इज्जतदार – सीमा गुप्ता

“नवीन जी, बहुत-बहुत धन्यवाद। आपकी समय पर मदद से मेरा बेटा बिल्कुल ठीक हो गया… वरना हम तो घबरा ही गए थे।” 

“मिसेज़ एंड मिस्टर नवीन, थैंक्यू सो मच फॉर योर कोऑपरेशन!”

फंक्शन में आए पड़ोसी, नवीन और उसकी पत्नी नीरू की ओर मुस्कुराते हुए सिर हिलाकर आभार जता रहे थे। यह दृश्य जितना सहज था, उतना ही किसी के भीतर कांटा भी बन रहा था।

दूसरे छोर पर खड़ी अनीता, नवीन की भाभी, दूर से सब कुछ देख तो रही थी लेकिन सुन नहीं पा रही थी। उसे लगा कि आज के इस भव्य भोज, सजावट और व्यवस्था का सारा श्रेय नवीन और नीरू बटोर रहे हैं। उसे यह बात भीतर तक खल गई। उसने एक-दो पड़ोसियों को पकड़कर कहा, “कुसुम दीदी, अपने बेटे की शादी का भात न्योतने हमारे यहां आई हैं। ये शानदार इंतज़ाम मेरे पति सुरेश ने किया है। नवीन की इतनी औकात कहाँ…”

मोहल्ले में सुरेश और उसके छोटे भाई नवीन के घर आमने-सामने थे। सुरेश एक बड़ा सरकारी अधिकारी था, जबकि नवीन एक छोटी किराने की दुकान चलाता था।

सुरेश की पत्नी अनीता मोहल्ले की सबसे मुखर और अग्रणी महिला थी। उसके अनुसार इज्जतदार होने का मतलब था:

-मोहल्ले की हर सामाजिक समिति में उच्च पद पर होना।

-महंगी साड़ियाँ पहनना, बड़े घर का दिखावा और अपनी अमीरी का बखान करना।

-दूसरों को बताना कि उसका परिवार कितना सफल है।

इसके उलट, नवीन और नीरू का मानना था कि इज्जतदार होने का अर्थ है:

-मन में दुर्भाव न रखना।

-किसी की मदद करके एहसान न जताना।

-कमाई का थोड़ा हिस्सा हमेशा किसी ज़रूरतमंद के लिए बचाकर रखना।

सुरेश और नवीन की बड़ी बहन हैं, कुसुम। अगले सप्ताह उसकी बड़ी बेटी प्रज्ञा की शादी है। वह अपने भाइयों को भात (मायरा) की रस्म का न्योता देने आई है। घर में पहले भात को लेकर दोनों भाइयों के परिवार भी उत्सुक हैं। जहां सुरेश और अनीता के लिए अपने रुपए-पैसे के बल पर बड़ा भात भरना अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ाने का अवसर है, वहीं नवीन और नीरू के लिए यह अपनी बड़ी बहन के प्रति प्यार, सम्मान और कर्तव्य निभाने का अवसर है।

इसी उपलक्ष्य में ही आज कुसुम के आने पर सब पड़ोसियों को भोज पर निमंत्रित किया गया था और भात के गीत गाकर खुशी मनाई गई। लेकिन पड़ोसियों का अपने देवर-देवरानी के प्रति प्रेमपूर्ण व्यवहार आज अनीता के मन में ऐसा चुभा कि उन सबके जाने के बाद, उसने अपनी ननद कुसुम से कहा, “दीदी, हम अपना भात अलग देंगें। आप दोनों भाइयों की मिनती के लिए अलग-अलग समय रखिएगा। आप तो जानती ही हैं, नवीन के पल्ले कुछ नहीं है, थोड़े पैसे उससे लेकर, संयुक्त भात देने से हमें क्या हासिल होगा! वह यूं ही हमारे बराबर की वाहवाही लूट लेगा! जब भगवान ने हमें इतना दिया है, तो हम भात में खुल कर खर्च करेंगे, लेकिन समाज में नाम और इज्जत भी हमारी ही होनी चाहिए।”

कुसुम और सुरेश, दोनों को ही अनीता की बात अजीब लगी। सुरेश ने कहा, “अनीता, कैसी बातें कर रही हो? नवीन मेरा भाई है। उसकी इज्जत अलग कैसे हो सकती है? मानता हूं कि न तो उसे पैसा कमाने का गुर आता है, और न ही उसे पता है कि आजकल पैसे से ही इज्जत होती है। उस पर तो ईमानदारी का भूत चढ़ा रहता है। मैं कई बार समझाता हूं उसे कि ये सब छोड़! पर उस पर असर ही नहीं होता! पर मैं बड़ा हूँ, उसे अलग नहीं कर सकता।”

कुसुम ने भी कहा, “अनीता भाभी, परिवार की इज्ज़त हमेशा साझी होती है। आप दोनों भाइयों के परिवार एक होकर आएं, उसी से मेरे सुसराल में मेरी और मेरे मायके की शोभा है। भात का उद्देश्य पैसा नहीं, प्रेम है। पैसा कभी अपनेपन से बड़ा नहीं हो सकता। रुपए-पैसे का तो कोई ओर-छोर ही नहीं होता। इसलिए भात में ज़्यादा दिखावे की कोई आवश्यकता नहीं। आप पैसा बच्चों के भविष्य के लिए रखिए। बस रस्म अदायगी के लिए थोड़ा-थोड़ा दोनों मिलकर दे दो। एक साथ अपनी बहन के द्वार आ जाओ। इस प्रेम से बढ़कर मेरे लिए कोई खुशी नहीं।”

अब अनीता के पास कोई जवाब नहीं था। दोनों भाइयों ने संयुक्त भात दिया। हालांकि सुरेश की तुलना में नवीन की कमाई काफी कम है, पर वह गरीब नहीं है। सीमित आय से परिवार के भरण-पोषण के साथ सब आवश्यक कार्यों के लिए हर महीने एक निश्चित राशि अलग रखने की आदत है नवीन और नीरू को। इसलिए भात में भी उसने अच्छा-खासा योगदान दिया। अब ये बात अलग है कि सुरेश ने उसका दोगुना दिया। अच्छे से भात-भराई की रस्म हुई।

लेकिन शादी समारोह के दौरान सुरेश ने नवीन पर अहसान जताना जारी रखा और अनीता तो प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से कुसुम के सुसराल के सब सदस्यों को बताने में लगी रही कि असली भाती हम ही हैं, इस नवीन ने तो हमसे आधा दिया है।

मोहल्ले में भी स्वघोषित ‘इज्जतदार’ का टैग चिपकाए रखते सुरेश और अनीता, क्योंकि वे मोहल्ले के हर फंक्शन में आगे होते थे। अनीता तो अक्सर कहती रहती, “नीरू तो हमेशा पुरानी साड़ियाँ पहनती है, और नवीन की दुकान से तो ₹500 का सामान भी नहीं आता। हमारे खर्च तो लाखों के हैं। भई, हम तो इज्जतदार हैं।”

नवीन और नीरू का परिवार साधारण माना जाता था, क्योंकि वे चुपचाप अपने काम से काम रखते थे। सुरेश कई बार उपहास करते हुए कह देता, “नवीन, मैं लाखों का लेन-देन एक फोन पर करता हूं और तुम ईमानदारी में लगे रहते हो! इसी कारण तुम आज भी वहीं हो!”

नवीन और नीरू को भाई-भाभी के ताने बहुत चुभते। उनके दिल को ठेस पहुंचती, पर बड़ों को उल्टा जवाब क्या ही दें! कभी-कभी बस इतना बोल देते, “भैया-भाभी, हम ऐसे ही संतुष्ट हैं।”

इसी तरह कई वर्ष बीत गए।

सुरेश की बेटी पायल, एक मेधावी छात्रा थी और उसका दाखिला देश के एक प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेज में हो गया। यह पूरे परिवार के लिए गर्व की बात थी, पर फीस बहुत ज़्यादा थी। अनीता ने हर जगह डींगें मारीं कि वे फीस आराम से भर देंगे।

फीस तो अगले महीने भरनी थी पर इससे पहले ही एक बड़ा संकट खड़ा हो गया। सुरेश जिस विभाग में था, वहाँ सरकारी फंड के डायवर्जन का एक बड़ा घोटाला सामने आया। सुरेश का नाम सीधे तौर पर आया, क्योंकि उसने ऊपर के अधिकारियों के दबाव में कुछ कागजात पर दस्तखत किए थे। अपने सहयोगियों के साथ सुरेश को भी गिरफ्तार कर लिया गया।

एक ही झटके में, सुरेश की सारी वाहवाही और इज्जत ध्वस्त हो गई। उनका 24 घंटे का दिखावा, महंगी कार और महंगी साड़ियाँ अचानक इज्जत नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार की निशानी बन गई। अचानक, मोहल्ले के लोग सुरेश के परिवार से दूर भागने लगे। उनके सारे दोस्त उनका फोन उठाना बंद कर चुके थे। ऐसे में नवीन, नीरू और बहन कुसुम दायां हाथ बनकर साथ खड़े रहे। नवीन ने अपने सारे कानूनी संपर्क लगाए, जो उसने ईमानदारी के बल पर सालों में बनाए थे। उसके अथक प्रयासों से ही सुरेश को जमानत मिली।

सुरेश की काफी जमा पूंजी जब्त कर ली गई। उसके केस सुलझाने की प्रक्रिया में बचा-खुचा पैसा, संपत्ति पानी की तरह बहने लगे। उसे नौकरी से भी बरखास्त कर दिया गया। उनके पास पायल की फीस भरने के लिए एक पैसा नहीं बचा था। अंतिम तिथि पास आने लगी थी।

सुरेश और अनीता बेटी के सामने शर्मिंदा बैठे थे। तभी नवीन और नीरू उनके घर पहुंचे। नीरू ने अनीता के पास जाकर एक लिफाफा रखा। अनीता ने खोला, उसमें पायल की पहले साल की पूरी फीस का चेक था। हालात से लाचार अनीता ने हैरानी से कहा, “यह चेक… यह कहाँ से आया? नवीन, तुम्हारी तो इतनी कमाई नहीं है… और किस हक से हम ये लें…मैने तुम्हें हमेशा……” उसकी आवाज भर्रा गई।

नवीन ने समझाया, “भाभी, यह मेरी कमाई नहीं, हमारी सालों की ईमानदारी है। हम हर महीने एक निश्चित रकम बेटी शानू की उच्च शिक्षा के लिए अलग रखते हैं। शानू अभी छोटी है। उसके लिए अभी समय शेष है। अभी हमारी बड़ी बेटी पायल को इसकी आवश्यकता है।”

सुरेश भी आंखे नीची कर बोला, “बड़ा भाई होकर भी मैंने तुझे सिर्फ ताने दिए हैं। फिर भी तू पायल के लिए शानू का भविष्य दांव पर लगा रहा है! छोड़…पायल को मना कर देंगे…।”

नवीन ने गहरी सांस ली, “भैया, हम न तो आदर्शवादी हैं और न ही झूठ बोलेंगे। आप लोगों के ताने मुझे और नीरू को सच में दर्द देते थे, गुस्सा आता था… पर हमारे रिश्ते की नींव, तानों और पैसों से ज्यादा गहरी है। हम नहीं चाहते कि चाचा-चाची होकर अब हम अंहकार पकड़ लें और पायल का भविष्य रुके!”

नीरू ने अनीता का हाथ पकड़ा, “भाभी, मुश्किल की इस घड़ी में मैं पुरानी बातें पकड़कर नहीं बैठूंगी। हम सब एक परिवार हैं, मिलकर इस समस्या को हल करेंगे। एक-दूसरे के साथ खड़े होने में ही हमारी इज्जत है।”

सुरेश और अनीता की आंखों में पश्चाताप के आंसू आ गए। सुरेश ने हाथ जोड़कर कहा, “नवीन, नीरू, हमें समझ नहीं आ रहा कि किन शब्दों में हम कृतज्ञता व्यक्त करें। सच्चे इज्जतदार तुम हो जो अहंकारी भाई के प्रति क्षमा और दया का भाव रखते हो।”

अनीता ने भी स्वीकार किया कि उसने जिस चीज को इज्जत माना था, वह केवल अहंकार था। नवीन और नीरू की सादगी और मौन त्याग में ही सच्ची इज्जत है। उन्होंने कभी अपने भाई-भाभी को मान देना नहीं छोड़ा!

पायल ने उस फीस से इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू की। उसने हमेशा अपने चाचा-चाची के इस त्याग को याद रखा।

सुरेश ने नौकरी छूटने के बाद नवीन के साथ व्यापार में हाथ बँटाया। उसने पहली बार महसूस किया कि ईमानदारी से कमाए गए 100 रुपये, 1000 रुपये की बेइमानी की कमाई से कहीं ज़्यादा इज्जत देते हैं।

एक शाम, सुरेश दुकान बंद करते हुए नवीन से बोला, “नवीन, मैं हमेशा तुझे समझाता था कि ईमानदारी गरीबी का मुखौटा है. अब मुझे समझ आया कि असली इज्जत, दिखावे और आडंबर में नहीं, बल्कि परिवार के सदस्यों के प्रति निस्वार्थ प्रेम और ईमानदारी में निहित होती है।”

अनीता ने भी दिखावे और आडंबर की जिंदगी छोड़ दी। अब वह नीरू के साथ मिलकर मोहल्ले की जरूरतमंद महिलाओं की मदद करने लगी थी। उसने महसूस किया कि नीरू के चरित्र की दृढ़ता और दयालुता के कारण महिलाएं उसकी इज्जत करती थी।

नीरू के जन्मदिन पर अनीता ने उसे ग्रीटिंग कार्ड दिया, जिसमें लिखा था, “नीरू, जन्मदिन की बहुत-बहुत शुभकामनाएं। हमेशा खुश रहो, क्योंकि हमारी खुशियां तुमसे हैं। तुम वो अनमोल हीरा हो जिसने मुझे सिखाया कि इज्जतदार हम अपने व्यवहार से बनते हैं। इज्जत धन का शोर नहीं, चरित्र की ख़ामोश महक है। यह उन लोगों के पास स्वतः चली जाती है जो बिना बोले अच्छा करते हैं। जैसे नमक खाने में अदृश्य रहकर स्वाद पैदा करता है, वैसे ही ईमानदारी और त्याग परिवार और समाज में अदृश्य रहकर इज्जत और स्थायित्व पैदा करते हैं। तुम्हारा बहुत-बहुत आभार!”

-सीमा गुप्ता (मौलिक व स्वरचित)

-साप्ताहिक विषय: #इज्जतदार

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