सुबह के 6:00 बजे थे। अलार्म की घंटी लगातार बज रही थी।
“उफ्फ! अदिति। अलार्म की घंटी कब से बज रही है, इसे बंद करो। मेरी नींद खराब हो रही है।” आधी नींद में बड़बड़ाते हुए अर्जुन ने अदिति से कहा।
अदिति ने जैसे-तैसे अलार्म बंद किया और बहुत ही बेमन से उठी और हाथ-मुँह धोकर अपनी बेटी आर्या का टिफिन बनाने के लिए किचन में चली गई।
अदिति, खुशनुमा दिल की मलिका, खिलखिला कर जोर से हंसने वाली, सबके दिलों पर राज करने वाली — एक बेटी, एक पत्नी, एक बहू और एक माँ थी। अर्जुन की नौकरी दूसरे शहर में थी, इसलिए ये तीन लोगों का एक न्यूक्लियर परिवार था।
शादी के 15 साल बाद भी अदिति अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभा रही थी। शादी के 3 साल बाद उनकी एक बेटी आर्या हुई। आर्या के जन्म के बाद अदिति ने अपनी स्कूल की नौकरी छोड़ दी और बेटी का पालन-पोषण अपनी पहली जिम्मेदारी मान ली।
आर्या अब 12 साल की हो चुकी थी। बेटी को पढ़ाना, घर का हर काम संभालना — इन सबमें अदिति ने अपने ऊपर ध्यान देना जैसे भूल ही गई थी। नई-नई शादी के दिनों में पूरा बन-ठन कर रहने वाली अदिति अब पहले जैसी अदिति नहीं रह गई थी।
“आर्या उठो! उठो आर्या। स्कूल के लिए देर हो रही है बेटा। उठ जाओ। स्कूल बस आती ही होगी।”
“मम्मी, थोड़ी देर और सोने दो।” बेटी आर्या ने कहा। यह सुनते ही अदिति को जैसे घबराहट-सी हुई और वह झल्लाकर बोली –
“क्या किस्मत पाई है आप लोगों ने। तुम्हें भी कोई फिक्र नहीं, ना ही तुम्हारे पापा को। एक मैं हूँ जो सबसे पहले जल्दी उठकर सबके लिए खाना बनाती हूँ। टिफिन तैयार करती हूँ। मुझे पूरा सोने को नहीं मिलता।”
ऐसे शब्द सुनकर अर्जुन की नींद खुल गई। उसने अदिति को बोला –
“क्या हुआ अदिति? क्यों तुम आजकल हर वक्त उखड़ी हुई रहती हो?”
तब बेटी आर्या ने पापा को कहा –
“पापा, आजकल मम्मी इतनी चिड़चिड़ी क्यों हो गई है? मेरी पढ़ाई पर भी पहले जितना ध्यान नहीं देतीं। पहले जैसी खिलखिलाकर हंसती भी नहीं। हर बात पर झल्ला पड़ती हैं। कभी खुश हो जाती हैं और अचानक दुखी भी।”
12 साल की आर्या अब समझदार हो गई थी। उसे अपनी माँ के अंदर आए बदलाव का साफ पता लग रहा था।
बेटी के स्कूल जाते ही अर्जुन ने बड़े प्यार से कहा –
“अदिति, चलो अच्छी-सी दो कप चाय बना लाओ। साथ बैठकर पीते हैं।”
पर अदिति ने थकान-भरे स्वर में कहा –
“आप ही पी लो, मुझे बहुत काम है।”
अर्जुन भी अब साफ महसूस कर रहा था कि अदिति बदल रही है। छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा, काम में मन न लगना, कभी हँसना तो कभी अचानक चुप हो जाना बिखरे मन का ही असर था।
अर्जुन ने अपने एक दोस्त की बीवी, जो डॉक्टर थी और अब उसकी भी एक तरह से दोस्त बन चुकी थी, उनसे इस बारे में बात की और अदिति के सारे लक्षण बताए।
डॉ. मीनाक्षी ने अर्जुन से कहा –
“अर्जुन, चालिस की उम्र तक आते-आते महिलाओं में हार्मोनल असंतुलन होना आम है। यह मूड को, नींद को और पूरे शरीर को प्रभावित करता है। खासकर जब महिला माँ बनती है, तो परिवार और बच्चों को प्राथमिकता देते हुए वह खुद के खान-पान और नींद को नज़रअंदाज़ कर देती है। यह सब उसी का परिणाम है।
और हाँ, याद रखिए, ऐसी स्थिति में इंसान कभी-कभी ऐसे शब्द भी मुँह से निकाल देता है जिन्हें वो असल में कहना नहीं चाहता। लेकिन उस समय कंट्रोल नहीं हो पाता। आपको उन बातों को दिल पर नहीं लेना है। ये अदिति का स्वभाव नहीं है, ये सिर्फ़ उस थकान और असंतुलन का असर है। अगर आप धैर्य और सहानुभूति से उनका साथ देंगे, तो धीरे-धीरे वही अदिति लौट आएँगी जिसे आप हमेशा मुस्कुराते हुए देखते आए हैं।”
“आप अदिति को मेरी क्लिनिक ले आइए। मैं जांच करूँगी और कुछ दवाइयाँ तथा लाइफस्टाइल बदलाव की सलाह दूंगी। लेकिन उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है कि आप उन्हें प्यार, सहारा और अपनापन दें। ज़रूरत हो तो उन्हें किसी पहाड़ी जगह घुमाने ले जाएँ, ताकि उनका मन बदले। याद रखिए, इस समय एक औरत को सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है — सहानुभूति, प्रेम और सम्मान की।”
फिर डॉक्टर थोड़ी देर रुककर मुस्कुराईं और बोलीं –
“जहाँ तक मैंने अदिति को जाना है, मैं उनसे मिली हूँ, वो बहुत खूबसूरत मन की मालकिन हैं। मैंने हमेशा उन्हें हंसते हुए ही पाया है। लेकिन मुझे यक़ीन है, वो जल्द ही संभल जाएँगी।”
डॉक्टर की बात सुनकर अर्जुन को सब समझ आ गया। उसने घर लौटते वक्त अदिति के लिए एक प्यारा-सा गुलदस्ता खरीदा।
घर आकर गुलदस्ता देते हुए अर्जुन ने कहा –
“मेरी बच्ची की प्यारी-सी माँ और मेरी प्यारी-सी बीवी को फिर से पहले वाली हंसती मुस्कुराती अदिति बनना है।”
अर्जुन ने अदिति को बाहों में भर लिया। अदिति ने हल्की-सी मुस्कान दी, मगर वह अब भी थकी हुई थी। उस पल सब कुछ बदल तो नहीं गया, लेकिन अर्जुन की बाँहों की गरमी और शब्दों की मिठास ने उसके दिल में एक छोटा-सा भरोसा बो दिया।
उसकी बिखरी हंसी और बिखरा मन एक ही पल में जुड़ने वाले नहीं थे, मगर उस दिन से धीरे-धीरे अदिति के चेहरे पर मुस्कान लौटने की शुरुआत ज़रूर हो गई।
✍️ ज्योति आहुजा