“आख़िर कब तक मैं ही इन सबकी ख़ुशी के लिए अपनी हर छोटी–बड़ी इच्छा कुर्बान करती रहूँगी, आदित्य? मेरी पसंद, मेरे मन का कोई मोल नहीं तुम्हारे लिए?”
स्नेहा अलमारी से कपड़े निकालते–निकालते अचानक रुक गई। उसकी आवाज़ में रूका हुआ रोष और बरसों की थकान दोनों घुल गए थे।
आदित्य लैपटॉप बंद करते हुए बोला,
“फिर शुरू हो गई तुम। बात–बात पर टोकना, शिकायत करना… तुम जानती हो न, ये तुम्हारा घर है, तुम्हारा परिवार है। इनको खुश रखना तुम्हारी ज़िम्मेदारी भी तो है। हर बात में ‘मैं–मैं’ करोगी तो कैसे चलेगा?”
“ज़िम्मेदारी सिर्फ़ बहू की ही होती है क्या?” स्नेहा ने उसकी ओर मुड़कर देखा,
“शादी को हुए एक साल हो गया। किसी दिन मैंने अपने मन से कुछ पहन लिया, तो सासू माँ का चेहरा उतर जाता है, किसी दिन बच्चों के चैनल की जगह खुद का पसंदीदा सीरियल लगा लूँ तो करण रिमोट छीनकर ले जाता है। और अगर कभी खाने में अपनी पसंद का ज़रा–सा बदलाव कर दूँ, तो पूरा घर मेरे ऊपर टूट पड़ता है।”
आदित्य ने आवाज़ थोड़ी कड़ी कर ली,
“देखो स्नेहा, तुम्हें पता है न, यहाँ सब सालों से एक ही तरीके से रहते आए हैं। तुम नई आई हो, तो तुम्हें ही उनके हिसाब से ढलना पड़ेगा। ये क्या रोज़–रोज़ नई बहस छेड़ देती हो…”
स्नेहा की आँखें नम हो उठीं,
“मैंने कोशिश नहीं की क्या? सुबह पाँच बजे उठकर चाय, नाश्ता, तुम्हारे ऑफिस की टिफिन, पापा की दवाइयाँ, करण के लिए दूध… सब करती हूँ। माँजी को समय पर मंदिर जाने के लिए पूजा की थाली तक तैयार करती हूँ। बस एक आज… एक दिन मैंने अपनी पसंद के हिसाब से सब्ज़ी बना दी, तो ऐसा लगता है जैसे मैंने कोई गुनाह कर दिया हो।”
आदित्य ने झुँझलाकर कहा,
“तुम्हें पता है न कि घर में सब प्याज़–लहसुन छोड़ चुके हैं। मम्मी ने कितनी मन्नतें मांगी हैं तुम्हारे पापा के इलाज के लिए। और तुमने आज सब्ज़ी में प्याज़–लहसुन डाल दिया! करण तो मान्यता के मामलों में बहुत सख़्त है, वो सहन नहीं करता ये सब। अब अगर उसने ग़ुस्से में दो बात कह दी, तो तुम भी चुप रह सकती थी। उल्टा उसके सामने बहस करने लगी।”
स्नेहा के भीतर आज की घटना पूरी फिल्म की तरह चलने लगी।
सुबह नौ बजे थे। सरला जी मंदिर गई हुई थीं। घर में सिर्फ़ स्नेहा और करण थे। आदित्य ऑफिस निकल चुका था, ससुर जी अपने कमरे में अख़बार पढ़ रहे थे।
रसोई में खड़ी–खड़ी उसने फ्रिज खोला। टमाटर, लौकी, आलू… एक कोने में प्याज़ का जाल पड़ा था, जिसे शादी के बाद से उसने हाथ तक नहीं लगाया था।
“शादी से पहले तो रोज़ प्याज़ वाली मिक्स वेज बनती थी घर में,” वह सोचने लगी, “अम्मा कितनी तारीफ़ करती थीं मेरे हाथ की। यहाँ आए एक साल हो गया, एक बार भी अपनी पसंद का स्वाद नहीं चखा। आज मम्मी जी नहीं हैं, करण को दाल–चावल पसंद है, तो एक साइड में वैसे ही बना दूँगी। और अपने लिए–पापा के लिए अलग सब्ज़ी बना लूँगी। कौन सा पाप हो जाएगा?”
काफ़ी सोचने के बाद उसने पहली बार उस जाल में हाथ डाला। दो प्याज़ निकाले, छीलते हुए जैसे–जैसे उनका सफ़ेद अंदरूनी हिस्सा दिखाई दिया, वैसे–वैसे उसके चेहरे पर हल्की–सी मुस्कान बिखर गई।
“आख़िर कुछ तो होगा जो सिर्फ़ मेरे मन का हो,” उसने खुद से कहा।
उसने दाल बिना प्याज़–लहसुन के बनाई, वैसे ही जैसे घर में बनती थी। और साथ में अपने लिए एक छोटी कड़ाही में प्याज़–टमाटर की मिक्स वेज चढ़ा दी। गैस पर तड़–तड़ छनकते हुए जीरे, मसालों और तले हुए प्याज़ की महक पूरे कमरे में फैल गई। स्नेहा ने आँखें बंद करके एक गहरी सांस ली — उसे वही पुराना मायके वाला रसोईघर याद आ गया, जहाँ वो मम्मी के साथ हँसते–बोलते खाना बनाया करती थी।
तभी पीछे से करण की तेज़ आवाज़ आई,
“भाभी! ये कैसी बदबू आ रही है? आपने रसोई में क्या बना दिया?”
स्नेहा के हाथ ठिठक गए,
“करण, दाल तो पहले जैसी ही है। बस अपने लिए थोड़ी सब्ज़ी बना ली प्याज़ वाली… आपको तो नहीं खिलाऊँगी।”
करण लगभग दौड़ता हुआ आया और कड़ाही में झाँक कर बोला,
“आपको पता है न, मम्मी ने घर में मना किया है। फिर भी आप…? आपको हमारी मान्यताओं की रत्ती भर परवाह नहीं है।”
“देखो करण,” स्नेहा ने शांत रहने की कोशिश की,
“मेरा किसी की श्रद्धा से खिलवाड़ करने का कोई इरादा नहीं है। मैंने तुम्हारे लिए, मम्मी–पापा के लिए सब कुछ बिना प्याज़–लहसुन के बनाया है। बस इतनी–सी बात कि मैं अपने लिए अलग से थोड़ी–सी सब्ज़ी बना लूँ, वो भी गलत है क्या? मैं भी इंसान हूँ, मेरी भी पसंद–नापसंद है।”
करण की नाक फड़कने लगी,
“तुम्हारी ये ‘मैं–मैं’ की आदत ही घर की सारी समस्या है। जबसे आई हो, रसोई की हवा तक बदल दी है।”
इतने में सरला जी मंदिर से लौट आईं। महक नथुनों से टकराते ही उनका माथा सिकुड़ गया,
“ये कैसा खाना बना है आज? ये… ये प्याज़ की गंध है क्या?”
“मम्मी, भाभी ने प्याज़ वाली सब्ज़ी बनाई है,” करण वहीं से बोल पड़ा, “आपको पता है न, मुझे डिसक्राइब करना भी मुश्किल हो जाता है अब इस घर को। बाहर वालों के सामने क्या जवाब दूँगा, जब उन्हें पता चलेगा कि हमारे यहाँ फिर से ताम–झाम शुरू हो गया?”
स्नेहा के भीतर कुछ टूट गया।
“हमारे ‘यहाँ’?” उसने मन ही मन दोहराया, “और मैं किस ‘यहाँ’ की हूँ?”
सरला जी सीधे रसोई में घुस आईं,
“तेरे से तो मैंने कभी यह उम्मीद नहीं की थी बहू। तुझे पता था घर का नियम, फिर भी तूने ये काम किया। ये सब मायके में चलता होगा, यहाँ नहीं चलेगा। अभी के अभी सब्ज़ी बाहर फेंक दे।”
“मम्मी, खाने की चीज़ है,” स्नेहा ने भर्राई आवाज़ में कहा, “मैंने अपने लिए बनाई है, बस इतना ही। आपलोगों को तो दाल, चावल, कढ़ी सब वैसा ही मिलेगा। आप चाहे तो गैस बंद करवा दीजिए, मैं दुबारा नहीं बनाऊँगी। लेकिन इसे फेंकने मत कहिए।”
करण ने झल्लाकर प्लेट उठाई,
“जब अपनी मनमानी करनी थी, तो इस घर में आने की क्या ज़रूरत थी? जाओ, अपने मायके में बना लिया करो प्याज़–लहसुन। यहाँ हमारी चलती है।”
और इतना कहते ही उसने खाली प्लेट ज़ोर से सिंक में पटकी। प्लेट फिसलते–फिसलते एक कटोरी से टकराई, कटोरी उछलकर आटे के डिब्बे से लगी और ज़ोरदार आवाज़ के साथ ज़मीन पर गिर गई।
आवाज़ सुनकर आदित्य भी बाहर आया। मामला सुलझाने की जगह उसने सारा ग़ुस्सा स्नेहा पर ही उतार दिया।
“तुम्हें दस बार समझाया है, लेकिन तुम हर बार वही करती हो जो तुम चाहती हो। इस तरह तो घर का चैन कभी नहीं रहेगा।”
आज कमरे में उसी बात से शुरुआत हुई थी। स्नेहा ने धीरे से कहा,
“तुम्हें सिर्फ़ मेरी गलती दिखाई देती है आदित्य। एक बार भी ये नहीं सोचते कि तुम्हारा छोटा भाई भाभी से किस लहज़े में बात करता है। थाली फेंके या मुझे ‘तू’ कहकर बोले, तुम्हें सब जायज़ लगता है। और माँजी… वो भी तो कभी नहीं कहतीं कि ‘बेटा, बहू भी इंसान है, उसकी भी पसंद है’।”
आदित्य ने उसकी तरफ़ देखा, कुछ कहने को हुआ, फिर होंठ भींच लिए,
“अभी तो वैसे भी मेरा ट्रांसफ़र हो चुका है। अगले महीने हम लोग जयपुर शिफ्ट हो ही रहे हैं। बस ये एक–डेढ़ महीने चैन से निकाल लो, फिर सब बदल जाएगा।”
“लोग नहीं बदलेंगे,” स्नेहा बुदबुदाई, “बस शहर बदल जाएगा।”
समय अपने ही ढंग से बीतता चला गया। अगले महीने आदित्य और स्नेहा जयपुर शिफ्ट हो गए। नया शहर, नया घर, आदित्य की नई पोस्टिंग, बहुत सारी दौड़–भाग, बहुत सारी उलझनें, लेकिन एक बदलाव ज़रूर आया —
जब भी रसोई में प्याज़ की महक फैलती, स्नेहा के चेहरे पर एक हल्की–सी राहत देखी जा सकती थी।
आदित्य भी धीरे–धीरे चीज़ें महसूस करने लगा।
रात को खुद पानी लेकर पीना, बटन खराब हो जाए तो खुद सिलाने जाना, हर काम में बराबर हाथ बँटाना — शायद इतना भी बुरा नहीं था। स्नेहा का चेहरा जब थकान से चूर होकर भी मुस्कुराने की कोशिश करता, उसका दिल अजीब–सी ग्लानि से भर जाता।
अगले साल देवर की भी शादी हो गई
एक दिन सास का फोन आया बड़ी बहू करण की शादी की पहली सालगिरह जनवरी के अंत में है। तुम्हारा होना ज़रूरी है।”
स्नेहा ने मन ही मन सोचा, “जिस देवर ने मेरी एक छोटी–सी इच्छा पर इतना बवाल किया, अब जब उसकी पत्नी आ गई है तो क्या वो उसके साथ भी ऐसा ही करता होगा ?”
आदित्य और स्नेहा जयपुर से सुबह-सुबह ही आ गए
अंदर जाते ही सरला जी ने गले लगा लिया,
“आ गई मेरी बड़ी बहू! देख, घर कैसा चमक रहा है। सब प्राची की मेहनत है। आएगी तो खुद देखना, कैसे सब संभाल लिया इसने।”
रसोई से किसी के खनकते पायल की आवाज़ आई। एक हल्की–सी मुस्कराती लड़की बाहर आई — नीले सूट में, माथे पर छोटी–सी बिंदी, हाथ में रोटी की टोकरी।
“आओ दीदी, मैं प्राची।” उसने सहजता से आगे बढ़कर स्नेहा को छू लिया।
स्नेहा ने मुस्कुराकर आशीर्वाद दिया,
“खुश रहो।”
थोड़ी ही देर में खाने का समय हो गया। सब लोग दाल, चावल, कचौड़ी के साथ–साथ सब्ज़ी की ओर बढ़े। स्नेहा ने जैसे ही सब्ज़ी की कड़ाही में झाँका, उसकी आँखें स्वतः चौड़ी हो गईं — प्याज़–टमाटर की जैतूनी–सी महकती ग्रेवी, ऊपर से हरा धनिया बुरका हुआ।
“प्याज़…!” उसके अंदर कहीं पुराना घाव हल्का–सा चुभा। उसने चुपचाप खुद को संभाला और प्लेट में थोड़ा–सा परोस लिया।
पर असली चौंकना तो तब हुआ जब करण ने खुद आगे बढ़कर उसी सब्ज़ी की दो कड़छी अपनी थाली में डाली और बड़े मज़े से खाने लगा।
स्नेहा ने भौंहें उठाकर आदित्य की तरफ देखा। आदित्य ने जैसे नज़रें चुराकर अपनी प्लेट में ध्यान लगा लिया।
सरला जी वहीं बैठी–बैठी बड़े गर्व से कह रही थीं,
“देखो बेटा, प्राची ने दो ही महीने में घर का स्वाद वापस ला दिया। ये प्याज़–वाली मिक्स वेज पहले तुम्हें तुम्हारी नानी के घर में मिलती थी न करण? आज बोला ही था कि माँ, बचपन वाला वही स्वाद खिला दो… तो मैंने कहा, अब तेरी पत्नी है न, वही खिला देगी। कितनी झटपट सीख गई।”
स्नेहा के भीतर धीरे–धीरे कुछ फटता–सा महसूस हुआ।
“तो प्याज़ अब मन्नतों के खिलाफ़ नहीं रहा? या नियम सिर्फ़ मेरे लिए थे?”
आदित्य ने हल्के से उसके घुटने पर हाथ रखा, जैसे कह रहा हो, “अब रहने दो…”, लेकिन आज स्नेहा चुप रहने नहीं आई थी।
उसने शांत स्वर में पूछा,
“मम्मी जी, अब घर में प्याज़–लहसुन से कोई दिक्कत नहीं है क्या?”
सरला जी ने चौंककर उसकी तरफ़ देखा, फिर तुरंत बोलीं,
“अरे, हम कौन होते हैं बच्चों की खुशी के बीच में आने वाले? करण को बचपन से ये सब्ज़ी बहुत पसंद है। और वैसे भी, उसने ही तो कहा कि ‘माँ, मान्यता दिल में होती है, प्याज़ खाने–न खाने से कुछ नहीं होता।’ हम पुराने लोग हैं, थोड़ा समय लगा, पर अब सोच बदली है हमारी।”
स्नेहा मुस्कुराई — मुस्कुराहट में हल्की–सी कड़वाहट भी थी और थोड़ी–सी मुक्ति भी,
“समझ गई मम्मी जी… मान्यताएँ भी किसी–किसी के लिए होती हैं, और बदलाव भी।”
प्राची रोटी लेकर आई तो वातावरण में कसावट महसूस करके उसने माहौल हल्का करने की कोशिश की,
“दीदी, स्वाद बताना ज़रूर, अगर ठीक न लगे तो अगली बार थोड़ा कम मिर्च डालूँगी।”
“स्वाद अच्छा है,” स्नेहा ने मुस्कुरा कर कहा, “बिलकुल वैसा, जैसा किसी नए घर में नई बहू के आते ही होना चाहिए — सबको पसंद आए, और किसी को अपने नियम याद ना रहें।”
करण के हाथ रोटी तोड़ते–तोड़ते रुक गए। उसने पहली बार नज़र उठाकर सीधे भाभी की तरफ देखा। उसकी आँखों में हल्की–सी झेंप थी,
“भाभी… वो जो पहले… आपने प्याज़ वाली… मतलब…”
स्नेहा ने बीच में ही बात काट दी,
“कोई बात नहीं करण। तब तुमने थाली सिंक में पटकी थी, आज पूरी थाली ख़ुशी–ख़ुशी खा रहे हो। यही तो ज़िंदगी है — जहाँ जिस पर मौका मिलता है, हम उसी पर नियम थोप देते हैं। अच्छा है कि तुमने खुद तय किया कि अपनी पसंद के लिए थोड़ा–बहुत नियम बदल लेना गुनाह नहीं होता। बस अगली बार किसी और की पसंद के लिए भी यही सोच रखना।”
कमरे में कुछ पल सन्नाटा छा गया। सरला जी ने फ़ौरन विषय बदलने के लिए प्राची की तारीफ़ शुरू कर दी,
“और सुनो, राघव… मतलब आदित्य, ये हमारी प्राची कितनी समझदार है। शाम को दवा का टाइम हो या पापा की चाय, सब ख़ुद देख लेती है। घर में अब कोई तनाव नहीं रहता।”
आदित्य ने ग्रहण किया कि मम्मी ने अनजाने में “राघव” की जगह “आदित्य” बोला, शायद मन में तुलना की आदत थी। उसने चुपचाप खाना खाया।
कमरे में लौटकर स्नेहा कपड़े बदलने लगी। आदित्य ने पीछे से आकर धीरे से कहा,
“मुझे पता है आज तुम्हें अच्छा नहीं लग रहा। पर…”
स्नेहा ने उसके हाथ पर अपना हाथ रखकर कहा,
“अच्छा क्यों नहीं लगेगा? कम से कम अब मुझे साफ–साफ दिख रहा है कि समस्या मुझमें नहीं थी, माहौल में थी। मैं अगर उस समय अपनी बात पर डटी रहती, तो तुम सब मुझे ज़िद्दी, बहस करने वाली बहू कहते। आज वही काम प्राची ने मुस्कुराकर किया और सबने उसकी तारीफ़ कर दी। फर्क सिर्फ़ इतना है कि मैं अकेली थी, और वो अपने पति के साथ है।”
आदित्य ने गहरी साँस ली,
“तुम चाहो तो मम्मी से… करण से… जो भी उस दिन हुआ था, उसके बारे में—”
“नहीं,” स्नेहा ने धीमे पर दृढ़ स्वर में कहा,
“अब उस दिन की बात उठाने से क्या होगा? उस दिन की चोट से मैंने सीख ले ली है। अब कम से कम मैं अपने ऊपर बेवजह इलज़ाम नहीं लगने दूँगी। तुम भी उस दिन की तरह चुप मत रहना, आदित्य। कभी–कभी बहू की इज़्ज़त का बोझ भी पति के कंधों पर होना चाहिए।”
आदित्य ने सिर झुका लिया,
“तुम सही कहती हो। तब मैंने तुम्हारा साथ नहीं दिया। उस दिन तुम अकेली लड़ती रह गई थी सबके ख़िलाफ़… और मैं… मैं तो बस मम्मी की आवाज़ में अपनी आवाज़ मिलाता रहा। शायद जयपुर जाने के बाद ही मुझे अहसास हुआ कि घर चलाने का सारा बोझ किसके कंधों पर था।”
बाहर बैठक में बच्चों की हँसी गूँज रही थी। प्राची और करण दोनों मिलकर उन्हें पतंग उड़ाना सिखा रहे थे।
कुछ देर बाद सब छत पर चले गए — मकर संक्रांति की धूप, तिल–गुड़ की ख़ुशबू, आकाश में रंग–बिरंगी पतंगें।
करण ने अचानक जोर से आवाज़ लगाई,
“भाभी! ये वाली लाल पतंग आप उड़ाइए न। मैंने बचपन में आपको छत पर ही तो पहली बार पतंग उड़ाते देखा था, याद है?”
स्नेहा ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।
“तो याद है उसे…”
वह हल्के कदमों से आगे बढ़ी, डोर थाम ली। करण ने पीछे से पकड़कर उसे संतुलन देना चाहा,
“इस बार थाली नहीं फेंकूँगा, प्रॉमिस,” उसने हौले से कहा, इतना धीमे कि सिर्फ़ स्नेहा के कानों तक पहुँचा।
स्नेहा ने आसमान की तरफ देखते हुए मन ही मन सोचा —
“ठीक है करण, थाली मत फेंको, पर कभी किसी की छोटी–सी इच्छा भी मत फेंकना। क्योंकि थालियाँ तो टूटकर जुड़ जाती हैं, पर दिलों पर पड़ने वाला निशान सालों बाद भी यूँ ही चुभता रहता है… जैसे प्याज़ की महक से अचानक याद आ गया आज।”
कटी पतंग दूर गिरते–गिरते भी आसमान में थोड़ी देर तक तैरती रही।
ठीक वैसे ही, जैसे किसी बहू की दबाई गई इच्छाएँ —
कभी–कभी सालों बाद भी लौटकर अपना वजूद ज़रूर जता देती हैं।
लेखिका : ममता यादव