम पर उसे रोकने को तैयार रहती थी।

जब सीमा दस साल की थी, उसके पिता की एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई। घर की पूरी ज़िम्मेदारी उसकी बीमार माँ और सीमा के नन्हें कंधो पर आ गई। उसकी माँ घरों में काम करती थी माँ की बीमारी बढ़ती गई लोग कहने लगे तुझसे नहीं होगा सीमा को काम पर भेज दिया कर और ना चाहते हुए भी सीमा की मां को सीमा को काम पर भेजना पड़ा।

सीमा का बचपन कहीं खो गया। स्कूल जाना छूटने लगा। लोग कहते अब क्या पढ़ेगी? लड़की है, किस्मत में यही लिखा है। सीमा चुप रहती। वह जानती थी कि किस्मत को दोष देना आसान है, उससे लड़ना मुश्किल है।

बरसात की उस रात सीमा रो रही थी कच्ची छत से टपकती बूंदें जैसे उसकी आँखों से बहते आँसुओं की नकल कर रही थीं। माँ खाँसते-खाँसते सो गई थी और सीमा चुपचाप कौने में बैठी सोच रही थी ।

क्या सच में मेरी ज़िंदगी बस इतनी ही है?

गाँव चंदनपुर में सब उसे “किस्मत वाली” कहते थे।

पर किसी ने कभी नहीं पूछा कि उस किस्मत की कीमत क्या है?

उसने बचपन खेलते हुए नहीं जिया। उसने बचपन जिम्मेदारियों में घुलते देखा। जब दूसरे बच्चे गुड़ियों से खेलते थे, वह माँ के लिए पानी गर्म करती थी। जब बच्चे स्कूल की घंटी सुनकर दौड़ते थे, वह दूसरों के घरों में झाड़ू लगाती थी।

उसके पिता कहा करते थे बिटिया, पढ़ लिख जाएगी ना, तो हमारी गरीबी हार जाएगी।

लेकिन पिता हार गए। जिस दिन पिता का साया उसके सिर से उठा उस दिन सीमा ने पहली बार महसूस किया पिता के बाद घर में सन्नाटा बस गया। माँ और अधिक बीमार रहने लगी और स्कूल छूटने लगा। गाँव के लोग और रिश्तेदार सहानुभूति के नाम पर सलाह देते। अब पढ़ाई छोड़ दो, लड़की हो, घर संभालो ।माँ की दवाई और तुम लोगों का खाना कहाँ से आएगा? कुछ नहीं रखा इन किताबों में फैंको इनको उठाकर।

सीमा हर रात किताब खोलती, पर अक्षर धुँधले हो जाते।भूख, थकान और डर तीनों मिलकर उसकी आँखों को जला देते। पर उसने कभी हार नहीं मानी। सुबह जल्दी-जल्दी सबके घरों में काम खत्म करके वह स्कूल पहुँचती थी। कभी उसे स्कूल में लेट आने के लिए पनिशमेंट भी दी जाती थी लेकिन कुछ टीचर्स उसकी परेशानी को समझते थे। जिन्होंने उसको बचपन से देखा था वे जानते थे कि वह पढ़ाई में बहुत होशियार है। अगर उसको थोड़ी सी भी मदद मिली तो वह कुछ कर गुजरेगी।

एक दिन स्कूल में नयी हिंदी टीचर शैलजा मैडम आयी।

उन्होंने सीमा की परीक्षा की कॉपी में सिर्फ उत्तर नहीं, दर्द की लकीरें देखीं। इसमें हर उत्तर बहुत अच्छी तरह से लिखा था। उसके हर उत्तर में एक दर्द छुपा था। जब उन्होंने पूछा, तुम्हारी आँखें इतनी उदास क्यों हैं?

तो सीमा पहली बार किसी के सामने रो पड़ी। उस रोने में पिता की कमी थी, माँ की बीमारी थी, और एक डर था

कहीं मैं भी खो न जाऊँ। उसने बताया कि वह अपने माता-पिता का सपना पूरा करना चाहती है शैलजा मैडम ने उसका हाथ थामा।जब तक मैं हूँ, तुम अकेली नहीं हो।

लोग बोले,देखो, कितनी किस्मत वाली है। सीमा जानती थी यह किस्मत नहीं, किसी का भरोसा था। 

सीमा पढ़ती रही, काम करती रही। हर दिन खुद को थोड़ा-थोड़ा तोड़ती रही, ताकि माँ को दवा मिल सके। लेकिन बीमारी नहीं रुकी।

एक दिन माँ भी सीमा को छोड़कर चली गई। सीमा चिल्लाई नहीं। वह बस माँ की ठंडी हथेली पकड़कर बैठी रही।

उसने सोचा ,अब किसके लिए पढ़ूँ?अब इस दुनिया में मेरा कोई नहीं है।

रात को माँ की साड़ी ओढ़कर वह फूट-फूटकर रोई।

शैलजा मैडम आईं, कुछ नहीं बोलीं, बस उसे सीने से लगा लिया और धीरे से कहा अगर तुम हार गई, तो तुम्हारी माँ दूसरी बार मर जाएगी।

ये शब्द सीमा की आत्मा तक उतर गए। परीक्षा का दिन नजदीक था शैलजा मैडम ने सीमा को दो दिन अपने पास रखा। उसे खाना खिलाया, पढ़ाया और समझाया।

परीक्षा के दिन सीमा के हाथ काँप रहे थे। उसके पास न नया पैन था, न अच्छे कपड़े। बस उसके पास थी माँ और पापा की दी हुई दुआ और शैलजा मैडम का विश्वास।

जब परिणाम आया, तो वही गाँव चुप हो गया जिसने उसे कमजोर समझा था। लिस्ट में उसका नाम सबसे ऊपर था।

लोग बोले, किस्मत खुल गई इसकी!

सीमा ने पहली बार सोचा – अगर ये किस्मत है, तो इसमें इतना दर्द क्यों था? अगर मैं किस्मत वाली हूं तो मेरे माता-पिता मेरे साथ क्यों नहीं है?

शैलजा मैडम की मेहनत से सीमा को स्कॉलरशिप मिली और शहर के कॉलेज में दाखिला मिल गया। शैलजा मैडम ने अपने संपर्क से उसे वहीं शहर में अपने किसी रिश्तेदार के यहाँ रहने की जगह दिलवा दी थी उसके बदले में वह उनके दो बच्चों को पढ़ाती थी। वहां जाकर उसने ग्रेजुएशन किया और बी. एड . किया।

शहर में सीमा अकेली थी।भीड़ में भी अकेली। कभी-कभी रात को तकिए से लिपटकर रोती और खुद से पूछती क्या मैं सच में यहाँ रह सकती हूँ?

लोग उसकी गरीबी नहीं, उसकी जड़ों को नीचा दिखाते थे।

पर हर ताना उसे और मजबूत बनाता गया।

उसने खुद से एक वादा किया, मैं हारूँगी नहीं, चाहे रोते-रोते क्यों न चलना पड़े।

उसकी पढ़ाई पूरी हुयी उसने शिक्षिका के लिए आवेदन किया और जब सरकारी स्कूल से नौकरी का पत्र आया, सीमा देर तक उसे देखती रही।

वह माँ और पापा की तस्वीर के सामने खड़ी हुयी और बोली,देखो माँ, मैं गिरकर भी खड़ी हो गई। काश आप मेरे साथ होते तब होती मैं किस्मत बाली।

आज वह चंदनपुर गाँव के उसी सरकारी स्कूल में खड़ी थी जहाँ कभी वह देर से आने पर पनिशमेन्ट में खड़ी होती थी उसके चेहरे पर एक मुस्कान आ गयी।

जो लोग उसे ताने देते थे कहते थे, लड़की हो पढ़ाई छोड़ दो नहीं तो माँ – बेटी रोटी कहां से खाओगे?

आज वही लोग यहां खड़े होकर सब गांव वालों को कह रहे हैं कि हमने इसको पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया था वरना इसने तो पढ़ाई छोड़ ही दी थी।

एक बच्ची की आवाज से वह वर्तमान में लौटती है। कहते हैं बच्चे मन के सच्चे होते हैं। एक बच्ची बोली दीदी मेरी मां कहती है आपका तो दुनिया में कोई नहीं था फिर आप इतनी मजबूत कैसे बनीं?

सीमा की आँखें नम हो गईं।

उसने कहा, क्योंकि मैं कमजोर होने का हक़ खो चुकी थी।

अब जब कोई उसे “किस्मत वाली” कहता है, तो सीमा मुस्कुरा देती है।

वह जानती है किस्मत वो नहीं जो बिन माँगे मिल जाए, किस्मत वो है, जो टूटकर भी हिम्मत से गढ़ी जाए।

स्वरचित एवं मौलिक

लेखिका – रंजना गुप्ता

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