“नाश्ता तैयार हो गया क्या नीतू? जरा जल्दी निकलना है।” बाथरूम से नहाकर निकलते हुए बेताब से मधुर ने कहा।
“अरे गीता, नाश्ता तैयार हो गया क्या। साहब को जल्दी निकलना है।” नीतू ने आवाज लगाई।
“बस मेमसाब, आलू उबलने ही वाले हैं।”
“ओ माय गौड़। अभी देर लगेगी। मुझे निकलना पड़ेगा नीतू। बिल्डिंग में फायर का फाइनल इंन्सपैक्शन होना है। नवरात्रे नजदीक हैं और अभी काम्प्लीशन मिलने के कोई आसार नजर नहीं आते। दूसरी साइट का महूर्त भी दिन पर दिन लेट हो रहा है।” बड़बड़ाते हुए मधुर तेजी से जूते पहनते रहे। ब्रीफकेस उठाया और बाहर निकल गए।
“अजी थोड़ा सा दूध ही…।” मगर तब तक कार स्टार्ट हो चुकी थी।
रात के ग्यारह बजे थे। नीतू खाने पर इंतजार करते करते ऊंघ रही थी। लगभग साढ़े ग्यारह बजे मधुर ने प्रवेश किया। चेहरे पर थकान। उलझे बाल और धूल में सने जूते।
“ये कैसा काम है मधुर। महीनों से तुम ने कभी ठीक से ब्रेकफ़ास्ट नहीं किया है तो कभी समय पर डिनर नहीं। न दिन को चैन न रातों को आराम।”
“अरे यार, क्या करूं। काम ही ऐसा है। अपने मरे बिना स्वर्ग नहीं है। जहां खुद देखभाल नहीं की वहीं कर्मचारी हाथ साफ़ कर जाते हैं। कहने को बिल्डर हूँ। दो प्रोजैक्ट चला रहा हूँ मगर… दो घंटे तक तो सीमेंट के कट्टे गिन रहा था। एक आध नहीं चालीस बैग गायब थे। लेहा तोलने के कांटे की मशीन में किसी ने बड़ी कलकारी से एक सौफ्टवेयर डाल दिया है। एक ट्रक में दो चार क्विंटल माल कम आयेगा तब भी पता नहीं चलेगा।”
तभी फोन की घंटी बजने लगी।
“अरे माँ। बारह बजने को हैं। अभी तक आप सोयी नहीं।”
“आँख खोलकर अपने फोन में मिसकौल देख। दिन भर तुझे फोन उठाने की फुर्सत मिलती है।”
“अरे माँ, क्या करूं। काम ही ऐसा है। आप फिकर मत करो सब ठीक है। दीवाली पर तो हम आ ही रहे हैं।”
“आए तो खुशखबरी लेकर आना। चार साल हो गाए हैं शादी को। दुनिया के लिए ईंट पत्थर के मकान ही बनाता रहेगा या परिवार भी बढ़ाएगा। अरे कब देगा रे अच्छी खबर बिटवा।”
“माँ, अभी तो हम खुद को ही नहीं सँभाल पा रहे हैं। किसी नए क्षेत्र में स्टार्टअप कितना मुश्किल है न माँ। अभी तीसरे को कैसे…। अच्छा लो नीतू से बात करो।”
खाना खाने के बाद मधुर कंप्यूटर खोल कर बैठ गया।
“क्या कर रहे हो जी। अठारह घंटे हो गए हैं तुम्हें बिस्तर छोड़े हुए। दिमाग चल जाएगा। अब… प्लीज कल देखना मधुर।”
“बस थोड़ा सा कल का शैड्यूल देखना था। सुबह लोहे के ट्रक आएंगे। दस बजे लेबर औफ़ीसर की विजिट है। ग्यारह बजे विकास प्राधिकरण जाना है। रास्ते में बैंक। उसके बाद जरा एकाउंट्स देखने पड़ेंगे। तीन बजे सीए के साथ मीटिंग। एक जेसीबी कंपनी डैमो दिखाने आएगी। नए प्रोजैक्ट के लिए रेरा के एड्वाइजर से मीटिंग है। शाम को लेबर लौ के एडवोकेट आएंगे। नई सीक्योरिटी कांपनी भी फाइनल करनी है। पहले वाले के आदमी सरिया चोरी करवाते पकड़े गए थे। एक नया बोरिंग जल्दी से जल्दी फाइनल…।”
पलट कर देखा कि नीतू मधुर की बातें सुन भी रही है या नहीं तो पता चला कि वो गहरी नींद में सोयी हुई थी।
सुबह के आठ बजे थे। मधुर हर दिन की तरह तेजी के साथ तैयार हो रहे थे। स्नान किया। दस मिनट भगवान की पूजा की। जल्दी जल्दी कपड़े पहने और नाश्ते की टेबल पर बैठे। अभी दो ग्रास ही खाये थे कि फोन बजने लगा।
“अरे क्या हुआ छगन सिंह। पहुँच रहा हूँ नाश्ता करके।”
“साहब टावर ‘सी’ की शटरिंग गिर गई है। दो आदमी गंभीर…।”
मधुर नाश्ता छोड़कर अपनी कार की तरफ भागे।
अठारह मंजिल तक लगी हुई लोहे की शटरिंग भरभराकर गिर गई थी। एक मजदूर की क्षत विक्षत लाश पड़ी थी। तीन आदमियों को गंभीर हालत में हस्पताल ले जाया गया था। आस पास की मल्टी स्टोरी बिल्डिंग्स के मिलाकर सैकड़ों मजदूर घटना स्थल पर एकत्रित हो गए थे।
“आ गया हरामखोर बिल्डर। इसका भी यही हाल होना चाहिए जो हमारे भाई का हुआ है।” एक मजदूर ने चिल्लाकर कहा। महिलाएं रुद्र विलाप कर रही थीं। कई सिक्योरिटी वालों ने मधुर को घेर लिया और ऑफिस की तरफ ले गए। पीछे से मजदूर गालियां दे रहे थे।
“छगन लाल, भाई इन्हे समझाओ। शटरिंग का काम तो ठेकेदार देखता था न। अरे मेरी इसमें क्या भूमिका है।” मधुर ने व्यथित और घबराए स्वर में कहा।
“सर, वहाँ कोई सुनने वाला नहीं है। माहौल गरम है। मैं तो कहता हूँ कि आप निकल जाइए। ये भीड़ कभी भी बेकाबू होकर मरने मारने पर उतारू हो सकती है।”
तभी बाहर से तोडफोड की आवाजें आने लगीं। भीड़ ने मधुर की कार पर हमला कर दिया था। कार पर पत्थर बरसाए जा रहे थे। तभी किसी ने कार में आग लगा दी। धू धू कर लपटें उठने लगीं।
मीडिया की कई गाडियाँ घटनास्थल पर आकर रुकीं और कैमरे के फ्लैश चमकने लगे। मधुर का दिल ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा था। अब भागने का भी कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था। मजदूरों की भीड़ उग्र होती जा रही थी। कार में आग लगाने के बाद अब वे मधुर के दफ्तर की ओर बढ़ रहे थे।
तभी कई पत्थर मधुर के ऑफिस की शीशे की खिड़की के ऊपर पड़े। पूरे ऑफिस में काँच फैल गया। सेना से रिटायर सिक्योरिटी ओफ़ीसर ने अपनी पिष्टल हाथ में लेते हुए कहा “चिंता न करें साहब। जब तक जान है आप को आंच नहीं आने देंगे।”
अचानक पुलिस की कई गाडियाँ ऑफिस के नीचे आकर ठहर गईं। कई मजदूर नेता पुलिस के अधिकारी से भी उलझाने को तैयार थे। “मौत का बदला मौत से लेंगे। बाहर निकालो हरामखोर बिल्डर को।”
उम्रदराज इन्सपैक्टर ने लोगों को कभी समझाया तो कभी डराया। कानून अपने हाथ में लेने पर लाठीचार्ज करने और गिरफ्तार करने की धमकी दी। बिल्डर के खिलाफ सख्त से सख्त कार्यवाही करने का आश्वासन दिया। तब जाकर पुलिस को अंदर आने दिया गया।
पुलिस आधिकारी हाथ में अथकड़ी लेकर मधुर के ऑफिस में घुस गए।
“आप मुझे हथकड़ी लगाएंगे? मैं कोई अपराधी नहीं हूँ।”
“अरे सर, माहौल को समझने की कोशिश कीजिये। मैं गाड़ी चलते ही हथकड़ी खोल दूंगा मगर प्लीज। थोड़ा ड्रामा तो करना पड़ेगा। वैसे भी एक और मजदूर हस्पताल में मर गया है। सारा मीडिया यहाँ है और थोड़ी देर में विधायक जी भी आने वाले हैं।”
“विधायक को तो मैंने चुनाव में पाँच लाख दिये थे।”
“हें हें हें। पोलोटिक्स नहीं समझते हैं मधुर साहब।”
“इंसपैक्टर साहब, आप तो जानते ही हैं कि शटरिंग वगहरा का काम…। मेरी क्या ज़िम्मेदारी भला। आप जो कहें मैं करने को तैयार हूँ। समझ रहे हैं ना। बात यहीं निपट जाए तो अच्छा है वरना आप को तो पता है पोलोटिक्स में मेरे रसूख…।”
“रेल एक्सीडैंट हो जाए तो जवाबदेही रेलमंत्री की होती है ना। मंत्री तो न रेल चला रहा होता है न कंट्रोल रूम में बैठा होता है। अरे मधुर जी, बड़ा बिज़नस खड़ा कर लिया मगर… बच्चे हो अभी। हालात को समझने की कोशिश करो यार। अच्छा बताओ आप के किसी काम को मना किया है कभी। मगर… मीडिया ट्रायल हो गया है भाई। अब आप नेताजी के द्वारा गरीब के पक्ष में फर्जी आँसू बहाने का माध्यम हो। दिये होंगे आप ने पाँच लाख मगर आप की दो ‘बूटल्ली’(वोट) है और वो भी आप देने जाते हैं या नहीं। अब विधायक जी आप के पाँच लाख याद रखें या अपनी बल्क वोटों की रखवाली करें।” अनुभवी दरोगा जी ने हँसते हुए कहा।
“कुछ भी कीजिये प्लीज़। मुझे इस झंझट से निकालिए।”
“मधुर जी, अब आप मजदूर नेताओं के लिए उनके द्वारा जहर उगलने और यूनियन बाजी करने का साधन हो। मीडिया के लिए सुर्ख समाचार हो। हॉट न्यूज। और अपने प्रतिद्वंद्वियों के लिए आज शाम को एक पैग एक्स्ट्रा पीने का बहाना हो।”
“और आप के लिए…। आप के लिए क्या हूँ मैं।”
“अरे यार, सारी बातें अभी खुलवाओगे क्या। पुलिस और प्रशासन के लिए तो आप हमेशा से सौने का अंडा देने… खैर छोड़ो। मामला बेहद गरम हो गया है। देखिये, मीडिया ट्रायल नहीं होता तो मैं देख लेता। इस समय आप की और मेरी सलामती इसी में है कि आप का चालान करके जेल भेजा दिया जाय। मजबूरी है भई। आग और भड़क गई तो संभालना मुश्किल हो जाएगा। अभी आप के लिए बराबर के कमरे में अपने घर से मंगाया बिस्तर लगवा दिया जाएगा मगर सुबह…। सुबह आप को कोर्ट के सामने पेश करने के बाद सौ प्रतिशत संभावना है कि आप जेल…। अरे थोड़े दिन का उफान होता है। हल्की फुलकी धाराएँ लगेंगी। सब ठीक हो जाएगा।”
“नहीं, मंत्री जी से मेरे रिलेशन हैं। अभी फोन नहीं उठ रहा है। करेंगे कुछ न कुछ।” मधुर ने मायूसी से कहा।
“बड़े भोले हो मधुर जी। अच्छा बताओ इस शहर में कितने बिल्डर हैं। पचास या सौ। और मजदूर कितने हैं। दो लाख। आप से ही मकान खरीदकर आप के ही सबसे बड़े दुशमन बन गए फ्लैट ऑनर कितने हैं। कम से कम डेढ़ लाख। किसी के मकान में सीलन आ गई है तो किसी को आप के बिजली के बिल से शिकायत है। भैया इन नेताओं के दिमाग में एक तराजू फिट रहता है। वोट के बाजार में आप का कोई वजन ही नहीं है मगर उनका है। अच्छा एक बात बताओ। सरकार को सबसे अधिक राजस्व कौन देता है। बिल्डर। मगर कभी रीयल स्टेट प्रमोटर्स के पक्ष में सरकार का कोई बयान सुना है। रिलेक्स। कोई फोन नहीं आयेगा। सब को घटना का पता है। कड्बी दवा की तरह ये वक्त तो आप को गुजराना ही पड़ेगा। आप की मिसेज़ को मैंने समझाकर घर भेज दिया है। सुबह आप को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने के बाद…।”
जेल की इस बैरक में करीब चालीस कैदी मौजूद थे। जेबकतरे और स्मैकिए से लगाकर घोटालों में फंसे नेता, आईएस ओफ़ीसर व व्यापारी तक। सभी कैदी खाना खाने गए थे। मधुर बेहद दुखी और व्यथित एक कौने में बैठा घुटनों में सर दिये सुबक रहा था। क्या से क्या हो गया। पुराने प्रोजैक्ट का कब्जा देना था। नए का महूर्त दिवाली से पहले… और मैं यहाँ चोर उचक्कों के साथ बंद हूँ। ओफ़्फ़ क्या होगा। न जाने कबतक के लिए इस नर्क में कैद हो गया हूँ। आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे कि तभी किसी ने कंधे पर हाथ रखा।
“तुम खाना खाने नहीं गए बच्चे?”
“भूख नहीं है।” मधुर ने आंसुओं से भीगा चेहरा ऊपर उठाया। एक श्वेत वस्त्रधारी लंबे कद के धीर गंभीर से व्यक्ति, जेल के वातावरन में भी जिनके चेहरे पर एक असीम शांति और तेज दिखाई दे रहा था मधुर के पास खड़े थे।
“अरे, तुम तो रो रहे हो। इतने कमजोर आदमी हो तो दुनिया में कैसे सरवाइव करोगे। चलो मैं तुम्हें चाय पिलाकर लाता हूँ।”
“चाय मैं नहीं पीता। कॉफी यहाँ मिलेगी नहीं।”
“अरे सब मिलेगा। तुम उठो तो सही। यहाँ एक प्राइवेट केंटीन है। वहाँ सब मिलता है।”
मधुर मंत्रमुग्ध सा उनके पीछे पीछे चलने लगा।
“आप… आप तो सन्यासी जैसे दिखाई देते हैं। फिर आप इस नर्क में।”
“नर्क नहीं है। नर्क और स्वर्ग तो मन के होते हैं। ये भी एक मोड है जिंदगी का। एक पड़ाव है। अनुभव है। ठहराव है। रुक कर सोचने के लिए।”
“मगर आप ने क्या अपराध किया होगा मान्यवर।”
“मैं… मैं सांप्रदायिक हूँ। सैक्युलर देश में एक धर्म विशेष को मानता हूँ। ये अजीम गुनाह है। जब भी शहर में कहीं तनाव होता है या दंगा होता है प्रशासन कुछ लोगों को गिरफ्तार करके अपना दायित्व पूर्ण करती है। उनमें से एक मैं भी हूँ। मगर… मुझे यहाँ कोई दिक्कत नहीं। बाहर जैसा जीवन मैं जीता हूँ, वैसा ही यहाँ है। किताबें पढ़ता हूँ। ध्यान-मनन करता हूँ और चैन की नींद सोता हूँ।”
“चैन की नींद यहाँ। इस कैदखाने में।”
“सब से पहले तो तुम्हें भगवान को धन्यवाद देना होगा।”
“इस जहन्नुम में भेजने का?”
“नहीं। तुम्हारे ही प्रोजैक्ट में दो आदमी मृत्यु को प्राप्त हो गए किन्तु तुम जिंदा तो हो। यहाँ सुरक्षित भी हो वरना मजदूरों की भीड़ के द्वारा तुम्हारे साथ क्या नहीं हो सकता था। देखो इस कल्पना मात्र से ही तुम्हें थोड़ी सी शांति मिलेगी कि इस बजबूत चारदीवारी के बीच कोई तुम्हारा बाल भी बांका नहीं कर सकता।”
“हाँ मगर…।”
“दूसरी बात, अभी इसी वक्त मन में निश्चय करो कि दुनिया छोड़कर चले गए मजदूरों को कम से कम मुआवजा देना पड़े इसके लिए प्रयास करने की बजाय उनके परिवार के भरण पोषण की व्यवस्था करोगे जो कि तुम आसानी से कर सकते हो। इस निश्चय से और अधिक शांति मिलेगी।”
“और?”
“मन से इस अपराधबोध को निकाल फेंको। जो हुआ है वो सब प्रारब्ध है। तुम्हारे हाथ में कुछ भी नहीं। नियति के निर्णय को सहज स्वीकार करना ही मनुष्य की विवशता है।”
“इतना सरल भी नहीं है मगर…।”
“सरल भी नहीं है किन्तु असंभव भी नहीं है। खैर, अगली बात बहुत अजीब है जिसका सामान्य तौर पर तुम विरोध करोगे।”
“आ हा हा। मैं आप की तरह सन्यासी नहीं हूँ मिष्टर। कोई योग वोग मत बताने लगना। आँखें बंद करो और ध्यान…।” मधुर ने पहली बात थोड़ा सा तनाव रहित होते हुए मुस्कराकर कहा।
“देखो, अभी तो मैंने कुछ कहा भी नहीं और तुम मुस्कराने लगे। तुम करोड़ों रुयाए का रीयलस्टेट कारोबार कर रहे थे। एक विलासी जीवन जी रहे थे। एक दुर्घटना ने तुम्हें वहाँ पहुंचा दिया जहां जेबकतरे और चोर उचक्के रहते हैं। पूरा व्यापार डिस्टर्व हो गया है। ऊपर से सामाजिक प्रतिष्ठा। उसके उपरांत भी तुम मुस्कराइए ना? क्षणिक ही सही।”
“तो! आप कहना क्या चाहते हैं मान्यवर।”
“मैं ये कहना चाहता हूँ कि ये दुख, खुशी, तनाव और आनंद, मन की अवस्था हैं। तुम ढेर सारा पैसा खर्च करके किसी एकांत हिलस्टेशन पर जाते हो। कई लोग ऐसी छुट्टियों में अपना फोन तक बंद कर देते है। घंटों होटल के कमरे में या किसी प्रकृतिक स्थान पर बैठकर लगातार व्यस्त रहे अपने तन और मन को पूर्ण विश्राम देने का प्रयास करते हैं। नो डिस्टर्वेंस। राइट?”
“क्या बात करते हैं। कहाँ वो पहाड़ों का मौसम। कल कल बहती नदियां और देवदार के वृक्ष और कहाँ ये बदबू भरा वातावरण।”
“बदबू। ओह… हाँ। ठहरो।” और उन्होने ज़ेब से एक इत्र की शीशी निकली और चंद छींटे मधुर की ओर फेंक दिये। “लो हो गया बदबू का भी समाधान। कुछ चीजें कितनी सरल होती हैं और हम उनकी तलाश में न जाने कहाँ कहाँ भटकते रहते हैं। आओ वहाँ उस बरगद के पेड़ के नीचे बैठते हैं जहां शानदार फसलें लहरा रही हैं। और देखो। वहाँ देखो। एक फूल पर कैसे तितली मंडरा रही है। कैदखाने में तितली। हा हा हा। क्या इसे पता होगा की ये जेल है।”
“इसकी जेल कहाँ है। ये तो फुर्र से उड़ जाएगी। आजाद है।”
“तो आप का भी केवल ये शरीर कैद में है। मन तो आजाद है ना। अच्छा मधुर जी, आप इतने बरस से दुनिया में पूरी तरह स्वतंत्र रहे हैं। आज को छोड़कर। फुर्र से कहीं भी उड़ जाने के लिए स्वतंत्र। तब क्या आप ने कभी ऐसे आनंद का अनुभव किया जैसे पंछी आकाश में उड़ते वक्त करते हैं। मृगशावक जंगल में कुलांचे भरते हुए करते हैं। नहीं किया होगा। क्यूंकी इंसान पाँवों में जंजीरें लेकर ही जन्म लेता है।”
“जंजीरें, कैसी जंजीरें।”
“जन्मदाताओं की अपेक्षा की जंजीरें। वंश परंपरा, जाति, लिंग भेद, वर्ण भेद की जंजीरें। हसरतों और महत्वाकांग्शाओं की जंजीरें।”
“तो क्या ये जंजीरें तोड़ी जा सकती हैं?”
“नहीं। इंसान को इन्हे साथ लेकर ही उड़ना पड़ता है। हा हा हा। मगर… मगर इन्हे कभी इतना भारी मत बनने दो कि जिंदगी कैद बन जाय।”
“अरे महाराज, आप भी मज़ाक करते हैं। कैद तो ये है जहां आज दुर्भाग्य से मैं हूँ।”
“वही तो मैं कहा रहा हूँ। कैद कहाँ नहीं है। दायित्वों को निभाने की कैद। रिश्तों का बंधन। संकुचित सामाजिक दायरे की लक्षमन रेखा। आने वाली पीढ़ियों के प्रति उत्तरदाईत्व की पराधीनता। मुक्ति कहाँ है मेरे दोस्त। स्वतंत्रता कहाँ है। यहाँ आप को दस बीस निगाहें देख रही हैं तो बाहर लाखों। हर पल आप की हर गतिविधि का मूल्यांकन किया जा रहा है।”
“कमाल करते हैं आप भी। कैदखाने की इन ऊंची ऊंची दीवरों के बीच खुद को बंदी नहीं मानूँ?”
“आँखें बंद करके एक लंबी गहरी सांस लो और ये सोचो कि ये चेंज ऑफ द लाइफ का एक प्रयोग मात्र है। फाइवस्टार होटल के डिनर से दस प्रतिशत खर्च में यहाँ तुम्हें ऐसा खाना मिल जाएगा जैसा डॉक्टर तुम जैसे रहीसों को खाने की सलाह देते हैं। बिस्तर वैसा ही है जिस पर और्थोपेडिक डॉक्टर सोने की सलाह देता है। अखबार है। टेलीवीजन है। दिन भर गप्पें मारने को दोस्त हैं। और काम कुछ भी नहीं। न शारीरिक न मानसिक। बताओ और क्या चाहिए।”
“आप मज़ाक कर रहे हैं।”
“नहीं। मैं तुम्हारी मनः स्थिति बदलने का प्रयास कर रहा हूँ। चीज़ों को दूसरी दिशा से, दूसरी दृष्टि से भी देखा जा सकता है। हिन्दू मायथोलौजी के हिसाब से देखा जाय तो ये सब प्रारब्ध है। पहले से ही तय है। दर्शन के हिसाब से सोचा जाय तो इस वाले जीवन का एक बहुत छोटा सा काल खंड है जिसे जिंदगी के अन्य पलों की तरह गुजर जाना है। मन की स्थिति है कि हाय मैं कहाँ फंस गया।”
“मगर… आप को कल्पना भी नहीं है कि लोग क्या कहेंगे। समाज क्या सोचेगा कि जेल गया है। एक दाग…।”
“अरे किसे फुर्सत है तुम्हारे दाग देखने की। तुम शक्तिशाली हो तो दुनिया तुम्हारे चारों ओर मंडराती रहती है चाहे कितने भी दाग हों और कमजोर हो तो… कितने भी क्लीन रहो जमाने को तुम्हारे शरीर से बदबू आती है। अछूत हो जाते हो तुम उनके लिए। अदृश्य।”
“मगर जेल का वातावरण। स्टाफ का व्यवहार। मान-अपमान।”
“अभी तक हुआ क्या? यहाँ सब जानते हैं कि तुम शहर के जाने माने बिल्डर हो। उन्हे तुम्हारा अपमान करके उतना नहीं मिलेगा जितना तुम्हें सुविधा देकर कमाया जा सकता है।”
“मुझे जिंदगी में पहली बार कोई व्यक्ति मिला है जो इस तरह भी सोच सकता है।”
“सोच का और मन का ही तो सारा खेल है मेरे दोस्त। श्मशान घाट पर काम करने वाला, वहीं जलती चिताओं के बीच बैठकर अपना लंच कर लेता है और बीवी को फोन करके कहता है कि आज भिंडी बड़ी स्वाद बनी हैं। यदि वो खुद को मरने वालों के साथ जोड़ लेगा तो दस दिन में खुद भी मर जाएगा। पोश्टमार्टम हाउस का कर्मचारी, जहां चारों तरफ क्षत विक्षत शव पड़े होते हैं वहीं, सड़ी हुई मानव देहों के बीच चाय पीते हुए ताश खेलता हुआ टहाके लगाता है। वहीं दूसरी ओर बड़े बड़े व्यापारी और उद्योगपति ब्लैकमेलिंग और कर्ज में फँसकर अत्महत्या तक कर लेते हैं। सम्पन्न परिवार की कुलवधू पति के एक कड़वे शब्द से आहत होकर अपने नवजात के साथ मृत्यु को अंगीकार कर लेती है जिसने अभी दुनिया में कुछ भी नहीं देखा और दूसरी तरफ बरहवीं मंजिल पर गारा पकड़ा रही मजदूरन ऊपर से ही, दरख्त की छाँह में सोते हुए अपने नौनिहाल को देखकर स्वार्गिक सुख पाती रहती है। तुम्हारे एक प्रोजेक्ट में कुछ करोड़ रुपये कम लाभ हो तो तुम तनाव में आ जाओगे किन्तु इस देश के अस्सी प्रतिशत लोग इतने पैसे में अपने घर का खर्च चलाते हैं जितना तुम्हारा बिजली का बिल आता है और खुश हैं। सोचो दोस्त, तुम्हें जो मिला है, दुनिया में कितने लोगों को मिलता है।”
तभी सामने से डेप्युटी जेलर आते दिखाई दिये और विनम्रता के साथ कहा “आप को बीमार दिखाकर हौस्पिटल में सोने की व्यवस्था करा दी है मधुर जी। वहाँ कम्फ़र्टेबल बैड…।”
“नहीं श्रीमान। मैं वहीं ठीक हूँ। बैरक में। सबके साथ।”
“अरे… ये तुम्हें क्या हो गया। सुविधा भोगी हो। सुविधा खरीदते क्यूँ नहीं?”
“आप बिना सुविधा के मुझ से अधिक खुश हैं तो..।
“हा हा हा। ये संक्रामक रोग है मधुर जी। किन्तु इसका मतलब ये नहीं कि तुम कर्म करना छोड़ दो। उद्यम छोड़ दो। ये कर्मभूमि है मेरे दोस्त। यदि इंसान के भीतर हसरतें नहीं होतीं तो आज भी कन्दराओं में रहता और कंद मूल खाकर गुजारा करता।”
अगले दिन पत्नी नीतू और कंपनी का मैनेजर मिलाई करने आए। पत्नी की आँखें रात भर न सो पाने और रोने के कारण सूजी हुई सी थीं। वे पति से लिपटकर रोने लगीं।
“कुछ नहीं हुआ है जानू। ये भी वक्त का एक छोटा सा टुकड़ा है। बहुत छोटा। वक्त ये भी गुजर जाएगा। समझो मैं चार छह दिन के लिए बाहर गया। और सुनिए मैनेजर साहब। मारे गए मजदूरों के परिवारों के तुरंत पाँच पाँच लाख की सहायता पहुंचा दीजिये।”
“सर… वे तो कोर्ट गए हैं ना। जहर उगल रहे हैं कंपनी के खिलाफ। धरने प्रदर्शन की बातें हो रही हैं। इंश्योरेंस कंपनी अपने आप देखेगी। जो निर्णय हो।” मैनेजर ने झिझकते हुए कहा।
“वो जब होगा, होता रहेगा। इस तरह की घटनाओं में हम सामने वाले को अपना प्रतिद्वंद्वी मानने लगते हैं और अदालतों में युद्ध करते रहते हैं मगर… आफ्टरऑल कुछ भी हो, आदमी की मौत तो हुई है ना। कई घरों का चूल्हा बुझ गया है। और सुनो नीतू, तुम स्वयं जाओगी उनके यहाँ पैसे देने।”
“ये क्या हो गया है आप को। छोटी छोटी बातों में तनाव ले लेते थे। बीपी बढ़ जाता था। चिड़चिड़े हो जाते थे। इतनी असुरक्षा की भावना थी कि कहीं प्रोजैक्ट फेल न हो जाय। घाटा न हो जाय। और आज…। आज यहाँ जेल में रहकर भी सामान्य दिखाई दे रहे हैं जी।” नीतू ने आश्चर्य से मधुर का चेहरा देखते हुए कहा।
“जीना सीखने का प्रयास कर रहा हूँ। हा हा हा।”
मधुर कैदखाने में टहका लगा रहे थे और नीतू व मैनेजर उन्हे आश्चर्य से देख रहे थे।
रवीन्द्र कान्त त्यागी