बचपन को खिलने दो – कमलेश आहूजा

“ये तू क्या सारा दिन हँसी ठिठोली करती रहती है सबके साथ।थोड़ा सा तो गंभीर रहना सीख।भाई बहनों में सबसे बड़ी है।जैसा तू करेगी वैसा ही छोटे भाई बहन करेंगे।”घर के सभी लोग अक्सर नेहा को यही नसीहत देते रहते थे।

नेहा तीन भाई बहनों में सबसे बड़ी थी।पढ़ाई लिखाई में होशियार थी।हर साल फर्स्ट आती थी।बस थोड़ी चुलबुली थी।सबके साथ हँसकर बात करना और मस्ती करना उसे अच्छा लगता था।

माँ को छोड़कर बाकी घरवालों को उसका ये व्यवहार पसंद नहीं आता था।हर वक्त उसे टोकते रहते…बड़ी हो तुम,तुम्हें ये नही करना चाहिए वो नहीं करना चाहिए।छोटे भाई बहन वही सीखेंगे जो तुम करोगी..!!!

नेहा के लिए बड़ा होना अच्छा हुआ या बुरा पता नही पर उसे हर घड़ी एक बोझ सा महसूस होने लगा,उससे कहीं कोई गलती ना हो जाए जिससे उसके भाई बहन पर गलत असर हो। 

इस बोझ तले नेहा इतनी दबती जा रही थी कि वो अपना बचपन ही खोने लगी।कुछ और ही बनती जा रही थी इस सोच में कि सबका भविष्य उसके आचार विचार और व्यवहार पर टिका है।

नेहा अब ना ही पहले की तरह हँसती मुस्कुराती ना किसी से बात करती।खाने में भी जो होता चुपचाप खा लेती कभी माँ से अपनी पसंद का खाना बनाने को न कहती।उसकी अपनी पसंद ना पसंद तो कुछ रह ही नहीं गई थी।

घर में नेहा के इस बदले हुए व्यवहार की किसी को कोई चिंता नहीं थी पर माँ तो माँ ही होती है वो अपने बच्चे की तकलीफ बिना बताए ही समझ लेती है।

एक दिन नेहा की माँ ने ये महसूस किया कि नेहा कुछ अजीब सा व्यवहार कर रही है तो वो नेहा के पास आई और बोली-“नेहु,क्या हुआ बेटा आजकल तुम चुपचुप रहती हो? तुमको तुम्हारे भाई बहन ने कुछ बोला है क्या?

मेरे पास भी नही आती तुम।पहले तो मैं तुम्हारे सामने छोटे भाई को प्यार करती तो तुम्हें अच्छा नहीं लगता था पर अब तो तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़ता।ना तुम चिढ़ती हो ना ही कुछ कहती हो।

माँ के इतना बोलते ही नेहा के सब्र का बाँध जैसे टूट गया वो उससे गले लगकर फफक-फफककर रोने लगी।माँ ने भी उसे रोका नही रोने दिया।कुछ देर बाद जब नेहा थोड़ी शाँत हुई तो वो उससे बोली-“अच्छा अब बताओ कौन सी बात है जो तुम्हें परेशान कर रही है?”

“माँ! वो..दादी।”

“हाँ..हाँ बोलो बेटा घबराओ नहीं।”

“दादी बोली थी,तुम जैसा करोगी तुम्हारे भाई बहन वही सीखेंगे..अब तुम देख लो कि तुम्हें कैसे रहना है उनके सामने।इस बात का मुझपर बहुत असर हुआ।मुझे ऐसा लगने लगा जैसे मैं खुलकर जी नही पा रही हूँ।हर समय यही डर सताता रहता था कि कहीं मुझसे ऐसी कोई गलती न हो जाए जिसकी सजा मेरे छोटे भाई बहनों को भुगतनी पड़े।”

“ये सब कब हुआ? और तुमने उसी समय मुझको क्यों नहीं बताया?अकेली झेलती रही इतना सब।बेटा तुम पहले से ही बहुत अच्छी बहन हो अपने भाई बहन के लिए,हमारे लिए अपने पूरे परिवार के लिए।तुम्हारे अंदर तो सहनशीलता,ममता,स्नेह,आदर देने का भाव, छोटे को संभालने का हुनर सब भरे पड़े हैं।तुम्हें और कुछ सीखने की जरुरत नहीं।तुम जैसी थीं वैसी ही रहो।तुम्हारा एक भी गुण तुम्हारे भाई बहन में आ जाए तो वो लोग भी बेहतरीन शख्सियत के मालिक हो जाएंगे।”नेहा की माँ उसके सर पे प्यार से हाथ फेरते हुए बोली।

“माँ,आप सच्च कह रही हैं ना?”नेहा चहकते हुए बोली।

“हाँ मेरा बच्ची ! तू तो मेरी लाडली है तुझसे भला मैं क्यों झूठ बोलूँगी?”

माँ के ममता भरे शब्द और प्यारा भरा स्पर्श पाकर नेहा के मन से सारा बोझ उतर गया….और वो धीरे धीरे पहले की तरह बन गई।

“अरे तू तो फिर से पहले जैसे ही मस्ती मजाक करने लगी…तुझे समझाया था ना कि तरीके से रहा कर।इतनी जल्दी भूल गई सब।” नेहा की दादी गुस्सा करते हुए उसे बोल ही रही थी कि तभी नेहा का माँ वहाँ आ गई और अपनी सास से बोली-“माँ जी,मेरी नेहु जैसी है वैसी रहेगी।उसे अपने आपको बदलने की कोई जरूरत नहीं है।आप अब उसे इस तरह रोज रोज टोकना बंद कर दें।”

“हम्म..मुझे क्या?मैं तो तुम्हारे बच्चों की भलाई के लिए ही कहती हूँ।अगर तुम्हें मेरा बोलना अच्छा नहीं लगता तो अब से कुछ नहीं बोलूँगी।आखिर मेरा तेरे बच्चों पर अधिकार कैसा ?” नेहा की दादी गुस्से से बोली।

“आप ऐसा क्यों कह रही हैं मां ?मेरे बच्चों पर मेरे से ज्यादा अधिकार तो आपका है क्योंकि आप बच्चों की दादी हैं।बस आप अपने अधिकार का गलत उपयोग कर रहीं है..बच्चों को उन्मुक्त होकर अपने बचपन को जीने देना चाहिए।बच्चों पर उनकी उम्र से अधिक दवाब बनाना अक्सर उनकी मासूमियत छीन लेता और उनमें कुंठा का भाव पैदा कर देता है।इसलिए हम बड़ों को चाहिए कि वो बच्चों के बचपन को खिलने दें उनकी मासूमियत छीनकर इसे मुरझाने ना दें।” नेहा की मां की बात सुनकर उसकी दादी कुछ बोली नहीं पर उस दिन के बाद से उनका व्यवहार नेहा की प्रति बिल्कुल बदल गया था।अब वो नेहा पर कभी गुस्सा नहीं करतीं अगर कुछ समझाना भी होता तो बड़े प्यार से समझाती।नेहा भी अब अपनी दादी से प्यार करने लगी।

सच यदि बड़े अपने अधिकारों का सही उपयोग करते है तो बच्चे भी खुश रहते हैं और परिवार का माहौल भी खुशनुमा रहता है जोकि बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास के लिए बेहद जरूरी है।

कमलेश आहूजा

#अधिकार कैसा 

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