किस्मत अपना रास्ता खुद चुनती है – गरिमा चौधरी

रीमा ने गेट से अंदर दाख़िल होते ही नाक पर रुमाल रख लिया।

“हे भगवान, ये कैसी जगह है?” उसने धीरे से माँ के कान में फुसफुसाया, “चारों तरफ़ धूल, खुले नाले, गाय-बैल… और आप कह रही थीं कि यहाँ ‘बहुत बड़ा कारोबार’ है!”

माँ ने आँखें तरेरीं—
“धीरे बोल, लोग सुन लेंगे। ये तेरे मामा का घर है, और तू पहली बार आई है यहाँ। थोड़ा सँभलकर चल।”

रीमा ने होंठ बिचकाए। वो मुंबई की चमकती सोसायटी में पली-बढ़ी थी। एयर कंडीशन फ्लैट, मॉडर्न कैफे, मॉल, कार—यही उसकी दुनिया थी। आज पहली बार माँ के ज़िद करने पर इस गाँव के कस्बे में आई थी, जहाँ उसके मामा का परिवार रहता था।

दरवाज़े पर से ही मामी ने हाथ पोंछते हुए उसे देखा तो खुश होकर दौड़ी चली आईं—
“अरे मेरी शहर वाली बिटिया आ गई! आओ-आओ रीमा, बहुत सुनी थी तेरी बातें, आज पहली बार देख रही हूँ।”

उन्होंने प्यार से गले लगाया, पर रीमा के शरीर में ज़रा भी ढील नहीं आई। उसे लग रहा था जैसे कोई ऑयली हाथों से उसकी महँगी ड्रेस खराब कर देगा।

अंदर बड़े आँगन में चारपाइयाँ पड़ी थीं। एक तरफ़ बड़ा-सा लकड़ी का टेबल था, जिस पर कई फाइलें और कागज़ फैले थे। वहीं बैठा एक लंबा-सा, सांवला-सा लड़का उठकर उनकी ओर बढ़ा।

“नमस्ते बुआ ,” उसने झुककर पैर छुए, फिर मुस्कुराते हुए बोला, “और ये हमारी मशहूर रीमा बहन… शहर से सीधा गाँव में!”

रीमा ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा। सादी-सी शर्ट, जींस, पैरों में साधारण चप्पल। उसकी नज़र में ये कोई खास प्रभाव छोड़ने वाला नहीं था।

“ये है तुम्हारा ममेरा भाई देवल,” माँ ने परिचय कराया, “घर और गोदाम दोनों संभालता है, और अब अपना बिजनेस भी बढ़ा रहा है।”

देवल हँस दिया—
“अरे बुआ , आप तो जैसे मुझे बहुत बड़ा व्यावसायी बना रही हैं। अभी तो बस शुरुआत है।”

रीमा मुस्कुरा भी नहीं सकी। उसने मन ही मन सोचा, यही है वो, जिसके लिए मम्मी मुझे यहाँ घसीट लाई हैं?

कुछ देर बाद सब लोग आँगन में बैठ गए। मामा चाय ले आए। बातों-बातों में माँ ने मुद्दा छेड़ दिया—

“देखो भैया ,” माँ ने कहा, “रीमा MBA कर चुकी है, मुंबई की बड़ी कंपनी में जॉब करती है, पर मैं चाहती हूँ कि वो खुद का कुछ करे। तुम लोगों का धंधा चल निकला है, अगर तुम दोनों मिलकर काम कर लो तो बिजनेस चार गुना बढ़ सकता है।”

मामी की आँखें चमक उठीं।
“वाह, ये तो बहुत अच्छा होगा! शहर की समझ, गाँव का अनुभव—मिलकर कमाल कर देंगे।”

देवल ने उत्साह से कहा—
“हाँ बुआ , मुझे भी किसी ऐसे की तलाश है, जो मार्केटिंग संभाल सके। ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म, ब्रांडिंग… मुझे तो बस अनाज, फलों, और सप्लाई का काम आता है। अगर रीमा सच में साथ दे तो हम कंपनी को अगले स्तर पर ले जा सकते हैं।”

सबकी निगाहें अब रीमा पर थीं।

उसने चाय का घूंट लिया, फिर ठंडी आवाज़ में बोली—
“माँ, आपको लगा मैं मुंबई छोड़कर यहाँ… इस गाँव में आकर बैठ जाऊँगी? ये बिजनेस… ये गोदाम… ये सब मेरे लिए नहीं है। मैं मल्टीनेशनल कंपनी में काम करती हूँ, इन सब देहाती कामों की मुझे आदत नहीं पड़ेगी।”

देवल की मुस्कान थोड़ी ढीली पड़ी, लेकिन उसने संयम बनाए रखा—
“रीमा, गाँव में रहने का मतलब पिछड़ापन नहीं है। हम लोग अब सीधे विदेशों में भी माल भेज रहे हैं। अगर सही ब्रांडिंग हो जाए तो…”

“प्लीज़,” रीमा ने उसके शब्द काट दिए, “विदेशों में माल भेज देने से कोई ‘इंटरनेशनल बिजनेसमैन’ नहीं बन जाता। और वैसे भी मैं उस वातावरण में काम करना चाहती हूँ जहाँ लोग मेरे जैसे सोचते हों। यहाँ…,” उसने नजरें घुमा कर आँगन और दीवारों की तरफ़ देखा, “मैं घुट जाऊँगी।”

मामी का चेहरा उतर गया। मामा ने चश्मे के पीछे से अपने बेटे की तरफ देखा। पर देवल ने बस हल्की-सी मुस्कान के साथ सिर हिलाया—

“कोई बात नहीं बुआ , ये तो बस एक सुझाव था। रीमा बहन, तुम जो भी करना चाहो, खुश रहना सबसे जरूरी है। अगर कभी लगता है कि हमें साथ में कुछ करना है, तो मैं हमेशा तैयार हूँ।”

रीमा ने नज़रें फेर लीं, मानो बात ख़त्म हो गई हो। उस रात उसने माँ से भी झुंझलाकर कहा—

“आपको सच में लगा कि मैं किसी गाँव के लड़के के साथ बिजनेस पार्टनर बनूँगी? लोग क्या सोचेंगे? कॉलेज के दोस्त, ऑफिस वाले… सब हँसेंगे मेरे ऊपर।”

माँ ने भारी मन से कहा—
“लोगों के हँसने से ज़्यादा जरुरी है कि क्या सही है, बेटी।”

“सही है या नहीं, ये मैं तय करूँगी,” रीमा ने बात खत्म समझते हुए कहा।

कुछ महीने बीत गए।
रीमा अपनी नौकरी में व्यस्त हो गई।
मेट्रो, ऑफिस की भाग-दौड़, पार्टियाँ, मीटिंग्स… यही उसका रोज का रूटीन था।

एक दिन ऑफिस में अचानक कंपनी की मीटिंग बुलाई गई। सबको कॉन्फ्रेंस रूम में बुलाया गया, जहाँ बड़े स्क्रीन पर एक प्रेजेंटेशन चल रही थी—

“इंडिया की टॉप 10 रूरल-बेस्ड स्टार्टअप कंपनियाँ, जो ग्लोबल लेवल पर अपनी पहचान बना रही हैं।”

रीमा भी बाकी सहकर्मियों की तरह स्क्रीन पर नज़रें टिकाए हुए थी।
अचानक स्क्रीन पर एक नाम उभरा—

“देवल एग्री-एक्सपोर्ट्स, गुजरात”

स्क्रीन पर जो फोटो था, उसमें सूट-बूट पहने, हल्की दाढ़ी, आत्मविश्वासी मुस्कान वाला एक शख्स दिखा… यही देवल था।

“ओह हो,” बॉस ने कहा, “ये वही कंपनी है ना जिसने पिछली तिमाही में यूरोप और मिडल ईस्ट में ऑर्गेनिक अनाज सप्लाई करके रिकॉर्ड बनाया? हमने भी इनसे संपर्क करने का सोचा था। बहुत सक्सेसफुल मॉडल है इनका।”

रीमा के हाथ से पेन गिरते-गिरते बचा।
ये… ये देवल है?
जिसे उसने पुरानी शर्ट और चप्पल में देखा था, जो गोदाम में घूमता था, वही आज कॉर्पोरेट वर्ल्ड में उदाहरण बनकर खड़ा था।

मीटिंग के बाद भी उसका दिमाग वहीं अटका रहा।
शाम को घर पहुँचकर उसने मां से यही सारी बातें बताईं।

माँ ने धीमे स्वर में जवाब दिया—
“हाँ, पिछले ही हफ्ते तेरे मामा का फोन आया था। बोले कि देवल को नेशनल लेवल पर अवॉर्ड भी मिलने वाला है। टीवी पर इंटरव्यू आएगा उसका। तूने खुद ही तो उसकी बात को मामूली समझकर इंकार कर दिया था, अब पछताने से क्या होगा?”

रीमा ने खुद से नज़रें चुराईं।
“मुझे कहाँ पता था माँ कि वो इतना आगे निकल जाएगा…”

“बेटी,” माँ ने गहरी साँस ली, “आगे निकलने से पहले भी इंसान का सम्मान करना सीखना जरूरी होता है। तूने तो उसके सपने का मजाक ही उड़ा दिया था, सिर्फ इसलिए कि वो कस्बे से था, सूटेड-बूटेड नहीं था, अंग्रेज़ी में धाराप्रवाह नहीं बोलता था।”

उस रात रीमा नींद में भी कुछ बेचैन-सी रही।

कुछ समय बाद, देवल का वही इंटरव्यू टीवी पर आने वाला था। माँ ने ज़िद करके उसे भी साथ बैठा लिया।

स्क्रीन पर एंकर सवाल पूछ रही थी—

“देवल जी, आपको ये आइडिया कैसे आया कि गाँव से ही ग्लोबल बिजनेस खड़ा किया जाए?”

देवल मुस्कुराकर बोला—
“मैं गाँव में पला-बढ़ा हूँ, मैंने किसानों की मेहनत देखी है। महसूस किया कि वो लोग सही दाम, सही पहचान नहीं पाते। मुझे लगा अगर उनकी उपज को सीधे दुनिया तक पहुँचा सकूँ, तो गाँव और शहर के बीच की दूरी कम हो सकती है…”

रीमा को लगा जैसे वो कोई और ही व्यक्ति देख रही हो। चेहरे पर वही सादगी थी, पर अंदर से आत्मविश्वास की चमक अलग ही तरह से दिख रही थी।

इंटरव्यू खत्म हुआ तो एंकर ने अंत में कहा—
“और सुनने में आया है कि आपकी पार्टनर भी विदेश से पढ़ी हुई हैं?”

देवल हल्के से मुस्कुराया—
“जी, मेरी पार्टनर और पत्नी नीला हैं। वो हॉलैंड में पढ़ी हैं, और हमने वहीं काम करते हुए साथ कंपनी शुरू की। अब वो इंडिया शिफ्ट हो गई हैं, ताकि हम दोनों मिलकर गाँव और शहर के बीच बेहतर पुल बना सकें।”

ये सुनते ही रीमा के दिल में जैसे कोई चुभोया गया हो।
पत्नी और पार्टनर…
यानी जो जगह कभी उसके लिए हो सकती थी, अब वहाँ कोई और थी—जो न सिर्फ़ देवल के साथ, बल्कि उसके सपनों के साथ भी खड़ी थी।

कुछ महीनों बाद माँ के ज़िद करने पर रीमा फिर से मामा के घर गई।
इस बार कस्बे में कदम रखते ही उसे वैसा घिनौना एहसास नहीं हुआ।
शायद वजह ये थी कि अब उसकी नज़र वहाँ की ख़ामियों पर नहीं, संभावनाओं पर जा रही थी।

जैसे ही गाड़ी से उतरी, उसने देखा—वही पुराना मकान अब रिनोवेशन के बाद एक छोटे-से “ऑफिस-कम-होम” में बदल चुका था। नीचे की मंज़िल पर ग्लास का दरवाजा, जिस पर बड़े अक्षरों में लिखा था—

“देवल एग्री-एक्सपोर्ट्स प्रा. लि.”

अंदर जाते ही एयर कंडीशन की ठंडी हवा आई, कंप्यूटरों की आवाज़, कुछ कर्मचारी, और रिसेप्शन डेस्क।

मामी ने उसे देखते ही गले लगा लिया—
“आ गई मेरी बिटिया! चल, देवल और नीला से मिलवाती हूँ।”

ऑफिस के अंदर केबिन में देवल बैठा था, नीले रंग की शर्ट, फॉर्मल पैंट, और दीवार पर सर्टिफिकेट्स की कतार। सामने वाली कुर्सी पर बैठी थी नीला—खुले बाल, सादगी भरा कुर्ता, चेहरे पर आत्मविश्वासी मुस्कान।

“अरे रीमा बहन!” देवल खुशी से उठा, “कितने साल बाद आना हुआ! बैठो-बैठो।”

रीमा ने हल्की मुस्कान के साथ सिर हिलाया—
“बधाई हो देवल, आपने तो कमाल कर दिया। अब तो टीवी पर आते हो, अखबार में भी।”

देवल हँसा—
“अरे ये सब तो किसानों की मेहनत और थोड़ी-सी किस्मत है। ये मेरी पत्नी हैं, नीला। हमारी कंपनी की असली ब्रांडिंग यही संभालती हैं।”

नीला ने आगे बढ़कर उसका हाथ थामा—
“आपके बारे में बहुत सुन रखा है, रीमा दी। मम्मी जी  हमेशा बताती हैं कि आप कितनी तेज़ दिमाग़ वाली हैं, और मुंबई में कितना अच्छा काम करती हैं।”

रीमा का गला हल्का-सा भर आया।
ये वही घर था, जहाँ उसने कभी देवल को ‘देहाती’ कहकर नज़रअंदाज़ किया था। आज वही लोग इतने सम्मान से बात कर रहे थे, मानो उसे अपने से कम नहीं, बराबर समझ रहे हों।

दोपहर में सब ऊपर वाले हिस्से में खाने पर बैठे।
मामा ने प्यार से कहा—
“रीमा बेटा, हम हमेशा चाहते थे कि तुम और देवल साथ काम करो। पर किसी पर ज़बरदस्ती थोड़े की जाती है… किस्मत अपना रास्ता खुद चुनती है।”

रीमा ने धीरे से कहा—
“मामा, उस दिन मैंने बहुत अहंकार से बात की थी। मुझे लगा बड़ा शहर मतलब बड़ी सोच, और छोटा शहर मतलब छोटी सोच। पर आज महसूस हो रहा है कि सोच का शहर से नहीं, इंसान के दिल से रिश्ता होता है। उस समय अगर मैंने देवल की बात को… थोड़ा भी गंभीरता से लिया होता तो शायद…”

वो रुक गई। आगे के शब्द खुद-ब-खुद गुम हो गए।
नीला मुस्कुरा रही थी।

“दी,” नीला ने धीमे स्वर में कहा, “कभी-कभी इंसान को गिरकर ही समझ आता है कि ज़मीन कितनी मजबूत है। आपने जो सोचा, वो ग़लत था, पर आपने आज मान लिया, यही बड़ी बात है। और कौन जानता है, आगे चलकर हम किसी प्रोजेक्ट में साथ भी काम कर लें?”

देवल ने तुरंत सहमति में कहा—
“हाँ रीमा, तू चाहे तो हम शहर के मार्केट के लिए नया ब्रांड लॉन्च कर सकते हैं। तू कंसल्टेंट बन जा, पार्ट टाइम ही सही। हम तेरा और तू हमारा सहारा बन जाना।”

रीमा के दिल में एक अजीब-सी हलचल हुई।
ये लोग उससे बदला नहीं ले रहे थे, उसे नीचा नहीं दिखा रहे थे, बल्कि फिर भी उसे साथ खड़े होने की जगह दे रहे थे।

शाम को जब रीमा और माँ लौटने लगे, तो मामी ने उसके हाथ में एक छोटा-सा पैकेट थमाया—

“ये क्या है?”

“हमारी कंपनी की तरफ़ से पहला आधिकारिक ऑफर,” मामी ने हँसते हुए कहा, “लेकिन ये ऑफर बिजनेस से ज़्यादा रिश्ते का है। इसमें एक ख़त है, जो देवल और नीला ने मिलकर लिखा है… घर जाके अकेले में खोलना, ठीक है?”

रास्ते भर रीमा चुप रही।
घर पहुँचकर उसने पैकेट खोला।
अंदर एक लेटर था—

“प्रिय रीमा,

कभी-कभी हम जिन लोगों को कम समझ लेते हैं, वही हमें आगे बढ़ने की सबसे बड़ी प्रेरणा बन जाते हैं। तुमने भले ही पहली बार हमारे सपनों पर हँस दिया हो, पर उसी दिन मैंने तय किया था कि मुझे खुद को इस लायक बनाना है कि फिर कभी कोई सिर्फ मेरे ‘गाँव’ को देखकर मुझे न आँके।

पर आज तुमने जो स्वीकार किया, वो हम सबमें सबसे बड़ा कदम है। तुम्हारी सच्चाई हमें तुम्हारे और करीब लाती है।

अगर कभी भी, किसी भी रूप में, तुम हमारे साथ काम करना चाहो—दरवाज़ा हमेशा खुला है।
लेकिन उससे भी ज़्यादा जरूरी है कि हमारे बीच का रिश्ता मजबूत रहे।

तुम्हारा,
देवल और नीला”

रीमा की आँखों से आँसू टपक पड़े।
उसने चुपचाप खत को सीने से लगा लिया।

उसने महसूस किया कि असली गँवार वो नहीं होते जो गाँव में रहते हैं, बल्कि वो होते हैं जो दूसरों की कीमत सिर्फ कपड़ों, पते और अंग्रेज़ी के आधार पर लगाते हैं।

उसने मोबाइल उठाया और देवल का नंबर डायल किया—

“हैलो देवल…”

“हाँ रीमा बहन, बोलो?”

“अगर… अगर तुम्हारा ऑफर अभी भी वैध हो तो… मैं कंसल्टेंट के रूप में तुम्हारे साथ काम करना चाहती हूँ। पार्ट टाइम ही सही।”

दूसरी तरफ़ से देवल की खिलखिलाहट गूँजी—
“अरे, हमारी कंपनी की किस्मत खुल गई! स्वागत है तुम्हारा, पार्टनर जी।”

रीमा मुस्कुरा पड़ी।
इस बार उसकी मुस्कान आँखों तक पहुँच रही थी—
क्योंकि अब वह सिर्फ किसी और की नहीं, अपनी खुद की भी इज्जत करना सीख चुकी थी।

लेखिका : गरिमा चौधरी

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