किस्मतवाली – डाॅ संजु झा

रामलाल   नैना को बेखौफ नन्हें -नन्हें कदमों से ऑंगन में  चहलकदमी करते हुए देखकर सोचते हैं -“किस्मत के खेल भी निराले हैं।कभी एक संतान के लिए पति-पत्नी तरसते थे,आज दो-दो बेटियों से हमारा जीवन गुलजार है!”

 रामलाल खुद को भाग्यशाली समझें या बेटियों को किस्मतवाली उनकी समझ से परे है!जिस प्रकार एक नवजात पक्षी अपने घोंसले में निडरता से चहचहाता रहता है,उसे तनिक भी भय नहीं होता है कि उसके कलरव को सुनकर कोई दुष्ट शिकारी पक्षी उन्हें ग्रास बना लेगा।वह अपने‌ माता-पिता के सुरक्षित संसार में एक डाली से दूसरी डाली पर निश्चिंत होकर उड़ता और फुदकता रहता है,उसी प्रकार उनके संरक्षण में दोनों दत्तक बेटियाॅं उनके घर को ही नहीं बल्कि अड़ोस-पड़ोस में भी अपनी खुशबू बिखेरतीं रहतीं हैं।

छोटी-सी नैना रामलाल दम्पत्ति की जान बन चुकी है। रामलाल उसे अपनी पत्नी  के लिए किस्मतवाली समझते हैं,जिसके कारण उसकी जीने की इच्छा एक बार पुनः जाग्रत हो उठी है,वरना वह तो जीवन से निराश होकर बिस्तर ही पकड़ चुकी थी।नैना को पत्नी के गले से लिपटा देखकर रामलाल को पुराने दिन याद आ जाते हैं।एक रात अचानक आधी रात को किसी बच्चे के रोने की आवाज से उनकी नींद खुल गई।वे एक नजर अपनी सोई हुई पत्नी और बड़ी बेटी नमिता पर नजर डालते हैं और चुपके से धीमे कदमों से दरवाजा खोलकर बाहर निकल जाते हैं। दिसम्बर के माह में बाहर कड़ाके की ठंड थी। उन्होंने खुद को अच्छी तरह शाॅल‌ से लपेटा और आवाज की ओर बढ़ चले।पास में ही एक डस्टबिन में से बच्चे के रोने की आवाज आ रही थी। रामलाल पास जाकर देखते हैं कि डस्टबिन में ऊनी शाॅल में  लिपटी हुई मासूम जान जार-जार रोऍं जा रही थी।

रामलाल बच्ची को उठाने के लिए तेजी से आगे हाथ बढ़ाते हैं, फिर कुछ सोचकर बढ़े हुए हाथ खींचकर पलटकर वापस जाने लगते हैं। परन्तु लगातार तेजी से रोती हुई बच्ची की आवाज उनके कदम रोक लेती है,वह वापस लौटकर उस बच्ची को‌ उठाकर अपने शाॅल के अंदर समेट लेते हैं।बदन के नर्म एहसास और शरीर की गर्मी पाकर बच्ची चुप होकर अपना ॲंगूठा चूसने लगती है। रामलाल बच्ची की बाल-सुलभ क्रीड़ा देखकर मुस्कुरा उठते हैं।ईश्वर ने‌ तो उन्हें संसार की खुबसूरत नेमत संतान से वंचित ही रखा था, परन्तु समय के साथ  उन्हें दो-दो बेटियों का पिता बना दिया। नमिता को तो उन्होंने बड़ी होने पर गोद लिया था, परन्तु इस बच्ची की कोमल और नर्म स्पर्श ने उनके शरीर के साथ-साथ उनकी आत्मा में भी एक सुखद तृप्ति का एहसास करा दिया। उन्होंने सिर उठाकर ऊपरवाले से शिकायती  लहजे में कहा -” हे ईश्वर!अगर तुझे संतान देनी ही थी,तो कुछ समय पहले दे देता!अब इस उम्र में बीमार पत्नी के साथ इस बच्ची का कैसे पालन-पोषण करूॅंगा?”

उनके मन में द्वंद्व की स्थिति बनी हुई थी। फिर खुद से बुदबुदाते हुए कहते हैं कि अगर रात -भर ठंढ़ में यह मासूम बाहर रहती तो अवश्य मर जाती।सुबह होने पर बच्ची के बारे में सोचूॅंगा।मन में एक‌साथ सैकड़ों सवाल लिए बच्ची के साथ धीमे कदमों से घर में घुसते। भगवान का लाख-लाख शुक्र था कि पत्नी सो रही थी।धीरे से उन्होंने पन्द्रह वर्षीया बड़ी बेटी नमिता को‌ जगाया। कुछ समय पहले ही नमिता अनाथालय से भागकर एक पार्क में बैठी रो रही थी।उसके दुख से द्रवित होकर रामलाल उसे अपने घर ले आऍं थे।पहले तो उनकी पत्नी नमिता को देखकर काफी नाराज़ हुई थी, परन्तु धीरे-धीरे नमिता के सद्व्यवहार और सेवा-भावना से खुश रहने लगी थी, परन्तु इस बच्ची को देखकर उसकी क्या प्रतिक्रिया होगी?यही उनके मन में डर है।

फिलहाल बच्ची के बारे में सोचते हुए उन्होंने कहा -“नमिता बेटी!देखो,घर में थोड़ा भी दूध है,तो इस बच्ची को पिला दो।यह भूख से बेहाल है!”

नमिता रसोई से दूध गर्म कर लाती है और चम्मच से बच्ची को दूध पिलाने लगती है।भूखी बच्ची पल भर में सारा दूध पीकर जम्हाई लेने लगती है। नमिता उसे कंधे पर रखकर थपथपाती है।बच्ची डकार लेकर सोने लगती है। नमिता उसे अपने सीने से लगाकर सुला देती है। रामलाल नमिता और बच्ची को बड़ी तन्मयता से देखते हैं और पूछ बैठते हैं -“नमिता!तुमने इतनी कम उम्र में ये सब कहाॅं से सीखा?”

नमिता मुस्कुराते हुए कहती हैं -“पापा! जहाॅं मैं अनाथालय में थी, वहाॅं मैं छोटी बच्चियों की ही देख-भाल करती थी।”

रामलाल -“बेटी! वहाॅं तो लड़के भी आते होंगे?”

नमिता -“नहीं पापा! हमारे समाज में बेटियों को ही बोझ समझा जाता है। बेटों को अकारण जल्दी कोई नहीं फेंकता है!”

रामलाल -” बेटी!सही बात है।हमारा समाज अभी भी बेटा-बेटी के अंतर को पाटने में असमर्थ ही है!”

रामलाल अतीत की यादों से वापस लौटकर सोने‌ चले जाते हैं।

नमिता बच्ची को सीने से लगाए बिस्तर पर आ जाती है, परन्तु नींद‌ उसकी ऑंखों से कोसों दूर है।बच्ची को देखकर उसे ऐसा महसूस होता है मानो उसका ही अतीत उसके समक्ष उपस्थित हो गया है।जिस प्यार से वह जिंदगी भर मरहूम रही,वहीं इस बच्ची के साथ भी तो नहीं होनेवाला है?इस बच्ची और‌उसमें कितनी समानताऍं हैं!उसे भी तो इसी तरह उसकी जन्मदात्री ने‌ कूड़े में फेंक दिया होगा।किसी ने‌ एहसान कर उसे जानवरों का निवाला बनने से पहले अनाथालय में पहुॅंचा दिया था। अनाथालय की जिंदगी याद कर उसकी ऑंखों में बार-बार दर्द उभर उठता है। वहाॅं की जिंदगी जानवरों से भी बदतर थी । वहाॅं पेट भर खाना भी उसी दिन नसीब होता था,जिस दिन किसी अमीर बच्चे का जन्म-दिन होता था। रिश्तों की कतरे भर की न तो सुगंध थी,न ही थोड़ी -सी भी अपनत्व की गर्माहट! वहाॅं जिन्दगी जैसे-तैसे घिसट रही थी।

अनाथाश्रम की संचालिका तो अनाथ बच्चों के नाम पर लोगों से खूब दान लेती थी, परन्तु अपने भाई के साथ मिलकर सारा पैसा हजम कर जाती थी।वह इन सब बातों को जानते हुए भी कपोत की भाॅंति ऑंखें बंद किए हुए थी, क्योंकि उसके वश में कुछ था ही नहीं।उसने जैसे-तैसे दसवीं पास कर ली थी।जबसे उसकी जिंदगी में यौवन ने दस्तक दिया था,तबसे उसकी जिंदगी और दूभर हो गई थी।उसे अपने चारों तरफ हवस भरी ऑंखें घूरतीं हुईं प्रतीत दिखतीं। कभी-कभी उस घुटन भरे माहौल से उसे भाग जाने की इच्छा होती, परन्तु उसके पास अनाथाश्रम छोड़कर कोई ठिकाना भी तो नहीं था!इसे वह अपनी नियति मानकर वहाॅं रहने को मजबूर थी।

आखिर बकरे की माॅं कब तक खैर मनाती?जिस बात का उसे डर था,वहीं हादसा एक रात उसके साथ घट गया।एक रात सोते समय अचानक से दो बलिष्ठ भुजाओं ने उसे दबोच लिया।उसकी चीख दबे हुए मुख के अंदर ही घुटकर रह गई।जैसे किसी शेर की गिरफ्त में आकर मेमने का शरीर छटपटाने के बाद सुन्न हो जाता है, ठीक वैसी  ही छटपटाहट वह महसूस कर रही थी।वह सुन्न पड़ चुकी थी।उसके इज्जत की अर्थी निकल चुकी थी।उस बदमाश ने उसके शरीर को रौंदते हुए अपनी हवस पूरी की और उसे धमकी देते हुए कहा -“ऐ लड़की! तुम्हारी भलाई इसी में है कि अपना मुॅंह बंद रखो। मैं कल फिर रात में तुम्हें जन्नत की सैर करवाने आऊॅंगा।”

उसके शब्दों को सुनकर वह पाषाण की भाॅंति भावविहीन हो उठी।उसकी ऑंखों के समक्ष ही उसकी मय्यत निकल चुकी थी।उसे समझते हुए देर नहीं लगी कि वह अनाथाश्रम संचालिका का कामी भाई ही था।जब रक्षक ही भक्षक बन जाऍं,तो फरियादी कहाॅं जाऍं?उसने अपनी सहेली से आपबीती कहने की कोशिश की।उसकी सहेली ने उसे समझाते हुए कहा -“नमिता!हमारी भलाई मुॅंह बंद रखने में ही है।जल में रहकर मगर से वैर नहीं किया जा सकता है!हमारा कौन-सा परिवार है,जो साथ देगा?हमारी जिंदगी तो कीड़ों -मकोड़ों से भी बदतर है। हमें इसी नर्क में जिंदगी भर रहना है!”

नमिता को ऐसी जिंदगी जीने से मर जाना मंजूर था।रात की बात याद कर उसकी रूहें काॅंप उठतीं।उसे अपनी जिंदगी से नफ़रत होने लगी।वह किसी कीमत पर दुबारा अपना शरीर उस कामी को सौंपना नहीं चाहती थी।उसी दिन शाम के धुॅंधलके में वह चुपचाप आश्रम से बाहर जान देने निकल गई, परन्तु बाहर आकर जान देने की हिम्मत नहीं जुटा पाई। जिंदगी से मायूस होकर पार्क के एक कोने में बैठकर अपनी किस्मत पर रोने लगी।बहते हुए ऑंसुओं पर काबू पाते हुए वह अपने आत्मबल सॅंजोने की चेष्टा कर रही थी,पर सफल नहीं हो पा रही थी।वह जोर-जोर से रोने लगी।उसे अपने चारों ओर दुख का उफनता सागर नजर आ रहा था,जिसका कहीं दूर-दूर तक कोई किनारा नजर नहीं आ रहा था।उसी समय किसी देवदूत की भाॅंति  रामलाल का अपनत्व भरा स्पर्श उसके कंधे पर पड़ा।

रामलाल की ओर देखते हुए उसकी उदास और निष्प्रभ ऑंखों में विषाद घनीभूत हो उठा। रामलाल ने उसे शुभचिंतक होने का विश्वास दिलाया। रामलाल का अपनत्व पाकर उसका हृदय द्रवित हो उठा।जिस प्रकार बाॅंध ढ़ह जाने से पानी का बहाव अत्यधिक तेज हो जाता है,उसी प्रकार रामलाल की सहानुभूति पाते ही उसके सब्र का बाॅंध टूट पड़ा।उसने अपनी दुःखभरी कहानी रामलाल को सुना डाली। रामलाल‌ उसके दुख से द्रवित होकर उसे अपने घर ले आऍं।अपने अतीत में विचरण करते हुए नमिता बच्ची को सीने से लगाए नींद के आगोश में समा गई।

अगली सुबह रामलाल की पत्नी सुधा के चिल्लाने से उसकी नींद खुल गई।सुधा ने पति पर चिल्लाते हुए कहा -” क्या आ पने इस घर को अनाथाश्रम समझ रखा है?जब ईश्वर ने हमें संतानें नहीं दी है,तो हम दूसरों के बच्चों से क्यों प्रेम करें?अभी इस बच्ची को घर से बाहर निकालो।”

रामलाल अपनी पत्नी की मन: स्थिति को भली-भांति समझते थे।एक संतान के अभाव में बेचारी जिंदगी भर काॅंटों की शय्या पर लोटती रही। लोगों के तानों से लहुलुहान होती रही। मातृत्व सुख के एहसास से वंचित रहीं। संतान की तड़प ने उसके हृदय को शुष्क और मातृत्वशून्य‍ कर दिया है । तबीयत खराब रहने‌ लगी है।वह बात-बेबात सभी पर चिल्लाने‌ लगती है, परन्तु दिल की बुरी नहीं है!

रामलाल पत्नी को समझाते हुए कहते हैं-”  तुम परेशान मत हो।हम जल्द ही इसे अनाथालय भेज देंगे।”

पति की बातों से सुधा आश्वस्त होकर कहती हैं -“बस इस घर में एक नमिता ही काफी है,इस बच्ची को मैं घर में देखना नहीं चाहती हूॅं।”

नमिता की सेवा-भावना  के कारण सुधा उससे लगाव महसूस करने लगी थी, परन्तु बच्ची को देखकर मुॅंह फेर लेती।नमिता सुधा की सेवा के साथ-साथ बच्ची की भी अच्छी तरह देखभाल करती।इतनी कम उम्र में ही वह एक बुजुर्ग और एक बच्ची की माॅं बन चुकी थी। आज तक उसने अनाथाश्रम में कई बुजुर्गों और बच्चों की सेवा की थी, परन्तु ऐसा सुखद एहसास उसे कभी नहीं हुआ था।इस घर को पाकर वह खुद को किस्मतवाली समझने लगी थी।अब वह बच्ची को किसी हालत में अनाथाश्रम नहीं जाने देना चाहती थी।कुछ ही दिनों में बच्ची से उसका जन्मों का रिश्ता बन चुका था।वह इन रिश्तों को ताउम्र सॅंजोए रखना चाहती थी,ताकि बच्ची को भी परिवार और रिश्तों का एहसास हो सके।जिन रिश्तों से वह जिंदगीभर मरहूम रही,उससे बच्ची ने रहे।

रामलाल भी बच्ची के वात्सल्य रस में डूबते जा रहे थे, परन्तु पत्नी की जिद्द के कारण उसे अनाथाश्रम भेजने को मजबूर थे। अनाथाश्रम में बच्ची को भेजने के बारे में बात कर चुके थे।एक सप्ताह बाद बच्ची का अनाथाश्रम जाना तय हो चुका था। ज्यों -ज्यों बच्ची के अनाथाश्रम जाने का दिन नजदीक आ रहा था, त्यों-त्यों नमिता का मन भावविहृवल हो उठता। रामलाल भी मानो इतने दिनों में ही बच्ची के साथ अपने अतृप्त एहसास को तृप्त कर लेना चाहते थे।बच्ची को देखते ही विछोह के एहसास से उनकी ऑंखें नम हो उठतीं।

जिस दिन  बच्ची को अनाथाश्रम जाना था,उस दिन नमिता और रामलाल ने जो देखा,वह उन्हें भावविभोर कर गया।जो सुधा बच्ची को सामने देखकर चिल्लाने लगती थी,वहीं सुधा मातृत्व रस से ओत-प्रोत होकर बच्ची को अपनी गोद में लेकर बोतल से दूध पिला रही थी।बच्ची भी एक हाथ से उसका ऑंचल पकड़कर उसे टुकुर-टुकुर देख रही थी।जिन मातृत्व रस को सुधा सदा के लिए मृत समझ रही थी,उस रस में डूबना-इतराना इस बच्ची ने उसे सिखा दिया था।बगल में खड़े रामलाल इस अनमोल पल को मंत्रमुग्ध भाव से निहार रहे थे। उन्होंने सुधा को सुनाते हुए जोर से कहा -“नमिता बेटी! बच्ची का सारा सामान समेट लो।आज उसे अनाथाश्रम पहुॅंचाना है!”

अचानक से सुधा ने बच्ची को अपने कलेजे से लगाते हुए कहा -“इस मासूम  ने मेरे भीतर ममता के समंदर का एहसास करा दिया है!इसके आने से मेरी बीमारी भी खत्म हो गई है।मेरी जिजीविषा भी बढ़ गई है। नमिता की तरह इसे भी हम गोद ले लेंगे। मैं दो-दो बेटियों की माॅं बनकर किस्मतवाली कहलाऊॅंगी।”

पत्नी की बातें सुनकर रामलाल मन-ही-मन सोचते हैं -“सचमुच मातृत्व में बहुत शक्ति है। इसलिए तो मातृत्व को अनमोल कहा गया है!”

बच्ची के साथ रहने के बारे में जानकर खुशी  से नमिता की ऑंखों से अश्रुधारा प्रवाहित होने लगी।उसने खुद और  बच्ची  को किस्मतवाली समझकर सुधा को‌ गले से लगा लिया।

समाप्त।

 लेखिका -डाॅ संजु झा (स्वरचित)

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