वैसे तो मंजूजी अपने पोतों, पारस और मानस से बड़ा लगाव रखती थीं पर जब भी उनसे नाराज़ होतीं,तो अपनी बहू आभा को ज़रूर लपेट लेती थीं।
आभा चाहे उस जगह पर मौजूद हो या न हो,अगर बच्चे कुछ भी शैतानी करते,तो बच्चों को डांटने के साथ साथ उनसे कहतीं,”पता नहीं तुम लोग कैसे हो,हमारे घर तो कोई भी ऐसा नहीं था।”
अगर बच्चे कभी कभार ज़्यादा बोलने लगते तो उनको चुप रहने के बजाय कहतीं,”हमारे यहाँ तो कोई इतना नहीं बोलता,ये लोग अपने ननिहाल पर चले गए हैं,तभी इतने बातूनी हैं।”
आभा यह सब सुनती तो उसको बड़ी तकलीफ होती क्योंकि वो समझती थी कि ये सब उसी को सुनाने के लिए कहा जा रहा है।
बच्चे अगर खिलौने खेलते तो अक्सर समेटना भूल जाते, जब तक आभा बिखरी चीज़ों को समेटने आती,उतनी देर में तो मंजूजी अपने शब्दों के बाण से बच्चों के ननिहाल तक पहुंच जातीं। आभा भी अनसुना कर देती क्योंकि वो जानती थी कि ये तो इनका रोज़ का काम है तो लड़ाई झगड़ा इसका हल नहीं है।
आभा को इन सबका एक ही हल समझ आता था कि मंजूजी की बातों को अनसुना और अनदेखा कर दिया जाए। पर कोई भी इंसान हर वक़्त एक ही सोच और मिज़ाज का नहीं रहता कभी तो गुस्सा आ ही जाता है। और ऐसा ही एक दिन हुआ जब मंजूजी ने पारस और मानस से खिलौने समेटने को कहा, तो बच्चे भी दादी के चिड़चिड़े स्वभाव और दिन भर टोका टाकी की आदत से भली-भांति परिचित होते हुए बोले,”आप हर वक़्त हमारे पीछे क्यों पड़ी रहती हैं? अभी खेलकर हटा लेंगे अपने खिलौने।”
इतना सुनते ही मंजूजी फटाक से बोलीं,”जवाब देते हो,यही सिखाया गया है तुमको,यही संस्कार मिले हैं तुम लोगों को?मुझसे ऐसे मत बात करना,मुझे बदतमीजी बर्दाश्त नहीं है। जाओ ऐसे बात अपनी मम्मी से करो जाकर।”
ये सुनते ही आभा रोटियां सेकना रोककर आयी और बोली,”मम्मीजी,आपको अगर बच्चों को डांटना है तो आप सीधे बच्चों से बात भी कह सकती हैं,मैंने तो कभी डांटने मारने को मना नहीं किया । आपका पूरा हक है अपने पोतों पर। लेकिन उसमें मुझे और मेरे घर वालों को समेटने की क्या ज़रूरत है? और रही बात संस्कारों की,तो शुरू से ये बच्चे इसी परिवार में सबके साथ रह रहे हैं,तो संस्कार भी यहीं के मिले हैं इनको। और वैसे भी इस घर के संस्कारों में तो दूसरों को नीचा दिखाना तो आम बात है। पर आज मैं आपको स्पष्ट कह देना चाहती हूं कि कृपया बच्चों से बात करते समय मुझे बीच में मत घसीटा करिए। मैं बच्चों को शैतानी करना या जवाब देना नहीं सिखाती हूं क्योंकि इतनी अक्ल मुझे भी है कि आज मैं इनको अगर कुछ भी गलत सिखाऊंगी तो कल उसका खामियाजा मुझे ही भुगतना पड़ेगा इसलिए जो जिसकी बात हो उससे सीधे कहिये इसी में सबका भला है।”
अपनी बहू के मुंह से इतनी स्पष्ट और सपाट बातें सुनने के बाद मंजूजी ने बहस करना उचित नहीं समझा और आभा को ये सब बोलकर बहुत हल्का महसूस हुआ,यूँ लगा मानो सालों का गुबार निकल गया हो।।।।
सिन्नी पाण्डेय