औलाद का दर्द

“यह क्या बात हुई भैया, आपने पहले कहा था कि आप 15 तारीख को आकर मम्मी और पापा को अपने साथ ले जाएंगे। अब आप दो दिन पहले कह रहे हैं कि आप नहीं आएंगे।”

“अरे, मैंने क्या ज़िंदगी भर का इनका ठेका लेकर रखा है? इनकी वजह से हम कहीं घूमने भी नहीं जा पा रहे हैं। देखा जाए तो अपनी कमाई का ज़्यादा हिस्सा तो इन्होंने आप पर ही खर्च किया है, फिर मैं ही इनकी ज़िम्मेदारी क्यों उठाऊँ?”
अपने बड़े भाई नैतिक को फ़ोन पर विमल ने कहा।

नैतिक बोला, “यह क्या कह रहे हो? पापा ने मुझ पर कैसे ज़्यादा खर्च किया है? क्या तुम इसका हिसाब बता सकते हो? जितना मुझे पढ़ाया, उससे ज़्यादा तुम्हें पढ़ाया है। देखा जाए तो तुम पर ज़्यादा खर्च हुआ है। मैंने दो बार में ही पढ़ाई छोड़कर नौकरी कर ली और तुम्हें 12वीं के बाद इंजीनियरिंग करवाया, साथ में कोचिंग भी दिलवाई। अब बताओ किस पर ज़्यादा खर्च हुआ? और जिसका हिसाब ज़्यादा बनता है, उसे ही तो ज़्यादा करना पड़ेगा।”

विमल बोला, “यह सब मैं नहीं जानता। मैंने अपने घूमने का प्रोग्राम बना लिया है और मैं दो दिन बाद उन्हें वहाँ भेज रहा हूँ। अब वो आपके घर पर रहें या आपके दरवाज़े पर, मुझे इससे कोई मतलब नहीं। और इस बार तो घर और ज़मीन का भी हिसाब करना होगा। इतने सालों से आप इतने बड़े घर में मज़े से रह रहे हैं और मैं यहाँ किराए के मकान में रह रहा हूँ। इसका हिसाब भी तो लगाना ज़रूरी है।”
इतना कहकर विमल ने फ़ोन रख दिया।

 श्यामलाल की पत्नी रेनू जी यह सब सुन रही थीं। लड़खड़ाते कदमों से वो अपने कमरे में गईं और अपने पति श्यामलाल जी से बोलीं—

“क्या हुआ रेनू? तुम ठीक तो हो? तुम्हारे चेहरे का रंग क्यों उड़ा हुआ है? क्या फिर बहू ने कुछ कहा?”

रेनू जी बोलीं, “दूसरे घर की लड़की को क्या दोष दें, जब अपना ही बेटा स्वार्थी निकला।”
फिर रेनू जी ने एक-एक बात श्यामलाल जी को बताई।

श्यामलाल जी बोले, “रेनू, यह कलयुग है। आजकल के बच्चे माता-पिता के लिए नहीं, बल्कि संपत्ति के लिए लड़ते हैं। एक समय था जब माँ-बाप के कदमों में लोग स्वर्ग ढूँढते थे, अब तो माँ-बाप बच्चों को बंजर ज़मीन समझते हैं। और फिर उसी ज़मीन के लिए लड़ते हैं। शायद हमारी किस्मत में यह सब देखना लिखा था।”
इतना कहकर दोनों रोने लगे और एक-दूसरे को शांत करने लगे।

अगले दिन विमल ने श्यामलाल जी से कहा, “पापा, भैया के पास जाने की आपकी टिकट करवा दी है। आराम के चक्कर में आप लोग हर बार यहाँ चले आते हैं, वहाँ तो एक साल भी नहीं टिकते। इस बार भैया से बात कर लीजिएगा—या तो वो घर का आधा किराया मुझे दे दें या फिर आधा घर खाली कर दें, ताकि मैं अपनी मर्ज़ी से उसे किराए पर लगा सकूँ या बेच सकूँ।”

श्यामलाल जी बोले, “बेटा, तुम लोग संपत्ति के चक्कर में हमें क्यों भूल जाते हो?”

विमल बोला, “क्यों? सारी मलाई उन्हें ही खाने दूँ? गाँव का अनाज, पानी भी वो अपने हिसाब से बेच देते हैं। उस झंझट में तो मैं पड़ना नहीं चाहता, इसलिए कुछ कहता नहीं। पर कम से कम जितना किराया मैं देता हूँ, उतना तो मिलना चाहिए। ऐसा करो, उनके साथ बैठकर इस बात का फ़ैसला कर लीजिए, वरना आगे से यहाँ आने की ज़रूरत नहीं है।”
इतना कहकर विमल दफ़्तर चला गया और रेनू जी भीगी आँखों से बस बेटे की ओर देखती रह गईं।

दो दिन बाद दोनों को रिक्शे पर बिठाकर, हाथ में कुछ पैसे देकर विमल बोला,
“ गाड़ी पर तो खुद ही चढ़ जाएंगे, तो मुझे वहाँ जाने की क्या ज़रूरत है।”

वहीं विमल की पत्नी नंदिनी धीरे से पति के कान में बोली,
“हाँ, तो यह कौन से बच्चे हैं जो गुम हो जाएंगे? और बूढ़े हुए तो कौन इस बोझ को अपने साथ रखेगा?”

श्यामलाल जी बेटे से बोले,
“बेटा, संपत्ति के चक्कर में क्यों भाई से अपना रिश्ता खराब करते हो? पैसा तो हाथ का मैल होता है—आज है, कल नहीं। पर रिश्ते जीवन भर साथ रहते हैं।”

विमल बोला,
“पापा, यह ज्ञान की बातें अपने पास रखिए। जीवन में ज्ञान नहीं, पैसे की ज़रूरत पड़ती है। और यह ज्ञान आप वहाँ जाकर उन्हें दीजिएगा।”

इतना कहकर वह रिक्शे पर बैठ गए और चले गए।

रास्ते में रेनू जी बोलीं,
“बच्चे बहुत जल्दी बड़े हो जाते हैं। वो भूल जाते हैं कि एक समय था जब हम उन्हें अपनी आँखों से ओझल नहीं होने देते थे, कि कहीं हमारी आँखों के तारे रास्ता न भटक जाएँ। कभी सोचा नहीं था कि पैसों के लालच में माँ के लिए वो प्यार कहीं खो जाएगा।”

श्यामलाल जी बोले,
“रेनू, दुनिया बहुत बदल गई है। अब बच्चे माँ-बाप को नहीं, उनके पैसों को चाहते हैं। इसमें उनका भी दोष नहीं, कहीं न कहीं दोषी हम भी हैं, जो जीवन भर अपना पेट काटकर संपत्ति अर्जित करते रहे। कभी अपने बारे में सोचा ही नहीं। काश हमने अपने बारे में सोचा होता, तो आज यह दिन नहीं देखना पड़ता।”

अगले दिन वो नैतिक के घर पहुँचे। वहाँ बहू ने चाय-पानी पूछने से पहले ही कहा,
“जिस बेटे के लिए इतना पैसा खर्च किया, वो आपको कुछ दिन भी नहीं रख पाया।”

बेचारे दोनों दंपत्ति अपने ही घर में अपमानित होते रहे, पर कुछ कर नहीं पाए। आखिर बुढ़ी हड्डियाँ और समाज में अपनी पुरानी इज़्ज़त का ख्याल जो था। दोनों एक-दूसरे का सहारा बनकर रहते, पर मन का दर्द आखिर कोई कितना सह पाए।

आए दिन दोनों भाइयों में संपत्ति को लेकर विवाद होता ही रहता था। माता-पिता बहुत दुखी थे कि बच्चे माँ-बाप के लिए नहीं, बल्कि उनकी संपत्ति के लिए खून का रिश्ता भी भूल गए।

एक शाम रेनू जी पति से बोलीं,
“सुनो जी, क्या दुनिया में कोई ऐसी जगह नहीं जहाँ जीवन के आखिरी पल गुज़र सकें? अपने खून-पसीने की कमाई पर भी हमारा अधिकार नहीं? आपसे जितना मिला, उतना मेरे लिए बहुत है। अब बस दो पल चैन से सोना चाहती हूँ।”

जो पत्नी अपने बच्चों के लिए अपने पति से लड़ती थी, अपने सुख की कभी चिंता नहीं करती थी—आज वही इतनी दुखी थी कि बस इस ज़िंदगी से उठ चुकी थी। जीवन साथी को इतना दुखी देखकर कौन खुश होता है। श्यामलाल जी को लगा, जीवन भर जिस पत्नी की एक मुस्कान के लिए वह लाख जतन करते रहे, आज वो इतने मजबूर हो गए कि उसे सुख का एक पल भी नहीं दे पा रहे हैं।

पत्नी के सवाल से उन्हें बहुत दर्द पहुँचा। रेनू जी ने उस रोज़ अपनी कोई दवाई भी नहीं ली थी, तो थकान के मारे उन्हें नींद आ गई। श्यामलाल जी ने कागज़-कलम निकाला और अपनी सारी जायदाद वृद्ध आश्रम के नाम कर दी और तुरंत जाकर वो लिफाफा अपने किसी रिश्तेदार के हाथ पर देकर घर वापस आए। रेनू जी का हाथ पकड़कर कब सो गए, पता भी न चला।

बेटे-बहू ने एक बार देखा भी नहीं कि माँ-बाप ने खाना खाया या नहीं।

अगले दिन जब नैतिक ने कोई हलचल नहीं देखी, तो उनके कमरे तक गया और बोला,
“पापा जी, कुछ तो शर्म करो। इस उम्र में दरवाज़ा बंद करके इतनी देर तक कोई सोता है?”

बहुत देर बोलने के बाद भी जब कोई जवाब नहीं मिला, तो वो कमरे के अंदर गया। जैसे ही नैतिक ने उन्हें हाथ लगाया, तो पाया कि उनका शरीर ठंडा हो चुका है। दोनों अपनी औलाद के दिए गए दर्द से मुक्त हो चुके थे।

बाद में दोनों भाई लड़ते रहे, पर हाथ कुछ न आया।

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