रीना को ऑफिस की छुट्टियाँ मुश्किल से मिली थीं और उसने मन ही मन तय कर रखा था –
“इस बार तो पूरा हफ्ता बस आराम… सीरियल, मोबाइल और चैन की नींद… किसी रिश्तेदार, किसी पड़ोसी के चक्कर में नहीं पड़ना।”
अंदर से उसकी सास सरोज की आवाज़ आई –
“रीना बेटा, जरा इधर तो आओ, तुमसे बात करनी थी।”
रीना अनमने ढंग से अंदर आई –
“जी मम्मी जी, क्या हुआ?”
सरोज ने इत्मीनान से चश्मा उतारा, सामने रखी मेज़ पर रखा –
“परसों तुम्हें पता है न, तुम्हारे जेठ साहब की शादी की सालगिरह है? इस बार उन्होंने होटल में छोटा सा गेट-टुगेदर रखा है। सबको बुलाया है, तुम्हें भी जाना है।”
रीना ने तुरंत नाक-भौं सिकोड़ ली –
“अरे मम्मी जी, आप भी… अभी तो मेरे ऑफिस से छुट्टियाँ शुरू हुई हैं। मैं तो सोच रही थी दो-तीन दिन तो घर से बाहर ही न निकलूँ। और वैसे भी, हर साल की पार्टी है ही… मेरी ननद, देवर, सब तो रहेंगे वहाँ। मेरा न होना कौन-सी बड़ी बात हो जाएगी?”
सरोज ने धीरे से कहा –
“बात बड़ी या छोटी की नहीं है, बेटी। बात जुड़ाव की है। परिवार में बड़े हैं, उनका दिल रख लिया करो।
रीना ने हँसते हुए कहा –
“आप भी ना, सब भावना-भावना में जीते हो। आजकल किसके पास इतना टाइम है? मैं तो साल भर थक जाती हूँ। रोज़ ऑफिस, ट्रैफिक, घर आकर बच्चों का होमवर्क… ये पार्टी-वर्टी मेरे बस की नहीं। आप और पापा जी चले जाना, मेरी तरफ से गिफ्ट भी दे दीजिएगा।”
इतने में रीना का पति राजेश बाहर आ गया –
“क्या चल रहा है भई?”
सरोज ने बात समझाते हुए कहा –
“बेटा, परसों तुम्हारे भैया ने होटल में एनिवर्सरी रखी है, पूरे परिवार को बुलाया है। मैं चाह रही हूँ कि रीना भी चले, पर बहू का मन नहीं हो रहा।”
राजेश ने प्यार से रीना की तरफ देखा –
“देखो रीना, जाने में क्या दिक्कत है? बस दो-तीन घंटे की तो बात है। भैया-भाभी हर सुख-दुख में साथ खड़े रहते हैं, थोड़ी-सी खुशी में हम भी तो उनका साथ दें।”
रीना थोड़ी चिड़चिड़ा गई –
“अरे राजेश, तुम लोगों को समझ नहीं आता क्या? मैं भी इंसान हूँ, मशीन नहीं। साल भर मैं ही तो दौड़ती रहती हूँ। एक दिन मैंने बोल दिया कि कहीं नहीं जाऊँगी, तो पूरा घर मिलकर मुझे ही समझाने लग जाता है। भैया-भाभी को अगर इतना ही दिल है मेरे से मिलने का, तो कभी हमारे घर भी आ जाया करें, बस होटल, रेस्टोरेंट, शोऑफ… सब दिखावे वाली दुनिया है।”
सरोज ने हल्का-सा आह भरी, पर आगे कुछ नहीं बोलीं।
दो दिन बाद, सब तैयार होकर निकल गए। सरोज, पापा जी, राजेश और बच्चे – बस रीना नहीं गई।
पार्टी में भैया-भाभी ने परिवार की कमी महसूस की, पर किसी ने रीना का नाम सीधे नहीं लिया। व्हाट्सऐप ग्रुप में तस्वीरें आयीं, राजेश ने उसे भी दिखाईं –
“देखो, कितना अच्छा डेकोरेशन है।”
रीना ने हल्के से देखा, फिर मोबाइल वापस थमा दिया –
“हम्म… ठीक है, हर साल की तरह ही लग रहा है। अच्छा है, मैं नहीं गई, बेकार की भीड़-भाड़।”
कुछ समय बीत गया।
एक महीने बाद रीना के अपने मायके में बड़ी खुशखबरी आई। उसकी छोटी बहन नेहा की पहली मैरिज एनिवर्सरी थी, और साथ ही उसके पति को नई नौकरी भी मिल गई थी। नेहा ने बड़े प्यार से फोन किया –
“दीदी, इस बार तो आपको आना ही पड़ेगा। मैं खुद के हाथ से केक बनाऊँगी, आप नहीं होंगी तो मज़ा अधूरा लगेगा।”
रीना का दिल खुशी से भर गया –
“अरे पगली, तेरी खुशी में मैं नहीं आई तो किसकी खुशी में जाऊँगी? तू बोल, मैं कब आऊँ?”
नेहा ने हँसते हुए कहा –
“बस दीदी, अगले शुक्रवार रात तक आ जाना। शनिवार रात को पार्टी है, रविवार को आराम कर लेना, फिर सोमवार सुबह निकल जाना। बच्चों की भी छुट्टी रहेगी। मम्मी-पापा तो वैसे भी उत्साहित हैं, कह रहे थे रीना और बच्चों के बिना मैं कोई कार्यक्रम नहीं करूंगी।”
रीना ने तुरंत राजेश से बात की –
“सुनो न, अगले वीकेंड मैं मायके जाऊँगी। नेहा की एनिवर्सरी है, साथ में जीजाजी की जॉब भी लगी है। मम्मी-पापा बुला रहे हैं।”
राजेश ने मुस्कुरा कर कहा –
“अरे, ये तो बहुत अच्छी बात है। बच्चों के टेस्ट तो अगले हफ्ते खत्म हो ही रहे हैं, जाना हो तो सब मिलकर जाते हैं।”
रीना के चेहरे पर हल्की शिकन आयी –
“तुम्हें भी ऑफिस से छुट्टी लेनी पड़ेगी, इतना दूर का सफर है। फिर वहाँ पुरुषों के लिए तो खास कुछ होता भी नहीं। तुम यहीं रहो न, मैं बच्चों को लेकर चली जाऊँगी।”
राजेश ने थोड़ी देर सोचा, फिर बोला –
“ठीक है, जैसे तुम्हें ठीक लगे। मम्मी-पापा को बता देते हैं, उनका भी मन होगा साथ जाने का।”
रीना ने तुरंत कहा –
“नहीं-नहीं, मम्मी-पापा को क्यों परेशान करना? उनकी तबीयत भी तो पहले जैसी नहीं रही। मेरा मायका छोटा है, सब एक साथ जाएंगे तो परेशान होंगे। मैं और बच्चे ही चले जाते हैं। तुम सब यहीं रहो आराम से।”
राजेश ने ध्यान से उसकी ओर देखा, जैसे कुछ कहना चाह रहा हो, फिर खुद ही चुप हो गया–
“ठीक है, जैसा तुम चाहो।”
कई सालों से रीना का यही पैटर्न था – मायका हो तो कोई भी बहाना नहीं, ससुराल वाले हों तो हर साल, हर फंक्शन में थकान, दूरी, भीड़-भाड़, ये सब बहाने।
शुक्रवार रात, बच्चों को लेकर रीना मायके पहुँची।
मां किरण ने दरवाज़ा खोला, खुशी से चीख ही पड़ी–
“अरे मेरी बेटी! आ गई तू?”
रीना ने उन्हें गले लगाते हुए कहा–
“मम्मी, आपकी बेटी को आने से कौन रोक सकता है?”
अंदर नेहा भागती हुई आई, उसने रीना को गले लगा लिया–
“दीदी, देख ना, मैंने कल का पूरा मेन्यू तैयार कर लिया है। डेकोरेशन भी सोच लिया है। बस तुम साथ रहना, तब ही मज़ा आएगा।”
रीना भी उसके प्लान सुनकर खुश होती रही। रात तक हँसी-मज़ाक चलता रहा।
अगले दिन सुबह-सुबह नेहा को अचानक उसकी सास सुमित्रा देवी का फोन आया –
“नेहा, बेटा, ज़रा जल्दबाजी में बात कर रही हूँ। तुम्हारे ससुर की तबीयत अचानक बिगड़ गई है। अस्पताल लेकर जा रही हूँ। रिपोर्ट की बात बाद में बताऊँगी। अगर ज़रूरत पड़ी तो तुम्हें बुलाऊँगी। अभी फिलहाल तुम वहीं रहो, मैं सोच कर ही परेशान हूँ कि तुम अकेली ट्रेन से कैसे आओगी।”
नेहा की आवाज़ काँपने लगी –
“माँ जी, प्लीज़ आप ध्यान रखिए पापा जी का। कोई भी बात हो तो मुझे तुरंत बताइएगा। मैं अभी दीदी के साथ मम्मी-पापा के यहाँ हूँ।”
फोन कटते ही घर का माहौल बदल गया।
रीना ने हड़बड़ाकर पूछा –
“क्या हुआ? किसका फोन था?”
नेहा ने घबराकर सारी बात बता दी।
किरण भी परेशान हो गई –
“अरे बाप रे, इतनी दूर से क्या करेगी तू यहाँ बैठकर? अगर बहुत बिगड़ जाए तो?”
रीना ने हल्का-सा चेहरा बिगाड़ा –
“मम्मी, अभी तो नेहा को बुलाया ही नहीं सासू माँ ने। और वैसे भी, कल रात एनिवर्सरी है, पार्टी है। अभी से क्यों घबर रहे हो? थोड़ा नॉर्मल हो जाने दो, फिर जाना।”
नेहा चुप हो गई। पर उसके चेहरे पर साफ़ दिख रहा था कि उसका मन कहीं और है। शाम तक खबर आई कि ससुर ICU में हैं, पर स्थिति स्थिर है।
नेहा ने अपने पति मयंक से बात की –
“मैं कल की पार्टी कैंसिल कर देती हूँ, मैं अगले हफ्ते तुम्हारे पास आ जाऊँगी।”
मयंक ने कहा –
“नेहा, अभी तुम वहाँ ही रहो। यहाँ की टेंशन मैं संभाल लूँगा। पापा की हालत अभी स्टेबल है। डॉक्टर का कहना है चौबीस घंटे क्रिटिकल हैं। तुम अचानक निकलोगी तो मैं और परेशान हो जाऊँगा। अभी जैसे हो, वैसी रहो। जो होना होगा, हम यहाँ से देख लेंगे। मम्मी भी यही चाहती हैं कि तुम परेशान न हो। हाँ, अगर बहुत खराब हुआ तो मैं खुद बुला लूँगा। अभी तुम रो मत।”
फोन कट गया, पर नेहा का मन बेचैन रहा। रात को उसने धीमे से कहा–
“मम्मी, दीदी… मुझे तो पार्टी करने का मन ही नहीं है अब।”
किरण ने प्यार से सिर सहलाते हुए कहा–
“देख बेटी, मैं समझ सकती हूँ तुम्हारा मन नहीं है, पर तुम्हारी सास और पति ने खुद कहा है कि तुम्हें परेशान न किया जाए। ऐसे में अगर तुम यहाँ रोती बैठी रहोगी, तो वो लोग और घबराएंगे। थोड़ा सामान्य हो, भगवान से प्रार्थना कर, और जो कार्यक्रम तय है, उसे पूरा कर। ये भी तो जीवन का हिस्सा है।”
रीना बीच में बोल पड़ी –
“और वैसे भी, सब कुछ कैंसिल करके क्या बदल जाएगा अभी? मयंक जी और सासू माँ ने स्पष्ट कहा है कि तुम्हें नहीं बुला रहे। तो जो तय है, वो हो जाने दो। बाद में जाते रहना।”
नेहा ने आंखों से आँसू पोंछे और सिर हिला दिया।
अगले दिन शाम को थोड़ी सजावट हुई, बड़ा नहीं, बस घर में परिवार के बीच एक छोटा-सा कार्यक्रम रखा गया। नेहा की मुस्कान के पीछे कहीं छुपा हुआ डर था, पर उसने जिद करके चेहरे पर खुशियों का मुखौटा चढ़ा लिया था।
रीना ने केक काटने की फोटो लेते हुए कहा –
“देखा, मैंने यहीं कहा था ना, सब ठीक हो जाएगा। तू बेकार टेंशन ले रही है।”
रात में फिर फोन आया –
“नेहा, पापा की तबीयत अब पहले से ठीक है, वेंटिलेटर हट गया है। डॉक्टर कह रहे हैं कि अब रिस्पांस अच्छा है। देखो, तुम्हारी प्रार्थनाएँ असर कर रही हैं।”
इस बार नेहा सच में मुस्कुरा पड़ी।
अगले दिन रीना वापसी की तैयारी करने लगी। उसने मम्मी से कहा –
“मम्मी, देखो ना, कितना अच्छा हो गया सब। मैं कह रही थी ना – कुछ दिक्कत हो तो उसका मतलब ये नहीं कि जिंदगी रोक दो। नेहा भी अगर कल पार्टी कैंसिल कर देती तो सबका मूड खराब हो जाता। कभी-कभी इंसान को खुद मजबूत बनना पड़ता है।”
किरण ने रीना की बात सुनी, मगर कुछ बोली नहीं।
तीन दिन बाद रीना और बच्चे ससुराल लौट आए।
घर पहुँची तो देखा, हॉल में सन्नाटा है। सास सरोज की आँखें सूजी हुई हैं, पापा जी चुपचाप सोफे पर बैठे हैं।
रीना अंदर आते ही बोली –
“अरे, घर में इतना शांत माहौल क्यों है? सब ठीक तो है?”
सरोज ने कातर नज़रों से उसकी ओर देखा –
“तुम्हें नहीं पता…?”
“क्या?”
राजेश आगे आया, उसकी आवाज़ भारी थी –
“भाभी के पापा नहीं रहे, भाभी मायके गई हुई हैं। भैया भी वहाँ ही हैं। भाभी सुबह तक लगातार रो रही थीं, तभी भैया उन्हें लेकर निकल गए।”
रीना के हाथ से बैग लगभग गिरते-गिरते बचा –
“क्या…? भाभी के पापा… कल तक तो…”
सरोज ने दुखी मन से कहा –
“हाँ, अचानक रात में हार्ट अटैक आया, नहीं बच सके। भैया ने सुबह चार बजे फोन किया था। हम भी जाना चाह रहे थे, पर गाँव बहुत दूर है, ट्रेन का रिजर्वेशन नहीं मिल पाया। सोच रहे थे कल निकलेंगे। भाभी तो सूनी हो गई हैं… बहुत लगाव था उन्हें अपने पिता से।”
रीना के पैरों तले ज़मीन जैसे खिसक गई।
उसे याद आया –
जब वो मायके थी, उसी समय भाभी अनिका का फोन आया था –
“रीना, सुनो न, इस बार तुम एनिवर्सरी में ज़रूर आ जाना। मैं तुम्हारे लिए स्पेशल डिश बनाऊँगी।”
रीना ने साफ़ मना कर दिया था –
“भाभी, मैं तो नहीं आ पाऊँगी। थकी हुई हूँ, आप ही संभाल लेना। सालगिरह तो हर साल आती है।”
आज वही सालगिरह उसके मन में चुभ रही थी।
सरोज ने आगे कहा –
“अनिका के पापा सालों से बीमार थे। फिर भी दोनों –भैया-भाभी– कभी शिकायत नहीं करते थे। जब हमारा कोई कार्यक्रम होता, तो सब कुछ समेटकर आ जाते। मुझे हमेशा कहते – ‘मम्मी, परिवार से ज़्यादा जरूरी कुछ नहीं।’ और तू देख… जब उन्होंने प्यार से कहा था कि तू आ जाओ, तुमने थकान का बहाना बना दिया।”
रीना के गले में कांटे-सा कुछ फँस गया –
“मम्मी, मुझे क्या पता था कि…”
सरोज ने बात काटी –
“यही तो बात है बेटा। किसी को पता नहीं होता कि कल क्या हो जाएगा। यही वजह है कि आज को निभाना पड़ता है। तुम मायके जाओ, बहन की खुशी में शामिल हो, बहुत अच्छी बात है। लेकिन उसी जोश में ससुराल के रिश्तों को हल्का समझना… ये ठीक नहीं। तुम्हें अपने मायके जाना मना नहीं किया, बस दो दिन का एडजस्टमेंट माँगा था, वो भी तुमसे नहीं हुआ। और अब देख, जिस भाभी को तुमने ‘सालगिरह तो हर साल आती है’ कहकर टाल दिया, उसी के पिता की अगली सालगिरह देखने के लिए वो खुद भी अकेली रह गई।”
रीना की आँखें अब छलक चुकी थीं।
रात को कमरे में अकेली बैठी उसे सब याद आने लगा।
जब नेहा के ससुर ICU में थे, उसने कितनी ‘समझदार’ बातें की थीं –
“सब छोड़कर रोने बैठोगी तो क्या फायदा…
डॉक्टर संभाल रहे हैं, तुम्हारी मौजूदगी से क्या फर्क पड़ेगा…
फंक्शन कैंसिल करोगी तो सबका मूड खराब होगा…”
और आज, जब भाभी के पिता नहीं रहे, उसे ख्याल आया –
“अगर मेरे पापा नहीं रहे होते…, क्या मैं भी ऐसे सोच पाती?”
अगली सुबह रीना ने खुद से फैसला किया।
वो सरोज के पास गई –
“मम्मी, भैया-भाभी जिस गाँव में गए हैं न, वहाँ की ट्रेन का टाइम बताइए। मैं भी जाना चाहती हूँ। भाभी को मेरी ज़रूरत है। अभी मैं उनके पापा के पास तो नहीं जा सकती, पर उनके पास तो जा सकती हूँ।”
सरोज ने आश्चर्य से पूछा –
“अकेली जाएगी?”
रीना ने सिर हिलाया –
“हाँ, इस बार मैं किसी बहाने के पीछे नहीं छिपूँगी। अभी मैंने बहुत बातें सिर्फ दूसरों को समझाने के लिए की थीं। अब समय है कि मैं खुद भी वही करूँ, जो सही है। नेहा को भी कल यही समझा रही थी कि अपनी ज़िम्मेदारी और रिश्तों के बीच संतुलन रखो। और खुद… मैं क्या कर रही थी?”
राजेश बाहर आया, उसने उसकी बात सुनी और मुस्कुराया –
“ठीक है, लेकिन अकेली नहीं जाओगी। मैं भी चलूँगा। आखिर चाचा का घर है, और भाभी तो अपनी बहन जैसी हैं। बच्चों के पेपर ख़त्म हो जाएँ, शाम वाली ट्रेन से निकलते हैं।”
दो दिन बाद, गाँव पहुँचकर जब रीना ने अनिका को देखा, उसका दिल भर आया।
अनिका के चेहरे पर गहरी थकान, आँखों के नीचे काले घेरे, बाल बिखरे हुए। वो अपने पिता की तस्वीर के सामने बैठी थी।
रीना धीरे से उसके पास गई, उसके कंधे पर हाथ रखा –
“भाभी…”
अनिका ने पलटकर देखा, कुछ पल वो कुछ समझ ही नहीं पाई, फिर अचानक फूट-फूट कर रो पड़ी –
“रीना… मुझे लगा तुम नहीं आओगी… तुम तो हमेशा कहती हो भीड़-भाड़, थकान…”
रीना ने उसे गले से लगा लिया –
“भाभी, इस बार दिल ने कहा – अगर इस वक्त नहीं गई, तो सारी उम्र अपने आपको माफ़ नहीं कर पाऊँगी। मैं जानती हूँ, मैं देर से सीख रही हूँ, पर सीख रही हूँ। सोचती थी खुद थकान के नाम पर सब टाल दूँगी, लेकिन जब अपनी बहन, अपनी भाभी की जगह खुद को रखकर देखा, तब समझ आया…”
अनिका ने सुबकते हुए पूछा –
“क्या समझ आया?”
रीना ने आह भरकर कहा –
“ये कि मुफ्त की सलाह देना आसान है – ‘एडजस्ट कर लो, निभा लो, रिश्ते निभाने पड़ते हैं’… लेकिन जब खुद की बारी आती है, तो हम सबसे पहले खुद की सुविधा देखते हैं। मैंने भी यही किया। जब तुम्हारे बुलावा आया, मैंने अपनी आराम को तरजीह दी। और मायके में जाकर भाभी न मिलने पर मैं खुद ही गुस्सा हो रही थी कि ‘टाइम एडजस्ट नहीं कर सकती क्या?’… मम्मी ने एक बात कही, तब दिमाग ठनका – जब खुद नहीं करती, तो दूसरों से उम्मीद भी क्यों रखती हो?”
अनिका ने चुपचाप उसकी बात सुनी।
कुछ देर बाद वो हल्के से मुस्कुराई –
“कोई बात नहीं रीना, देर से सही, तू आ तो गई न। बस यही काफी है। पापा तो चले गए, लेकिन तू इस समय मेरे पास है, यही मेरा सहारा है।”
वापसी में ट्रेन में बैठे-बैठे रीना खिड़की से बाहर खेतों को देखती रही।
उसने मन ही मन तय किया –
“अब से साला-बहाना नहीं। मायका हो या ससुराल, ननद हो या भाभी, भैया हो या जीजा… रिश्ते दोनों तरफ़ के हैं। जो सलाह दूसरों को देने में मैं इतनी माहिर हूँ, अब वही खुद पर भी लागू करूँगी। दूसरों की कमी गिनाने से पहले, अपनी कमियाँ देखूँगी। तभी तो हक बनता है बात करने का।”
घर लौटकर उस रात उसने सरोज के पास बैठकर साफ़-साफ़ कहा –
“मम्मी, अगली बार भैया-भाभी की सालगिरह हो, या कोई छोटा-सा भी फंक्शन, आप मुझे दो बार मत कहना। मैं खुद अपनी तारीख़ देखूंगी और खुद ही कहूँगी – ‘मम्मी, क्या प्लान है? मुझे क्या करना है?’ मैंने समझ लिया है, सिर्फ़ अपनी बहन के लिए बेटी नहीं, आपकी बहू होकर आपकी बेटी भी बनना है। दोनों तरफ के रिश्ते मेरे ही हैं।”
सरोज ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा –
“बस बेटा, अगर हर बहू ये बात समझ जाए कि मायका और ससुराल दो अलग दुनिया नहीं, उसके अपने ही दो घर हैं, तो न किसी को शिकायत रहेगी, न रिश्ते आधे-अधूरे लगेंगे।”
रीना ने मुस्कुराकर सोचा –
“और सबसे अहम बात – दूसरों को समझाने से पहले खुद समझना सीखो। वरना सलाह देने वाला भी एक दिन खुद की ही बातों के बोझ तले दबकर पछताता रह जाता है।”
उस दिन से उसने ये नियम बना लिया –
“कोई भी बात बोलने से पहले खुद से पूछूँगी – क्या मैं खुद भी ऐसा करती हूँ? अगर नहीं… तो दूसरों को कहने का हक भी नहीं।”
धीरे-धीरे उसके व्यव्हार में बदलाव दिखने लगा।
ननद आए तो वो खुद रुकने लगी, भाभी फोन करे तो वो पहले तारीख़ मिलाकर मिलने जाने लगी, मायके की योजना बनाते समय ससुराल और बच्चों की ज़रूरत का भी ध्यान रखने लगी।
और सच यही है – जब इंसान सिर्फ सलाह नहीं, बल्कि अमल के रास्ते पर चल पड़ता है, तो रिश्तों की गर्माहट खुद-ब-खुद लौट आती है।
लेखक : मुकेश पटेल