मैं पीहू…..आज मैं अपनी ननकी बुआ की बातें आपसे करूंगी …..वैसे तो मेरी दो बुआ है ….बड़की बुआ और ननकी बुआ….. ये बड़की और ननकी बुवाओ के घर के नाम है …..पर इसी नाम से हमारी दोनों बुआ पूरे मोहल्ले में जानी जाती हैं …..हम सब बड़ी बुआ को बड़की बुआ और छोटी बुआ को ननकी बुआ कहते हैं….!
बड़की बुआ एकदम शांत ,सुशील, समझदार थी ….ठीक इसके विपरीत ननकी बुआ चंचल , अल्हड़ शोख ,मस्त मौला बुआ… किसी चीज की परवाह चिंता नहीं….
अरे नहीं… नहीं ….परवाह चिंता तो थी , बस एक चीज की और वो था उनका पर्स…..हां भाई पर्स ….हमारी ननकी बुआ पर्स की बड़ी शौकीन थी…
सुंदर-सुंदर पर्स रखना उन्हें बहुत पसंद था….सबसे बड़ी बात वो पर्स को लेकर बहुत सचेत रहती थी … अपने पर्स को किसी को छूने भी नहीं देती थी…. कभी-कभी अपने पर्स के प्रति उन्हें अति परवाह या चिंता करने पर उन्हें लज्जित भी होना पड़ता था… हम सब मिलकर उनकी हंसी उड़ाने से नहीं चूकते थे….पर वो बिना बुरा माने अपना पर्स फिर भी अपने हाथों में पकड़े ही रहती थी …. एक मिनट के लिए भी छोड़ना नहीं चाहती थी…।
एक बार चुपके से मैंने उनका पर्स खोला और फटाफट सामान उलट-पुलट कर देखने की कोशिश की…. कि आखिर ननकी बुआ के पर्स में है क्या …? जो इतना जतन कर , संभाल कर रखती हैं…किसी को छूने तक नहीं देती ….तभी ननकी बुआ की नजर मुझ पर पड़ी और उन्होंने मुझे ऐसे घूरा मानो मैंने कुछ चोरी ही कर ली हो …..! पर मैं भी तो उन्हीं की भतीजी थी ना … थोड़ा भी नहीं डरी… और आखिर पूरा पर्स देख ही लिया… फिर मैंने वहां बैठे सभी लोगों से कहा….
अरे , बुआ के पर्स में तो ऐसा कुछ भी नहीं है ….आप लोग बेकार में ही बुआ की हंसी उड़ाते हो…!
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फूफा जी के रिटायरमेंट के बाद दीदी (बुआ की बेटी) सेजल ,जीजाजी ,भैया भाभी ( बुआ के बेटे बहू) सभी ने मिलकर एक साथ घूमने का प्रोग्राम बनाया…..बुआ की प्यारी भतीजी …मैं.. पीहू भी उनके साथ हो ली…!
लाइए ना मम्मी जी दीजिए…मैं पर्स पकड़ लेती हूं बुआ को बड़ा पर्स टांगे देखकर भाभी ने कहा…
अरे नहीं ठीक है…. कहकर बुआ ने भी बात टाल दी… सास बहू की बातें सुनकर फूफा जी ने कहा… अरे छोड़ो बहू (अरुणिमा) तुम्हारी मम्मी जी सब कुछ दे सकती हैं पर अपना पर्स कभी नहीं… किसी को भी नहीं देती…!
तभी बेटे (आरव) ने कहा…. मम्मी के पर्स में खजाना है सबको थोड़ी ना दिखाएंगी …हां भाई बिल्कुल …मेरे लिए तो… मेरे हजार , पांच सौ ही मेरे करोड़ों के बराबर है…..ऐसे कैसे सबको दिखा दूं …. ननकी बुआ ने भी तुरंत जवाब दिया और सब लोग हंस पड़े…!
थोड़ी दूर जाने के बाद सेजल दीदी ने कहा…..ला ना मां मुझे दे दे पर्स ….मैं पकड़ लेती हूं ….नहीं नहीं बेटा , मैं पकड़ी हूं ना……बुआ का जैसे ही ये कहना था…… सेजल दीदी ने रुखे व कड़े शब्दों में कहा …..अरे बहुत हो गया मम्मी….. ठीक से चलते तो बन नहीं रहा… ऊपर से इतना बड़ा पर्स ले ली हो ….और किसी को देती भी नहीं हो पकड़ने को…।
ननकी बुआ मन ही मन सोच रही थी…. दामाद नहीं होते तो तुझे डांट भी देती पर दामाद के सामने चुप ही रहती हूं …..इतना पर्स पकड़ने का शौक है तो अपना अपना क्यों नहीं लेकर आते हो….. मैं अपने जिम्मे पर अपना पर्स लेकर आती हूं….किसी के भरोसे नहीं…!
हम लोग सुबह-सुबह जंगल सफारी के लिए निकले…. ठंड थी…भाभी ने कहा ….…कान से सीधे हवा जा रही है कॉटन होता तो कान में लगा लेती ….बस फिर क्या था ननकी बुआ ने पर्स खोला कॉटन का एक टुकड़ा देते हुए कहा लो लगा लो… अरे मम्मी आपने पर्स में कॉटन भी रखा हैं …और बुआ मुस्कुरा दीं…! सेजल दीदी के बाल खुले थे जो काफी उड़ रहे थे…. जल्दी-जल्दी में क्लचर लगाना ही भूल गई थी…. ननकी बुआ ने तुरंत पर्स खोल क्लचर निकाल कर दिया…सभी लोगों ने अपना-अपना मोबाइल ननकी बुआ के पर्स में ही रखा …. अंत में पर्स में से टिशु निकालते हुए ननकी बुआ ने मुझसे कहा ….लो नाक पोछ लो पीहू… और टिशू यहां वहां फेंकना मत…. एक पॉलिथीन भी पर्स में से निकाल कर मेरी और बढ़ाते हुए बोली… इसमें रखना बेटा…!
वाह ननकी बुआ ….मान गई आपको… आप अपने पर्स में कितना कुछ रखती है ….आवश्यकता की सभी चीजें…… तभी फूफा जी ने पीछे से कहा ….अरे ये तो सब समान है …अभी तो असली माल कितना होगा ये तो किसी को पता नहीं…।
किसी को खांसी आए तो लौंग से लेकर सिर दर्द पेट दर्द की दवाइयां.. पुराने पेपर और न जाने क्या-क्या… समाया होता था उनके पर्स में…!
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वाकई …ननकी बुआ और उनका पर्स था तो कमाल का…. कुछ ना कुछ तो ज्यादा पैसे जरुर रखतीं होंगी वो……जो सबको पता नहीं होगा …वैसे भी कुछ लोगों की आदत होती है अपना अलग से कुछ रूपए पैसे छिपा कर रखना …. जिसके बारे में घर वालों को पता ना चले…!
कुछ ही महीनों के बाद हमारी ननकी बुआ ह्रदयाघात से शांत हो गई…. एकदम शांत…. ना कभी रुकने वाली ..ना कभी थकने वाली …ना कभी हारने वाली …और ना ही कभी झुकने वाली….. ननकी बुआ आज अपनी जिंदगी से हार गई थी …थक गई थी …वह ईश्वर के मर्जी के आगे झुक गई थी…!
हम सब नम आंखों से आज ननकी बुआ के ऐसे रूप को देख रहे थे …जो बिल्कुल भी वैसी थी नहीं… शांत स्थिर ,चुप की मुद्रा में लेटी हुई…. अरे हमारी ननकी बुआ के लिए तो शांत रहना सबसे कठिन होता था…. पर आज एकदम शांत पड़ी थी ननकी बुआ …..
नहीं…. जोर से चीखी थी भतीजी पीहू…. उठो ना , बुआ और जोर-जोर से रोने लगी थी…!
एक कोने में बड़की बुआ सिसक – सिसक कर न जाने कब से रोए जा रही थी…आखिर दोनों बहनों की बेमिसाल जोड़ी अब जो टूट गई थी ..अकेली हो गई थी बड़की बुआ…
रीति रिवाज से सारे क्रियाकर्म संपन्न हुए… समय खुद में बहुत बड़ा मरहम होता है…. सहने की शक्ति आ ही जाती है…।
आनन – फानन में फूफा जी ने अलमारी खोली…. वो बड़ा सा लाल पर्स भी कोने में शांत पड़ा था….. हम सब…. भैया भाभी , दीदी जीजाजी , बड़की बुआ मैं और फूफा जी … सबने पर्स को देख ननकी बुआ की एक-एक बात को याद किया…।
आज हमने पर्स खोलकर देखना चाहा ….रोकने वाली ननकी बुआ भी तो नहीं थी…!
पर्स में सारा सामान मौजूद था …मानो कहीं जाने की तैयारी कर रखी हो ननकी बुआ ने……अब बारी आई छोटे चैन , जिसमें पैसे रखे होते हैं… उसे खोलने की….
पांच पांच सौ के कुछ नोट थे…. लगभग 3000 रहे होंगे….. हां रजिस्टर का एक पन्ना था… जिसमें कुछ लिखा था……
लक्ष्मनिया को…..₹700 दिए हैं…. 500 वापस लूंगी ….200 छोड़ दूंगी…
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दूध वाले शंभू भैया….. पांच सौ… दो महीने बाद लौटाएंगे….
ऐसे ना जाने कितने हिसाब किताब उस पन्ने में लिखे थे….
पन्ने में लिखे हिसाब पढ़ते ही फूफा जी के आंखों में आंसू आ गए ….उन्होंने बताया…मेरी हिसाब लिखने की आदत थी …रोज का खर्च भी डायरी में लिखा करता था …!
जब दिन भर के खर्च का हिसाब पूछता तो कभी-कभी खीज जाती थी तुम्हारी मम्मी ….कहती…. शर्मा जी आप ही घर चलाया कीजिए…. मुझसे नहीं होता …..मैं हर चीज याद नहीं रख पाती ….अब भूल जाती हूं…!
इस बात पर मैं नाराज होकर दो बातें भी सुना दिया करता था…. पर मुझे क्या मालूम वो तो छोटा-मोटा एनजीओ ही चला रही थी…।
फूफा जी ने झट से अपने आंसू पोछे और पन्ने में लिखें भावनाओं को गले लगाया…. दृढ़ संकल्प से ननकी बुआ द्वारा छोड़े गए अधूरे कार्य को बड़ा रूप देने का संकल्प लिया…. फूफा जी के आंखों के आंसू अब मोती बन …न जाने कितने गरीब निराश्रित लोगों के उम्मीद की किरण बनी…!
ऐसी थी हमारी ननकी बुआ….।
(स्वरचित, सर्वाधिकार सुरक्षित और अप्रकाशित रचना )
साप्ताहिक प्रतियोगिता : # आंसू बन गए मोती
संध्या त्रिपाठी