बड़ी अम्मा – मुकेश पटेल

मिसेज़ निर्मला का आज 50वां जन्मदिन था, यानी आज वे अपने जीवन की गोल्डन जुबली मना रही थीं। उनके पति मिस्टर रामचंद्र इस जन्मदिन की शाम को यादगार बनाना चाहते थे।

निर्मला जी पेशे से एक टीचर थीं और वे अपना खुद का एक प्राइवेट स्कूल चलाती थीं। उनके पति मिस्टर रामचंद्र बैंक में मैनेजर थे।

क्योंकि आज निर्मला जी का 50वां जन्मदिन था, इस वजह से स्कूल में छुट्टी थी। स्कूल के सारे बच्चे और टीचर को आज घर पर ही निमंत्रण दिया गया था। बच्चे मिलकर अपनी प्रिंसिपल मैम का जन्मदिन खास बनाना चाह रहे थे।

सारे बच्चे मिलकर पूरे घर को सजा रहे थे। लेकिन निर्मला जी इन सबसे अनजान, घर के पार्क के लॉन में अकेली बैठी हुई थीं। उनके मन में यही विचार आ रहे थे —
“आज मैं अपने जीवन के 50 बसंत देख रही हूं, लेकिन अभी तक मुझे मां बनने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ है।”

यह सोचकर निर्मला उदास थीं। वे कल्पना कर रही थीं—
“अगर मेरा भी बच्चा होता तो वह मुझे ‘मम्मी’ कहकर पुकारता, मेरी बाहों में लिपट जाता और मेरे आंचल में समा जाता।”

एक स्त्री जब तक मां नहीं बनती, तब तक वह खुद को अधूरा समझती है। चाहे दुनिया के सारे सुख मिल जाएं, लेकिन मातृत्व का सुख न मिले तो मन खाली सा लगता है।

निर्मला जी कभी उठकर घर में जातीं, तो कभी अपने कमरे में जाकर टीवी देखने लग जातीं। फिर अचानक बच्चों के बीच जाकर बैठ जातीं। लेकिन उनका मन किसी भी काम में नहीं लग रहा था।

उन्हें लग रहा था जैसे वे सिर्फ शरीर हैं, उनकी आत्मा किसी ने निकाल ली हो। मन करता था कि चीख-चीखकर रो लें, लेकिन ऐसा भी नहीं कर सकती थीं।

वे सोच रही थीं—
“सब लोग कितने खुश हैं मेरी जन्मदिन की तैयारियों में। सब मुझे खुशी देने में लगे हुए हैं। लेकिन किसी को क्या बताऊं कि जब तक औरत मां नहीं बनती, उसके लिए हर खुशी अधूरी है।”

तभी रामचंद्र जी उनके पास आकर बैठ गए। वे बोले—
“निर्मला, देखो सब कितने खुश हैं। आज तुम्हारा जन्मदिन है, सब बहुत अच्छे से सेलिब्रेट कर रहे हैं।”

निर्मला कुछ देर तक चुप रहीं। फिर अचानक बोलीं—
“मुझे अपना खुद का बच्चा चाहिए।”

रामचंद्र जी अवाक रह गए। बोले—
“निर्मला, कैसी बहकी हुई बातें कर रही हो? तुम्हें तो पता है कि तुम कभी मां नहीं बन सकतीं। और अब हमारी उम्र भी नहीं रही कि हम बच्चा पाल-पोसकर बड़ा कर सकें।”

निर्मला बोलीं—
“मैं कहां कह रही हूं कि आप बच्चा पैदा करें। अब तो आपकी मां भी नहीं रहीं। कोई रोकने वाला भी नहीं है। हम आसानी से कोई बच्चा गोद ले सकते हैं।”

रामचंद्र बोले—
“निर्मला, तब की बात और थी। हमारी उम्र अब नहीं है कि हम किसी बच्चे को गोद लें और पाल-पोसकर बड़ा करें। और फिर हमारे स्कूल के इतने सारे बच्चे हैं। वे भी तो हमारे बेटे जैसे ही हैं।”

निर्मला ने आहत होकर कहा—
“प्यार तो करते हैं, लेकिन कोई मुझे मां तो नहीं कहता। मेरे कान तरस गए हैं यह शब्द सुनने के लिए।”

रामचंद्र ने समझाया—
“निर्मला, तुम अपने स्वप्नलोक से बाहर आओ। बाहर चलो, सब तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं। केक तैयार है। आओ और काटो।”

रामचंद्र के जाते ही निर्मला अपने ख्यालों में खो गईं। उनकी यादें 30 साल पीछे लौट गईं।

निर्मला के घरवाले खुश थे कि उनका रिश्ता बैंक मैनेजर से हुआ था। लड़का हीरो जैसा दिखता था। निर्मला ने रामचंद्र का फोटो देखकर ही उन्हें पसंद कर लिया था।

शादी से पहले जब रामचंद्र ने पहली बार मिलने की बात कही, तो घरवालों ने इजाजत दे दी। दोनों एक रेस्टोरेंट में मिले। पहले तो चुप रहे, फिर रामचंद्र ने पूछा—
“ग्रेजुएशन के बाद क्या करना चाहती हो?”

निर्मला बोलीं—
“मुझे B.Ed करना है और टीचर बनना है।”

बातचीत बढ़ी। जाते-जाते रामचंद्र ने निर्मला का हाथ पकड़कर कहा—
“कुछ दिनों बाद हम पति-पत्नी होंगे। मैं तुमसे कुछ छुपाना नहीं चाहता। मेरी मां थोड़ी गुस्से वाली हैं। पिताजी के गुजर जाने के बाद घर का सारा बोझ उन पर आ गया था। उन्होंने अपनी सारी खुशियां कुर्बान कर दीं, हमें बड़ा किया। इसलिए उनका गुस्सा हमें दवाई जैसा लगता है। उम्मीद है, तुम भी उन्हें संभाल लोगी।”

निर्मला ने वादा किया कि वे पूरी कोशिश करेंगी कि सास को कोई तकलीफ न हो।

शादी धूमधाम से हो गई। निर्मला ने अपने व्यवहार से सास का दिल जीत लिया। सास हमेशा उन्हें बेटी कहकर बुलाती थीं।

जब निर्मला ने B.Ed करने की बात की, तो सास बोलीं—
“बेटी, B.Ed की क्या जरूरत है? मैं तुम्हारे लिए स्कूल ही खुलवा देती हूं।”

पुराने मकान की मरम्मत कर स्कूल शुरू हुआ। निर्मला ने पढ़ाना शुरू किया। धीरे-धीरे बच्चे बढ़े, टीचर रखे गए। स्कूल का नाम फैल गया।

इसी बीच कई साल गुजर गए। सहेलियां मां बन गईं, लेकिन निर्मला अब भी मां नहीं बन पाई थीं। एक दिन सास ने कहा—
“बेटी, मुझे दादी बनने का सुख कब मिलेगा?”

तब जाकर निर्मला को भी अहसास हुआ। डॉक्टरों के पास गईं, इलाज कराया। लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।

सास मंदिर-मंदिर लेकर गईं, ज्योतिषियों से मिलाया, सत्यनारायण कथा करवाई। लेकिन बच्चा नसीब नहीं हुआ।

10 साल गुजर गए। निर्मला मां बनने की चाह में टूटने लगीं। उन्होंने गोद लेने की बात की। लेकिन सास ने सख्त मना कर दिया—
“मेरे रहते यह घर किसी और के बच्चे को नहीं अपनाएगा। अगर बच्चा आया, तो या तो वह रहेगा या मैं।”

निर्मला पहली बार फट पड़ीं—
“मां बनने का दर्द आप क्या जानें? बच्चा भगवान का रूप होता है। उसके साथ भेदभाव क्यों?”

लेकिन सास नहीं मानीं।

सहेली के सुझाव पर निर्मला और रामचंद्र दिल्ली गए। टेस्ट ट्यूब बेबी की प्रक्रिया करवाई। छह महीने तक उम्मीद रही। लेकिन आखिरकार डॉक्टर ने कहा—
“माफ कीजिए, सफलता की संभावना नहीं है।”

निर्मला का सपना टूट गया। वे और भी अकेली हो गईं।

फिर सास का देहांत हो गया। घर वीरान हो गया।

रामचंद्र ने स्कूल में घोषणा की—
“आज से सब लोग निर्मला को ‘दीदी’ नहीं, बल्कि ‘मां’ कहकर पुकारेंगे।”

अगले दिन सारे बच्चों ने कहा—
“गुड मॉर्निंग मम्मा!”

निर्मला की आंखों में आंसू थे। वे जानती थीं कि यह सिर्फ संबोधन है, असली मातृत्व नहीं। लेकिन फिर भी उन्होंने अपने मन को समझा लिया।

50वें जन्मदिन पर उन्होंने पति से कहा—
“मैं आपसे एक उपहार चाहती हूं। मैं एक अनाथालय खोलना चाहती हूं। जिन बच्चों को मां का सुख नहीं मिला, मैं उन्हें यह सुख देना चाहती हूं।”

रामचंद्र भावुक हो गए—
“बस इतनी सी बात? समझो तुम्हें यह उपहार मिल गया।”

कुछ ही महीनों में अनाथालय बनकर तैयार हुआ। अब वहां के सारे बच्चे निर्मला को “बड़ी अम्मा” कहते थे।

निर्मला की दुनिया अब स्कूल और अनाथालय थी। बच्चों की मुस्कान में ही उन्होंने अपनी अधूरी मां बनने की पीड़ा को ढक लिया था।
लेखक : मुकेश पटेल

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