खून के आंसू रुलाना – सुदर्शन सचदेवा 

आज के समय में जिंदगी की रफ़तार जितनी तेज हो गई  है , उतनी ही मुश्किलें भी बढ़ती जा रही हैं। ऐसी ही एक कहानी है रिद्धि की, जो एक साधारण परिवार से थी, पर उसके सपने बिल्कुल असाधारण थे। वह फैशन डिज़ाइनर बनना चाहती थी, लेकिन हालात ने उसे खून के आँसू रुलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

कॉलेज की फीस भरने के लिए वह सुबह अख़बार बाँटती, दोपहर को ट्यूशन पढ़ाती और रात में ऑनलाइन डिज़ाइन कोर्स करती। कई बार थकान इतनी गहरी होती कि लगता जैसे शरीर जवाब दे देगा, लेकिन मन हार मानने को तैयार नहीं था। उसके घरवालों की सीमित आय और समाज की तानों ने उसे और बाँधना चाहा, पर रिद्धि हर दिन अपने अंदर की आग को और तेज़ करती गई।

एक दिन उसके पापा की तबीयत अचानक बिगड़ गई, और घर की सारी बचत इलाज में लग गई। यह वही पल था जब किस्मत ने उसे सचमुच खून के आँसू रुलाए—न पढ़ाई के पैसे, न घर में उम्मीद, और न खुद के लिए समय। लेकिन रिद्धि ने ठान लिया कि वह रुकेगी नहीं। उसने अपने डिज़ाइन बेचने के लिए सोशल मीडिया पर एक छोटा-सा पेज बनाया। धीरे-धीरे उसके काम को सराहना मिलने लगी। लोगों ने उसकी मेहनत को पहचाना, और उसके डिज़ाइन दिल्ली के एक बड़े बुटीक तक पहुंच गए।

आज रिद्धि न सिर्फ एक सफल डिज़ाइनर है, बल्कि अपने जैसे संघर्ष करने वाले युवाओं के लिए मुफ़्त वर्कशॉप भी चलाती है। लोग जब उससे उसकी सफलता का राज पूछते हैं, तो वह मुस्कुराकर कहती है—

“जिंदगी जितना रुलाती है, उतना ही मजबूत भी बनाती है। अगर खून के आँसू भी बहे हैं, तो उन में हिम्मत का रंग जरूर मिला होता है।”

सुदर्शन सचदेवा 

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