चलिए कन्यादान की रस्म होने वाली है पंडितजी बुला रहे हैं मेघा ने आकर कहा तो रामेश्वर जी के दिल में एक हलचल सी मच गई मानो प्राचीन रस्म रिवाज वर्जनाओं की बेड़ियां तोड़ने को बेताब हो गए हों।
जब से निम्मी की शादी तय हुई अजीब सी आकुलता उनके मन को बेचैन करती रहती है।रामेश्वर जी अपने मन की इस आकुलता से बाहर ही नहीं निकल पा रहे थे ।
निम्मी उनकी इकलौती बेटी है।उनका तो बेटा भी वही और बेटी भी वही।बेटा बेटी के सारे अधिकार उसे दिए उन्होंने।लेकिन आखिर तो बेटी है वह उनकी पराए घर तो जाना ही है।अब जब उसकी शादी होने वाली है तब उसके कन्यादान के लिए वह स्वयं को तैयार नहीं कर पा रहे थे।
बेटी के विवाह की प्रसन्नता उससे अलगाव की व्यथा में दब गई थी।क्या विवाह होने के बाद बेटी पर उनका कोई अधिकार नहीं रह जाएगा।उसका इस घर में हम लोगों के साथ रहना आना जाना सब पर उनका अधिकार जाता रहेगा।
हमारा बड़ा भाग है कि हमें कन्यादान का सौभाग्य भगवान ने दिया है।पंडित जी कह रहे थे कि कन्यादान से बढ़ कर कोई दान इस संसार में नहीं होता उनकी पत्नी गौरी बहुत हुलस कर उन्हें बता रही थी।
हां वो तो अम्मा भी बताती थीं रामेश्वर जी की आवाज अतीत से डूब कर आ रही थी।
हां बोई तो।हमारी अम्मा और पिता जी ने तो निर्जल व्रत किया था हमारा कन्यादान करने के लिए ।जब आपके हाथ में मेरा हाथ सौंप कर पंडित जी ने संकल्प दिलवा दिया उसके बाद ही अन्न ग्रहण किया था मेघा की आंखों के सामने अपनी शादी का दृश्य आ गया था उसकी आँखें पनीली हो गईं और आवाज भीगती चली गई।उनका हाथ दूल्हे के हाथ में रखते हुए पंडित जी की ” समर्पए “मंत्र की प्रतिध्वनि और मां पिता जी के साथ अपने हृदय की हूक छिपाए आंसुओं की निशब्द बारिश याद आ गई थी उन्हें।साथ ही अपने पिता का विनय से झुका हुआ सिर जो शादी के बाद से अपनी कन्या को लड़के वालो को सौंप कर उन्हीं की आज्ञा अनुसार चलने को संकल्पित हो गया था।जैसे आज उनकी बेटी बंट गई थी।
क्या हम लोग भी वैसा ही कन्यादान करेंगे अपनी निम्मी का आकुल स्वर था उस पिता का जिसने आज तक अपनी बेटी को अपना बेटा भी मान कर पाला था।हर वो अधिकार वो सुविधा सब उसे दी थीं जो एक भारतीय परिवार के पुत्र के लिए अनिवार्य मानी जाती हैं।परिवार से लड़ाई मोल लेकर उसे दूसरे शहर के कॉलेज में पढ़ाई करने भेजा ।उसके बाद निम्मी के कहने पर उसे जॉब भी करने दिया।निम्मी को इसी शहर में शानदार नौकरी करता देख उनका दिल गर्व और संतोष से सराबोर हो जाता था।
बाबा बाबा कहां हो आप अचानक निम्मी की मधुर उत्साहित आवाज से वह सजग हुए।
ये क्या ले आई मेरी बेटी वात्सल्य उमड़ आया पुत्री को देख कर।
देखो बाबा आपके लिए कोट पैंट लेकर आई हूं अपनी पसंद का आखिर मेरी शादी है मेरे बाबा तो एकदम अलग एकदम स्पेशल दिखने चाहिए चहक उठी वह और तुरंत बड़े से बैग से सूट निकाल कर बाबा के सामने फैलाने लगी।
तू अपने लिए शॉपिंग करने गई थी या अपने बाबा के लिए मीठी झिड़की दी उन्होंने।
अपने बाबा के लिए और अपनी मां के लिए भी वह ठुनक कर बोली।
देखो मां यहां आओ जल्दी से ये हैं तुम्हारी साड़ियां पसंद आईं मां के सामने साड़ियां फैलाते हुए निम्मी मां पिता की उत्साहित प्रतिक्रिया की अपेक्षा करती उतावली हो गई।
लेकिन वे दोनों तो अचानक उत्साहहीन हो गए थे।
ये तो बहुत महंगे कपड़े हैं निम्मी पिता ने चिंता से कहा तो मां भी सहमति में सिर हिलाने लगी।
मेरे बजेट में हम दोनों के लिए इतने महंगे कपड़े नहीं है शादी तुम्हारी है तुम्हारे लिए बहुत कुछ खरीदने का बजेट बनाया है मैने पिता ने व्यग्र स्वर में कहा।
हां तो मेरे बजट के हैं मै आप लोगों के लिए खरीद कर लाई हूं निम्मी ने नाराजगी से कहा।
लेकिन अब तुम्हारी शादी होने वाली है। हम तुम्हारी कमाई के रुपए के कपड़े नहीं पहन सकते मेघा ने समझाना चाहा।
तुम्हारे रुपए का क्या मतलब है मां अभी तक तो ऐसा कुछ नहीं था।अचानक मेरे रुपए की बात कहां से आ गई क्या हो गया है आप लोगों को हैरान हो वह पिता से पूछने लगी।
अब तेरी शादी होने वाली है दूसरे घर जाएगी।कन्यादान के बाद हमारा कोई अधिकार नहीं रहेगा रामेश्वर जी अब भी कन्यादान की रस्म के भंवर जाल में तैर रहे थे।
कन्यादान !!!मतलब आप लोग आज इस जमाने में भी अपनी कन्या यानी कि मुझे दान करने के मंसूबे बांध रहे हो।मुझे नहीं करवाना अपना दान वान बाबा मै कोई गाय हूं कोई वस्तु हूं जिसे आप दान कर देने की बात सोच रहे हैं निम्मी क्रोधित हो उठी ।
निम्मी चुप हो जा।बावली हो गई है क्या।कन्यादान के लिए ऐसी उल्टी सीधी बात बोल रही है ।तुझे क्या अक्ल है इन रस्मों की समझ भी है मेघा चिहुंक उठी।
मैं सब समझती हूं मां।ये कन्यादान जैसी रस्में ही हैं जो हर बेटी को अपने खुद के घर में पराया कर देतीं हैं।अपने ही घर पर उसका कोई अधिकार नहीं रह जाता ।उसे गाय बकरी की तरह दूसरे को दान कर दिया जाता है निम्मी कहां चुप रहने वाली थी।तर्कशील थी वह।
मां आप खुद सोचो आपके मायके से आपका अधिकार खत्म हो गया है।नाना कहते हैं तेरा कन्यादान कर दिया तेरे घर का पानी कैसे पी सकता हूं यहां हमारे साथ आकर रहने की तो बात दूर है।आप उनके लिए कभी कोई गिफ्ट नहीं ले जा सकती वे लेंगे ही नहीं क्योंकि उन्होंने आपको दान कर दिया है ।दान की हुई वस्तु पर नाना नानी का क्या अधिकार।आप उनके लिए कभी कुछ कर नहीं पाती क्योंकि वह सब करने का आपका सारा अधिकार छीन लिया गया है इसी दान की वजह से…. निम्मी हांफने लग गई थी।
अपनी ही कन्या का दान आप क्यों और कैसे कर सकते हैं मुझे शादी ही नहीं करनी बाबा कहती बह पैर पटकती अपने कमरे की ओर बढ़ गई थी।
ज्यादा पढ़ाई लिखाई ने इस लड़की का दिमाग खराब कर दिया है।सदियों से यह रस्म चली आ रही है हम सब निभाते आ रहे हैं इसके कहने से बदल जाएगी हुंह मेघा ने गुस्से से कहा तो रामेश्वर जी कुछ कह नहीं सके।
कन्यादान सर्वाधिक महत्वपूर्ण रस्म है वैवाहिक संस्कार है।इस तथ्य से वह भलीभांति परिचित थे।लेकिन बदलते संदर्भ में क्या इस रस्म में इससे जुड़ी मानसिकता में परिवर्तन नहीं होना चाहिए यही मंथन उनके दिमाग को बेचैन कर रहा था।जिसका कोई समाधान कारक उपाय सुझाने में वह खुद को सर्वथा असमर्थ पा रहे थे।
सुनिए जी आप अपनी सिर चढ़ी लड़की के ऊटपटांग विचारों से प्रभावित हुए बिना पंडित जी क्या कह रहे हैं घर के बुजुर्ग क्या कह रहे हैं और सबसे ज्यादा लड़के वाले क्या कह रहे हैं सोच रहे हैं अपेक्षा कर रहे हैं इस पर ध्यान दीजिए अनुराग जी और उनके मां पिता रस्म रिवाजों के प्रति बहुत सख्त हैं ।आखिर हम लड़की वाले हैं हमारे निर्णय कोई मायने नहीं रखते समाज की सहमति अनिवार्य है मेघा ने उनके हाथ में चाय की प्याली पकड़ाते हुए चर्चा का पटाक्षेप सा कर दिया।
सही कह रही है मेघा।मुझे कैसा अधिकार कन्यादान या किसी भी रस्म में तब्दीली का। मैं तो अपनी कन्या जिन्हें सौंपने जा रहा हूं ये तो उन्हीं का अधिकार क्षेत्र है।
विवशता की गहरी सांस के साथ वह पत्नी द्वारा पकड़ाई चाय पी कर दूसरी तैयारियों में लग गए थे लेकिन उस दिन के बाद से निम्मी उनसे नाराज ही हो गई थी ।खामोश हो गई थी वह।
शादी की ढेरों तैयारियों के बीच उन्हें निम्मी के पास बैठने बात करने ध्यान देने की फुर्सत ही नहीं मिली और आज उसकी शादी का दिन आ गया।
मेघा ने कई बार उन्हें फल दूध खिलाने पिलाने की चेष्टा की थी अरे अनोखे आपकी ही लड़की का ब्याह नहीं हो रहा है ना ही कन्यादान करने वाले आप दुनिया के पहले व्यक्ति हैं ये फल दूध ले लीजिए आजकल कौन निर्जल व्रत रहता है कन्यादान के लिए ।
लेकिन रामेश्वर जी की तो जैसे भूख प्यास ही मर गई थी।
चलिए जल्दी पंडितजी बुला रहे हैं कन्यादान करिए फिर कुछ खा लीजिए तबियत खराब हो जाएगी अत्यधिक चिंतित स्वर था मेघा का।पत्नी थी उनकी समझ रही थी अपने पति के दिल के उमड़ते झंझावात को।बचपन से जिस बेटी को पलकों पर बिठा कर रखा और अंगारों पर भी चलना सिखाया ।साधिकार सही गलत का भेद करना सिखाया आज अधिकार विहीनता का अहसास उन्हें अंदर से व्यथित कर खोखला किए दे रहा था।
सुसज्जित मंडप में शहनाई की मीठी धुन बिखर रही थी।रामेश्वर जी के आते ही पंडितजी ने निम्मी का मेहंदी रचित हाथ वर अनुराग के हाथों में थमाया और रामेश्वर जी को हाथ लगाने को कह मंत्र पढ़ने की तैयारी करने लगे।
बिना निम्मी की ओर दृष्टिपात किए रामेश्वर जी ने अपना विवश थरथराता हाथ निम्मी और वर के हाथों को लगाया और पंडितजी ने मंत्र पढ़ना शुरू किया कि निम्मी ने अपना हाथ खींच लिया उसकी बड़ी बड़ी आंखों से आंसू की धार बह निकली।
बाबा मेरा कन्यादान मत करो कह फूट फूट कर रोने लगी।
हलचल मच गई।अनुराग के मां पिता जी अचरज से पास आ गए।
क्या बात है बेटी बहुत स्नेह से अनुराग के पिता ने अपनी होने वाली बहू से पूछा तो वह थोड़ी शांत हुई ।
पिता जी क्या ये कन्यादान की रस्म जरूरी है उसने धीरे से पूछा।
बेटी तुम स्वयं को वस्तु मत समझो जिसका दान किया जा रहा है।आज तुम्हारे पिता तुमसे संबंधित सारे अधिकार का दान कर रहे हैं।वो सारे अधिकार तुम्हारी जिम्मेदारी के तुम्हारी सेवा के तुम्हारे पालन पोषण के सब आज वह दूल्हे को दान कर रहे हैं सौंपने जा रहे हैं पंडित जी ने निम्मी को समझाने की कोशिश की।
वह मेरे पिता हैं।मेरा इस दुनिया में अस्तित्व मेरे मां पिता के ही कारण हैं।मुझ पर सबसे पहला अधिकार उन्ही का है उसका वह दान कैसे कर सकते हैं।कुछ अधिकार ऐसे होते हैं जिनका हस्तांतरण असंभव होता है।इस घर से मेरा अधिकार कोई दान नहीं कर सकता निम्मी का भीतर का आक्रोश मुखर हो उठा।
तो क्या कन्यादान की रस्म नहीं होगी पंडित जी बोल उठे।
मेघा थर्रा गई।ये लड़की पागल हो गई है।बारात लौट जाएगी आज बिना शादी के सोच कर ही वह ईश्वर को याद करने लगी।रामेश्वर जी स्तब्ध थे जुबान तालू से चिपक गई थी।
बिल्कुल सही कह रही है निम्मी अचानक तेज आवाज गूंज उठी।
अनुराग की मां नंदा जी जो इतनी देर से चुपचाप सबकी बातें सुन रहीं थीं मुखर हो गईं थीं।
सही तो कह रही है।रामेश्वर जी आप इसके जन्मदाता हैं क्या उस अधिकार को दान करने के अधिकार की स्वीकृति आपको आपकी बेटी ने दी है।देखिए आपकी बेटी आपकी जिम्मेदारी नहीं थी ना है ना ही हम उसे अपनी जिम्मेदारी समझ कर आपसे दान मांगने आए हैं।निम्मी एक पढ़ी लिखी आत्मनिर्भर लड़की है वह अपनी जिम्मेदारी स्वयं उठाने में सक्षम है।बल्कि अब वह और अनुराग दोनों साथ मिलकर हम आप सब की जिम्मेदारी उठाएंगे।अनुराग को निम्मी मिल गई और निम्मी को अनुराग का सहयोग मिलेगा।
कन्यादान होना है या नहीं अबकी बार पंडित जी की आक्रोशित आवाज गूंज उठी।
नहीं होना है।कन्यादान नहीं होगा बल्कि उस की जगह कन्या मान या कन्यासम्मान या सम्मानदान की रस्म करवाइए ।आइए मेघा जी हम चारों के हाथ बेटा बहू के हाथों से मिलाते हैं और सब मिलकर एक दूसरे के मान सम्मान का संकल्प लेते हैं।एक दूसरे की भावनाओं का एक दूसरे के घर और घरवालों को बराबर मानते हुए सम्मान का संकल्प लेते हैं जिसमें किसी एक का दान नही होगा बल्कि रिश्तों की मिठास का आपसी प्यार और समझ की साझेदारी का आ दान प्रदान होगा कहते हुए उन्होंने मेघा और रामेश्वर जी के हाथ अपने हाथों में पकड़ निम्मी और अनुराग के हाथों से जोड़ दिए।
हां पंडित जी अब कन्यासम्मान की दोनों परिवारों के सम्मान का संकल्प करवाइए कि आज से हम सब एक दूसरे को सम्मान का अधिकार सौंपते है अधिकारों का भावनाओं का जिम्मेदारियों का सम्मान करेंगे ।अगर ये अपनी बेटी हमें सौंप रहे हैं तो हम भी अपना बेटा इन्हें सौंपते हैं नंदा जी कहती जा रहीं थीं और रामेश्वर जी की बेचैनी उफनती आकुलता शांत होती जा रही थी।
बाबा ….निम्मी ने खुश होकर पिता की ओर देखा तो इस बार रामेश्वर जी ने भी बेटी की आंखों से आँखें मिला लीं थीं अब उन आंखों में अधिकार छोड़ने की विवशता नहीं अधिकार जताने का आत्मविश्वास के भाव थे।
यजमान जी बहुत सार्थक बात कही है आपने।वास्तव में रस्मों रिवाजों को रिश्तों में माधुर्य और सहजता वृद्धि में सहायक होना चाहिए । ऐसी रस्में जो मन में आक्रोश और परिवारों में विषमता के भाव फैलाएं उनसे सामाजिक समरसता बाधित होती है ।समय के साथ उनमें संशोधन आवश्यक है पंडित जी भावुक हो गए।
जी हां हम आप पढ़े लिखे वर्ग को ही आगे आना होगा ।बदलते जमाने में रस्में घुट कर मर जाएं या युवा पीढ़ी उन्हें मानने से इनकार कर दे उसके पहले उन्हें सुधार कर सबके अनुकूल बनाने की पहल तो होनी ही चाहिए रामेश्वर जी आज बहुत दिनों बाद भीतर की बात अधिकार से कह रहे थे।
जी हां रामेश्वर जी रस्म रिवाज परंपराएं इंसान की खुशी के लिए होती हैं समाज के विकास के लिए होती हैं।लड़का लड़की बराबरी के दावे करने में ऐसी ही रस्में रुकावट हैं।संशोधन तो हमारे देश के संविधान में भी हो जाता है फिर इसमें क्यों नहीं अनुराग के पिता ने भी मुस्कुराते हुए अपनी बात पूरी की।
थोड़ी ही देर में शहनाई की मीठी धुन के बीच अनुराग के मां पिता जी निम्मी के पास और निम्मी के मां पिता जी अनुराग के पास खड़े हो गए।पंडित जी ने सबके हाथ परस्पर पकड़वा दिए और जल सींच कर एक दूसरे के सम्मान की जिम्मेदारी का संकल्प मंत्र पढ़ने लगे थे…!
अब अधिकारों का बिखराव या क्षरण नहीं हो रहा था बल्कि अधिकारों का जुड़ाव हो रहा था और स्नेह संबंधों का भी।
प्रिय विद्वत पाठकों

ये बात सच है एक तरफ हम लड़का लड़की समानता की बात करते हैं समान अधिकारों की भागीदारी की दुहाई देते हैं।दूसरी तरफ कुछ रस्मों रिवाजों की वजह से विवाह संस्कार को इतना पेचीदा बना देते हैं कि वर्तमान युवा वर्ग उनमें जकड़न महसूस कर अपनाने से ही इनकार कर देता है ।जटिलताओ को सुलझाइए। रस्में ऐसी हों जो प्रसन्नता की बारिश करें मतभेद मिटाएं वैमनस्य छोटे बड़े के भेदभाव से ऊपर कहीं आपसी रिश्तों को भविष्य में भी मजबूती दें।जरूरत है पुरानी रस्मों का नवीनीकरण करने का।दोनों पक्ष खुश और बोझरहित महसूस करें।
लेखिका : लतिका श्रीवास्तव
#अधिकार कैसा?