थोड़ा और कमा लूं – के आर अमित

ये कहानी एक मनोज की नही बल्कि हर उस आदमी की है जो हजारों सपने लेकर घर से बाहर निकलता है । स्कूल की पढ़ाई खत्म करके अभी जवानी में कदम रखा ही था कि नौकरी की फिक्र सताने लगी। कुछ छोटी मोटी नौकरी मिली भी तो सैलेरी इतनी कम थी कि अपना गुजारा करना भी मुश्किल था। मनोज को लगा कि इस तरह जिंदगी नही गुजरेगी किसी दोस्त ने सलाह दी कि विदेश चले जाओ वहां बहुत पैसा है और जिंदगी भी ऐश में कटेगी। मनोज ने सोचा की क्यों न दो साल तक बाहर जाकर ढेर सारा पैसा कमा लूं फिर घर मे आकर अपना कोई बिजनेस करेगा। वो सोते जागते सपने देखने लगा उसका बड़ा आलीशान घर है घर की छत पर किरसी लगाकर चाय की चुस्कियों के साथ अखवार पढ़ रहा है। सामने आंगन में हरा भरा बगीचा है। नौकरानी फर्श पे पोछा लगा रही है। और मनोज आंगन में खड़ी चमचमाती गाड़ी पर पानी मारने को कहता है। पूरे गांव में उसके जितना अमीर कोई नही है। रिश्ते के लिए खूबसूरत लड़कियों की लाइन लगी है। ऐसे ही खुली आँखों से सपने देखते देखते उसे कब नींद आ जाती पता नही चलता।

कुछ कोशिश करने के बाद उसे इंटरव्यू के बाद अरब के एक देश मे क्लीनर की नौकरी लग गई। मनोज के सपने उसे सच होते दिखने लगे क्योंकि एजेंट ने बताया था कि उसको इंडिया के हिसाब से पचास हजार सैलेरी मिलेगी ऊपर से अरबी लोग टिप इतना देते हैं कि लाख डेड लाख महीने का कमा लेगा। मनोज अब विदेश पहुंच गया। बारह घण्टे की ड्यूटी दो घण्टे का ट्रांसपोर्ट आकर खाना बनाओ एक रूम में आठ आदमी बाथरूम की लाइन किचन की लाइन में दो घण्टे और चले जाते। कुल मिलाकर सोलह से सत्रह घण्टे के बाद सोने को मिलता फिर सुबह ड्यूटी जाने की फिक्र।

मनोज खा पीकर तीस हजार रुपये घर भेज देता। घर वाले रिश्ता देखने लगे। छः साल में जो कमाया वो शादी में लग गया। मनोज फिर उसी मोड़ पे खड़ा था खाली हाथ। अब रिश्तेदारी बढ़ी तो खर्चे और बढ़ गए कहीं शादी जन्मदिन दिन त्योहार कुल मिलाकर जो भेजता खर्च हो जाता। उसकी बीबी ने जैसे कैसे छः साल तक थोड़े थोड़े पैसे बचाकर दो कमरे एक रसोई और बाथरूम की निंब भरा दी। कई साल तक निंब ऐसे ही भरी रही जब भी लोग पूछते की मकान कब डालोगे तो कहता कि अभी नींव पर जितनी बरसात पड़ेगी ये मजबूत होगी तभी मकान का काम शुरू करेंगे। 

कुछ साल और पैसे जोड़े गए तो घर का ढांचा खड़ा हुआ मगर अब मनोज सोचता कि जबतक पलस्तर न हो जाए तबतक घर नही जाऊंगा एकबार पलस्तर हो जाए तो नौकरी छोड़कर घर चला जाऊंगा। इसबार छूती गया तो बीबी को बोल आया कि अबकी बार पैसे इकट्ठा करके पलस्तर करवा लो फिर में घर मे ही आकर कोई काम करूंगा। मगर जब पलस्तर हुआ तो बीबी कहने लगी कि बिना खिड़की दरवाज़ों के भी भला कोई घर होता है कोई भी चोर या जानवर रात को अंदर घुस आए। 

मनोज ने दो साल औरकाम कर्म की सोची अब उसने घर के दरवाजे लगवा लिए मगर जब वो घर गया तो गांव के ज्यादातर लोगों के फर्श की जगह संगमरमर लगा देखा आंगन में सीमेंट के ब्लॉक लगे देखे तो उसे लगा कि लोग क्याकहेँगे क्यों न मैं भी दो साल और लगाकर संगमरमर लगा लू। खैर दो साल एयर गुजरे तो उसने भी फर्श की जगह संगमरमर लगा लिया बाहर आंगन में ब्लॉक लगा लिए। अब बीबी कहने लगी कि देखो अब सारा काम हो गया बस एक चारदीवारी हो जाए तो कम से कम आदमी की चिंता खत्म हो जाए जैसे मर्जी अपने घर मे बैठे और आजकल चोरी चकरी भी बहुत बढ़ गयी है कम से कम चारदीवारी के साथ एक गेट हो तो ताला लगाकर काईन भी आदमी चला जाए।

मनोज को बात सही लगी इसने सोचा थोड़ा और कमा लूं तो चारदीवारी और गेट लगा लूं। दो साल और गुजरे अब चारदीवारी गेट भी लग गया मगर अब उसकी बेटी सोलह साल की हो गई बेटा नौंवी में जाने लगा अब घर मे बात हुई तो ख्याल आया कि दो चार साल में बेटी की शादी करनी है उसके लिए गहने दहेज शादी का खर्च कहाँ से होगा। अब उम्र भी तो चालीस की हो गई यहां आकर क्या काम करोगे और छोटे मोटे काम मे बेटी की शादी कैसे होगी। बस इसी फिक्र में मनोज को छः साल और लग गए अब बेटी की शादी हुई तो बेटा ग्रेजुएशन करके किसी कोर्स करने की जिद्द करने लगा जिस भी संस्थान में बात होती लाखों रुपये एडमिशन फीस और हजारों में फीस थी अब घर जाकर तो संभव नही होता।

मनोज ने बैंक से पांच लाख कर्ज लेकर उसका एडमिशन करवा दिया अब हर महीने बैंक की किश्त बेटे की फीस के बाद घर चलाना भी मुश्किल हो गया मगर जैसे कैसे दस साल लगाकर उसने बैंक का कर्ज चुकाया इतना महंगा कोर्स करने के बाद बेटे को जो नौकरी मिली वो हमेशा यही कहता कि पापा कमरे का किराया और मेरा खर्च भी इस सैलेरी में मुश्किल से पूरा होता है। मनोज अब बासठ साल का हो गया था। विदेशो की लाइफस्टाइल और पैक्ड फ़ूड की बजह से शुगर बीपी और जाने किन किन बीमारियों ने घेर लिया। कुछ दिन से उसकी तबियत ज्यादा खराब थी मगर वहां मेडिकल कम्पनी की तरफ से फ्री था तो वहीं हॉस्पिटल में एडमिट हो गया उसे पता था घर जाकर दवाई का खर्च कहाँ से देगा। 

एक हफ्ता हॉस्पिटल में रहने के बाद अचानक उसकी सांसे थम गईं। दो तीन दिन बाद उसकी बॉडी एक दो फुट छोड़े छः फुट लम्बे ताबूत में घर पहुंची। घरवालों के रो रोकर बुरा हाल था। मनोज ने जो सपने देखे थे वो सब उसके साथ खत्म हो गए उसका घर तो बना था मगर उसने उस घर मे कभी दो महीने से ज्यादा रहकर नही देखा और रहा भी तो उस घर की मरम्मत में ही लगा रहा। थोड़ा और कमा लूं के चक्कर से वो कभी निकल ही नही पाया। ऐश की जिंदगी तो दूर वो कभी अपनी जिंदगी को जी भी नही पाया उसे पता ही नही चला कब उसकी जवानी निकली कब वो बूढ़ा हुआ कब उसके बच्चे जवान हुए और कब वो दुनिया को अलविदा कह गया।

               के आर अमित

     अम्ब ऊना हिमाचल प्रदेश

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