रवि व सुषमा की शादी को पाँच साल हो गये थे।सब सवाल करते क्या बात है।कब तक की प्लानिंग है।वे दोनों बच्चे के लिए परेशान थे।
पाँच साल बाद सुषमा के पांँव भारी हुए।
घर में खुशी की लहर छा गयी। परिवार वाले सभी उसका ध्यान रखते।
रवि रोज आफिस से आते समय सुषमा की पसंद की चीज खानें के लिए लेता आता।सासु माँ भी उसकी पसंद की जलेबी हर आठवें दिन बना के देती।
समय बीतता गया, सातवें माह में मायके में गोद भराई की रस्म हुई।मांँ व भाभी उसका बहुत ध्यान रखती थी।
समय आने पर सुषमा ने एक प्यारी सी बेटी को जन्म दिया। ससुराल मायके में मिठाई बाँट के खुशियांँ मनाई गई।
दिन-दूनी रात चौगुनी सुषमा की बेटी बड़ी होती जा रही थी।तीन साल की गुड़िया बड़ी सुंदर प्यारी था। गुड़िया का असली नाम था ‘चारु’।
उसकी बुआ ने उसे पहली बार देखते ही कहा था,”बड़ी सुंदर है गुड़िया तो,भाभी इसका नाम ‘चारु’रखना।पता है भाभी, चारु का अर्थ होता है सुंदर।”
गुड़िया मीठी-मीठी बातें करती थी। पूरे मोहल्ले की प्यारी थी।जो भी देखता चूम लेता था।
जो उसके गाल छूता गुड़िया मुंँह बनाकर कहती थी,” मत लगाओ ना हाथ, मेरे गाल गंदे हो जाते हैं।”कोई चूमता तो झट गाल को अपने फ्राक से पोंछ लेती थी।
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खेलते-खेलते जिसके घर पहुंँच जाती, वही उसे प्यार से खाना खिला देता था।
समय चक्र चलता रहा।जाने कब वह अल्हड़ बिटिया समझदार होने लगी थी।
माँ कहती,”तू अब बड़ी हो गई है ढंग से उठा बैठाकर”।
कभी वह कुछ सवाल-जवाब करती तो दादी समझाती “गुड़िया बेटा अब तू बड़ी हो गई है, बहस मत किया कर, बात समझाकर”।
हर बात पर सब समझाते व कहते’ बेटा अब तू बड़ी हो गई है।”गुड़िया अपने मन ही मन सोचती “कहांँ बड़ी हो गई?”
दो दिन बाद गुड़िया की सहेली रानू की शादी थी।
गुड़िया रानू की हल्दी की रस्म में माँ के साथ जा रही थी। उसने बहुत सुंदर पीला लहंगा व चुनरी पहनी थी।सबकी आँखें उस पर टिक रही थी।
रानू की मौसी का परिवार भी आया था।
रानू ने गुड़िया का अपने रिश्तेदारों से परिचय करवाया । रानू की मौसी को गुड़िया बहुत भा गई।अपनी बहन से अपने बेटे के लिए बात करने के लिए उनने कहा।
रानू की माँ ने गुड़िया की मम्मी सुषमा से कहा “मेरी बहन का लड़का है, आप लोग भी देख लो, बहुत अच्छा होनहार व सुंदर है। शहर में नौकरी करता है। पैसे वाले लोग हैं, खूब जमीन जायदाद भी है। इकलौता बेटा है।
सुषमा ने अभी गुड़िया की शादी के बारे में सोचा भी न था, वह सकपका गई।बोली गुड़िया के पापा से बात कर के बताती हूँ।
रात को गुड़िया की माँ अपने पति से रानू की मम्मी की कही बात बता रही थी।
गुड़िया सुन रही थी। वह पिता से बोली,”क्या बोल रही है पापा, मम्मी ?”
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पापा बड़े प्यार से उसके माथे पर हाथ फेरते बोले,”तेरी शादी की बात कर रही है”।
गुड़िया बोली,”मैं पढ़ाई करुंँगी।
पिता बोले,”बेटा शादी तो करना पड़ेगी, रानू की भी हो रही है ना।अब तू बड़ी हो गई है।
अपने पिता के मुख से पहली बार यह वाक्य सुन गुड़िया अपने बाबू से लिपट कर फूट-फूट कर रोने लगी। रोते-रोते बोले जा रही थी,”मुझे आप से दूर नहीं जाना पापा, मुझे आप बताओ न मैं बड़ी क्यूँ हो गई! मैं बड़ी क्यूँ हो गई।”
सुनीता परसाई
जबलपुर मप्र