आंखों में सपना सजाये मखमली एहसास लिए सलोनी डोली में विदा हो ससुराल आई ।
नाम के अनुरूप उसकी छवि उतनी ही निराली और आकर्षक, जो एक नजर देख ले तो देखता ही रह जाए । विवाह के तीन-चार दिन तक तो दुल्हन की मुंह दिखाई की रस्म चलती रही जो ही देखता बलाइया लेते ना थकता।
सप्ताह बीत गया सभी नाते रिश्तेदार घर जा चुके थे।
बहू की पहली रसोई बेहद स्वादिष्ट व्यंजन के साथ डाइनिंग टेबल पर लोग चटकारे ले रहे थे, तभी सलोनी की सासू मां कौशल्या ने टांट कसते हुए कहा… “बहु तुम्हारे घर तो दाल चावल के ही लाले पड़े रहे फिर पनीर कोफ्ता दाल मखानी कैसे बना लेती हो?
सलोनी यह सुनकर झेंप गई और सीर नीचे कर बोली..
‘ मां जी मैंने विवाह से पहले कुकिंग का कोर्स किया था’ ।
सलोनी के आने से वह घर स्वर्ग हो गया था ।
सुबह होते वह नहा धोकर पूजा- पाठ, आरती करती पूरे घर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता,
घर की सारे काम वह खुद करती उसको इसमें काफी आत्म संतोष होता।
उसकी वाणी तो इतनी मीठी थी कि सभी मंत्रमुग्ध हो जाते किंतु सासू मां कौशल्या देवी को उसका गरीब घर
परिवार से आना बेहद खलता ।
वह गाहे बेगाहे उसको अपमानित करती
मसलन-” बहू डाइनिंग टेबल पर खा रही हो, कभी अपने घर देखा था तुम्हारे घरवाले तो चटाई पर खाते होंगे’
इतनी मामूली साड़ी! तुम्हारे बाप मां- बाप ने दिए हैं ऐसे तो हमारे घर के नौकर चाकर भी नहीं पहनते”
इस तरह के तानो से सलोनी के दिल पर ठेस लगती
मां -बाप की गरीबी का दंड उसे भोगना पड़ता।
जगह-जगह उसे शर्मिंदा किया जाता उसे वह सम्मान नहीं मिलता जो औरों को मिलता ।
किंतु समय के साथ सलोनी ने भी समझ लिया था कि उसे अब अपनी आत्म सम्मान की रक्षा खुद करनी पड़ेगी नहीं तो वह लोगों के कदमों ताले रौंदा जाएगा।
उसने विवाह से पहले कुकिंग के दौरान बेकरी का भी कोर्स किया था तरह-तरह के केक बनाना, डेकोरेट करना आदि ।
सबसे पहले उसने केक बनाकर अगल-बगल, मोहल्ले में उपहार के तौर पर केक बाटें किंतु समय के साथ मांग बढ़ती गई अब तो ऑर्डर भी आने शुरू हो गए थे ग्राहकों के बढ़ती मांगों को देखते हुए सलोनी ने दो सहायिका भी रख लिया अब वह आर्थिक रूप से मजबूत होती जा रही थी जो लोग उसके मायके को लेकर उसे ताना मार रहे थे आज वही सलोनी और उसके परिवार वालों की सराहना करते नहीं थक रहे थे।
यह सच है! आर्थिक रूप से सफल होना सम्मान के लिए बेहद जरूरी है
आराधना श्रीवास्तव ( लेखिका)