दिखावे से परे – ज्योति आहूजा 

मुंबई की एक बड़ी और चमकदार सोसाइटी में राहुल और नेहा रहते थे। शादी को उन्हें दो साल हुए थे। दोनों नौकरीपेशा थे—राहुल एक मल्टीनेशनल कंपनी में मैनेजर और नेहा एक प्राइवेट फर्म में मार्केटिंग प्रोफ़ेशनल। सुबह जल्दी निकलना, दिनभर काम की दौड़ और रात को थके-हारे लौटना उनकी दिनचर्या थी। कई बार तो ऐसा होता कि वीकडेज़ में दोनों को ठीक से बैठकर बात करने का समय भी नहीं मिलता। वीकेंड आता तो या तो देर तक सो जाते या फिर किसी पार्टी में चले जाते। बाहर से उनकी ज़िंदगी सबको परफ़ेक्ट लगती थी—अच्छे कपड़े, गाड़ियाँ और सोशल मीडिया पर चमकती तस्वीरें। लेकिन धीरे-धीरे नेहा को इस चमक में कहीं खालीपन महसूस होने लगा।

पिछले कुछ हफ़्तों से उसके चेहरे की मुस्कान कम हो गई थी। ऑफिस से लौटकर वह चुपचाप सोफ़े पर बैठ जाती। पार्टी में भी उसकी हँसी बनावटी लगती। राहुल ने कई बार नोटिस किया, मगर काम के दबाव में अक्सर पूछ नहीं पाता। एक शाम जब वे दोनों कार से पार्टी से लौट रहे थे, तो नेहा अचानक बोली—“राहुल, तुम्हें नहीं लगता हमारी ज़िंदगी बस एक चक्कर बन गई है? वही पार्टियाँ, वही दिखावे वाली बातें, वही लोग जो सामने से हँसते हैं लेकिन पीठ पीछे बुराई करते हैं। कभी-कभी तो लगता है दो तरह की दुनिया है । ऐसे लोग जो अपनी ही दुनिया,ईगो और घमंड में डूबे है इस बड़े शहर में किसी को किसी से कोई मतलब नहीं । या दूसरे प्रकार के जो एक-दूसरे की स्टेटस से जलते रहते हैं, और हम भी खींचकर उसी होड़ में डाल दिए जाते हैं। मुझे ये सब नहीं चाहिए… मैं चाहती हूँ कुछ पल ऐसे हों जहाँ शांति हो, सादगी हो और कोई दिखावा न हो। क्या सच में ऐसी कोई जगह है?”

राहुल ने गाड़ी की स्पीड धीमी की और थोड़ी देर सोचकर बोला—“नेहा, याद है जब हम मिले थे।तब कुछ मुलाक़ातों  के बाद मैंने तुम्हें अपने बचपन के बारे में बताया था। जब मेरा जन्म हुआ था, पापा की पोस्टिंग छोटे-छोटे शहरों और गाँवों में होती थी। इसलिए हमें बार-बार कस्बों और गाँवों में रहना पड़ता था। वही मिट्टी, वही अपनापन अब भी मेरे अंदर बसा है। गाँव ने मुझे सिखाया कि सादगी ही असली शान है। अगर तुम चाहो तो हम अगले हफ़्ते पापा के एक पुराने जानकार के फार्महाउस चलें। वहाँ तुम्हें वही काफ़ी हद तक वही मिलेगा जिसकी तुम्हें तलाश है।” नेहा ने उसकी ओर देखा। उसकी आँखों में थकान थी मगर उसी पल उनमें हल्की-सी चमक लौट आई। उसने धीरे से मुस्कुराकर कहा।अच्छा सच में ।

और कुछ दिन बाद दोनों सुबह मुंबई से प्लेन की दिल्ली तक यात्रा के बाद एक पब्लिक कैब द्वारा राजस्थान में स्थित अलवर के निकट गाँव के लिये  निकल पड़े। शहर का ट्रैफिक और हॉर्न धीरे-धीरे पीछे छूट गए। 

कुछ घंटों की दूरी के बाद सड़कें सँकरी होने लगीं, किनारों पर पेड़ और खेत फैल गए। नेहा ने खिड़की से बाहर झाँकते हुए गहरी साँस ली और बोली—“राहुल, ये हवा… ये रास्ते… सब अलग हैं। जैसे साँसें हल्की हो गई हों।” राहुल ने मुस्कुराकर कहा—“यही फर्क है नेहा। यहाँ गाड़ियों का शोर कम या नहीं के बराबर है ।बस हवा का संगीत है।”

थोड़ी देर बाद कार एक कच्चे रास्ते पर मुड़ी और एक बड़े से फार्महाउस के गेट पर रुकी। गेट पर खड़े एक बुज़ुर्ग ने दोनों का स्वागत किया। राहुल ने आदर से प्रणाम किया और नेहा से परिचय कराया—“ये पापा के पुराने जानकार हैं, आज हम यहीं रुकेंगे।” बुज़ुर्ग मुस्कुराकर बोले—“बिटिया, यहाँ शहर जैसी चमक नहीं मिलेगी, पर मिट्टी की महक ज़रूर मिलेगी।” नेहा के होंठों पर हल्की मुस्कान आई।

आँगन में आम और नीम के पेड़ थे, मिट्टी का फर्श ठंडा लग रहा था। दूर खेतों में औरतें काम कर रही थीं। किसी ने सिर पर घड़ा रखा था, किसी ने लकड़ियों का गट्ठर। उनके कपड़े साधारण थे, लेकिन उनके चेहरे पर मेहनत की एक अलग ही चमक थी। नेहा उन्हें देर तक देखती रही और धीमे स्वर में बोली—“राहुल, शहर में औरतें घंटों सजती-संवरती हैं, गहनों से लद जाती हैं, लेकिन इन औरतों को देखो… इनके माथे पर जो पसीना है, वही इनका हार है, वही इनका श्रृंगार है और वही इनका गहना है। कितनी सुंदर लग रही हैं ये।” राहुल ने सिर हिलाकर कहा—“हाँ नेहा, यही सादगी है जो इनकी असली चमक है।”दिखावे से कोसों दूर है ये नारियाँ ।

थोड़ी देर बाद खेतों से कुछ पुरुष लौटते दिखे। किसी ने हल कंधे पर रखा था, किसी ने बैलों की रस्सी थामी थी। सबके सिर पर पगड़ी बँधी थी, और धूप की आख़िरी किरणों में वो पगड़ी जैसे सोने  के ताज जैसा चमक रही थी। नेहा मंत्रमुग्ध होकर बोली—“राहुल, ये पगड़ी जैसे इनकी पहचान है।” राहुल मुस्कुराया—“हाँ, जब किसान या ज़मींदार पगड़ी पहनता है, तो वो उसके लिए सिर्फ कपड़ा नहीं होता। वो उसकी शान है, उसकी इज़्ज़त है। सच कहूँ तो, यही पगड़ी उसका ताज है। उसी पल वो अपने खेतों का राजा बन जाता है।”

अगली सुबह नेहा नीम के पेड़ के नीचे बैठी थी कि अचानक दूर से ढोलक और टन-टन की आवाज़ आई। उसने बुज़ुर्ग से पूछा—“ये कैसी आवाज़ें हैं?” बुज़ुर्ग मुस्कुराए—“बिटिया, इन दिनों गाँव में मेला लगा है। वही से ढोलक, वही घंटी की आवाज़ आ रही है। बच्चे झूलों पर होंगे, ढोलक बजेगी और दूर हाथी की घंटी भी सुनाई देगी।” नेहा की आँखों में चमक आ गई। वह तुरंत राहुल के पास भागी—“राहुल, चलो न! मुझे वो मेला देखना है।”

गाँव का चौक रंग-बिरंगी दुकानों से सजा था। कहीं गुड़ और जलेबी की मिठास हवा में घुली थी, कहीं लकड़ी के खिलौने चमक रहे थे। बच्चे खिलखिलाते हुए झूलों पर बैठे थे और ढोलक की ताल पर औरतें गीत गा रही थीं। नेहा वहीं खड़ी सब देखती रही। उसके मन में मुंबई के प्रदर्शनी केंद्र घूम गए—बड़े हॉल, ब्रांडेड कपड़े और जूते, महँगी चीज़ों की सेल लगती है वहाँ ।वह धीमे स्वर में बोली—“राहुल, मैंने मेले देखे हैं… लेकिन शहर के। वहाँ सिर्फ ब्रांड्स होते हैं, लोग खरीदारी करने जाते हैं। वो मेला नहीं, शॉपिंग फेयर होता है। यहाँ देखो… ये बच्चे, ये औरतें, ये हँसी… ये असली मेला है।”

उसी वक्त पास से एक हाथी गुज़रा। उसकी गर्दन में बँधी घंटी टन-टन कर रही थी और बच्चे उसकी पीठ पर बैठे हाथ हिला रहे थे। नेहा ठिठक गई। उसकी आँखें फैल गईं। “राहुल… ये तो जैसे सपना है। हाथी की सवारी मैंने सिर्फ पुरानी फिल्मों में देखी थी। कभी सोचा भी नहीं था कि असलियत में ऐसे देख पाऊँगी। ये दृश्य… ये आवाज़… ये सादगी… मेरा रोम-रोम भर रहा है।” उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन होंठों पर मुस्कान थी। 

बड़े शहर में पली बड़ी नेहा ने कभी ऐसी ज़िन्दगी का स्वाद चखा ही नहीं था ।राहुल उसकी ओर देखता रहा। उसे लगा जैसे नेहा सचमुच पहली बार जी रही है।

अगले दिन शाम को दोनों कार द्वारा अलवर के आसपास स्थित एक नदी किनारे पहुँचे। पानी की सतह पर चाँदनी ऐसे बिखरी थी जैसे किसी ने चाँदी घोल दी हो। पानी कल-कल की धीमी धुन बजा रहा था। किनारे पर लगे पेड़ों की परछाइयाँ लहरों में झूम रही थीं। नेहा धीरे-धीरे घास पर बैठ गई और गहरी साँस लेकर बोली—“राहुल… ये आवाज़ सुन रहे हो? ये पानी का बहना, ये हवा का झोंका… लगता है जैसे किसी ने मेरी थकी हुई आत्मा को सहला दिया हो। शहर की तेज़ रोशनी में भी मैंने कभी इतनी शांति महसूस नहीं की।” राहुल ने उसका हाथ थाम लिया और बोला—“नेहा, देखो… यही फर्क है। दिखावे से जीवन नहीं चलता, चलता है तो सादा जीवन।”

दो दिन कैसे बीत गए, पता ही नहीं चला। जब वे लौटने लगे तो नेहा कार तक पहुँची, मगर अचानक रुकी। उसने खेत की मिट्टी उठाई, हथेली में भरकर सूँघी और फिर अपने सीने से लगा ली। उसकी आँखें भीग गईं। वह धीमे स्वर में बोली—“राहुल, शहर चाहे जितना भी चमके, लेकिन असली जड़ें तो यहीं हैं… इस मिट्टी में। जब भी हम शहर की चकाचौंध और दिखावे की दुनिया से बोर हो जाएंगे, तो हम यहीं पर आ जाया करेंगे। वादा करो।” राहुल उसके पास आया, उसकी हथेली में रखी मिट्टी पर नज़र डाली और मुस्कुराकर बोला—“पक्का वादा, नेहा। ये भी कोई कहने की बात है? जब भी मन थक जाएगा, हम यहीं लौटेंगे… इस मिट्टी में, इस सादगी में।”

गाड़ी धीरे-धीरे कच्चे रास्ते से निकलकर पक्की सड़क की ओर बढ़ने लगी। खेत, नहर नदियाँ और गाँव की गलियाँ पीछे छूट रही थीं, मगर उनके दिलों में हमेशा के लिए एक सच्चाई बस चुकी थी—दिखावे से जीवन नहीं चलता, चलता है तो सादा जीवन और सच्चाई से भरी वास्तविक दुनिया ।

ये कहानी आपको पसंद आयेगी ।

इसी आशा के साथ ।

ज्योति आहूजा 

#झूठे दिखावे से जिंदगी नहीं चलती ।

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