पचासी साल पूरे कर चुकीं हैं सासू मां।सारे दांत निकलवा लिए है, दर्द से हार कर।अपनी जिंदगी में क्या कुछ नहीं सहा है उन्होंने? उन्हें देखकर तो शुभा खुद से ही लड़ती रहती है।जब मां इस उम्र में अपनी इच्छाशक्ति के बल पर स्वयं को खुश रख सकतीं हैं, तो वह क्यों नहीं?
आंखों की पलकों पर भी चांदी की रंगत आ गई अब तो, पर अब भी डॉक्टर के उम्र पूछने पर ऐसे टाल देतीं हैं , जैसे सुना ही नहीं।पिछले पैंतीस वर्षों से साथ रहते हुए, अब शुभा का चेहरा भी उनसे मिलने लगा।कोई भी अपरिचित आने पर यही समझता कि वे उसकी ही मां हैं।कानों में कम सुनने की शिकायत कर रहीं हैं आजकल।पिछले दो सालों में दोनों आंखों का सफलतापूर्वक मोतियाबिंद का ऑपरेशन भी करवा चुकीं हैं वे।अब शायद कान भी दिखाना पड़ेगा डॉक्टर को।इन बीते हुए सालों में ऐसा नहीं कि उनकी आदतों में कुछ बदलाव नहीं हुआ।हां कुछ आदतें आज भी जस की तस हैं।
सुबह सबेरे चाय के तुरंत बाद अखबार पढ़ना उनकी सबसे पसंदीदा आदत है।मजाल है कि दैनिक भास्कर की जगह कोई और स्थानीय अखबार आंगन में आ जाए।कभी आया भी तो शुभा को याद दिलाना नहीं भूलती थीं”देखा ना तुमने,इस बार पांच दिनों से दैनिक भास्कर नहीं डाला लड़के ने।बिल देकर गया है कल।तुम जब पैसे दोगी,पांच दिन का काट कर देना।”
शुभा झल्लाकर जवाब भी देती”अच्छा मां ,खबरें तो पढ़ी हैं ना आपने।वो चाहे किसी भी अखबार की हों,क्या फर्क पड़ता है?” वे हथियार कब डालने वाली होतीं।तुरंत कहतीं”अरे, आ गया तो पढ़ लिया।सबमें वो पटनायक का माइथोलॉजी वाला कॉलम कहां होता है?”
“हैं!!!!!!!,ये कौन सा कॉलम है मां?पूरे अखबार को इतनी बारीकी से पढ़ती हो तुम?बाप रे!मानना पड़ेगा तुम्हें।” शुभा को ही बात खत्म करनी पड़ती।
तब वे आखिर में गर्व से मुस्कुरा कर कहतीं”यही तो मेरी आदत है सबसे पुरानी।पटनायक जी के कॉलम में अलग-अलग धार्मिक स्थलों की मान्यताएं इतनी अच्छी तरह से बताई जातीं हैं,मन खुश हो जाता है।एकदम सौ प्रतिशत सत्य घटनाओं का विवरण देतें हैं वो।”
शुभा चकित होकर चुप हो जाती। उम्र का असर शरीर के अधिकतर अंगों पर साफ दिखने लगा है,पर वाह रे याददाश्त!!!!!सब कुछ याद रहता है इन्हें,विशेषकर बिल्स।पेपर वाले का, दूध वाले का, धोबी का सबका।शुभा को भी याद दिलाने का दायित्व उन्हीं का है।महीने के आखिरी में जैसे ही डिश टीवी का नोटिफिकेशन आता है स्क्रीन पर, बिस्तर में बैठे-बैठे ही तुरंत दोहराना नहीं भूलतीं” आज रात आपका कनेक्शन बंद हो जाएगा।तुरंत रीचार्ज करें।” शुभा कभी -कभी तो खिसिया ही जाती थी,रोटी बनाते हुए जाकर कहती”मां, ठीक है।कल कर दूंगी ना सुबह।आज तो अभी चल रहा है ना, देखो।” वो किसी मासूम बच्चे की तरह मुंह लटकाकर कहतीं, “नहीं, मैंने बता दिया बस, स्क्रीन पर आ रहा है ना।” शुभा सोचती बाद में, शाम से टीवी देखकर ही तो समय काटतीं हैं मां।ना कहीं आना ना जाना।सुबह दो -तीन घंटे अखबार।फिर दोपहर में रामायण या कोई और धार्मिक किताब पढ़ती हैं।शाम को क्या करें वे? हम सारे दिन में कितने लोगों से मिलतें हैं, ढेरों बातें करतें हैं।ये औरत पिछले पांच सालों से (पैर के ऑपरेशन के बाद )कहीं नहीं निकलती।कभी -कभार मंदिर या एक दो बार बाहर खाने ले जाती है शुभा, बेटे के साथ उन्हें।
जो पेंडिंग बिल उनकी नजरों के सामने आता है,वह तो वे याद दिला देतीं हैं,पर अपने मोबाईल की रीचार्ज की तारीख तो उन्हें पता नहीं होती।
नहाने जाते समय भी मोबाईल पास की टेबल पर रखतीं हैं वो।बाहर धूप में बैठने पर साथ में मोबाईल होता है।कितनी बार शुभा ने कहा”फोन लगा दूं क्या बेटियों को? फोन हांथ में लिए बैठी रहती हो। रीचार्ज किया हुआ है फोन।कॉल तो तुम कर ही सकती हो।दोनों बेटियों के नाम से सेफ है।मुझे अच्छा नहीं लगता ऐसे ।”
उनका तर्क सुनकर शुभा की नसों में सरसराहट होने लगी।वे बोलीं”,नहीं रे बहू,दोनों अपने घरों में ,परिवार के काम में व्यस्त रहती हैं।समय असमय यदि मैं फोन करूं तो,वो क्या सोचेंगी?बात करने का मन ना हो ,तो भी करना पड़ेगा उन्हें।मैं तो बस फोन साथ में इसलिए रखतीं हूं,कि जब वो फोन करें ,तो मैं तुरंत उठा सकूं।” एक मां अपने बच्चों के स्वास्थ्य, परिवार,बच्चों, संपत्ति,सुविधा के अलावा उनके समय के बारे में भी सोच सकती है,यह समझ से परे था शुभा के लिए।
अक्सर स्कूल से आकर पूछा लेती” मां,फोन आया था किसी का?बात हुई?”कभी तो खुश होकर बतातीं” हां आया था अमृता का,या अर्पिता का।कभी हताश होकर कहतीं”नहीं एक हफ्ते से फोन नहीं आया उनका।”रात में फिर शुभा छोटी ननद को फटकार लगाना नहीं भूलती “इतना व्यस्त रहती हो तुम,मां को एक फोन भी नहीं कर सकती?थोड़ा मेरी बुराई ही कर लिया करो,अच्छा लगेगा उन्हें।” वो हंसकर कहती”तुम्हारी सास बात ही कहां करती है ज्यादा।एक दो वाक्य के बाद ही बोल देखतीं हैं कि ठीक है यहां सब।तुम लोग अपना ख्याल रखना।तुम्हारी बुराई करने की हिम्मत है हममें उनके पास।ना बाबा ना।हमें ही सुना देंगीं।तुम तो सबसे लाड़ली हो उनकी।”शुभा भी मजा लेकर कहती” और नहीं तो क्या,बिचारी बहू के डर से बेटियों के पास बुराई भी नहीं कर पाती होगी।हाय रे किस्मत!”छोटी ननद भी साथ में हंसने लगती।ऐसा ही है हमारा ननद भाभी का रिश्ता।
बड़ी ननद थोड़ी तेज है स्वभाव से।जब भी फोन करेगी,मां को कुछ ना कुछ ताने जरूर मारेगी।कभी उसकी जल्दी शादी कर देने का ताना,कभी उसे ज्यादा पढ़ाई ना करवाने के ताने,कभी बचपन में उसे मारने के ताने।कई बार शुभा ने खुद अपने कानों से सुनी थी, उसकी जली -कटी बातें।कई बार तो मां खुद ही दुखी होकर सारा कुछ बता देतीं शुभा को किउसने ये बोला, वो बोला।शुभा को एक दिन बहुत गुस्सा भी आया जब मां फोन पर कहा रहीं थीं अपनी बड़ी बेटी से” अब बेटे का ब्याह कर दे रे। उम्र बीतती जा रही है उसकी।मेरे सुंदर नवासे के लिए राजकुमारी जैसी लड़की ले आ ।तू भी फुर्सत पा जाएगी।मैं भी मरने से पहले उसकी दुल्हन देख लूंगी।”उसने तपाक से बहुत गन्दे लहजे में कहा था ” हां तो अब तुम्हारे लिए मैं अपने बेटे की आनन-फानन में शादी तो नहीं कर सकती ना।आजकल की लड़कियों के बारे में तुम क्या जानो? आते ही घर तोड़ देतीं हैं।तुम क्या चाहती हो? तलाक हो जाए।”,उस दिन शुभा से रहा नहीं गया ।मां से सख्ती से बोली थी”आज के बाद उसका फोन आए तो काट देना।बेटी होकर कितनी बातें सुनातीं हैं तुम्हें?, और तुम कैसी मां हो? कुछ कहती क्यों नहीं?, अगली बार अगर उसने ऐसे बात की तुमसे,और तुमने उसे कुछ नहीं कहा तो ,देखना।मैं फोन में रीचार्ज ही नहीं करवाऊंगी।ना लगेगा कॉल, ना वो सुना पाएगी तुम्हें।”
एक मां ने बड़े कातर स्वर में कहा अपनी बहू से” अरे!मां हूं ना मैं।भले बात सुनाए या ताने मारे।सप्ताह में दो दिन उसकी आवाज तो सुन लेती हूं।मेरे मन को शांति मिल जाती है।ख़ुद की परेशानी तो किसी से कह नहीं पाती,मुझ पर ही चिड़चिड़ा कर उतार लेती है अपना गुस्सा।”शुभा की आंखों से आंसू लुढ़कने लगे।ये है मां।इस जगत में मां से बड़ी कोई पूंजी नहीं।जो अपने बच्चों की आवाज सुनने के लिए उनका गुस्सा भी झेलने को तैयार हैं,वह मां ही हो सकती है।
पिछले महीने ही बड़ी ननद को ब्रेन अटैक आया था।शुभा को भांजे ने बताया था और यह भी कहा था कि अभी नानी को ना बताए शुभा।शुभा ने बताया भी नहीं।बेटी अस्पताल में एडमिट थी,और मां हाथों में फोन लिए कॉल का इंतजार कर रहीं थीं।पूछने पर कहतीं” अमृता ठीक है कि नहीं , कोई फोन ही नहीं कर रही।तुमसे बात हुई क्या? छोटी बेटी भी कुछ बताती नहीं।”शुभा ने छेड़ते हुए कहा” अच्छा तो , जली -कटी बातें सुन नहीं पा रही तो ,दुख हो रहा है क्या?, “,वो हंसती भी रहीं साथ में। अस्पताल से आने के बाद ही उन्हें बताया शुभा और छोटी ननद ने।यह भी बताया कि बात करने से मना किया है अभी डॉक्टर ने।तीस दिसंबर को छोटी ननद ने बताया होगा उन्हें कि अब अमृता बात कर पा रही है।सुनकर शुभा के आने का इंतजार था उन्हें।स्कूल से घर पहुंचते ही खिली-खिली हंसी के साथ बताया उन्होंने कि अमृता अब पहले से काफी ठीक है।बात कर सकती है अब, पर धीरे-धीरे।
शायद फोन पर शुभा के पे टी एम पर नोटिफिकेशन आ रहे थे,नंबर रीचार्ज के।आदतन शुभा भूल भी जा रही थी।कल दिन में बाजार से कुछ पूछना चाह रही थी उनसे लाने के लिए।जैसे ही कॉल लगाया मां का,स्विच ऑफ बताने लगा।घर आकर बरस पड़ीं उन पर कि चार्ज क्यों नहीं किया फोन अपना।कभी भी इमेरजैंसी में कितना टैंशन हो जाता है,और भी ना जाने क्या-क्या। उन्होंने सहज होकर बताया कि कल भी चार्ज हुआ था फोन और आज भी किया है उन्होंने।
शुभा को अब अपने पे टी एम को चैक करना था।वहीं हुआ था। वैलिडिटी समाप्त हो चुकी थी दो दिन पहले ही।एक ग्लानि का बोध हुआ मन में।कहीं और कोई फोन किया होगा ,तो टैंशन में आ गया होगा।नए साल के नए दिन में शुभा ने मंदिर जाने से पहले उनका फोन रीचार्ज कर दिया।पता नहीं क्यों जैसी शांति मंदिर जाकर मिलती है ना,आज सुबह वैसी ही शांति की अनुभूति हुई।मां फोन लेकर धूप सेंक रही थीं।इशारे से पूछा” क्या आया किसी का फोन?”,शुभा अमृता को इंगित कर रही थी । उन्होंने कहा”नहीं छोटी की थी।विश किया बच्चों ने नए साल पर।मैंने आशीर्वाद दिया।छोटी बताई कि दीदी भी जल्दी ही करेगी।जब वो करेगी , तब कर लूंगी बात। रीचार्ज तो समय पर करवा ही दिया होगा तुमने?”,
यह रीचार्ज केवल फोन का नहीं,रिश्तों का भी तो होता है।अब कल मैं ही लगाकर बात करवा दूंगी,मां की अमृता से।आवाज तो सुन पाएंगी कम से कम।ज्यादा बात नहीं करेंगी बस।
शुभ्रा बैनर्जी