अमित पुणे में सॉफ्टवेयर कंपनी में इंजीनियर के पद पर काम करता है। उसका घर
राजस्थान में है , इसलिए बार -बार आना -जाना नहीं हो पाता। आज पूरे तीन महीने बाद
वो अपने घर आ रहा है। उसके घर में मम्मी -पापा, भाई -भाभी और उसकी पत्नी रेणुका है।
भाई के दो बच्चे हैं आलोक और रूही। दोनों बच्चे स्कूल जाते हैं।
दोपहर को वो पहुंचा तो सभी लोग अपने -अपने कमरों में आराम कर रहे थे। उसकी पत्नी
रेणुका रसोई में खाना बना रही थी। उसको आया देख , वो गिलास में पानी ले आयी।
अमित ने बहुत ग़ौर से रेणुका को देखा उसे उसकी आँखों में वो चमक , वो ख़ुशी दिखाई ही
नहीं दी , जो पहले दिखाई देती थी। वो असमंजस में सोफे पर बैठा ही था कि रेणुका सबको
बुला लाई। अमित मम्मी -पापा , भाभी से मिला। बड़े भाई उसी शहर में नौकरी करते थे ,
तो शाम को घर आ जाते थे। बच्चे अभी स्कूल में थे। तभी रेणुका , अमित के लिए चाय-
नाश्ता लेकर आयी। प्लेट में सुबह की सब्जी देख सासुमां चिल्लाके बोली , अरे करमजली
पति इतने दिन बाद घर आया है , कुछ ढंग का बना देती। रेणुका ने कुछ नहीं कहा , पर
अमित ने ही कह दिया कोई बात नहीं माँ घर का खाना अच्छा ही लगता है। मेरे आने की
ख़बर किसी को नहीं थी। नाश्ता करके अमित अपने कमरे में लेटने चला गया। उसे लगा
घरवालों के सामने तो रेणुका ने कोई ख़ुशी नहीं जाहिर की पर कमरे में आकर जरूर कुछ
कहेगी पर रेणुका आयी ही नहीं। उसका रास्ता देखते -देखते अमित की आंख लग गयी। जब
आलोक और रूही उसे उठाने आए , तब उसकी नींद खुली।बच्चे चाचू -चाचू करके आगे पीछे
घूम रहे थे। अमित ने दोनों को मनपसंद उपहार और मिठाई दी तो खुश हो गए। अमित
सभी के लिए कुछ न कुछ जरूर लेकर आते थे। माँ और भाभी के लिए साड़ी लाये थे। पापा
के लिए नया चश्मा और भाई के लिए टी-शर्ट्स लेकर आये थे। सभी हॉल में बैठ कर अपने –
अपने गिफ्ट्स देख रहे थे। रेणुका सबके लिए चाय ले आई। सबको चाय देकर वो वापिस
रसोई में चली गई। उसने एक बार भी नहीं कि उसके लिए क्या लाया हूँ। कहीं न कहीं
अमित को कुछ अजीब लग रहा था, पर उसने सोचा कोई न रात को अच्छे से बात कर लूंगा।
रात के खाने के वक़्त भी सभी लोग खाना खा रहे थे , और रेणुका परोस रही रही थी। गरम
-गरम रोटियां सेक रही थी और दे भी रही थी। अमित सोचने लगा पहले तो भाभी और
रेणुका दोनों मिलकर काम करती थीं। सबके खाना खाने के बाद रेणुका ने सबके बर्तन उठाये
और सिंक में रख दिए और टेबल साफ़ कर दी। सभी खाना खाकर अपने -अपने कमरों में
चले गए। रेणुका अभी रसोई में ही थी। लगभग एक घंटे बाद वो काम ख़तम करके अपने
कमरे में आई। अमित कब से उसका इंतज़ार कर रहा था। कमरे में आकर रेणुका ने पूछा
कुछ चाहिए आपको ? नहीं बस तुम चाहिए कहकर अमित ने उसे अपनी बाँहों में भर लिया।
तभी भाभी की आवाज़ सुनाई दी , रेणुका तुमने बच्चों को दूध क्यों नहीं दिया अब तक ?
भाभी की आवाज सुनकर रेणुका जल्दी से कमरे से बाहर चली गयी। अमित सोचने लगा
भाभी कौन सा इस घर में मेहमान है, अपने बच्चों के लिए दूध तो ले ही सकती हैं ?
दूध देने के बाद रेणुका कमरे में आयी। अमित ने पूछा भी रेणुका कोई बात है क्या ? तुम
इतना चुप -चुप क्यों हो ? मुझे देखकर खुश नहीं हो क्या ? नहीं ऐसे बात नहीं है खुश हूँ न ,
रेणुका ने कह तो दिया पर उसकी आँखों में उभरती नमी को अमित ने देख लिया। अंतरंग
पलों में भी रेणुका चुपचाप पड़ी रही। रेणुका तो सो गयी पर अमित बेचैन हो गया। आख़िर
कोई तो बात है , वरना जो लड़की उसके घर आने पर बच्चों की तरह चहकती थी , आज़
ख़ुशी तक जाहिर नहीं की। यहाँ तक कि ये भी नहीं पूछा मेरे लिए क्या लाए हो ? सोचते –
सोचते अमित कब सो गया उसे पता ही नहीं चला।
सुबह एकदम से उसकी नींद खुली तो देखा , रेणुका बिस्तर पर है ही नहीं। बाथरूम में भी
नहीं थी। उसने घड़ी देखी अभी तो 5 :30 ही बजे हैं। बाहर आकर देखा तो रसोई घर की
लाइट जगी थी। अमित रसोई में गया तो देखा रेणुका नाश्ते की तैयारी कर रही थी। इतनी
सुबह किसके लिए खाना बना रही हो? अमित ने पूछा। वो बच्चों के लिए उनका स्कूल 7 :30
बजे लग जाता है न। रेणुका धीरे से बोली। पर उसके लिए तो भाभी को उठना चाहिए ना
? अमित की बात सुनकर कलछी चलाते हुए रेणुका के हाथ एक दम से रुक गए और अमित
की तरफ बड़ी हैरानी से देखने लगी। तभी सासुमां की आवाज आई रेणुका , ओ रेणुका कहाँ
मर गयी सुबह -सुबह अभी तक चाय भी नहीं दी। जी अभी लाई कहकर रेणुका ने जल्दी –
जल्दी सबके लिए चाय बनाई और सबके कमरों में देकर आ गयी। उसके बाद उसने जल्दी –
जल्दी खाना बनाया , बच्चों का लंचबॉक्स , बड़े भाई का लंचबॉक्स पैक किया। बच्चों को
छोड़ने बस स्टॉप तक गई। जब तक रेणुका वापिस आयी, घर के बाकि लोग नाश्ता कर चुके
थे। जब रेणुका वापिस आई तो अमित ने देखा : उसके दोनों हाथ सामान से भरे हुए थे।
सब्जी, फल , दूध, अखबार और भी छोटा -मोटा सामान। घर पहुंचकर सारा सामान
यथोचित जगह पर रखा, और अखबार पापा जी को दे दिया।उसके बाद उसने पूरे घर की
सफाई की , रसोई समेटी। अभी नहा -धोकर खाना खाने लगी ही थी कि पापा ने चाय की
फरमाइश कर दी। ढंग से खाना भी नहीं खा पायी। पूरा दिन बस कामों में ही उलझी रही।
अमित सब कुछ ग़ौर कर रहा था। भाभी सारा दिन कमरे में ही रहती हैं और रेणु को कमरे
तक में आने की फुर्सत नहीं थी।पूरे दिन में सिर्फ एक बार आयी वो भी नहाने और कपडे
बदलने के लिए। रात को फिर अमित ने बड़े प्यार से रेणुका को पूछा क्या बात है रेणु ? जब
से आया हूँ तुमने ढंग से बात तक नहीं की। सारा दिन बस घर के कामों में ही लगी हुई हो।
पहले से ज्यादा कमजोर हो गयी हो। सारे काम तुम क्यों करती हो , जो सफाई वाली आती
है उससे क्यों नहीं करवाती ? वो अब नहीं आती , उसे मम्मी जी ने काम से हटा दिया है।
रेणुका ने जबाब दिया। क्यों हटा दिया ? क्यों आपको पिछली बार का कुछ भी याद नहीं ?
रेणुका ने हैरानी से पूछा। पिछली बार का मतलब ? अमित ने हैरानी से पूछा। क्यों पिछली
बार आप ही तो सजा का फरमान सुना कर गए थे कि घर के सारे काम मैं ही करुँगी।
इतनी जल्दी भूल भी गए आप ? रेणुका ने कहा। उसी फरमान की सजा भुगत रही हूँ। कहते
-कहते रेणुका की आँखों में आंसू आ गए। वो दूसरी तरफ़ मुंह करके सो गयी। अमित को
तीन महीने पहले की बातें वैसे तो याद नहीं थी पर हाँ थोड़ा दिमाग पर जोर डाला तो थोड़ा
बहुत याद आने लगा। उस दिन भाभी, मम्मी और भैया की जबरदस्त बहस हुई थी। भाभी
का कहना था की सारा काम वही करती हैं और रेणुका कुछ भी नहीं करती। जबकि रेणुका
सारा दिन उनके साथ ही हेल्प करवाती थी। उस दिन रेणुका शॉपिंग करने गयी थी और
अमित भी घर पर नहीं था I शाम को घर आयी तो माँ उसके ऊपर जोर से चिल्ला पड़ीं ;
सारा दिन इधर -उधर घूमती रहती हो , कभी घर का काम भी देख लिया करो। रेणुका
बोली : मांजी , आपसे पूछ कर ही तो गयी थी। तो क्या एहसान कर दिया , अंदर तेरी
भाभी बीमार पड़ी है, खाना नहीं बनाना था क्या ? पर मांजी मुझे नहीं पता कि वो बिमार
हैं। और अगर ऐसी बात थी तो आप फ़ोन करके मुझे बुला लेती ,या खुद बना लेती। रेणुका
ने अपनी बात रखी। अच्छा अब दो -दो बहुओं के होते हुए मैं सारा काम करूँ ? यही संस्कार
दिए हैं तुम्हारे माँ-बाप ने ? बस कीजिये मांजी, मैंने ऐसा क्या कह दिया है जो आप मेरे माँ-
पापा को सुना रही हैं। उनके खिलाफ मैं कुछ नहीं सुनूंगी। तभी उसके गाल पर ज़ोर से
तमाचा पड़ा, आंख उठा कर देखा तो सामने अमित था। मेरी माँ से जुबान लड़ाने की हिम्मत
कैसे हुई ? अमित जोर से चिल्लाया। पहले पूरी बात तो सुन लो, रेणुका ने अपनी बात
रखनी चाही, पर अमित ने कुछ नहीं सुना। बस मुझे कुछ नहीं सुनना। तभी अमित की माँ
ने बात में नमक -मिर्च लगाकर कहा ; अरे बेटा मैं तो इसे बस इतना कह रही थी कि आज
तुम्हारी भाभी बीमार है ,थोड़ा काम कर ले , तो महारानी कहती हैं आप ही कर लो। अब
बता इस उम्र में मैं काम करुँगी। मेरे तो भाग ही फूट गए कहकर वो झूठ-मूठ की रोने लगीं।
तभी अमित ने कह दिया आज से घर का सारा काम तुम करोगी समझी , नहीं तो मायके
भेजते देर नहीं लगेगी। उसके अगले दिन अमित वापिस पुणे चला गया था और कल ही
लौटा था।
अमित को अपनी गलती का एहसास हो गया की उसने बिना जाने रेणुका को इतनी बड़ी
सजा सुना दी। उसने सोई हुई रेणुका पर नजर डाली। चेहरे की रूमानियत कहीं खो गयी
थी। हाथों पर कहीं जले के निशान थे, कहीं कटे होने के। उसे देखकर कोई नहीं कह सकता
था कि वो इस घर की बहु है, ऐसा लग रहा था नौकरानी है या यूँ कहें नौकरानी से भी
बद्द्तर हालत थी उसकी । अब मैं ऐसा नहीं होने दूंगा। अपनी गलती का प्रायश्चित
करूँगा।
सुबह अमित उठा तो देखा, रेणुका वैसे ही कामों में लगी हुई थी, सारे घरवाले उसी को काम
के लिए बुला रहे थे। अमित ने माँ से पूछा : माँ वो काम वाली क्यों नहीं आ रही ? अरे बेटा
घर में काम ही कितना है , सब मिलकर करेंगे तो जरूरत नहीं।और वैसे भी तू ही तो
पिछली बार कह कर गया था कि सारे काम तेरी पत्नी ही करेगी , तभी तो घर में शांति है।
माँ काम करवाने को बोला था, नौकरानी बनाने को नहीं। मिलजुल कर काम हो कहाँ रहा है
? सारा दिन यही लगी रहती है। यहाँ तक कि बच्चों का काम भी इसी के ऊपर डाल रखा है।
बच्चों का काम भाभी भी तो कर सकती हैं। बच्चे उनके हैं तो जिम्मेदारी भी उनकी हुई ना।
एक अगर खाना बना रही है तो दूसरी रसोई भी तो साफ़ कर सकती हैं। पर यहाँ तो सब
कुछ रेणुका ही कर रही है। अमित की बातें सुनकर उसक माँ को गुस्सा आ जाता है और जोर
से चिल्लाती हुई कहती हैं , क्यों री करमजली , आते ही मेरे बेटे के कान भर दिए तूने। यही
सिखाया है क्या तेरे माँ-बाप ने। रेणुका रसोई से निकल कर आई , तभी अमित ने कहा इसने
कुछ नहीं कहा। पिछले दो दिन से जो नोटिस कर रहा हूँ वही बोल रहा हूँ। ये बहु है इस
घर की कोई नौकरानी नहीं है। अमित ने सबके सामने रेणुका से माफ़ी मांगी और उसे अपने
साथ पुणे ले गया।
दोस्तों कई बार हम अनजाने में ही किसी को गुनहगार मान लेते हैं। बिना पूरी बात जाने
सजा सुना देते हैं , ये भी नहीं सोचते की उस पर क्या बीत रही होगी। सभी को अपनी बात
रखने का हक़ होता है , यहाँ तक की कोर्ट भी सारे सबूत, गवाह ख़िलाफ़ होने के बाद भी
सजा सुनाने से पहले एक बार मुजरिम से उसकी सफाई मांगते हैं।
कई घरों में देखा है , छोटी -छोटी बातों के लिए बहुओं को ही नहीं , अपने बच्चों के साथ भी
गलत व्यवहार कर बैठते हैं। और बाद में शर्मिंदा भी होते हैं अपने व्यवहार को सकारात्मक
बना चाहिए।
समिता बडियाल