ओहदे का मान – पुष्पा जोशी

        आज बैशुमार दौलत के मालिक रविन्द्र बाबू अपने घर के बराण्डे में अकेले बैठे थे, कहने को बहुत इज्जतदार थे, हर तबके के लोग उनकी इज्जत करते थे, इज्जत से बात करते थे, वे नजर घुमाकर जिसे भी कोई कार्य कहते वह अपने को खुशकिस्मत समझता था। यह इज्जत उनकी थी

या उनके आसपास जो धन का मुलम्मा चढ़ा था उसकी कहना मुश्किल है। उन्हें यह दौलत कमाने का ऐसा शोक लगा था कि उसके आगे वे उचित अनुचित की परिभाषा ही भूल गए थे।

इस दौलत को कमाने के लिए उन्होंने अपने दिल को दरकिनार कर दिया था, बस दिमाग  से सोचते और वही राह उन्हें सही लगती जो उन्हें धन तक ले जाती। धन कमाने के चक्कर में वे ऐसे उलझे कि सारे नजदीकी रिश्ते उनकी मुट्ठी से फिसलते गए।

         अब एक नजर रविन्द्र बाबू की जीवन यात्रा पर डालते है। रविन्द्र बाबू के दादाजी एक इज्जतदार किसान थे। वे बहुत ईमानदार और दयालु प्रकृति के थे। उनके चार बेटे थे और उन्होंने सभी बच्चों को अच्छे संस्कार सिखाए थे। रविन्द्र बाबू के पिता मोहनलाल सब भाइयों में सबसे छोटे थे,

वे अध्यापक की नौकरी करते थे और  रविन्द्र बाबू के तीनों ताऊजी खेती का काम करते थे । सभी ईमानदारी से काम करते और मिलजुलकर रहते थे। वे गाँव में किसी को भी कोई तकलीफ होती तो उनकी मदद करते थे। उनका परिवार इज्जतदार परिवार कहलाता था।

मोहनलाल जी का तबादला शहर में हो गया। अब मोहन बाबू का परिवार शहर में आकर बस गया। रविन्द्र बाबू के एक भाई और दो बहिन थी। परिवार से विरासत से मिले संस्कार के कारण शहर में भी उन्होंने अच्छी इज्जत कमा ली थी। रविन्द्र बाबू की बहिनों का विवाह हो गया था और वे अपने परिवार में सुखी थी। उनके बड़े भाई की एक सहकारी संस्था में क्लर्क की नौकरी लग गई थी। रविन्द्र बाबू कॉलेज में पढ़ाई कर रहै थे,

वे शरीर से हृष्टपुष्ट और सौन्दर्य से परिपूर्ण थे। बातें प्रभावशाली करते थे। और सबसे बड़ा गुण उनका यह था कि वे हर दु:खी व्यक्ति की मदद करते थे।किसी वृद्ध व्यक्ति की पेन्शन का निपटारा कराना हो, किसी के नल, बिजली के बिल, सम्पत्ति कर किसी से सम्बंधित कोई  समस्या हो ,

वह कार्यालय में उनके साथ जाकर उनकी उलझन को सुलझा देते थे। उनकी बोली इतनी प्रभावशाली थी, कि सब कार्य आसानी से हो जाते । किसी को अस्पताल ले जाना हो, या कोई अन्य कार्य हो वह सभी की मदद करते। उनके आसपड़ोस मे, कॉलेज में सब उन्हें चाहते थे।

यह बात उनके कॉलेज में पढ़ रहै निलेश को बर्दाश्त नहीं होती है। वह धनाड्य परिवार का बिगड़ैल बेटा था, नई नई गाड़ियों में घूमना, नित नये कपड़े पहन वह कॉलेज मे अपनी शान बताता था। वह चाहता था कि विद्यार्थी रविन्द्र का साथ छोड़ उसके साथ रहै। मगर ऐसा हो नहीं रहा था,

एक दिन उसने रविन्द्र को नीचा दिखाने के लिए कहा, दिन भर लोगों के काम करवाने के लिए दौड़ते रहते हो, अगर मैं चाहूँ तो अपने पिता से फोन लगवा कर घर बैठे वह काम करवा सकता हूँ, पैसो में बहुत शक्ति है। रविन्द्र ने कुछ नहीं कहा मगर बात उसके दिल को लगी थी,

निलेश की उस व्यंग भरी मुस्कान ने रविन्द्र के जीवन की दिशा ही बदल दी। अगले वर्ष देश में चुनाव होने वाले थे, रविन्द्र की  मित्र मण्डली और चाहने वालों की कमी नहीं थी, उसके प्रभावशाली व्यक्तित्व और उसकी ख्याति को देख एक पार्टी ने उसे अपनी पार्टी की ओर से टिकट ऑफर की और अपने दोस्तों के कहने पर वह चुनाव में खड़ा हो गया। भारी बहुमत से जीत गया अब उनके चारों तरफ पैसा ही पैसा था

और ज्यादा पैसे कमाने के चक्कर में वे अपने जीवन के आदर्श को भूल गए अब किसी गरीब की पुकार उन्हें सुनाई नहीं देती, न किसी वृद्ध की जरूरतों को पूरा करना वह जरूरी समझते थे। न अपने दोस्तों के लिए उसके पास कोई समय था, यहाँ तक कि परिवार के लोग भी उससे बातें करने के लिए तरस जाते थे। पैसा ही उसका भगवान् था, और पैसे वाले ही उसके दोस्त थे। कल एक घटना घटी वह किसी पार्टी से लोट रहे थे

रास्ते में एक वृद्धा रास्ता रोक कर खड़ी हो गई सूरत पहचानी सी लगी। एक पल के लिए वह उसे छोड़कर आगे बढ़ गए फिर न जाने क्या हुआ कि  पलट कर उसके पास गए, वह मुसकुरा दी और बोली ‘लौटने की सम्भावना है अगर सीधे चले जाते तो….।’  ‘तो क्या माई! क्या कहना चाहती हो?’ ‘मैं अपने पुराने रविन्द्र को ढूंढ रही हूँ,

जो कहीं खो गया है,जिस तक हम गरीबों की आवाज़ पहुँचती थी। जो असहाय की मदद के लिए नंगे पॉंव दौड़ जाता था। आज तुम पलट कर नहीं आते तो मैं यही समझती रविन्द्र कहीं खो गया है, अब कहीं नहीं मिलेगा।’ कहकर वह वृद्धा चली गई। रविन्द्र बाबू भी

अपने घर आ गए।वे उसे पहचानने की कोशिश कर रहै थे। उन्हें याद आया ये तो उनके पड़ौस में रहने वाली जानकी भुआ थी, जिनकी गोद में खेलकर वह बड़ा हुआ, घर पर कुछ भी अच्छा बनाती तो मेरे लिए बचाकर रखती थी। कितनी हंसमुख थी, पर आज थकी हुई और कमजोर नजर आ रही थी।

   घर के बराण्डे में बैठे हुए उन्हें अपना अतीत याद आया जब उनके पास इतना पैसा नहीं था, मगर उनके पास उनके चाहने वालों की कमी नहीं थी, सच्चा प्यार और इज्जत करते थे। आज वह सिर्फ चाटुकारों की भीड़ से घिरा है और सारे रिश्ते बेमानी से लगते हैं, सिर्फ स्वार्थ से जुड़े है। रविन्द्र बाबू ने सोचा उस समय तो मेरे पास धन ओहदा कुछ नहीं था

फिर भी मैं सबकी मदद करता था। आज मेरे पास सबकुछ है तो मैं क्यों न दीन दु:खियों  की मदद कर अपना जीवन बिताऊं।विचार आते ही उनके कदम अपनी उस बस्ती की ओर बढ़ गए ।ड्राइवर दौड़ता हुआ आया बोला- ‘मालिक  गाड़ी निकालता हूँ,कहॉं चलना है।?’

नहीं आज मुझे पैदल ही जाना है। वे वहॉं गए जहाँ उनका बचपन बीता, उन्होंने अपना घर देखा जो अब एक प्लाट में तब्दील हो गया था, वहाँ कूड़े का ढेर लगा था, वह बिक गया था। उन्होंने अपने पड़ोस का घर खटखटाया जहाँ जानकी भुआ रहती थी। एक दस साल के बच्चे ने दरवाजा खोला, फिर अन्दर की ओर देखकर आवाज लगाई दादी कोई आया है। जानकी भुआ लकड़ी के सहारे बाहर आई और रविन्द्र को देखकर बोली,

मुझे विश्वास था तुम आओगे, आओ बैठो, रविन्द्र की ऑंखों में ऑंसू आ गए तो जानकी भुआ ने कहा बेटा तुम्हारा इतना बड़ा पद है पर मेरे लिए तो तुम मेरे नन्हें रविन्द्र ही हो। मैं चाहती हूँ, तुम और ऊंचे ओहदे पर पहुँचो, मगर गरीब, असहाय को मत भूलो उनकी मदद करो तभी सच्चे इज्जतदार कहलाओगे

। रविन्द्र ने जानकी माँ के चरण छुए और कहा भुआ मुझे आशीर्वाद दो,मैं आपके कहे अनुसार कार्य कर सकूँ। जानकी भुआ ने आशीर्वाद दिया और वह फलीभूत हुआ। रविन्द्र बाबू के जीवन की दशा बदल  गई थी, और अब वे सच्चे इज्जतदार बन गए थे। पद और ओहदे की गरिमा इसी में है कि हम असहाय के सहायक बने।

प्रेषक

पुष्पा जोशी

स्वरचित, मौलिक, अप्रकाशित

विषय- #इज्जतदार

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