सपने सुहाने – गरिमा चौधरी

सुबह का समय था। रसोई से ज़ोर–ज़ोर से बर्तनों की खनखनाहट आ रही थी, मानो बर्तन नहीं, किसी के मन की कड़वाहट टकरा–टकरा कर आवाज़ कर रही हो।

नेहा ने गैस पर चाय चढ़ाते हुए फिर एक नज़र दीवार पर घड़ी की तरफ़ डाली।

“आठ बजने वाले हैं और ये लड़की अभी तक बिस्तर से नहीं उठी!” वह बड़बड़ाई, “कहाँ से बनेगी ज़िंदगी में कुछ? ना टाइम की कदर, ना पढ़ाई का होश…”

इतने में कमरे का दरवाज़ा खुला और उनींदी आँखों में चिड़चिड़ाहट लिए अनन्या बाहर आई। बाल बिखरे हुए, हाथ में मोबाइल, अभी भी आधी नींद में।

“मम्मी… पाँच मिनट और सोने देती तो क्या हो जाता… रात देर तक असाइनमेंट कर रही थी।”

नेहा ने तुनक कर कहा,
“असाइनमेंट या सोशल मीडिया? सब मालूम है मुझे। पाँच मिनट–पाँच मिनट करते–करते पूरी ज़िंदगी निकल जाती है, समझी? दसवीं बोर्ड है तुम्हारी इस साल, खेल नहीं है कोई। सुबह छह बजे उठो, आधा घंटा रिविज़न करो, फिर तैयार हो कर स्कूल… ये मैंने कितनी बार समझाया है?”

अनन्या ने कुर्सी पर ढीले से बैठते हुए कहा,
“आपको तो बस डाँटना आता है मम्मी। एक दिन देर से उठ गई तो जैसे दुनिया उलट गई! कभी प्यार से भी बात कर लिया कीजिए… मुझे भी अच्छा लगेगा।”

“ओह! अब हम प्यार से बात नहीं करते तुमसे?” नेहा की आवाज़ ऊँची हो गई, “तुम्हारे अच्छे के लिए बोलो तो भी तुम्हें उपदेश ही लगता है। तुम्हारे नाना को कितनी उम्मीदें हैं तुम से, तुम्हारे पापा को देखो – कितना मेहनती है वह! और तुम हो कि बस फोन, दोस्त, गाने… यही रह गया है जीवन का लक्ष्य?”

इतने में बरामदे से एक हल्की खाँसी की आवाज़ आई। नेहा के पिता, राघव, अपनी लकड़ी की छड़ी टेकते हुए अंदर आए।

“क्या हुआ बेटा, सुबह–सुबह किस पर युद्ध छेड़ रखा है?”
वो मुस्कुराने की कोशिश करते हुए बोले।

“कुछ नहीं पापा,” नेहा ने झुंझलाकर कहा, “आप आराम कीजिए। बस आपकी नातिन को टाइम की कोई पाबंदी नहीं है, वही समझाने की कोशिश कर रही हूँ।”

अनन्या ने दादाजी को देखते ही थोड़ा संयम पकड़ा।
“गुड मॉर्निंग, दादू,” उसने धीरे से कहा, और पास जाकर उनके गले लग गई।

राघव ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा,
“पढ़ाई कैसी चल रही है, चैंपियन?”

“अच्छी…” अनन्या ने एक लंबा साँस खींच कर कहा, “लेकिन मन नहीं होता दादू, इतना दबाव… मम्मी को लगेगा तो नहीं, पर कभी–कभी बहुत डर लगता है। गलत पेपर हो जाए, मार्क्स कम आ जाएँ, तो सब नाराज़ हो जाएँगे…”

नेहा ने बीच में टोका,
“अब ये मैं डराती हूँ इसे? मैंने तो बस कहा है कि मेहनत करो। डर लग रहा है तो पढ़ो, जितना ज़्यादा पढ़ोगे उतना डर कम होगा। ये कोई नई बात नहीं है।”

राघव ने नेहा की ओर देखा। उस नज़र में कुछ था – जैसे बहुत पुरानी यादें फिर से जाग गई हों।

“नेहा,” उन्होंने धीमे से कहा, “ज़रा चाय दो बाहर वाले कमरे में, तुम्हें एक बात करनी थी।”

नेहा थोड़ी हतप्रभ हुई, पर फिर चाय की ट्रे उठाकर पिता के पीछे–पीछे कमरे में चली गई। अनन्या चुपचाप अपनी कॉपी लेकर टेबल पर बैठ गई, लेकिन कान वहीं कमरे की तरफ लगे थे।

राघव ने अपने पुराने से पलंग पर बैठते हुए कहा,
“तुझसे कुछ पूछूँ, बुरा तो नहीं मानेगी?”

“ऐसी बात क्यों कर रहे हैं पापा? बताइए।”

“तुझे याद है,” राघव ने बात शुरू की, “जब तू नौवीं में थी और हर समय घर में यही होता था – ‘पढ़ो, पढ़ो, पढ़ो।’ मेरा बस यही राग था, और तेरी माँ भी उसी सुर में मेरे साथ लग जाती थी। तुझे गाना कितना पसंद था… हर समय कोई न कोई धुन गुनगुनाती रहती थी।”

नेहा की आँखों में एक क्षण को चमक–सी आकर बुझ गई।
“हाँ, याद है… पर गाने से क्या मिलता, पापा? जिस घर में पैसे कमाने का दबाव हो, वहाँ शौक़ किस काम के?”

“ठीक कह रही है तू,” राघव ने गहरी साँस लेते हुए कहा, “मगर याद है, तूने एक बार जिला–स्तर की संगीत प्रतियोगिता जीती थी? तेरी ट्रॉफी अब भी मेरे कमरे में रखी है। तब तेरी मास्टरनी ने कितने प्यार से कहा था – ‘इसे आगे संगीत में भेजिए, बहुत अच्छा गाती है।’ मैंने वहीँ कह दिया था – ‘संगीत से घर नहीं चलता, हमारी लड़की डॉक्टर बनेगी।’”

नेहा ने थकी हुई मुस्कान दी,
“आख़िर में डॉक्टर तो नहीं बन पाई मैं, ज्यादा नंबर नहीं आए… और B.Sc करके, फिर ये ऑफिस की नौकरी… सब ठीक ही तो है पापा। अगर डॉक्टर बनती तो और अच्छा होता।”

“हो सकता है,” राघव ने सिर झुकाकर कहा, “पर एक सच और भी तो है – मैंने तेरे भीतर की गायिका को अपनी ही डर–घबराहट के नीचे दबा दिया। तू रात–रात भर रोती थी, आवाज़ दबा कर। सोचती होगी – ‘मेरे पापा तो मेरी बात सुनते ही नहीं।’ तब तूने भी तो मन–ही–मन कहा था – ‘मैं अपने बच्चों के साथ ऐसा नहीं करूँगी।’”

नेहा के हाथ में पकड़ा कप हल्का–सा काँप गया।
वो उस कमरे में लौट गई, जहाँ उसने कई रातें तकिए में मुँह छुपाकर बिताई थीं, जब उसे कुछ समझ ही नहीं आता था कि अपने सपनों का क्या करे।

“तो अब आप ये कह रहे हैं कि मैं अनन्या के साथ वही कर रही हूँ?” नेहा की आवाज़ में थोड़ी टीस थी, थोड़ी झुंझलाहट, “आप मुझे दोष दे रहे हैं?”

“दोष नहीं दे रहा, आईना दिखाने की कोशिश कर रहा हूँ,” राघव ने प्यार से कहा, “हमारे गाँव में एक कहावत थी – ‘जिसने बबूल बोया, उसके आँगन में आम नहीं उगते।’ मैंने तेरे मन की ज़मीन में डर, तुलना और दबाव के काँटे बोए। तूने चाहा था कि तेरी बेटी के लिए आम का एक मीठा पेड़ लगा सके, पर अनजाने में तूने वही काँटे दोहरा दिए।”

नेहा ने धीरे से कहा,
“तो क्या करूँ पापा? उसे बिल्कुल आज़ाद छोड़ दूँ? पढ़ाई ही न करे? दुनिया बोलीगी – ‘माँ ने लाड़–प्यार में बिगाड़ दिया।’ आप ही कहा करते थे – जो आज नहीं सीखेगा, कल पछताएगा। तो क्या मैं गलत हूँ कि चाहती हूँ वो सफल हो?”

“गलत तब होती है,” राघव बोले, “जब तू सफलता की परिभाषा सिर्फ़ अपने डर से तय करती है, उसके सपने से नहीं। मैं आज भी अपने उस डर का दंड भुगत रहा हूँ – तेरी माँ तो इस दुनिया में नहीं रही, पर जब भी तेरी पुरानी ट्रॉफी देखता हूँ, लगता है जैसे तेरी गाई हुई अधूरी धुनें मेरी दीवारों में अटकी पड़ी हैं।”

कमरे में कुछ देर चुप्पी रही। नेहा की आँखों के कोने भीगने लगे।

तभी बाहर से अनन्या की धीमी आवाज़ आई,
“दादू… मम्मी… मैं थोड़ी देर बाहर टहलने जा रही हूँ, ठीक है?”

नेहा ने जल्दी से आँसू पोंछे और बाहर आई।
“कहाँ जा रही है अकेली? इतना तनाव है तो परीक्षा के बाद घूम लेना, अब तो बस पढ़ाई…”

अनन्या ने हल्का सा पलट कर कहा,
“बस गली तक ही… दम घुटता है कभी–कभी मम्मी,” और बिना कुछ और बोले बाहर चली गई।

नेहा ने दरवाज़ा बंद होते देखा, तो उसे लगा जैसे सालों पहले की अपनी ही परछाईं दरवाजे से बाहर चली गई हो – वही बोझिल चाल, वही भीतर दबे सवाल।

शाम तक घर में एक अजीब–सी खामोशी छाई रही। पवन, नेहा का पति, ऑफिस से लौटकर आया तो माहौल को भाँपते ही पूछा,
“क्या हुआ? आज घर में इतना सन्नाटा क्यों है? दिन भर कोई हँसी की आवाज़ नहीं आई।”

श्रद्धा ने – जो अब तक चुप थीं – सारा किस्सा पवन को बता दिया। राघव ने भी पुरानी बातें दोहराईं। पवन गहरी सोच में डूब गया।

“नेहा,” पवन ने धीमे स्वर में कहा, “तुम्हें याद है न, जब हम दोनों कॉलेज में थे और तुम्हारी सबसे बड़ी ख़्वाहिश थी कि तुम संगीत–विद्यालय में एडमिशन लो? तुम्हारे पापा नहीं माने, तुमने बहस भी नहीं की… बस चुप हो गई। उसी दिन तुमने मुझे कहा था – ‘मैं अपने बच्चों को कभी बिना बात सुने फैसले नहीं सुनाऊँगी।’ आज तुम्हें देखते–देखते मुझे वही बात याद आ रही है।”

नेहा की आँखें भर आईं,
“तुम भी मुझे ही गलत कह रहे हो?”

“कोई किसी को गलत नहीं कह रहा,” पवन ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “हम सब अपनी–अपनी जगह डरते हैं। मैं भी डरता हूँ कि अगर अनन्या ने ठीक से पढ़ाई नहीं की, तो बाद में पछताएगी। मगर… क्या ये डर इतना ज़्यादा हो चुका है कि हम उसकी साँस तक पर पहरा बिठा दें?”

इतने में दरवाज़े पर घंटी बजी। अनन्या वापस आ गई थी। वो चुपचाप अंदर आई, जूते उतारे, और सीधे अपने कमरे में चली गई।

रात के खाने की मेज़ पर सब बैठे थे। नेहा ने सबके लिए खाना परोसा, पर खुद की प्लेट ख़ाली ही रही। अनन्या ने थाली में चावल–दाल को चम्मच से घुमाते हुए धीमे से कहा,
“दादू, आपके पास वो पुरानी अलमारी की चाबी है? मुझे कुछ देखना था।”

राघव थोड़ा चौंके,
“क्यों? वहाँ तो बस पुराने कागज, किताबें, और… कुछ बेकार की चीज़ें पड़ी हैं।”

“बेकार नहीं,” अनन्या ने चेहरा उठाकर कहा, “वहीं तो आपकी और मम्मी की आधी ज़िंदगी बंद पड़ी है न? पुरानी रिपोर्ट कार्ड, मोमबत्ती वाले जन्मदिन के फोटो… और शायद मम्मी की कोई तस्वीर, जिसमें वो गा रही हों।”

नेहा ने घूरकर देखा,
“उस अलमारी में तुम्हारे लिए कुछ नहीं है, अनन्या। पढ़ने बैठो। ये ड्रामा बाद में करना।”

अनन्या ने गहरी साँस लेते हुए चम्मच थाली में रख दिया।
“ठीक है मम्मी, मैं भी साफ बोलती हूँ आज। आप हर समय कहती हैं – ‘मैंने बहुत झेला है, इसलिए बता रही हूँ।’ आपने झेला, हम मानते हैं। दादू भी झेल चुके हैं अपने पापा का ज़ोर।

लेकिन हर बार बस ये कहना कि ‘हमारे साथ ये हुआ, इसलिए तुम भी सहो’… इस से आगे बढ़कर भी तो कुछ होना चाहिए न? अगर दादू से गलती हुई, तो उनसे आगे बढ़ने के बाद आपने क्या सीखा? और अगर आपसे गलती हो रही है, और आपने ही बदलने की कोशिश न की, तो मैं बड़ी होकर क्या सीखूँगी? यही न – कि मेरी बेटी आएगी तो मैं भी उसे दबाऊँ, ताकि परंपरा बनी रहे?”

नेहा सन्न रह गई।
“तुम ये क्या कह रही हो? हम तुम्हारी भलाई नहीं चाहते क्या?”

“भलाई और पकड़ में बहुत फ़र्क होता है, मम्मी,” अनन्या की आँखों में आँसू आ गए, पर आवाज़ टूट नहीं रही थी, “आप चाहती हैं मैं सफल बनूँ, अच्छी बात है। पर अगर मेरी खुशी, मेरा हुनर, मेरी साँसें, सब आप अपने डर के हिसाब से बाँध देंगी, तो मैं रह जाऊँगी जैसे एक ऐसा पेड़, जिसके चारों तरफ तार बाँध दिए हों। ना पूरी तरह बढ़ पाऊँगी, ना गिर भी पाऊँगी।”

राघव ने धीमे स्वर में कहा,
“बेटा, बात गलत नहीं कह रही है। कभी–कभी बच्चे हमारे जमे हुए सच को नए शब्दों में कह देते हैं।”

अनन्या ने राघव की ओर देखकर कहा,
“दादू, आप ही बताइए… अगर किसी खेत में आपके बाबा ने बबूल बोया हो, और आप छोटे थे, आपके हाथों में वो काँटे चुभते रहते हों… आपको दुख होता हो… तो क्या आप भी वही बबूल के बीज अपने खेत में बोते, सिर्फ़ इसलिए कि ‘हमारे बाबा ने ऐसे ही किया था’? या आप सोचते कि चलो अब आम, नीम, पीपल जैसे पेड़ों की बारी है, जो छाँव भी देंगे, फल भी?”

पवन ने चुपचाप नेहा की तरफ देखा। उसे लगा जैसे अनन्या की बातों में केवल शिकायत नहीं, एक गुहार भी छुपी है।

नेहा के होंठ काँप रहे थे। उसका बचपन, उसके अधूरे गीत, पिता का कड़ा चेहरा, पवन से की गई बातें – सब एक–एक कर उसके सामने तैरने लगे।

उसने मेज़ पर रखी प्लेट से अचानक हाथ हटा लिया, और धीरे से कुर्सी से उठ खड़ी हुई।

“आओ,” उसने अनन्या की तरफ देखते हुए कहा, “तुम्हें दिखाती हूँ वो अलमारी।”

सब चौंक कर उसकी ओर देखने लगे। अनन्या कुछ समझ नहीं पाई, पर धीरे–धीरे उठकर मम्मी के पीछे–पीछे चल दी।

राघव के कमरे में पुरानी लकड़ी की अलमारी थी, जिसके ऊपरी खाने में सालों से कोई नहीं गया था। राघव ने कंपकंपाते हाथों से चाबी निकाली, ताला खोला।

अंदर धूल की हल्की परत जमी थी, पर उसके बीच कुछ चमकती हुई चीजें भी थीं – पीली पड़ चुकी रपटियाँ, पुरानी किताबें, और एक कोने में रखी छोटी–सी सुनहरी ट्रॉफी।

नेहा ने ट्रॉफी उठाई। पीछे उँगलियों से धूल पोंछी। लिखा था –
“जिला स्तरीय गायन प्रतियोगिता – प्रथम पुरस्कार – नेहा राघव।”

नेहा की आँखों में आँसू भर आए।
“ये… ये ट्रॉफी मैंने सालों से नहीं छुई थी,” उसने फुसफुसाकर कहा, “मैंने सोचा था, भूल जाऊँगी तो दर्द भी कम हो जाएगा।”

अनन्या ने ट्रॉफी को हल्के से छुआ,
“आप बहुत अच्छा गाती होंगी, मम्मी।”

“थी…” नेहा खुद को सुधारते–सुधारते रुक गई, “शायद ‘थी’ नहीं… अभी भी हूँ, बस खुद को रोक रखा है। ये सोचकर कि ‘अब उम्र निकल गई, अब घर–गृहस्थी ही सब कुछ है।’”

राघव बिस्तर के किनारे बैठकर ये सब देख रहे थे।
“नेहा,” उन्होंने धीरे से कहा, “अगर तू आज भी गाएगी, तो मेरी हर धड़कन तुझे आशीर्वाद देगी। मेरी पीढ़ी ने तुझ पर जो बबूल थोपे, अगर तू आज उन्हें उखाड़ कर नई पौध लगाएगी, तो शायद मेरे अंदर का अपराधबोध थोड़ी शांति पा सकेगा।”

नेहा ने ट्रॉफी वापस रखते हुए अलमारी बंद नहीं की।
“ये अलमारी अब बंद नहीं होगी,” उसने कहा, “हम सब मिलकर इसे साफ करेंगे। अनन्या, इसमें से कुछ तस्वीरें, कुछ यादें तुम अपने कमरे में भी लगा लेना। ताकि तुम्हें हमेशा याद रहे – मम्मी के जीवन में क्या हुआ, और उन्होंने आगे क्या चुना।”

रात को सब खाने के बाद बैठ गए। टीवी बंद था, मोबाइल साइलेंट पर थे। लिविंग रूम में हल्की पीली रोशनी थी।

“अनन्या,” नेहा ने लाड़ से आवाज़ दी, “इधर आओ, मेरे पास बैठो।”

अनन्या थोड़ी हिचकिचाते हुए पास आ गई।
“हाँ मम्मी?”

नेहा ने उसकी ठोड़ी उठाकर सीधा देखा,
“मैं तुमसे माफ़ी माँगना चाहती हूँ।”

“मम्मी!” अनन्या चौंक गई, “आप मुझसे… क्यों?”

“क्योंकि मैं भी वही गलती करने लगी थी जो मेरे पापा ने मेरे साथ की,” नेहा की आवाज़ भर्रा गई, “मैंने अपने डर, समाज की बातें, अपने अधूरे सपने… सब तुम्हारे कंधों पर लाद दिए। मैं भूल गई थी कि तुम एक अलग इंसान हो, तुम्हारे सपने अलग हैं।

मैं ये नहीं कह रही कि पढ़ाई ज़रूरी नहीं है – वो ज़रूर है। पर मैं ये मान रही हूँ कि पढ़ाई का मतलब सिर्फ़ रटाई नहीं, समझना भी है; और ज़िंदगी का मतलब सिर्फ़ नौकरी नहीं, खुशी भी है। अगर तुम अपने मन की राह चुनोगी और ईमानदारी से मेहनत करोगी, तो मैं तुम्हारे साथ खड़ी रहूँगी। ये वादा है मेरा।”

अनन्या की आँखों से आँसू बह निकले।
“मम्मी… मुझे भी माफ़ कर दीजिए। मैं भी कई बार ज़्यादा चिड़चिड़ा हो जाती हूँ। पर सच कहूँ तो डर मुझे भी लगता है – ना आपके सपनों पर खरी उतरने का भरोसा होता है, ना अपने सपनों पर टिके रहने की हिम्मत जुटा पाती हूँ।”

पवन ने आगे बढ़कर दोनों माँ–बेटी को गले लगा लिया।
“हम तीनों मिलकर डर से भी लड़ेंगे, पढ़ाई से भी, सपनों से भी,” वह मुस्कुराता हुआ बोला, “तीनों में से किसी से भागेंगे नहीं, बस सही संतुलन खोजेंगे।”

राघव ने धीरे–धीरे ताली बजाई,
“वाह! आज मेरे घर में पहली बार ऐसा निर्णय हुआ है जो केवल ‘पुराने नियमों’ के हिसाब से नहीं, दिल की आवाज़ सुनकर लिया गया है। आज मुझे लग रहा है जैसे मैंने भी कुछ सीख लिया अपनी उम्र के आख़िरी पड़ाव पर।”

कुछ महीनों बाद बोर्ड की परीक्षा के साथ-साथ अनन्या ने फाइन आर्ट्स और डिज़ाइन की प्रवेश–परीक्षाओं की तैयारी भी शुरू कर दी। नेहा ने खुद बैठकर उसका टाइम–टेबल बनाया – जिसमें पढ़ाई भी थी, स्केचिंग भी, और थोड़ा–सा समय गाने के लिए भी… जिसे अब वे दोनों साथ बैठकर गुनगुनाती थीं।

एक शाम नेहा ने खुद के लिए नया हारमोनियम मंगवाया। डिब्बा खोलकर जब उसने पहली बार लंबे समय बाद ‘सा’ लगाया, तो उसकी आवाज़ हल्की काँपी, पर कुछ ही पलों में सुर ने अपना रास्ता पकड़ लिया। अनन्या ने मोबाइल में वो वीडियो रिकॉर्ड कर लिया।

“ये क्या कर रही हो?” नेहा ने हँसते हुए पूछा।

“इतिहास संभाल रही हूँ, मम्मी,” अनन्या ने वही शब्द दोहराए जो उसने कभी टीवी पर सुने थे, “जब मेरे बच्चे पूछेंगे – ‘मम्मी, आपने हमें सपने देखने देना कैसे सीखा?’ तो मैं उन्हें ये वीडियो दिखाऊँगी और कहूँगी – ‘देखो, ये वो दिन था जब दादू ने अपनी गलती मानी, मम्मी ने अपना मन बदला, और हमने मिलकर बबूल की झाड़ियाँ हटाकर आम का पेड़ लगाने का फैसला किया।’”

राघव ने खिड़की से ये दृश्य देखा। उनकी आँखें नम हो गईं, पर चेहरे पर एक ठहरी हुई मुस्कान थी।

उन्होंने मन ही मन कहा –
“शुक्र है, इस घर की अगली पीढ़ी ने वही नहीं बोया जो हमने बोया था। शायद अब सचमुच आम खाने की बारी आने वाली है – मीठे, रसीले, अपने–अपने सपनों के आम।”

आँगन में पुराने नीम के नीचे एक छोटी–सी क्यारी में अनन्या ने कलम से आम का छोटा–सा पौधा लगाया था – दादू, मम्मी और पापा के साथ मिट्टी डालते हुए।

शायद उसी दिन से इस घर में बात–बात पर जो कड़वाहट थी, वह थोड़ी–थोड़ी कम होने लगी थी… और उसकी जगह एक नई मिठास ने लेना शुरू कर दिया था – समझ की, संवाद की, और एक नई शुरुआत की।

लेखिका : गरिमा चौधरी 

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